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आज सिरहाने

 

रचनाकार
मृदुला गर्ग

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प्रकाशक
ज्ञानपीठ प्रकाशन,
दिल्ली

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पृष्ठ - २

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मूल्य :  ९.९५ डॉलर

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प्राप्ति-स्थल
भारतीय साहित्य संग्रह

वेब पर दुनिया के हर कोने में

कठगुलाब (उपन्यास)

मृदुला गर्ग का पिछला उपन्यास 'चितकोबरा' नारी-पुरुष के संबंधों में शरीर को मन के समांतर खड़ा करने और इस पर एक नारीवाद या पुरुष-प्रधानता विरोधी दृष्टिकोण रखने के लिए काफी चर्चित और विवादास्पद रहा था। 'कठगुलाब' को इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है।

स्मिता, मारियान, नर्मदा और असीमा, चार स्त्री कथावाचक और विपिन एक पुरुष कथा-वाचक के ज़रिए या उनके परिप्रेक्ष्य में उपन्यास की संरचना बुनावट की गई है। एक उपन्यास के रूप में यह कृति उम्दा है- पाठक निरंतर पाठ से जुड़ा रहता है। प्लाट, थीम, दृष्टिकोण- कथावाचन के हर तत्व में मृदुला सिद्धहस्त हैं। पर इन सबमें ऐसा नया कुछ नहीं है, जिस पर विशद चर्चा हो सके। 'कठगुलाब' को अगर किसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए, वह है पुरुष-प्रधान समाज के बारे में इसके सवाल और नारीवादी विचारों की उलझन का सामंजस्य।

हिंदी में स्पष्ट रूप से नारीवाद पर आधारित रचनाएँ बहुत कम हैं। कृष्णा सोबती ने 'डार से बिछुड़ी' से 'दिलो-दानिश' तक जिस नारीवादी सौंदर्य-बोध को विकसित और प्रतिष्ठित किया है, उसे आदर्श मानने की कोशिश मृदुला या अन्य लेखकों में है। 'कठगुलाब' का एक प्रधान चरित्र स्मिता 'सूरजमुखी अंधेरे के' पढ़ चुकी है और अपने वाचन में इसका ज़िक्र करती है। पर नारी पुरुष संबंधों के विभिन्न आयामों और उनकी जटिलताओं को जितनी खूबसूरती से कृष्णा सोबती सामने लाती हैं, वह मृदुला पूरी तरह दे पाने में सक्षम नहीं हैं। शायद इसकी एक वजह मृदुला के अनुभव संसार की भौगोलिक व्यापकता है। मारियान का कथा-वाचन दरअसल कोई छः चरित्रों का कथा वाचन बन जाता है। पति के साथ उपन्यास लेखन के लिए उसके समाज-वैज्ञानिक खोजबीन में पोलैंड, स्पेन और कई दूसरी देशों से आईं महिलाएँ प्रकट होती है।

 'कठगुलाब' में इससे भी आगे वर्ग द्वंद्वों को बखानने की भी ज़बर्दस्त कोशिश है। मृदुला पर अपने चरित्रों के प्रति पूरी तरह न्याय करने का दबाव बहुत अधिक है। इसी दबाव के चलते कहीं यह अमरीका का 'फॉल' (पतझड़) या वहाँ की सांस्कृतिक जटिलताओं को बखानने में परेशान हैं, तो कहीं नर्मदा ('छोटे लोग') की मानसिकता को प्रतिष्ठित करने में लाचार हैं।

नारीवाद के बारे में भी 'कठगुलाब' कई तरह के भ्रम पाठक के मन में छोड़ देता है। विडंबना यह है कि केवल मात्र विपिन- पुरुष कथावाचक के वाचन में ही नारीवादी कथा-सौंदर्य की भरपूर छलक मिलती है, इसके पहले स्मिता, मारियान, नर्मदा और असीमा के वाचन में पुरुष का वहशीपन तो है, पुरुष-प्रधानता से निपीड़ित नारी के प्रति पाठक को सचेत करने की अतिरिक्त चेष्टा भी है, पर यह अतिरेक से ग्रस्त है। सभी प्रमुख चरित्र- चारों महिलाएँ (और बाद में एक ओर, नीरजा) और पुरुष विपिन, संतान प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा से पीड़ित हैं, पर किसी को भी संतान-प्राप्ति नहीं होती। शायद यहाँ मृदुला नारी की जैविक पीड़ा (और मुक्त पुरुष या मुक्ति-पथ पर अग्रसर पुरुष विपिन की पितृ-पीड़ा भी) को रेखांकित कर रही हैं। वे सभी नारी चरित्र, जिनकी संतानें हैं, मुख्य चरित्रों की तरह भूल-भुलैया में तो नहीं हैं, पर वे सभी पुरुष-प्रधान मूल्यों से दलित हैं और अपनी लाचारी से निकल न पाने की तकलाफ़ में (पाठक की) संवेदना नहीं, घृणा की पात्र हैं। स्मिता की बड़ी बहन नमिता, मारियान की माँ वर्जीनिया, नर्मदा की दीदी गंगा, असीमा की माँ- ये सभी ऐसी महिलाएँ हैं। तो क्या मृदुला का नारीवाद एक ओर मातृत्व की आकांक्षा को प्रतिष्ठित करता है, वही दूसरी ओर आज मातृत्व के बंधन में फँसी लाचार महिलाओं को धिक्कारता है?

मुख्य चरित्रों के द्वंद्वों में भी मृदुला पाठक को भ्रमित करती हैं। एक प्रबुद्ध पाठक स्मिता, मारियान से लेकर विपिन तक हर चरित्र में नारीवाद जागरूकता ढूँढ़ने में विवश है। पर नारीवाद पर सवाल उठाते चरित्रों के डायलाग उपन्यास में कई जगह बिखरे हुए हैं। उदाहरण के तौर पर देखिए पृ. १७२ में स्मिता और असीमा की बातचीत-
''देख स्मिता, सच कहेगी तो सच सुनेगी, वरना नहीं। सोच कर तय कर ले। मुझे यह पुरातन औरतनुमा छल-प्रपंच पसंद नहीं है। दो टूक बात करने का साहस हो तो मुझसे दोस्ती कर वरना अपना रास्ता नाप।''
''तुम लोगों का क्या कुछ निजी नहीं होता?''
''किन लोगों का?''
''फेमिनिस्टों का?''
''आपस में नहीं।''
''तू क्या हर औरत से सब कुछ कह देती है?''
मैंने कहा, ''नहीं यार, फेमिनिस्टों से।''...
स्पष्ट है, मृदुला नारीवाद की चलताऊ किस्म की व्याख्याओं में उलझी हुई हैं।

आलोचना के इन बिंदुओं को संक्षेप में रखा जाए तो रचनाकार की अपनी विषय-वस्तु की व्यापकता को बखानने की भरपूर कोशिश से रचना के कमज़ोर होने की ओर संकेत करना पड़ेगा। विषय-वस्तु ज़रूरी है और यह रचनाकार की सामाजिक जिम्मेवारी की घोषणा करता है, पर उसे संतुलित और सर्जनात्मक सौंदर्य-बोध के साथ पेश करने में रचनाकार बहुत सफल नहीं है। सही बात तो यह है कि एक अच्छी कृति वैचारिक बहस की शुरुआत करती है, पर स्वयं एक बहस का संग्रह नहीं होती। रचना को बहस बनाना, रचना और बहस, दोनों को सरलीकरण का शिकार करती है।

बहरहाल, हिंदी में इस तरह के उपन्यासों की कमी है। हिंदी का पाठक वर्ग पुरुष-प्रधानता से बुरी तरह ग्रस्त है। ऐसे एक माहौल में 'कठगुलाब' एक आँधी की तरह हमें झकझोरता है। ख़ासतौर से पुरुष कथा वाचक विपिन की उलझनें कई पीढ़ियों तक प्रबुद्ध पुरुषों के मानसिक संकट का प्रतिनिधित्व करेंगी- ऐसा निश्चित है। इसलिए कम से कम हर हिंदी भाषी पुरुष को यह उपन्यास पढ़ना चाहिए।

लाल्टू
१६ फरवरी २००९

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