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<title>अभिव्यक्ति: साहित्य का सुरुचिपूर्ण साप्ताहिक</title>
<description>अभिव्यक्ति ३० जनवरी २०१२ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org</link>

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<title>प्रभु जोशी की कहानी- सविता बनर्जी एक डायरी का नाम</title>
<description>परसों दिन भर इन्दौर के टेम्पो, टैक्सियों में, सिटी बसों और उनके स्टाप्स् पर घूमते हुए मैंने लगभग हर उस लड़की से बेसाख्ता पूछा, जो एक नजर में दूर से सलीकेदार जान पड़ती थी कि-‘क्या आप सविता बनर्जी हैं?‘ और, शाम होते-होते मुझे किसी भी लड़की से पूछने के पहले दहशत होने लगी थी, इस बात को सोचकर कि वह बेलिहाज हो कर इनकार देगी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2012/savita_banerji/savitab1.htm</link>
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<title>राज चड्ढा का व्यंग्य- आग तापने का सुख</title>
<description>पराई आग तापने के अपने ही मजे हैं, भले ही यह आग मई-जून की प्राणलेवा गर्मी में ही क्यों न लगी हो। जो लोग दिसंबर जनवरी में भी अपनी अँगीठी इसलिए नहीं सुलगाते कि उसमें महँगा कोयला जलता है, प्रदूषण फैलता है, वे दूसरों की आग का मजा लेने चिलचिलाती धूप में निकल पड़ते हैं। कोई कहता है आह! क्या आग है! कोई कहता है वाह! क्या आग है! अगर कोई यह कहता है कि हाय! क्या आग है! तो उसके मन के किसी कोने में यही छुपा रहता है कि वाह, क्या सीन है! </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2012/aag.htm</link>
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<title>पत्रकार डॉ. सौरभ मालवीय का आलेख- क्या समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उपेक्षा हो रही है?</title>
<description>जब मैं ‘हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन’, इस विषय पर शोध कर रहा था तब हिन्दी समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विषयवस्तु के तुलनात्मक अध्ययन की ओर गहराई से विश्लेषण करने का अवसर प्राप्त हुआ। यह विश्लेषण रोचक तो था ही राष्ट्रीय मुद्दों पर कुछ महत्त्वपूर्ण सत्यों को उजागर करने वाला भी था। आगे बढ़ने से पहले हमें पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विशेषताओं को संक्षेप में जान लेना चाहिये।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2012/01_30_12.htm</link>
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<title>कला और कलाकार में- डॉ. लाल रत्नाकर से परिचय</title>
<description>डॉ.लाल रत्नाकर का जन्म जौनपुर में १२ अगस्त १९५७ को हुआ, इन्होंने कला विषय में गोरखपुर विश्वविद्यालय स्नातक, कानपुर विश्वविद्यालय से परास्नातक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से प्रोफेसर आनंद कृष्ण के निर्देशकत्व में 'पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक कला' पर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। १ अक्टूबर १९९२ को गाजियाबाद में एम्.एम्.एच. कालेज के चित्रकला विभाग में कार्य प्रारंभ किया जहाँ वे सहायकर प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। 
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<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kaladirgha/kalaakaar/lal_ratnakar.htm</link>
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<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश से साहित्यिक-सांस्कृतिक सूचनाएँ</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>विभा रानी की कहानी- अभिनेत्रियाँ</title>
<description>देर हो चुकी थी। नागम्‍मा जल्‍दी-जल्‍दी कपड़ा मार रही थी कि पीतल के नटराज नीचे गिरे – घन्न्न्न्न्.... जोरदार आवाज हुई। जयलक्ष्‍मी घबड़ाकर बाहर निकली –
‘क्‍या तोड़ दिया?’ 
‘कुछ नहीं... नटराज गिर पड़े।’
‘संभालकर बाबा! कितनी बार समझाऊं?’‘हाथ ही तो है न मा! हो जाता है।’ जयलक्ष्‍मी के भाषण से नागम्‍मा चिढ़ती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2012/abhinetriyan/abhinetriyan1.htm</link>
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<title>पवन शर्मा की लघुकथा- तनाव</title>
<description>साल में एक बार चोटा आता ही है परिवार सहित। और जब भी छोटा आता है बड़े के दिमाग में एक तनाव बना रहता है। ये तनाव तब तक बना रहता है जब तक छोटा इस घर में रहता है। यह बात वह किसी से कहता नहीं, किसी को मालूम भी नहीं होने देता, अपनी पत्नी को भी नहीं।
ये तनाव क्यों होता है जानता है वह।...</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2012/tanaav.htm</link>
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<title>पत्रकार ओमप्रकाश तिवारी की डायरी के पन्नों से- भुज का भूकंप</title>
<description>बस एक झटके से रुकी तो खिड़की के बाहर एक साथ दर्जनों चिताएँ जलती दिखाई दीं। मेरी आँखों के सामने यह पहला दृश्य था गुजरात के भूकंप की प्रचंडता का, जो २६ जनवरी, २००१ की सुबह गुजरात के कच्छ क्षेत्र में तबाही मचाकर हजारों जानें ले चुका था। इतनी चिताएँ पहली बार एक साथ जलती देखीं। दिल दहल उठा। डरते-डरते सिर घुमाकर दूसरी ओर की खिड़की पर नजर डाली, तो उधर भी वही हाल था। धू-धू कर जलती चिताएँ, और चिताओं की रोशनी में लगभग लेट सा गया गाँव। यह था अहमदाबाद से भुज की ओर आने पर गाँधीधाम से करीब ३५ किलोमीटर पहले पड़ने वाला गाँव वोंद। ...</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2012/bhuj_ka_bhukamp.htm</link>
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<title>अनिल मिस्त्री का दृष्टिकोण- पुरानी सोच का आदमी</title>
<description>मैं अपने जीवन में बहुत सी जगहों पर रहा और जीवन को उसके उतार चढ़ाव को देखता रहा। मेरे जीवन पर मेरे मिडिल स्कूल का और अध्यापकों का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा।
सच कहूँ तो मैंने अपनी आँखों के आगे जमाने को बदलते देखा है। मगर हर वक़्त में, हर ज़माने में साहित्य का समाज पर बहुत गहरा प्रभाव भी महसूस किया है। इस कारण जब मैं आज के हालात देखता हूँ तो बड़ा अजीब सा लगता है। लगता है चारों ओर आग लगी हुई है और नयी पीढ़ी ना जाने किस नशे में डूबी हुई है ?...</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2012/purani_soch.htm</link>
</item>


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<title>माधवी वर्मा का आलेख- स्वर साम्राज्ञी सुरैया</title>
<description>जिस बात से माँ जी डर रही थी, वही हुई। बाबू जी दो-चार कौर खा कर ऐसे ही उठ गए जब खाने बैठे थे, तो ऐसा नहीं लगता था कि भूख बिल्कुल है ही नहीं यों जबसे दोनो दुकाने दंगाइयों ने जला दी, उनकी क्या, घर में सभी की भूख-प्यास नींद उड़ गयी थी. पर रोया भी कहाँ तक जाए, आसूं भी तो इतना साथ नहीं देते। हाँ! माँ जी को मालूम है कि बाबू जी की आँखों ने कभी खारा जल नहीं बहाया, पर उनकी छाती से उठती वे दिल को चीरती गहरी निश्वासें, माँ जी ही जानती थी कि वह रो रहे है...</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2004/suraiya.htm</link>
</item>

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<title>शीला इंद्र की कहानी- स्वेटर के फंदे</title>
<description>जिस बात से माँ जी डर रही थी, वही हुई। बाबू जी दो-चार कौर खा कर ऐसे ही उठ गए जब खाने बैठे थे, तो ऐसा नहीं लगता था कि भूख बिल्कुल है ही नहीं यों जबसे दोनो दुकाने दंगाइयों ने जला दी, उनकी क्या, घर में सभी की भूख-प्यास नींद उड़ गयी थी. पर रोया भी कहाँ तक जाए, आसूं भी तो इतना साथ नहीं देते। हाँ! माँ जी को मालूम है कि बाबू जी की आँखों ने कभी खारा जल नहीं बहाया, पर उनकी छाती से उठती वे दिल को चीरती गहरी निश्वासें, माँ जी ही जानती थी कि वह रो रहे है...</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2012/sweter_ke_phande/skph1.htm</link>
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<title>रतनचंद रत्नेश का व्यंग्य- टीवी में गरीबी कहाँ</title>
<description>अहा ! दूरदर्शन या टीवी का नायाब तोहफा इंसान की जिंदगी में क्या आया कि दुनिया धीरे-धीरे श्वेत-श्याम से रंगीन होती चली गई। दो-चार सप्ताह की सब्र हो तो अब थिएटर में जाकर फिल्म देखने के लिए धक्के खाने नहीं पड़ते। स्टेडियम में मैच न देख पाने के गम को घर में बैठकर खुशी में बदला जा सकता है। जो है, सो --केबल ने दिलोदिमाग के साथ ऐसे तार जोड़े कि जो सुख लूटना चाहें, रिमोट दबाकर लूट सकते हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2012/tv_me.htm</link>
</item>

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<title>अनीता खटवानी का आलेख- सिंधी लोकनाटक</title>
<description>लाहौर में १९२९ में जन्मी, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की कई पीढ़ियों की आँखों को नम और दिलों को बेखुद करने वाली सुरैया ने जीवन के रंगमंच से ३१ जनवरी २००४ को अलविदा कह दिया और उसके साथ ही सरहदों को दरकिनार करने वाली साझी संस्कृति का एक और स्तंभ ढह गया। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/2012/sindhi.htm</link>
</item>

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<title>आज सिरहाने के अंतर्गत- कहानी संग्रह 'वतन से दूर'</title>
<description>अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिमाह ५ लाख से अधिक पाठक संख्या रखने वाली वेब पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ द्वारा वर्ष २००२ में आयोजित ‘अभिव्यक्ति कथा-महोत्सव-२००२’ के अन्तर्गत प्रकाशित कहानियों का संकलन ‘वतन से दूर’ शीर्षक से कहानी-संग्रह के रूप में प्रकाशित हुआ है। जिसका संपादन पूर्णिमा वर्मन ने किया है। संयुक्त अरब इमारात में रह रही पूर्णिमाजी पिछले ११ वर्षों से नियमित रूप से ‘अभिव्यक्ति’ का कुशल संपादन और संचालन कर रही हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2012/vatan_se_door.htm</link>
</item>

<item>
<title>कला दीर्घा में- कृष्ण जी हौवाला जी आरा </title>
<description>कृष्ण जी हौवाल जी आरा का जन्म १६ अप्रैल १९१३ में बोलारम (हैदराबाद), आंध्रप्रदेश में हुआ। तीन वर्ष की आयु में उनकी माता का देहान्त हो गया, सात वर्ष की आयु में वे बम्बई आ गये और उन्होंने अपने जीवन की शुरूआत कार–क्लीनर के व्यवसाय से की। वे एक जापानी कंपनी में कार क्लीनर का काम करते थे। 'पर्ल हार्बर' पर आक्रमण की ऐतिहासिक घटना के बाद उनका जापानी मालिक घर को सेवक के भरोसे छोड़ कर लापता हो गया। संयोग से मिले हुए उस घर का वह सर्वेन्ट क्वार्टर जीवन पर्यन्त उनका कला–कक्ष (स्टूडियो) बना रहा। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kaladirgha/kalaakaar/ara.htm</link>
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<title>नीलम जैन कहानी- संस्कार</title>
<description>सुबह की चुप्पी में अचानक घर्र- घर्र करते ट्रक की आवाज कानों में पड़ी तो मानसी जान गई कि साढ़े छः बज चुके हैं। हर बृहस्पतिवार को कूड़ा कचरा उठाने वाली गाड़ी लगभग इसी समय आया करती है। बुधवार की रात को ही लोग अपने घर का सप्ताह भर का कचरे का एक बड़ा कूड़ादान घर के आगे, सड़क के किनारे रख देते हैं। अगले रोज सुबह ट्रक के आगे लगी दो विशालकाय यंत्रित बाहें बढ़ कर उस बड़े से कूड़ेदान को उठा कर ट्रक के पीछे वाले खुले मुँहनुमा हिस्से में डालती हैं और वहाँ एक और चक्की सी मशीन कूड़े को दबाते रौंदते अन्दर खींच लेती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2012/sanskar1.htm</link>
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<title>विनोद विप्लव का व्यंग्य- कुर्सी में जान डालने की तकनीक</title>
<description>दादी-नानी की कहानियों में अक्सर वैसे दैत्यों एवं जादूगरनियों का जिक्र होता था जिनके पास ऐेसी प्रौद्योगिकियाँ होती थीं जिनकी मदद से वे अपनी जान को तोते-मैने आदि में डालकर निश्चिंत हो जाते थे। फिर चाहे उनकी जितनी धुनाई की जाए, चाहे जितनी बार उनकी गर्दन मरोड़ी जाए, चाहे जितने दिन उन्हें उल्टा लटकाए रखा जाए और चाहे जितनी बार पहाड़ से नीचे फेंका जाए उनका बाल बाँका नहीं होता। लेकिन जैसे ही तोते या मैने की गर्दन मरोड़ी जाते बड़े-बड़े दैत्य टें बोल जाते। 
 </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2012/kursi.htm</link>
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<title>श्रीश बेंजवाल शर्मा के साथ- २०११ का तकनीकी सफर</title>
<description>वर्ष २०११ तकनीकी विकास के लिहाज से काफी उन्नत रहा। इस दौरान जहाँ कई नये गैजेट सामने आये वहीं पुराने उपकरण भी बेहतर हुये। आइये नजर डालें सन् २०११ में हुये तकनीकी बदलाव पर।
  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2012/2011_ka_takniki_safar.htm</link>
</item>


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<title>सुधा अरोड़ा का आलेख- सावित्री बाई फुले</title>
<description>सावित्रीबाई फुले का जीवन कई दशकों से महाराष्ट्र के गाँव कस्बों की औरतों के लिए प्रेरणादायक रहा है। उनकी जीवनी एक औरत के जीवट औेर मनोबल को समर्पित है। सावित्रीबाई फुले के कार्यक्षेत्र और तमाम विरोध और बाधाओं के बावजूद अपने संघर्ष में डटे रहने के उनके धैर्य और आत्मविश्वास ने भारतीय समाज में स्त्रियों की शिक्षा की अलख जगाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे प्रतिभाशाली कवयित्री, आदर्श अध्यापिका, निस्वार्थ समाजसेविका और सत्य-शोधक समाज की कुशल नेतृत्व करने वाली महान नेता थीं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2012/savitri_bai_phule.htm</link>
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<title>पुनर्पाठ में पर्यटक के साथ- आरामगाह आस्ट्रेलिया </title>
<description>आस्ट्रेलिया जैसे बड़े देश की सैर का अर्थ है संपूर्ण और व्यापक मनोरंजन। हम जितना सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा पाते हैं यहाँ। यहाँ का पानी सभी उम्र के लोगों को सुविधाजनक मनोरंजन उपलब्ध कराता है। यहाँ के नैसर्गिक और नवनिर्मित आकर्षण एक बार फिर से ऑस्ट्रेलिया आने पर मजबूर करते हैं।
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2003/australia/australia1.htm</link>
</item>
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<title>सुधा ओम ढींगरा की कहानी- परिचय की खोज</title>
<description>मेरी भारत यात्रा के दौरान अक्सर अजय भनोट जालंधर में अपने घर पर गोष्ठी रख लेते हैं। उनकी गोष्ठियों में पुराने मित्रों से मिलना हो जाता है और नए उभरते रचनाकारों से परिचय। इस बार भी बहुत सी नई प्रतिभाओं से मिलना हुआ। उभरते उपन्यासकार मयंक भारती को देख कर लगा कि इसे पहले कहीं देखा है। पूरी गोष्ठी में याद नहीं आया कि उसे कहाँ देखा है..बहुत सोचती रही। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/parichay_ki_khoj/parichay_ki_khoj1.htm</link>
</item>

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<title>समीर लाल का व्यंग्य- कड़वा वाला हनी</title>
<description>चेहरा पढ़ने की आदत ऐसी कि चाहूँ भी तो छूटती नहीं। दफ्तर से निकलता हूँ। ट्रेन में बैठते ही सामने बैठे लोगों पर नजर जाती है और बस शुरु आदतन चेहरा पढ़ना। पढ़ना तो क्या, एक अंदाज ही रहता है अपनी तरफ से अपने लिए। किसी को बताना तो होता नहीं कि एकदम सही सही ही पढ़ा हो। हालाँकि जिनको बताना होता है वो भी हाथ देख कर कितना सही सही बताते हैं, यह तो जग जाहिर है। ढेरों अनुभव रोज होते हैं, धीरे धीरे सुनाता चलूँगा।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/kadwa.htm</link>
</item>

<item>
<title>विमलेश कुमार त्रिपाठी के कविता संग्रह- हम बचे रहेंगे से परिचय</title>
<description>समकालीन कविता में हमारे भरोसे को बनाए रखने में उन कवियों की भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है जिनके पास बतौर ताक़त न तो जोड़ तोड़ की गणित है और न ही कोई विश्वसनीय आलोचक। ऐसे ही एक कवि हैं विमलेश त्रिपाठी जिनका यह कविता संग्रह अभी छप कर आया है। विमलेश की कविताओं में समय की उदासी है। उदास समय में कवि कहता है</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/hum_bache_rahenge.htm</link>
</item>


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<title>दिवंगत गीतकार को श्रद्धांजलि- गीतों के चितेरे भारत भूषण</title>
<description>शनिवार १७ दिसंबर २०११ की शाम गीतों-के-चितेरे-भारत-भूषण-हमारे बीच नहीं रहे। शिक्षक के रूप में अपने कार्यजीवन का आरंभ करने वाले भारत भूषण बाद में कविता की दुनिया में आए और छा गए। १९४६ से मंच से जुडने वाले भारत भूषण अपने अंतिम समय तक मंच से गीतों की रसधार बहाते रहे और महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर जैसे कवि-साहित्यकारों के साथ मंच साझा किया।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2011/bharat_bhushan.htm</link>
</item>

<item>
<title>अंबरीश मिश्र का संस्मरण- सुनंदा भाभी</title>
<description>दल के सभी सदस्य भास्कर जी की बातें बड़ी एकाग्रता से सुन रहे थे। वे हिमालय के पिन्डारी ग्लेशियर मार्ग में १२,००० फीट की उँचाई पर स्थित चिल्टा में बैठकर अपनी हिमालय की यात्राओं में मिले अनेकों लोगों में से एक असाधारण महिला सुनन्दा भाभी के साथ हुए अनुभवों को बाँट रहे थे। दुनियादारी में भले ही भास्कर जी कच्चे हों, पर हिमालय के विषय में उन्हें कोई चकमा नहीं दे सकता। पिछले २० वर्षों से भी अधिक समय से हिमालय के अनगिनत भागों में पैदल ही घूम–घूम कर उसके हर रूप को देखा है और मन के अन्दर उतारा है उन्होंने।   </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2002/sunanda_bhabhi.htm</link>
</item>
<item>
<title>भारत से मनमोहन सरल की कहानी- जमी हुई झील</title>
<description>हमारी कैब को चेक पोस्ट पर रोक दिया गया। मैंने तो समझा था कि यह तो महज औपचारिकता भर होगी। पासपोर्ट, विसा वगैरह जाँच कर जाने दिया जायेगा। सिक्योरिटी पर बेहद लम्बी और बेहद स्मार्ट औरत थी। उसने मेरा पासपोर्ट तो तुरंत लौटा दिया पर कैट का पासपोर्ट अपनी कठोर मुट्ठी में दबा कर उसे कार से उतरने को कहा। कैट, यानी कैथरीन, के पासपोर्ट में तकनीकी आपत्ति थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/jami_hui_jheel/jami1.htm</link>
</item>

<item>
<title>शरद तैलंग की लघुकथा- कंबल</title>
<description>बहुत सम्पन्न पुरूष थे ज्ञानदेव जी लेकिन उतने ही दयालु प्रकृति के भी। गरीबों का दुःख दर्द समझने वाले तथा उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले बहुत ही सज्जन व्यक्ति। अर्धरात्रि का समय था कडाके की सर्दी पड़ रही थी। एक फुटपाथ के किनारे उनकी गाडी आकर खडी हो गई। फुटपाथ पर कुछ अत्यन्त गरीब लोग फटे पुराने कपडों को ओढ कर ठण्ड से बचने का प्रयास करते हुए सो रहे थे। ज्ञानदेव जी ने गाडी में से कुछ कम्बल निकाले तथा वे उन लोगों को एक एक कर ओढाने लगे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/kambal.htm</link>
</item>

<item>
<title>विजय कुमार से सामयिकी में- शिक्षा वहाँ राजनीति यहाँ</title>
<description> भारत में अधिकांश राजनेता धरती की राजनीति करने का दावा करते हैं, फिर भी धरातल की समस्याएँ नहीं सुलझतीं। इसमें एक बड़ा दोष तो वंशवादी लोकतंत्र का है; पर उसके साथ ही उनके घरेलू संस्कार और शिक्षा का भी कुछ दोष हो सकता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parikrama/delhi/2011/12_12_11.htm</link>
</item>

<item>
<title>इंदिरा गोस्वामी की लेखनी से- मैं और मेरा लेखन</title>
<description>मैंने तेरह वर्ष की उम्र मsx लिखना शुरू किया। मेरी कहानियों जो अधिकतर बच्चों के लिये होती थीं। आसामी दैनिक और साप्ताहिक अखबारों के बच्चों के स्तंभ में निकलना शुरू हुईं। मुझे छपे शब्दों को देखकर ही खुशी होती थी। मुझे मैं ठीक किस पर लिख रही हूँ जानने की अधिक परवाह न थी। तेरह साल की उम्र में मेरी रचनाओं का स्रोत अधिकतर मेरी आकस्मिक प्रेरणe थी। श्री कीर्तिनाथ हजारिका जो उस समय के सबसे अधिक प्रचलित दैनिक नूतन असमिया के संपादक थे, मुझे उत्साहित करते थे और उस समय यही मेरे लिये प्रेरणा थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2011/mai%20aur%20mera%20lekhan.htm</link>
</item>

<item>
<title>पुनर्पाठ में- पर्यटक के साथ देखें- स्पानी स्थापत्य का सौंदर्य मैड्रिड</title>
<description>लन्दन से मेड्रिड तक की विमान यात्रा मात्र दो घंटे की थी। दृष्टि खिडकी के बाहर हरे भरे जंगलो के बीच बादलों की अठखेलियों में खोई हुयी किन्तु मन स्पेन के कल्पनात्मक दृश्यों में उलझा हुआ। स्पेन आइबेरियन प्रायद्वीप पर पुर्तगाल के साथ बसा हुआ, उत्तरी सीमा स्थित पिरेनीज स्पेन और फ्रान्स के बीच सीमा रेखा की तरह है। बहुसंख्यक ऊँची ऊँची दुर्गम पहाडियों के कारण स्पेन को यूरोप में पर्वतो वाला प्रथम देश माना जा सकता है यदि हम स्वीटजरलैंड को अपवाद रूप में मान लें। मैड्रिड १५६२ से स्पेन की राजधानी के रूप में आइबेरियन प्रायद्वीप के भौगोलिक केन्द्र पर स्थित है। इसकी केन्द्रीय उच्चता समुद्र तट से लगभग ६५० मीटर है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2002/spain/spain.htm</link>
</item>

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<title>भारत से शीला इंद्र की कहानी- मेरा पूरा नाम</title>
<description>आज सुबह से मीना की आँखों में बार-बार आँसू भर आते हैं। रह-रह कर उसे वह दिन याद आ रहा है जब वह पहली बार स्कूल गई थी। कितना उत्साह, कितनी प्रसन्नता थी उसे स्कूल जाने में। नए-नए कपड़े, नई-नई पुस्तकें और नया-नया शानदार बस्ता! सब कुछ उसे अपनी गुड़िया से भी अधिक प्यारा लग रहा था। उसके साथ उसके माँ और पापा भी कितने प्रसन्न थे। बार-बार उसे कितनी बातें प्यार से समझाते। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/mera_poora_naam/mera_pura_naam1.htm</link>
</item>

<item>
<title>आकांक्षा यादव की लघुकथा- बच्चा</title>
<description>इन बच्चों को भी कौन समझाए, सारा सामान उलटकर रख दिया है। उधर संपादक जी रट लगाए हैं कि इसी महीने उन्हें बाल कविताएँ चाहिये। ताकि अगले अंक में बाल दिवस पर प्रकाशित कर सकें। एक एक लाइन लिखने में कितना दिमाग खपाना पड़ता है, पर लय है कि बनती ही नहीं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/bachcha.htm</link>
</item>

<item>
<title>नरेन्द्र कोहली की बाल कथाएँ-
हम सबका घर तथा अन्य कहानियाँ</title>
<description> बच्चे हमारी अमूल्य संपत्ति है, यह लुट जाएगी यदि इसे संस्कार नहीं दिए जाएँगे। बाल्यावस्था जीवन की नींव होती है। इस नाजुक समय में यदि सही मार्गदर्शन व अच्छे संस्कार बच्चों को दिए जाएँ तो वे जीवन में सफलता प्राप्त कर आदर्श नागरिक बन सकेंगे अन्यथा गलत कार्यों में प्रवृत्त हो देश की प्रगति और विकास में अवरोधक ही बनेंगे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/hum_suka_ghar.htm</link>
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<title>डॉ. श्रीप्रसाद का दृष्टिकोण- बच्चे पसंद करते हैं शिशुगीत</title>
<description>यह युग गद्य का है इस बात को इतिहास ने स्वीकार किया है और व्यवहार में भी दिखाई दे रहा है। कथा साहित्य, नाटक और उपन्यास तथा अन्य गद्य विधाओं का जैसा विस्तार है, काव्य का नहीं है। यह तथ्य बड़ों के साहित्य के साथ भी है और बाल साहित्य के साथ भी। बाल साहित्य में उतनी विधाओं का विकास नहीं है, जितना बड़ों के साहित्य में है। पर कविता बच्चों के साथ जितने निकट भाव से जुड़ी उतनी बड़ों के साथ नहीं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2011/bachche.htm</link>
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<item>
<title>डॉ. जगदीश व्योम का आलेख-
बाल साहित्य का केन्द्र लोक साहित्य</title>
<description>लोक जीवन की जैसी सरलतम, नैसर्गिक अनुभूतिमयी अभिव्यंजना का चित्रण लोक–गीतों व लोक–कथाओं में मिलता है, वैसा अन्यत्र सर्वथा दुलर्भ है। लोक–साहित्य में लोक–मानव का हृदय बोलता है। प्रकृति स्वयं गाती–गुनगुनाती है। लोक–साहित्य में निहित सौंदर्य का मूल्यांकन सर्वथा अनुभूतिजन्य है। 
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<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2006/balsahitya.htm</link>
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<title>श्रीलाल शुक्ल की कहानी- इस उम्र में</title>
<description>आदित्य का फोन आया था...अपनी दिल्ली की पोस्टिंग से बहुत ख़ुश है वह। काफी सालों तक उत्तर प्रदेश से दूर प्रांत में रहने के बाद दिल्ली आ गया है...अलीगढ़ से कुछ ही घंटों का तो रास्ता है...फिर अब की से उसे घर बहुत ही बढ़िया मिला है...वैल मेन्टेन्ड।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/visthapit/visthapit1.htm</link>
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<title>रमेश बतरा की लघुकथा- लोग</title>
<description>एक आदमी एक जगह बैठा बैठा अपना काम कर रहा था। कुछ लोग उधर से निकले, ठिठके, काफी देर तक देखते रहे, फिर उनमें से एक बोला, 'बताओ साला काम कर रहा है।' आदमी ने काम करना बंद कर दिया और देखने लगा। दूसरा बोला, बताओ, साला देख रहा है। आदमी उठकर खड़ा हो गाया। तीसरे ने कहा, बताओ, साला खड़ा हो गया। आदमी ने कुछ बोलने की कोशिश की। चौथा बोला, बताओ, साला बोल रहा है। आदमी चुप हो गया तो पाँचवाँ बोला, देखो, साला चुप हो गया।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/log.htm</link>
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<title>सुशील सिद्धार्थ का संस्मरण- व्यंग्य के विलक्षण शिल्पी- श्रीलाल शुक्ल</title>
<description>मौसम 'भारत-भारती' पुरस्कार का था। परमानन्द श्रीवास्तव और मैं श्रीलाल शुक्ल की बैठक में उपस्थित थे। परमानन्द जी ने एक पत्रक श्रीलाल जी की ओर बढ़ाते हुए सूत्र जोड़ा कि जैसी आपसे बातचीत हुई थी, भारत-भारती के लिए आप मेरी संस्तुति कर दें। श्रीलाल जी आनंद से भर गए और बोले कि यह भी खूब रही। भाई परमानंद, अभी तो मैं खुद इस पुरस्कार पर नजरें गड़ाए हूँ। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2011/raag_viraag.htm</link>
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<title>आज सिरहाने- श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास राग विराग </title>
<description>श्रीलाल शुक्ल का राग विराग अपने पुराने विवरणात्मक स्वरूप को तोड़कर एक नए शिल्प में मितव्ययी लेखक की समर्थ कृति के रूप में पाठकों तक पहुँचा है। शिल्प और इसकी बुनावट पर पाठकों के अलग अलग मत हो सकते है लेकिन अगर शुक्ल जी के 'राग दरबारी' को कोई 'राग विराग' के बाद पढ़े तो वह लेखक के प्रति न केवल चमत्कृत होगा वरन एकशेष श्रद्धा से नत हो जाएगा।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2003/ragvirag.htm</link>
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<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>सुमति सक्सेना लाल की कहानी- विस्थापित</title>
<description>आदित्य का फोन आया था...अपनी दिल्ली की पोस्टिंग से बहुत ख़ुश है वह। काफी सालों तक उत्तर प्रदेश से दूर प्रांत में रहने के बाद दिल्ली आ गया है...अलीगढ़ से कुछ ही घंटों का तो रास्ता है...फिर अब की से उसे घर बहुत ही बढ़िया मिला है...वैल मेन्टेन्ड।</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/visthapit/visthapit1.htm</link>
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<title>शिल्पा अग्रवाल का व्यंग्य- श्री गणेश के साक्षात दर्शन</title>
<description>अमरीका आकर हमें महिला शब्द का एक नया संधि- विच्छेद पता चला : महिला = मही+हिला , मही अर्थात धरती, अतः महिला का अर्थ हुआ जो चले तो धरती को हिलाए। यहाँ की पिज्जा-बर्गर की डाइट में स्थूलकाय होना कोई मुश्किल कार्य तो है नही, इसलिये हमने तो पहले ही सचेत रहने की ठानी और फिटनैस की ओर पहला कदम बढाते हुए हम सोमवार सुबह जल्दी उठ गये, जिम के लिये तैयार हुए और चल दिये सोसाइटी के जिम की ओर। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/ganesh.htm</link>
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<title>आज सिरहाने में- इंदुजा अवस्थी का शोधग्रंथ- रामलीला : परंपरा और शैलियाँ</title>
<description>'काव्‍येषु नाटकं रम्‍यम्' इस पंक्ति से संस्‍कृत की एक उक्ति का आरम्‍भ होता है। काव्‍य के विविध प्रकारों में नाट्य एक ऐसी विधा है जिससे मानव सर्वाधिक समरस होता है। इस मान्‍यता का आधार एक निश्चित विचारधारा है जो वामन (ईस्‍वी की आठवीं - नवीं शताब्‍दी) के काव्‍यालंकारसूत्राणि ग्रंथ में मिलती है - दीर्घ साहित्यिक रचनाओं में विवध प्रकार का नाट्य श्रेष्‍ठ है ऐसी वामन की मान्‍यता है।  </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/ramleela.htm</link>
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<title>डॉ. पांडुरंग राव का निबंध- रामायण में स्‍वयंप्रभा  </title>
<description>रामायण के महिला-पात्रों में स्‍वयंप्रभा का नाम बहुत कम लोग जानते हैं, हालाँकि रामायण की आध्‍यात्‍मिक भाव भूमिका के उन्‍नयन में इस बात का बहुत बड़ा महत्त्व है। 
किसी साधारण पाठक से यह पूछा जाए कि रामायण के किस प्रसंग में इस पात्र का प्रवेश होता है, तो वह शायद ही इसका ठीक-ठीक जवाब दे सके। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/snibandh/2011/swayamprabha.htm</link>
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<title>राजेन्द्र तिवारी का आलेख- सिरमौर का रेणुकाजी मेला </title>
<description>माँ रेणुका जी मेला हिमांचल के जिले सिरमौर में मनाया जाने वाला एकमात्र राज्यस्तरीय मेला है जिसके उदघाटन और समापन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल स्वयं आ कर देवताओं की अगवानी व विदाई करते हैं। रेणुका तीर्थ स्थल जिला सिरमौर के मुख्यालय नाहन से मात्र ४० किलोमीटर तथा चण्डीगढ़ से क़रीब १२५ किलोमीटर है। 
</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2005/renuka_mela.htm</link>
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<title>जयनंदन की कहानी बदरीमैया</title>
<description>रात जब अपना अंचरा ओढ़ा देती है धरती को तो नैका धान की पहली गमक से सगरी घर-दुआर एकाएक गमगमा जाता है। आज महीनों बाद बदरी मैया को लगता है कि रात लोरी गा रही है और एक गमक लुटा रही है। जबकि रोज ऐसा लगता था कि रात सिसक-सिसककर विलाप कर रही है और मुर्दा जलाने जैसी बदबू फैला रही है।
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<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/badari_maiya/badari_maiya1.htm</link>
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<title>सुरेश यादव की लघुकथा- करवाचौथ</title>
<description>अक्षय और रजनी के बीच वैवाहिक सम्बंधों में रिक्तता का सूत्रपात जल्दी ही हो गया था। अक्षय ने रजनी की परवाह कम कर दी, परंतु बदले में रजनी ने सेवा और परवाह कभी नहीं छोड़ी। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/karvachauth.htm</link>
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<title>शशिपाधा का संस्मरण- विजय स्मारिका</title>
<description>जनवरी १५ को भारत में प्रति वर्ष सेना दिवस मनाया जाता है। इस दिन दिल्ली की सैनिक छावनी की परेड ग्राऊन्ड में भारतीय सेना की विभिन्न टुकडियाँ अपने विशेष अस्त्र -शस्त्रों से लैस होकर सेनाध्यक्ष को सलामी देती हैं और सलामी के बाद देश के आंतरिक एवं बाह्य रक्षा अभियानों में वीरता तथा साहस के साथ अपना कर्त्तव्य निभाने वाले सैनिकों को अलंकृत किया जाता है। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2011/vijay_smarika.htm</link>
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<title>सूर्यकांत जोशी का आलेख 'त्रियात्र' - गोवा का अनोखा लोकनाट्य </title>
<description>भौगोलिक दृष्टि से यद्यपि गोवा भारत का सबसे छोटा राज्‍य है, तो भी सांस्‍कृतिक विशेषताओं से यह बहुत ही समृद्ध है। यहाँ भारतीय और पाश्चिमात्‍य संस्‍कृतियों का खूबसूरत मिलाप हुआ है। </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/2011/goa_tiatr.htm</link>
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<title>रति सक्सेना से सुनें- आस की कथा प्यास की व्यथा </title>
<description>गोबर में गेरुआ मिट्टी मिला कर आँगन पर सटासट हाथ चलाती माईं को देख कर ऐसा लगता कि मानों कोई चित्रकार बड़ी सहजता से आसमान में रंग भर रहा हो। माई के घर हर त्योहार एक उत्सव का रूप धर लेता था। त्यौहार का साथ देता था गोबर से लिपा आँगन और उसमें उकरे बेल–बूटे। 
</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2004/ratisaxena.htm</link>
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<title>रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी- विद्रोही</title>
<description>लोग कहते हैं अँग्रेजी पढ़ना और भाड़ झोंकना बराबर है। अँग्रेजी पढ़ने वालों की मिट्टी खराब है। अच्छे-अच्छे एम.ए. और बी.ए. मारे-मारे फिरते हैं, कोई उन्हें पूछता तक नहीं। मैं इन बातों के विरुद्ध हूँ। अँग्रेजी पढ़-लिखकर मैं डॉक्टर बना हूँ। अँग्रेजी शिक्षा के विरोधी तनिक आँख खोलकर मेरी दशा देखें। सोमवार का दिन था। सवा नौ बजे मेरे मित्र बाबू सन्तोषकुमार बी.एस-सी. एक नवयुवक रोगी को साथ लिये मेरे दवाखाने में आये। उस रोगी की आयु अठारह-उन्नीस से अधिक न थी। गेहुआँ रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, गठीला शरीर, कपड़े स्वदेशी, किन्तु मैले थे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sahityasangam/2011/vidrohi/vidrohi1.htm</link>
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<title>डॉ. अशोक गौतम का व्यंग्य- हाय रे मेरे भाग</title>
<description>सुबह के साढ़े की दस बजे का समय हुआ होगा। पत्नी को दफ्तर रवाना करने के बाद लगे हाथ बरतन धो जरा धूप देखने के लिए दरवाजा खोल सीढ़ियों पर आराम फरमाने निकलने की सोच ही रहा था कि दरवाजे पर घंटी बजी। कहीं श्रीमती दफ्तर से लौट तो नहीं आई! अरे अभी तो झाड़ू पोछा करना बाकी है। सोच रहा था जरा कमर सीधी कर लूँ। फिर लगूँगा। किसी अज्ञात डर से भीतर तक काँप गया। अपने बड़े बुरे दिन चल रहे हैं आजकल भाई साहब! हाय रे स्‍वार्थी सात जन्‍म के रिश्‍ते!</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/haire_mere_bhaag.htm</link>
</item>

<item>
<title>मनोहर पुरी का आलेख- दसों पापों को हरने वाला दशहरा</title>
<description>त्योहार लोक जीवन की प्रगाढ़ता के केन्द्र बिन्दु माने जाते हैं। यह न केवल हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन को प्रभावित करते हैं वरन इनके साथ हमारी आर्थिक गतिविधियाँ भी पूरी तरह से जुड़ी हुई हैं। त्योहार पग पग पर व्यक्ति को समाज के साथ जोड़ते हैं। प्रकृति के बदले परिधानों के साथ जुड़े त्योहार फूलों के बदलते रंगों की भाँति व्यक्ति को लुभाते रहते हैं। इनकी विविधता मानव को अपने मोहपाश में बाँधे रखती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2011/dason_paaponko.htm</link>
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<title>शैलेन्द्र पांडेय के साथ पर्यटन- धनुषकोटि जहाँ राम ने सेतु बाँधा था</title>
<description>विगत दिनों रामेश्‍वरम् जाने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ। ऐसी मान्‍यता हे कि पवित्र सेतु में स्‍नान के बाद ही रामेश्‍वरम् में ज्‍योर्तिलिंग का दर्शन करना चाहिए। धनुषकोटि के विषय में स्‍थानीय लोगों से जानकारी मिली कि वहाँ तो अब कोई जाता ही नहीं है, मंदिर के पास ही समुद्र के पश्‍चात चौबीस कुंडों के जल से स्‍नान करके दर्शन करते हैं। अगले दिन कमर कस ली कि चाहे जैसे जाना पड़े, धनुषकोटि तो जाना ही है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2011/dhnushkoti/dhanushkoti.htm</link>
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<title>मानोशी चैटर्जी की कलम से- चंदनपुर की जगद्धात्री पूजा </title>
<description>शरद का महीना आते ही शुरू हो जाती है बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम। नये कपड़े, नये ज़ेवर, और चार दिन के इस उत्सव के ख़त्म होते ही जैसे सब उदास हो जाते हैं। मगर फिर कुछ ही दिनों बाद कोजागरी पूर्णिमा के दिन घर-घर में लक्ष्मी पूजन के लिए जोड़-तोड़ होने लगती है। और थोड़े ही दिनों में फिर आ जाती है दिवाली। दिवाली या काली पूजा के बाद त्यौहारों का मौसम जैसे ख़त्म हो जाता है सबके लिए। मगर कलकता शहर से कोई तीस किलोमीटर दूर उत्तर में? हुगली ज़िले में बसे चंदरनगर या चंदन नगर नामक छोटे से शहर में तैयारी हो रही होती है एक और उत्सव की? जगद्धात्री पूजा।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2006/jagaddhatri.htm</link>
</item>


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<title>मथुरा कलौनी की कहानी- एक झूठ</title>
<description>कहानियों के लिये सामग्री हमें आसपास की जीवन से मिल जाती है। पात्रों के जीवन में झाँक कर और कुछ कल्पलना के रंग भर कर कहानी बन ही जाती है। सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि पात्र या घटनाएँ बहुत करीब की न हों। बच्चे क्या सोचेंगे, भाई साहब कहीं बुरा न मान जाएँ आदि के चक्कर में रोचक उपन्यासों का मसाला धरा का धरा रह जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि पाठक कपोल कल्पित घटना को सच मान बैठते हैं। 'ऐसी कल्पना तो कोई कर ही नहीं सकता है, जरूर आपके साथ ऐसा घटा है!' बहरहाल, आप बताइये कि यह कहानी सच्ची है या नही। मुझे तो लगता है कि इस कहानी का नायक झूठ बोल रहा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2011/ek_jhooth/ek_jhooth1.htm</link>
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<title>संजीव सलिल का लघुकथा- गांधी और गांधीवाद</title>
<description>बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे। जब तक हर भारतीय को कपड़ा न मिले, तब तक कपड़े न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवंत उदाहरण है। वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं’ -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी महँगी आयातित कार में बैठने लगे तो पत्रकारों ने उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारण पूछा। नेताजी बोले– ‘बापू पराधीन भारत के नेता थे। उनका अधनंगापन पराये शासन में देश का दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत के नेता हैं।  अपने देश के जीवनस्तर की समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना होता है। हमारी कोशिश तो यह है की हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुविधाएँ दी जाएँ।’</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2011/gandhi.htm</link>
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<item>
<title>अनुपम मिश्र का आलेख- तैरने वाला समाज डूब रहा है</title>
<description>जुलाई (२००४) के पहले पखवाड़े में उत्तर बिहार में आई भयानक बाढ़ अब पुरानी बात हो गई है। लोग उसे भूल गए हैं। लेकिन याद रखना चाहिए कि उत्तर बिहार उस बाढ़ की मंजिल नहीं था। वह एक पड़ाव भर था। बाढ़ की शुरुआत नेपाल से होती है, फिर वह उत्तर बिहार आती है। उसके बाद बंगाल जाती है। और सबसे अंत में- सितम्बर के अंत या अक्टूबर के प्रारंभ में- वह बाँग्लादेश में अपनी आखरी उपस्थिति जताते हुए सागर में मिलती है। इस बार उत्तर बिहार में बाढ़ ने बहुत अधिक तबाही मचाई। कुछ दिन सभी का ध्यान इसकी तरफ गया। जैसा कि अक्सर होता है, हेलीकॉप्टर आदि से दौरे हुए। फिर हम इसको भूल गए।
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2011/tairne.htm</link>
</item>


<item>
<title>रिंपी खिल्लन सिंह का आलेख- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की लोक चेतना</title>
<description>सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म सन १९२७ में बस्ती में हुआ था। सन १९४९ में प्रयाग विश्वविद्यालय से एम .ए .की परीक्षा पास की। आरंभ में आप कुछ समय तक आकाशवाणी से जुड़े रहे। बाद में जब अज्ञेय 'दिनमान' के संपादक बने तो सर्वेश्वर को उन्होंने अपने संपादक मंडल में शामिल कर लिया जहाँ वे मृत्युपर्यन्त (सन १९८३) कार्यरत रहे। इनकी प्रारंभिक रचनाओं का एक संकलन 'काठ की घंटियाँ' सन १९५९ में प्रकाशित हुआ था, जिसका संपादन अज्ञेय ने किया था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2006/sarveshwardayal_saxena.htm</link>
</item>


<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>


<item>
<title>उषा राजे सक्सेना की कहानी- इंटरनेट डेटिंग</title>
<description>उस दिन स्काइप पर सौम्या, ममी-पापा से उनके विवाह की पचीसवी वर्षगाँठ लंदन में मनाने की योजना पर बातचीत कर रही थी कि ममी ने बात को बीच में ही काटते हुए कहा, ‘सौम्या, अब तू प्रोफेशनल हो गई है साथ ही रीयल स्टेट रैशब्रुक ऐंड सन्स में फिफ्टी परसेन्ट की पार्टनर है। मकान, कार, भारी बैंक-बैलेन्स सबकुछ है तेरे पास। अब अपनी शादी की सीरियसली सोच! तू इतने लोगो से मिलती-जुलती है। कोई तो तुझे पसंद होगा ही!’</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2011/internet_dating/internet_dating1.htm</link>
</item>

<item>
<title>दीपक दुबे का व्यंग्य- फाइलों में अटका भोलाराम का जीव</title>
<description>धर्मराज के कहने पर नारद भोलाराम के जीव को खोजने पृथ्वीलोक आ गए। उन्होंने भेालाराम का घर भी ढूँढ लिया और उसकी फैमिली से भी मिल लिए। बात बात में ही उन्हें उस दफतर का भी पता चला जहाँ भोलाराम जी शासकीय सेवक थे। वे खोजते खोजते उस दफतर मे पहुँच गए। फाइल मे छिपे बैठे भोलाराम के जीव से उन्होने साथ चलने की रिक्वेस्ट की मगर पेंशन फाईल मे छिपे भोलाराम के जीव ने साथ चलने से साफ इंकार कर दिया।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2011/filonme.htm</link>
</item>

<item>
<title>महेश परिमल का ललित निबंध- रिश्ते कभी बोझ नहीं होते</title>
<description>हम रोज ही मौतों के बारे में पढ़ते-सुनते हैं। पर हमें कितनों की मौत याद रहती है? सोचा कभी आपने? वैसे तो मौत सबके लिए एक भयावह त्रासदी के रूप में सामने आती है। पर किसी अपनों की मौत हमें भीतर तक हिला देती है, इसके अलावा कई मौतें हम पर कोई भी असर नहीं छोड़ती। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2011/rishte.htm</link>
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<item>
<title>जयप्रकाश मानस के कविता संग्रह- 'अबोले के विरुद्ध' से परिचय</title>
<description>मानवता में अस्तित्वबोध की नयी ऊर्जा एवं संभावनाओं को लेकर कवि जयप्रकाश मानस का नया काव्य संग्रह ‘अबोले के विरूद्ध’ अनस्तित्व के खिलाफ साहित्य, समाज एवं व्यक्ति की नयी भूमिका को रेखांकित करता है। संग्रह वर्गीकृत नहीं अपितु बहुरंगी संवेदनाओं का संयोजन प्रतीत होता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2011/abole_ke_virudh.htm</link>
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<title>प्रमिला कटरपंच से जानें- लोकपर्व साँझी का विषय में</title>
<description>क्वार मास की समाप्ति पर ब्रज क्षेत्र में घर–घर साँझी के लोकगीत गाकर कार्तिक महीने का स्वागत किया जाता है। यों अभी क्षेत्रीय परम्परा की रूपरेखा अपने अनवरत गति से प्रवाहित हो रही है, परन्तु "साँझी" तो साहित्यकारों तथा शोधकारों के लिये स्वयं में गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2003/sanjhi.htm</link>
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