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आज सिरहाने

 

कवि
श्रीप्रकाश शुक्ल
*

प्रकाशक
लोकभारती प्रकाशन
15 ए, महात्मा गाँधी मार्ग
इलाहाबाद

*

पृष्ठ - 104
*

मूल्य - 100 रुपए
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जहाँ सब शहर नहीं होता (कविता-संग्रह)

श्रीप्रकाश शुक्ल आसपास की बनती-बिगड़ती दुनिया से बेहद ख़बरदार युवा कवि है। उनकी कविता प्रतिरोध और करुणा की ताक़त से लैस है। श्रीप्रकाश के यहाँ कविता कहाँ से शुरू हो सकती है और परिचित दृश्य के ह्रदय से कभी  अदृश्य दिखना प्रारंभ हो सकता है। छोटे शहरों की सामाजिकता पर केंद्रित कई कविताएँ उन्होंने लिखी हैं। ऐसी बहुत सारी विशेषताओं के साथ उनका कविता संग्रह 'जहाँ सब शहर नहीं होता' प्रकाशित हुआ है।

संग्रह प्रमाणित करता है कि श्रीप्रकाश अपने समय की उन सीमाओं से परिचित हैं जिन पर बरसों बहस तो की जा सकती है मगर जिनको दुरुस्त करना असंभव है। 'सहस्त्राब्दी' की तैयारी और विचार विमर्श का पर्यवसान इन शब्दों में होता हैः
'फिलहाल तो आज बहुत जल्दी है
मुझे एक जलसे में जाना है
और एक जनाज़े में।

अब कविता महापुरुषों की शताब्दी से उबर चुकी है, जिसमें (उदाहरणार्थ) दिनकर एक हाथ में परशु और एक हाथ में कुश धारी व्यक्ति की प्रतीक्षा में सारे संकटों का समाधान मान लेते थे। यह जलसे और जनाज़े को एक साथ निभाने की विचित्र घड़ी है। अपने समय को परखने के लिए श्रीप्रकाश ने उन लोगों के साथ अपने शब्दों को खड़ा किया हैं जिनकी वजह से संस्कृति के तत्व जीवित हैं. . .मगर जो स्वयं संस्कृति के पेटेंट मानचित्र से बहिष्कृत हैं- 'ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत।' 'काँवरिए' कविता में एक अदम्य जीवनचर्या की ओर संकेत हैः
'कौन जाने कितने बड़े ऐतिहासिक दायित्व को निभा रहे होते हैं अपने श्रमजल को उड़ेलते ये लोग
बहुत छोटे-छोटे लोग
अपनी लोटियों से भी छोटे'
छोटे शहरों के बहाने कवि ने छोटी इच्छाओं के बड़े होते इरादों और सिमटी मानसिकता के व्यापक होने की ज़रूरतों को सहेजा है-
'किंतु कोई भी शहर
इतना छोटा तो नहीं ही होना चाहिए
कि अपनी माप के लिए बार-बार
आपको शहर से दूर जाना पड़े'
 

श्रीप्रकाश 'पानी और जल के फ़र्क में' हर वक्त उलझी रहने वाली दुनिया के सुख-दुख के भोक्ता भी हैं और विश्लेषक भी। इस संदर्भ में संतुलन, लड़का और पत्थर, एक मुहल्ला बह चुका, साइकिल, कुर्सी, तीन बहनें, बाज़ार के बीच जैसी कविताएँ विशेष तौर पर पढ़ी जानी चाहिए। इस दुनिया में वो प्रपन्नाचार्य भी है जो उस व्यक्ति से मिलता जुलता है 'जो माननीय मंत्री जी गाड़ी में पकड़ा गया था. . .' संवासिनी कांड के मुख्य अभियुक्त के रूप में। यहाँ सुंदरता की अजीब परिभाषाओं में फँसे ब्यूटी पार्लर हैं। हाल में व्यक्तियों को लक्ष्य करके ऐसी कहानियाँ और कविताएँ रची गई हैं जो एक ख़ास तरह का परपीड़क तोष प्रदान करती हैं। 'सूअर समाज' संग्रह में शामिल ऐसी ही कविता है, लेकिन यह परनिंदा पर नहीं ठहरती। एक प्रवृत्ति विशेष पर जमकर कोड़े बरसाती है यानी 'कहानीकार का इस तरह गटर में कूद पड़ना / शहर के सारे सूअरों को अच्छा लगा।' वैसे यह कविता उदय प्रकाश की सूअरों पर लिखी कविताओं की बहुवस्तु स्पर्शिता से वंचित है। एक दूसरी कविता 'आत्मकथा' भी इसमें शामिल है। 'इलाहाबाद' कविता में प्रसिद्ध होने के ढेर सारे गुण हैं। शहरों पर लिखी अनेक कविताओं में रखकर इसे देखने पर पता चलता है कि वक्त की गिरती हुई गर्द में चीज़ें कितनी बदला-बदली लगती हैं-
'यहाँ का हर आदमी सिद्ध है
और जितने सिद्ध हैं उतने सिद्धांत
और जितने सिद्धांत उतने संस्थान
जितने संस्थान उतने विद्वान
जितने विद्वान उतने जूते
जो अनादि काल से चले आ रहे हैं'

कवि के अनुसार जब किसी शहर में पद और पादुका पूजे जाने लगते हैं तो उसका यथार्थ 'इलाहाबाद' कविता जैसा ही होता है। श्रीप्रकाश ने अचार, माँ, चायवाला, धन्यवाद, मिलन, पुर्वार्ध और फ़र्क जैसी कविताएँ नितांत निजी संदर्भों को लेकर लिखी हैं। जब कोई निजता किसी सामाजिकता का संकेत देकर चुप्पी लगा जाती है तब उसकी अर्थवत्ता असंदिग्ध होती है, जैसे 'फ़र्क' कविता, जो नारी अस्मिता को टटोलती पंक्तियों से भरी है। कवि उस रचनात्मक जीवन के प्रति भी कृतज्ञ है, जिसकी नाची हुई आहटें हैं हमारी सदियाँ। 'जीवन' जैसी कविताएँ चूक मिथकीय बोध से भरी है। जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। कोई चाहे तो भाग्य विधाता कविता को संग्रह में सर्वोत्तम कह सकता है। श्रीप्रकाश का यह संग्रह अपनी सहजता के लिए उदाहरणीय है, हाँलाँकि कुछ मामूली दिखने वाली गैरमामूली के अनास्वादित रह जाने का ख़तरा भी है। -- सुशील सिद्धार्थ

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