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उपन्यासकार
कमलेश्वर
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प्रकाशक
राजकमल प्रकाशन,
नेताजी सुभाष मार्ग,
नई दिल्ली-२
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पृष्ठ -
128
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मूल्य -
15$
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प्राप्ति-स्थल
भारतीय साहित्य संग्रह
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अम्मा (उपन्यास)
मूलतः सिनेमा के लिए लिखे
गए बड़े कैनवस के इस छोटे उपन्यास पर दृष्टि डालने के पूर्व
लेखक के 'कुछ शब्द' पढ़ लेना ज़रूरी है, ''यह उपन्यास मेरे
आंतरिक अनुभव और सामाजिक सरोकारों से नहीं जन्मा है और इसका
प्रयोजन और सरोकार भी अलग है. . .यह उपन्यास साहित्य के
स्थायी या परिवर्तनशील रचना विधान और शास्त्र की परिधि में
नहीं समाएगा क्यों कि यह सिनेशास्त्र के अधीन लिखा गया है।''
निस्संदेह एक लंबी कालावधि
के ओर-छोर में बसी इस द्रुतगामी कथा को रचना विधान इन तथ्यों
को काफ़ी गंभीरता और स्वतःस्फूर्त ढंग से स्पष्ट कर देता है।
लेखक के ही शब्दों में निहित सरोकारों के लिए नई शब्दावली
में जिसे एक पीरियड फ़िल्म कहते हैं, के निर्माण के लिए लिखे
गए इस उपन्यास में स्वतंत्रता पूर्व के दृश्य हैं, जहाँ अपने
समय के संघर्ष और त्रासदियों को झेलता एक परिवार है, पर जहाँ
उस परिवार के चरित्रों के विकास की पूर्वकथाएँ नहीं हैं।
संभव है, सिनेशास्त्र के लिए यह आवश्यक न हो। बहरहाल, बाबू
कुंदनलाल के दो बेटे हैं प्रवीण और नवीन, तथा एक बेटी है
मुन्नी। उनकी पत्नी का नाम है सरस्वती। संयुक्त परिवार के
विलगाव की पहचान स्वरूप कुंदन के भाई हैं जो उनकी पुश्तैनी
संपत्ति में नाजायज़ तरीके से क़ाबिज़ हैं और यह प्रकरण
न्यायालय में लंबित है। काल के संक्रमण में तमाम विपरीतताओं
के रू-ब-रू खड़े ये परिवार अपनी अस्तित्व रक्षा और अस्मिता
के अपने-अपने मूल्यों के साथ जूझ रहे हैं।
उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण
पहलू यह है कि कुंदनलाल का बेटा नवीन स्वतंत्रता आंदोलन में
क्रांतिकारी है। ब्रिटिश पुलिस उसे पागलों की तरह ढूँढ़ रही
होती है। परिवार से जुड़े प्रसंगों के इतर उसका जब भी ज़िक्र
आता है, उपन्यास की रोचकता बढ़ जाती है। मूल कथा वहाँ से
शुरू होती है जब कुंदनलाल के बड़े बेटे का विवाह शांता नामक
देशभक्त लड़की से हो रहा होता है और वह जब विदा होकर एक नई
जीवन यात्रा के लिए ट्रेन में होती है, तब लुकता-छिपता उसका
क्रांतिकारी देवर नवीन उससे मिलने पहुँचता है।
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स्पष्ट है कि शांता की
देशभक्ति उससे मिलने के बाद ज़्यादा प्रबल होती है। लेकिन
शांता का पति यानी नवीन का बड़ा भाई प्रवीण गांधीवादी
विचारधारा का है और स्कूल में अध्यापक है। उसमें नवीन जैसी
दृढ़ता का सर्वथा अभाव है।
कथा के उत्तरोत्तर विकास में
आगे तमाम ऐसी घटनाएँ हैं जो उस काल विशेष में संभव हो सकती
थीं। मसलन, शांता कथा के अंतिम छोर तक आते-आते 'अम्मा' के
रूप में प्रतिष्ठित होती है। इस प्रतिष्ठा की प्राप्ति के
एवज़ में उसे अनेक प्रकांड दुख झेलने पड़ते हैं। पति
प्रवीण की हत्या होती है, तब सास से लेकर समाज तक के लोग
उसे सती हो जाने के लिए सनातनता की याद दिलाते हुए उकसाते
हैं। पर उसके ससुर द्वारा उसे ऐन वक्त पर बचा लिया जाता
है। कालांतर में न्यायालय के निर्णय के बाद उसे पुश्तैनी
जायदाद हासिल होती है। आगे चलकर वह संपन्न कारोबारी बनती
है। पर उन शिखर दिनों के अंत में वह 'अम्मा' कहलाने लायक
तब होती है, जब जायदाद के बँटवारे में वह अपने जेठ के पाले
हुए बच्चों को भी शामिल करती है और अपने धूर्त दामाद को
कठोर शर्तों के साथ वहाँ स्थान देती है। कठोर जीवन के
समानांतर एक प्लूटॉनिक किस्म का प्रेम उसके जीवन में
किशोरावस्था से पैवस्त रहता है पर एक पड़ोसी की शिनाख़्त
के रूप से आगे वह कभी नहीं बढ़ता। वह पड़ोसी सलीम
जीवनपर्यंत उसका साथ निभाता है।
दरअसल, यह उपन्यास
तात्कालिक व्यवस्था में एक मानक सामाजिकता की शीर्ष स्थिति
की वकालत करता है। सबसे रोचक तथ्य यह है कि इन सार्थक
मूल्यों के पीछे विचारधाराओं की अभिप्रेरणा काम नहीं करती।
यह मनुष्य के प्रादुर्भाव के बाद निरंतर विकसित होता वह
तत्व है जो अंततः विद्यमान रहेगा। संभवतः लेखक जीवन के इस
तत्व की अक्षुण्णता से भलीभाँति परिचित है इसलिए बिना किसी
लाग-लपेट के इसे यहाँ प्रतिपादित करने में सफल हुआ है।
भाषा की सहजता-सरलता तो
यहाँ एक दीर्घकालिक लेखन के कौशल को दर्शाती ही है,
प्रभावोत्पादकता पैदा करने की गरज से उत्पन्न अनावश्यक
विस्तार की अनुपस्थिति पाठकीय जिज्ञासा में बाधा पैदा नहीं
करती।
–राजेंद्र दानी
16 अप्रैल 2007
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