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जम्मू शहर की समस्याओं और
मरती हुई सांस्कृतिक धरोहर को जिस बखूबी से लेखिका ने
पात्रों को जोडते हुए बुना है, वह काबीले तारीफ है। शहर के
लोगों की भाषा और रहन-सहन से ही वहाँ की पहचान होती है। हर
छोटी-छोटी बात का ज़िक्रकर लेखिका ने उस शहर को ही मानो
जीवंत कर दिया है जो धीरे-धीरे आतंकवाद के शिकंजे में कसता
जा रहा है।
पद्माजी ने इस उपन्यास में
जितने भी पात्र रचे हैं, वे सभी एक कहानी कहते हैं। उनमें
जीने की ख्वाहिश तो है पर तकलीफों की आहट भी साफ सुनाई
देती है। लाजो के साथ हुए बलात्कार के माध्यम से उन्होंने
बेटियों की जिंदगियों की त्रासदी को छुआ है। पदमाजी की
भाषा में जो लयात्मकता है और शब्दों की बानगी है वह अद्भुत
है। उपन्यास के बीच-बीच में लोकगीतों के माध्यम से लोगों
के जीवन के सच को उकेरा है। इससे कहानी में प्रवाह आ गया
है। जम्मू शहर की लोक संसकृति, जीवन-शैली और दिनचर्या
कहानी में ही बुनी गई है जिससे रोचकता बनी रहती है। पाठकों
को कैसे शब्दों के प्रवाह में बांधे रखना है, इसमें लेखिका
का कोई सानी नहीं है।
अपने उपन्यास के विषय में
पद्मा जी कहती है- "वो
जम्मू जो मुझे याद आता रहता है। आज तो जम्मू कूड़ाखाना हो
गया है। भीख माँगनेवाले भी बाहर से आ गये हैं। वैसे तो
सारा भारत एक घर है, पर जब शेख अब्दुल्ला की सलाह पर
महाराजा हरिसिंह ने रियासत में किसी भी बाहर के आदमी को
आकर बसने में रोक लगायी तब यही मंशा रही होगी कि भीड़ न हो
जाय, कहीं भीड़ न हो जाय। इसमें बेटियाँ चपेट में आ गयीं।
जो लड़की बाहर शादी करे वो यहाँ की शहरी नहीं है पर लड़कों
के रियासत दी गयी, वो चाहे फारुख अब्दुल्ला हों या कोई और।
उनकी पत्नियाँ बिना रियासत में पैदा हुए, बिना भाषा जाने
यहाँ की शहरी हो गयीं। पर पद्मा सचदेव की तरह और कितनी ही
लड़कियाँ यहाँ दो ग़ज ज़मीन भी नहीं ले सकतीं। कुछ इस दर्द
ने, कुछ सुग्गी नाइन ने, कुछ पुराने शहर ने यह उपन्यास
लिखवा दिया। हो सकता है यह उपन्यास पढ़कर आपको भी अपना
पुराना शहर याद आ जाय।"
उपन्यास में एक आत्मीयता है,
तीखे प्रहारों में छिपा यथार्थ है और मानस को झकझोरने की
क्षमता है। अंत तक जो कहानी का प्रवाह बँधे रहता है उसे
सुग्गी नाईन की मृत्यु भी तोड़ने में सफल नहीं हो पाती।
नाईनें अब नहीं हैं, पर इतिहास में तो जिंदा हैं।
सुमन बाजपेयी
२७ अप्रैल २००९ |