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<title>अभिव्यक्ति: साहित्य का सुरुचिपूर्ण संसार</title>
<description>अभिव्यक्ति ८ फरवरी २०१० </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org</link>

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<title>ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी- मोड़</title>
<description>मुकदमा दो साल तक चला। आखिर पति-पत्नी में तलाक हो गया। तलाक के पसःमंजर बहुत मामूली बातें थीं। इन मामूली बातों को बड़ी घटना में रिश्तेदारों ने बदला। हुआ यों कि पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए। पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका। सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया। मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहीन समझा। रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/mod/mod1.htm</link>
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<title>नरेन्द्र कोहली का व्यंग्य- उदारता</title>
<description>रामलुभाया को एक गोष्ठी में एक महिला मिल गई। नाम था नीलिमा। वह बाहर से आई थी और दो चार दिन दिल्ली में रह कर नगर देखना चाहती थी। उस के पास रुकने का कोई ठिकाना नहीं था और किसी होटल में वह रुकना नहीं चाहती थी। रामलुभाया को उस पर दया आ गई। वह उसे अपने घर ले आया। अब किसी परदेसी असहाय अबला को आश्रय देने में तो कोई बुराई नहीं थी। यह तो हमारा धर्म था। धर्म पर महान् लोग ही चल पाते हैं और रामलुभाया को अपनी महानता में कहीं कोई संदेह नहीं था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/udarata.htm</link>
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<title>नरेश पंडित और सुनील राणा का आलेख- मंडी का शिवरात्रि मेला</title>
<description>हिमाचल प्रदेश के मंडी नगर में मनाया जाने वाला शिवरात्रि का त्यौहार आसपास के अनेक नगरों में जुड़ा भावनाओं से भरपूर लोकोत्सव है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से प्रारंभ होने वाले उत्सव में आसपास के सौ से भी अधिक देवी-देवता दूर दूर से आकर एकाकार होते हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2010/shivratri.htm</link>
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<title>डा. दीपक नौगाई से जानें- शिवरात्रि-पर्व की महिमा</title>
<description>हमारे देश में जितने भी प्रकार के व्रत, उपवास, पूजा, पर्व प्रचलित हैं उनमें शिवरात्रि-व्रत के समान प्रचार अन्य किसी का भी नहीं है। सर्वधर्म समभाव वाले इस महान देश में प्राय: सभी हिंदू भगवान शिव की आराधना करते हैं। अधिकतर लोग यथाविधि पूजादि न करते हुए भी उपवास करते हैं। जिनकी उपवास में रुचि नहीं होती, वे रात्रि-जागरण कर इस व्रत के पुण्य का लाभ कमा लेते हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2006/shivratri.htm</link>
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<title>रसोईघर में- पुलावों की बहार</title>
<description>सर्वाधिक लोकप्रिय १३ पुलावों की व्यंजन विधियाँ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rasoi/pulav/index.htm</link>
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<title>श्यामसखा श्याम की कहानी- आखिरी बयान</title>
<description>मैंने जिन्दगी भर किसी से कुछ नहीं कहा, आज कह रहा हूँ, अगर आप सुन लें तो मेहरबानी होगी। वैसे भी मैं आज नौकरी से रिटायर हुआ हूँ, पूरे साठ साल का होकर। साठ साल तक जो आदमी पहले माँ-बाप की, फिर बीवी-बच्चों, सहकर्मियों की सुनता आ रहा हो, उसे इतना हक तो है कि वह आज कुछ कह सके। फिर आपने खुद ही मुझे दो शब्द कहने के लिए, मेरे विदाई समारोह के मंच पर बुलाया है। मेरे खयाल से जिन्दगी सचमुच एक दुर्घटना है और किसी के लिए हो ना हो कम से कम मेरे लिए तो जरूर है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/akhiri_bayan/akhiribanayan1.htm</link>
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<title>रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' का व्यंग्य- लूट सके तो लूट</title>
<description>बहुत पुराने वक़्त में दूकानों के बोर्ड पर छूट ऑफ़र लिखे मिलते थे। छूट के मौके पर दूकान का कचरा निकल जाता था। धीरे-धीरे छूट की गरिमा पीछे छूटती गई। इसका स्थान अब लूट ऑफ़र ने ले लिया है। आप घर से निकलते ही लुटने या लूटने के लिए तैयार रहें। आप 'लुटने या लूटने' में से कौन-सा खेल खेलेंगे,यह आपकी औक़ात पर निर्भर होगा। बीहड़ में अब सुविधाएँ नहीं रहीं, अत: डाकू सीधे राजनीति में आ गए हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/loot.htm</link>
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<title>डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव का दृष्टिकोण- हिंदी के ये उत्सव ये सम्मेलन</title>
<description>मुझे चालीस वर्षों से हिंदी भाषा और साहित्य को पढ़ाते हुए जो एक बात बेहद अखरती रही, वो ये कि हिंदी के हितैषी भारतीय, गोरी चमड़ी वाले प्राध्यापकों के प्रति अतिरिक्त भक्तिभाव का प्रदर्शन करते हैं। यह बिल्कुल भी जरूरी चीज न थी और न है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2010/hindi.htm</link>
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<title>विज्ञानवार्ता में डॉ. गुरुदयाल प्रदीप का आलेख- हाय रे दर्द</title>
<description>दर्द श्वेत है, दर्द श्याम है, दर्द शाश्वत है और उससे राहत का सरल उपाय आप के समक्ष प्रस्तुत करते हैं अपने बिग 'बी', एक क्रीम के रूप में। बहरहाल इस बारे में हमें इसके विज्ञापनदाताओं से कोई बहस नहीं करनी है। बल्कि मैं भी इनका शुक्रगुज़ार हूँ क्योंकि इसने मुझे भी दर्द के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया और आज मैं इस जाँच-पड़ताल का निचोड़ लेकर अभिव्यक्ति के सुधी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हूँ।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/vigyan/2006/dard.htm</link>
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<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>महीप सिंह की कहानी- धुँधलका</title>
<description>उसे लगता है, उसके पास बहुत कुछ है। 
वह संसद की सदस्य है। इस नाते पूरी कोठी, टेलीफोन, रेल और हवाई यात्रा सहित उसके पास अगणित सुविधाएँ हैं। उसकी पार्टी आज सत्ता में नहीं है। पर इससे क्या होता है? वर्षों तक उसकी पार्टी सत्ता में रही है। अगले चुनाव के बाद वह फिर सत्ता में आ सकती है। उस समय उसके मंत्री बन जाने की पूरी संभावना है। आज उसे पार्टी के अध्यक्ष के बहुत निकट समझा जाता है। वह दो राज्यों में पार्टी के सभी कार्यकलापों की इंचार्ज है। वहाँ पर उसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/dhundhalka/dhundhalka1.htm</link>
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<title>डॉ. योगेंद्रनाथ शुक्ल की लघुकथा- बदलते नायक</title>
<description>सदाशिव मास्टर साहब शहीद भगतसिंह का चित्र लेने बाज़ार की ओर जा रहे थे। शासन की मंशा थी कि इस वर्ष 'भगतसिंह जयंती' धूमधाम से मनायी जाए, इसीलिए हेड मास्टर साहब ने उन्हें भगतसिंह का चित्र, मढ़वा कर लाने का आदेश दिया था। पोस्टर्स की उस दुकान पर जाकर उन्होंने चारों ओर निगाह दौड़ाई। सभी ओर अपना शरीर दिखाते हुए फिल्मों के नायक-नायिकाओं के चित्र लगे थे। ''क्यों भाई। शहीद भगतसिंह का चित्र है।''</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2010/badalte.htm</link>
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<title>अक्षय कुमार का साहित्यिक निबंध- निराला की कविता में राष्ट्र</title>
<description>यद्यपि  सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'  को साहित्य में छायावाद का एक स्तंभ माना गया है, तथापि उनका राष्ट्रवाद अनेक कविताओं में तेजस्वी रूप से मुखरित होता है। उनकी कविता में राष्ट्रवाद के अंतर्गत, 'राष्ट्र' को केवल एक राजनैतिक इकाई न मानकर, एक सांस्कृतिक औऱ सामाजिक उन्नयन की इकाई माना गया। 'राष्ट्र' कोई भौतिकवादी तुच्छ अवधारणा नहीं है, यह एक सनातन धर्म है जो अपने-आप को उत्तरोत्तर सँवारता और पुनः परिभाषित करता रहता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/nirala.htm</link>
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<title>डॉ. सत्यभूषण वंद्योपाध्याय का आलेख- सलामी लाल किले से ही क्यों?</title>
<description>१५ अगस्त, १९४७ को भारत पूर्ण रूप से स्वाधीन हो गया और उसके दूसरे दिन यानी १६ अगस्त, १९४७ को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रध्वज प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा लाल किले के लाहौरी गेट की प्राचीर से फहराया गया। लाल किला तब से ही भारतीय स्वाधीनता और देश की एकता का प्रतीक बन गया, जहाँ हर वर्ष १५ अगस्त स्वतंत्रता दिवस को प्रधानमंत्री द्वारा और २६ जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा भारत का तिरंगा फहराया जाता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/salami.htm</link>
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<title>आशीष सान्याल से क्रांतिकारी कवि: नजरुल इसलाम का परिचय- तूफ़ान हूँ मैं आज़ाद रहूँगा</title>
<description>बंगाल साहित्य और संस्कृति की पावन भूमि रही है। यहाँ न केवल नोबेल पुरस्कार प्राप्त महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर - जैसे मनीषियों ने अपने काव्य की पताका पूरे विश्व में फहराई, बल्कि उन हज़ारों-हज़ार कवियों, साहित्यकारों में काजी नजरूल इसलाम ने भी अपनी कविता से बंगला साहित्य एवं संस्कृति को नया आयाम दिया। काजी नजरूल इसलाम को इसीलिए क्रांतिकारी बंगला कवि के रूप में अधिक जाना जाता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2005/nazrul_islam.htm</link>
</item>
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<title>राजेन्द्र त्यागी की कहानी- अनजान रिश्ते</title>
<description>असगर आज अपने गाँव चला गया। जाते-जाते खुद तो रोया ही हमारी आँखें भी नम कर गया। जाते-जाते ही क्यों, जाने के एक दिन पहले से ही वह इस तरह सुबक रहा था, मानों अपने अपने प्रियजनों से हमेशा-हमेशा के लिए बिछुड़ रहा हो। नहीं, साल-छह महीने बाद फिर उसे रोजी-रोटी की तलाश में अपना गाँव छोड़कर फिर उसे इस शहर की किसी झुग्गी को आबाद करना है! </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/anjan_rishte/anjan_rishte1.htm</link>
</item>

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<title>रामकिशन भँवर का व्यंग्य- हाय मेरी प्याज़</title>
<description>क्या पता था कि प्याज के दिन ऐसे बहुरंगे कि वह सौ फीसदी वी.आई.पी. हो जाएगा। प्याज खाना हैसियत वाले आदमी की पहचान बन गई है। '' क्यो भाई साब... प्याज खा रहे है, वह भी सलाद में, क्या ठाठ है। सब्जी मंडी में प्याज के दुकानदार के चेहरें की रौनक के भी क्या कहने! </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/haipyaaz.htm</link>
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<title>समीक्षा में- भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा</title>
<description>पत्रकारिता के क्षेत्र में हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा सम्मानित प्रसिद्ध पत्रकार, अन्वेषक एवं लेखक अरविन्द कुमार सिंह द्वारा रचित एवं नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया द्वारा प्रकाशित 'भारतीय डाक: सदियों का सफरनामा' विश्व डाक साहित्य को एक कीमती तोहफा है। यह भारतीय डाक व्यवस्था पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण शोध ग्रन्थ है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2010/bhartiya_daak.htm</link>
</item>


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<title>हृषिकेश सुलभ का लेख- विदूषक की तलाश</title>
<description>विदूषकों की सांस्कृतिक जड़ें भारतीय परंपरा में बहुत गहरी हैं। मिथक-चरित्रों के बीच नारद जैसे बहुचर्चित विदूषक का होना विदूषकों की समृद्ध परंपरा की ओर संकेत करता है। नारद ब्रह्मा को भी वेद सुनाते हैं। अपनी प्रतिभा और तर्कशक्ति के कारण सबके बीच पूजे जाने वाले नारद की उपस्थिति वातावरण को व्यंग-हास्य के साथ-साथ गंभीरता से भी पूरित करती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/2010/vidushak.htm</link>
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<title>रमेश चंद्र द्विज का आलेख- पोंगल- संक्रांति का महा उत्सव</title>
<description>पोंगल तमिल और दक्षिण भारत तथा श्रीलंका, मलेशिया, मॉरिशस, अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर आदि अन्य कई स्थानों पर रहने वाले भारतीयों में व्यापक रूप से मनाया जानेवाला एक प्रमुख त्योहार है जो प्रति वर्ष संक्रांति के दिन १४ या १५ जनवरी को मनाया जाता है। यह फसल की कटाई का उत्सव है, जिसमें नवान्न का भी बहुत महत्त्व है। पोंगल का तमिल में अर्थ है उबालना। तीन दिन के इस पर्व में सूर्य की पूजा, पशु धन की पूजा और सामूहिक स्तर गीत-संगीत से भरपूर आनंद का ऐसा उबाल उमड़ता है कि इस पर्व का नाम सार्थक हो जाता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2010/pongal.htm</link>
</item>
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<title>पावन की कहानी- एक भीगती हुई शाम</title>
<description>महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन
चर्चगेट जाने वाली लोकल महालक्ष्मी स्टेशन पर रुकी। लेडीज कम्पार्टमेन्ट से ढेर सारी महिलाओं के रेले के साथ वह भी बारिश से भीगते हुए प्लेटफार्म पर उतरी। आज सुबह से बारिश हो रही थी लेकिन बारिश की वजह से मुम्बई की जिन्दगी थम नहीं जाती।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/ekbheegtihuishaam1.htm</link>
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<title>प्रमोद ताम्बट का व्यंग्य यह साम्राज्यवादी थपथपाहट</title>
<description>अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को अपने परिवार का सदस्य बताया है। उनकी पत्नी ‘मिशेल’ और बच्चे एक ‘सरदारजी’ को अपने बीच में पाकर कैसा महसूस करेंगे यह तो जिज्ञासा का विषय है, मगर भारतीय होने के नाते मेरे लिए तो यह बड़ी खुशी की बात है। यूँ तो ओबामा स्वयं एक अमरीकी माता और केन्याई मुसलमान पिता की संतान हैं, और अब उनके परिवार का एक सदस्य पगड़ी‍‌‍धारी भारतीय सरदार निकल आया है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/yeh_samrajyavadi.htm</link>
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<title>लक्ष्मीकांत नारायण का आलेख- भारत कला भवन</title>
<description>भारतीय चित्रकला के विषय में यदि कोई भी विद्वान, शोधकर्ता या कलाविद गहन अध्ययन करना चाहे तो यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि उसे वाराणसी में स्थित 'भारत कला भवन' के चित्र संग्रह का अवलोकन करना ही होगा। भारत में प्रचलित लगभग समस्त शैलियों के चित्रों का विशाल संग्रह इस संग्रहालय में है। यहाँ का चित्र संग्रह, विशेषकर लघुचित्रों का विश्व में अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2010/bharatkalabhavan.htm</link>
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<title>आर के श्रीनिवासन की रपट जब शौच से उपजे सोना</title>
<description>जब कोई युवा पढ़ाई- लिखाई करके शहरों की ओर भागने की बजाय अपनी शिक्षा और नई सोच का उपयोग अपने गाँव, ज़मीन, अपने खेतों में करने लगे तो बदलाव की एक नई कहानी लिखने लगता है, ऐसे युवा यदि सरकार और संस्थाओं से सहयोग पा जाएँ तो निश्चित ही क्रान्तिकारी परिवर्तन ला देते हैं। ऐसी ही एक कहानी है शौच से उपजे सोने की और कहानी के नायक हैं युवा किसान श्याम मोहन त्यागी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2010/jub/jub_shauch.htm</link>
</item>


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<title>कुँवरपाल सिंह का संस्मरण- मेरी यादों के पयाले में भरो फिर कोई मय</title>
<description>राही जब अलीगढ़ आए, तब उनका नाम मशहूर शायरों में गिना जाता था। वे बहुत दोस्ती पसन्द इन्सान थे। मैंने अपने पूरे युनिवर्सिटी जीवन में उन्हें अकेले नहीं देखा। उन दिनों राही अपने बड़े भाई मूनिस रज़ा के साथ वाली मन्जिल में रहते थे। विभाग से घर तक की खासी दूरी थी पर किसी मुद्दे पर बहस होती रहती और राह तय होती रहती। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2001/meriyadon.htm</link>
</item>

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<title>सुधा ओम ढींगरा की कहानी- फन्दा</title>
<description>उसका का दिल आज बेचैन है, किसी भी तरह काबू में नहीं आ रहा, तबीयत बहुत उखड़ी हुई और भीतर जैसे कुछ टूटता-सा महसूस हो रहा है। सुबह के पाठ में भी मन नहीं रमा। चित्त स्थिर नहीं हो पा रहा था, भीतर-बाहर की घुटन जब बढ़ गई, तो वह अपने बिस्तर से उठ गया। कमरे की खिड़की खोली, ताज़ी हवा का झोंका आया, पर अस्थिरता बढ़ती गई।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/phanda1.htm</link>
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<title>दिनेश थपलियाल का व्यंग्य- किस्सा कहावतों का</title>
<description>होता दर असल ये था कि जब भी हम कहावतों के बारे में सोचते तो वही दो चार घिसी पिटी कहावतें जेहन में उभरा करतीं - जैसे कि धोबी का कुत्ता घर का न घाट का, दिल्ली दूर है, आँख के अंधे, नाम नयनसुख, नौ दो ग्यारह होना या फिर न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी वगैरा वगैरा।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/kissa.htm</link>
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<title>तेजेन्द्र शर्मा के साथ मोहन राणा की बातचीत</title>
<description>जो हम जी रहे हैं हम मानें अगर वह कहानी है तो फिर कहानी क्या है?</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sakshatkar/tej_mohan.htm</link>
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<title>डॉ. पवन अग्रवाल का आलेख- लखनऊ विश्वविद्यालय</title>
<description>लखनऊ विश्वविद्यालय स्थापना १८ मार्च १९२१ को उत्तर-प्रदेश की राजधानी -लखनऊ में गोमती के तट पर की गई। स्थापना में तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के उपराज्यपाल सर हरकोर्ट बटलर तथा अवध के तालुकेदारों का विशेष योगदान रहा। इससे पूर्व अवध के तालुकेदारों ने लार्ड कैनिंग की स्मृति में २७ फरवरी १८६४ को लखनऊ में कैनिंग कालेज क नाम से एक विद्यालय स्थापित करने के लिए पंजीकरण कराया। १ मई १८६४ को कैनिंग कालेज का औपचारिक उद्घाटन अमीनुद्दौला पैलेस में हुआ।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2010/lko_univ.htm</link>
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<title>पर्व परिचय में</title>
<description>वर्ष २०१० के पर्वों की सूचना पर्व पंचांग में </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/panchang/panchang10.htm</link>
</item>

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<title>सरस्वती माथुर की कहानी- पूर्व संध्या</title>
<description>राधा देवी ने रोज़ की तरह अपना कंप्यूटर ऑन किया, पासवर्ड देकर डायरी का पन्ना खोला लेकिन जाने क्यों उनका कुछ भी लिखने का मन नहीं हुआ। उनकी बहू विभा कंप्यूटर इंजिनियर थी। उसने उनकी वेबसाइट बना दी थी और जब भी वह अमेरिका से आती थी उन्हें काफी कुछ सिखा जाती थी। कंप्यूटर विंडो पर 'गूगल टॉक’ की खिड़की खोल कर राधा देवी ने सरसरी निगाहें डाली तो पता लगा कोई भी आनलाईन नहीं है न उनके बच्चे न पति। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/purv_sandhya/purv_sandhya1.htm</link>
</item>

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<title>डॉ रामनारायण सिंह मधुर का व्यंग्य- खर्च हुए वर्ष के नाम</title>
<description>मेरे एक मित्र हैं, वे नववर्ष की शुभकामना भेजने से नहीं चूकते। उनकी शुभकामना का कार्ड पाकर मुझे विदित होता है कि नववर्ष का आगमन हो चुका है, अन्यथा मुझे कुछ भी नया नहीं लगता। भैंस उसी तरह से गोबर करती है पूँछ उठाकर, गधा उसी तरह से धूल में लोटपोट कर रेंकता है, दिन पर दिन बुढियाता पड़ोसी अपने चिरंजीव को उसी तरह घिघियाता हुआ गरियाता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/kharch.htm</link>
</item>


<item>
<title>अरविंद कुमार सिंह का आलेख- भारतीय रेल पत्रिका का स्वर्णजयंती वर्ष</title>
<description>रेल मंत्रालय रेलवे बोर्ड द्वारा प्रकाशित मासिक हिंदी पत्रिका 'भारतीय रेल' अगस्त, २००९ में अपनी गौरवशाली यात्रा के पचासवें वर्ष में प्रवेश करते हुए स्वर्णजयंती वर्ष मना रही है। भारतीय रेल को इस महादेश की धड़कन और जीवन रेखा कहा जाता है। इसी प्रकार भारतीय रेल पत्रिका नें रेलकर्मियों के साथ अन्य पाठक वर्ग में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2009/bhartiyarail_patrika.htm</link>
</item>


<item>
<title>आशीष और दीपिका की प्रस्तुति- देश-देश में नव वर्ष</title>
<description>आज हम लोग जिस नव वर्ष की खुशियाँ मना रहे हैं, वह नए कैलेंडर के अलावा और क्या है? स्कूलों, ऑफ़िसों में छुट्टी, टीवी पर रात भर के कार्यक्रम और रात के बारह बजे धमाल करने से आगे इस नव वर्ष का क्या महत्व है? भारत में विक्रम संवत का प्रारंभ चैत्र से होता है जो लगभग मार्च-अप्रैल के करीब पड़ता है और शक संवत का प्रारंभ कार्तिक से जो अक्तूबर-नवंबर के आस पास आता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2004/nav_varsh.htm</link>
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<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>दुर्गेश गुप्त 'राज' की कहानी- आइटम नंबर दस</title>
<description>'आइटम नंबर टेन` आवाज़ आती है। 'हाँ, मैं तैयार हूँ.' मैं जबाव देता हूँ और कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए अपने आपको तैयार करने लगता हूँ। सायकल उठाता हूँ और उस पर सवार हो अपने चेहरे पर रोज़ाना वाली कृत्रिम मुस्कुराहट लाने की कोशिश करता हूँ। बालों में कंघी मारता हूँ। फिर होठों की मुस्कुराहट को स्थिर करने की कोशिश करने लगता हूँ। तभी देखता हूँ जिमनास्टिक वाला ग्रुप लौटकर आ रहा है और मेरा ही नंबर है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/itemnodus/itemnumberdus1.htm</link>
</item>

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<title>राकेश शर्मा का व्यंग्य- कोई जूते से न मारे</title>
<description>जूते का मानव सभ्यता से बड़ा गहरा संबंध रहा है। कहते हैं कि किसी ज़माने में किसी नाजुक बदन और तुनक मिजाज़ राजा को बागिचे में टहलते हुए काँटा चुभ गया। फिर क्या था उसने सारी पृथ्वी को चमड़े से मढ़ देने का आदेश दिया। अब इतना चमड़ा आखिर पैदा कैसे हो, तो किसी बीरबल टाइप दरबारी ने एक छोटे से चमडे़ के टुकड़े को काट कर राजा के पाँव में पहना दिया और तब से धरती पर जूते का चलन चल पड़ा।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/koi.htm</link>
</item>


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<title>स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ का नवाँ और अंतिम भाग</title>
<description>''क्या आप कल यहाँ बाकी सबके पहुँचने से कुछ पहले आ पाएँगी? सूज़ाना ने पूछा।
''मैं चाहती हूँ कि कल यहाँ स्फ़टिक शिला पर दो धार्मिक प्रतिष्टापन हों- एक ज्यूइश, एक हिंदु। मुझे बहुत प्रोत्साहन मिलेगा यदि हिंदु प्रतिष्ठापन आप के हाथों से हो।''

मेरे हाँ कहने पर उसने कहा, ''मनु ने आपको बताया होगा कि कल होने वाली विवाह-पद्धति का हर चरण, हर प्रथा, हर विशिष्ट पाठन मनु का अपना चुनाव है। उसकी लिखी पटकथा में कोई वाक्य तो क्या एक शब्द भी बदलने के लिए उसकी अनुमति लेनी होगी।''
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache09.htm</link>
</item>


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<title>डॉ. दिवाकर का आलेख- चूड़ियाँ- इतिहास से संस्कृति तक</title>
<description>भारतीय नारियाँ रंग-बिरंगी चमकीली चूड़ियाँ कलात्मक एवं सुरुचिपूर्ण ढंग से पहनकर अपनी कोमल कलाइयों का शृंगार करती हैं। यह शृंगार शताब्दियों से कुमारियों एवं नारियों को रुचिकर प्रतीत होता है, साथ ही स्वजन-परिजन भी हर्षित होते हैं। हाथ की चार चूड़ियाँ उनके अहिवात को सुरक्षित रखने के लिए ही पर्याप्त हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2009/choodiyan.htm</link>
</item>


<item>
<title>रानी पात्रिक का संस्मरण- क्रिसमस जो ढ़ोलक की थाप पर पूरा हुआ</title>
<description>पाणिग्रहण संस्कार के समय मैंने अपने मेंहदी भरे हाथ विदेशी पति के हाथों पर पूर्ण समर्पण के साथ रख दिए। जीवन के प्रति हमारे सिद्धान्त एवं मूल्य तो एक ही थे पर अपने देश और माटी का छूटना अलग बात थी। मन में एक कसक-सी थी। मेरा देश छोड़ना मेरे अरमानों की उड़ान के कारण नहीं बल्कि अपने विदेशी पति के भारतीय प्रेम के कारण था जिसका मुझे गर्व भी था। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2002/christmas/christmas.htm</link>
</item>

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<title>दीपक शर्मा की कहानी- रक्त कौतुक</title>
<description>''कुत्ता बँधा है क्या?'' एक अजनबी ने बंद फाटक की सलाखों के आर-पार पूछा। फाटक के बाहर एक बोर्ड टँगा था- 'कुत्ते से सावधान!'
ड्योढ़ी के चक्कर लगा रही मेरी बाइक रुक ली। बाइक मुझे उसी सुबह मिली थी। इस शर्त के साथ कि अकेले उस पर सवार होकर मैं घर का फाटक पार नहीं करूँगा। हालाँकि उस दिन मैंने आठ साल पूरे किए थे।
''उसे पीछे आँगन में नहलाया जा रहा है।''</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/raktkautuk/raktkautuk1.htm</link>
</item>

<item>
<title>अविनाश वाचस्पति का व्यंग्य- काले का बोलबाला</title>
<description>आज दुनिया भर में काले बनने बनाने का फितूर छाया हुआ है। अभी कुछ अर्सा पहले तक जो कंपनियाँ गोरेपन को तरह-तरह की क्रीमों के जरिए भुना रही थीं, उन सभी को सावधान हो जाना चाहिए। नई क्रीमें बाज़ार में निकल पड़ी हैं जो कहती हैं- कालिमा क्वीन, ब्लैक एंड लवली क्रीमों को अपने चेहरों पर पोतें और इतने चमकदार हो जाएँ कि गोरापन भी शर्मा जाए। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/kale.htm</link>
</item>


<item>
<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ का आठवाँ भाग</title>
<description>जमी हुई बर्फ़ की लटकती हुई लड़ियों नुमा बतियों का सेहरा पहन कर हमारा घर बाहर से दुल्हा बन कर सज गया। अंदर वाले कमरे में इस दीवार से उस दूर की दीवार को मिलाती चौड़ी खिड़की के सामने दुल्हन के घर में लगाई जाने वाली विवाह-वेदिका बनी। मंगल कलश, हल्दी-कुंकुंम के रंगों वाले ताज़े फूलों की रंगोलियाँ, आम के पत्तों की लड़ियाँ और बंदनवार सभी कुछ सजावट शगुन मनाए गए। दो दिन से लगातार गिरने वाली बर्फ़ की घनी-घनी फुहारों ने घर के चारो तरफ़ उँघते ठिठुरते पेड़ों की सूखी टहनियों को चाँदनी जैसे उजले चंदोवे बना दिया। बाहर बर्फ़ गिरती रही। और भीतर हमारे परिवार, परिवार जैसों की आमद-रफ़्त बढ़ती रही।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache08.htm</link>
</item>


<item>
<title>तारादत्त निर्विरोध के साथ देखें- आबू की प्राकृतिक सुषमा</title>
<description>प्राकृतिक सुषमा और विभोर करनेवाली वनस्थली का पर्वतीय स्थल 'आबू पर्वत' स्वास्थ्यवर्धक जलवायु के साथ एक परिपूर्ण पौराणिक परिवेश भी है। यहाँ वास्तुकला का हस्ताक्षरित कलात्मकता भी दृष्टव्य है। पर्यटक हैं कि खिंच चले आते हैं और आबू का आकर्षण है कि आए दिन मेला, हर समय सैलानियों की हलचल चाहे शरद हो या ग्रीष्म। आबू ग्रीष्मकालीन पर्वतीय आवास स्थल और पश्चिमी भारत का प्रमुख पर्यटन केंद्र रहा है। यह ४३० मील लंबी और विस्तृत अरावली पर्वत शृंखला में दक्षिण-पश्चिम स्थित तथा समुद्रतल से लगभग ४००० फुट की ऊँचाई पर अवस्थित है। गुरु शिखर इस पर्वत का सर्वोच्च शिखर है जो समुद्रतल से ५६५० फुट ऊँचा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2009/mt.abu/abu.htm</link>
</item>


<item>
<title>घर-परिवार में- माटी कहे पुकार के </title>
<description>चाहे वह सूरज कुंड का मेला हो या शिल्पग्राम की प्रदर्शनी या फिर पड़ोस के गाँव की हाट- मिट्टी की लयात्मक कारीगरी आपको अपनी ओर खींच ही लेती है। मानो पुकार-पुकार कर कहती है। मैं माटी हूँ शुद्ध माटी तुम्हारी तरह जीवंत। निस्पंद नहीं हूँ प्लास्टिक की तरह। माटी का प्रेम ही कुछ ऐसा है तालब रामपुरी के शब्दों में - </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/2001/mkpk.htm</link>
</item>

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<title>विनीत गर्ग की कहानी- बसवाली लड़की</title>
<description>धीरज की आँख खुलीं, तो सामने  टँगे हुए कैलेंडर ने एक परंपरागत पड़ोसी की तरह मौका मिलते ही सच्चाई का ज्ञान करा देने के अंदाज़ में उसे आज की तारीख़ बता दी और बड़ी ही बेरहमी से उन २५ साल, १० महीने, १२ दिनों का एहसास भी करा दिया जो धीरज ने इस धीरज के साथ बिताए थे कि धीरज का फल मीठा होता है। ठीक एक महीना पहले पूरे हुए एम.बी.ए. के एक महीने बाद आज २६ अप्रैल, २००९ को भी उसका जीवन उतना ही खाली था जितना एम.बी.ए. में प्रवेश लेते समय या उससे पहले के किसी भी पल।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/buswali_ladki/buswali_ladki1.htm</link>
</item>


<item>
<title>रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति का व्यंग्य- कुर्ता-पायजामा पहनने के लाभ</title>
<description>रिटायरमेंट के बाद कुरता पायजामा हमारी पहली प्राथमिकता बने। हम कुरते पायजामे के आराम को जानते थे। इसी मज़े के लिए हमने कुरता पायजामा सिलवाया। नौकरी में नहीं पहन सके। नौकरी में पेंट शर्ट और बेल्ट पहनना ज़िंदगी भर मजबूरी बनी रही। कुरता पायजामा पहनने के बाद हमें पता चला कि जनता इसे नेताओं का अधिकृत परिधान मानने लगी है। ख़ैर, हमें कुरते पायजामा पहनने के बाद के ऐसे फ़ायदे भी मिलने लगे जिनकी हमें उम्मीद भी नहीं थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/kurta.htm</link>
</item>


<item>
<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ का सातवाँ भाग</title>
<description>फिर सुनने में आया कि इस्टर्न दरिया के मुहाने पर स्टैचू ऑफ लिबर्टी की पृष्ठभूमि में एक बंदरगाही रेस्टराँ उनके पसंदीदा में उपरवाले पाँच की उस फ़हरिस्त में आ गया है जिनको उन्होंने पंद्रह और जगह देख कर अपने विवाह उपरांत के रिसेप्शन के लिए चुना है। कुछ ही दिन बाद वह पूरी की पूरी फ़हरिस्त चिंधियाँ बना कर फेके जाने की उड़ती-उड़ती ख़बर मिली। रिसेप्शन में कौन, कहाँ और किसके साथ बिठाया जाएगा, यह अपने आप में युनाइटेड नेशन्ज़ की आम सभा के सार्वजनिक अधिवेशन के लिए निर्धारित कुर्सियों के चयन से ज़्यादा चुनौती जनक हो गया। यू.एन. की आम सभी में हर सदस्य राष्ट्र के लिए पूर्व निर्धारिक कुर्सियों की कतार होती है जो इंग्लिश कायदे के अक्षरों की तरतीब के मुताबिक निश्चित रहती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache07.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. हीरालाल बछोतिया का आलेख- सतलुज की कहानी</title>
<description>सतलुज का उद्गम राक्षस ताल से हुआ है। राक्षस ताल तिब्बत के पश्चिमी पठार में है। यह सुविख्यात मानसरोवर से कोई दो कि.मी. की दूरी पर है। सतलुज शिप्कीला से भारत के किन्नर लोक में प्रवेश करती है। किन्नर देश में सतलुज को लाने का श्रेय वाणासुर को दिया जाता है जैसे गंगा को लाने का श्रेय भगीरथ को है और इसी कारण गंगा का नाम भागीरथी भी है। किंतु सतलुज का नाम वाणशिवरी नहीं हैं। एक कथा के अनुसार पहले किन्नर दो राज्यों में विभक्त था। एक की राजधानी शोणितपुर (सराहन) थी और दूसरे की कामरू।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2009/satluj.htm</link>
</item>


<item>
<title>गृहलक्ष्मी से सुनें- रूमाल की कहानी </title>
<description>रूमाल जो नज़ाकत का प्रतीक है, जो भावनाओं को अपनी सुकोमल तहों में समेट लेता है, जो हर घर और हर अवसर की शोभा है, क्या आपने कभी उसके दिल में झाँकने की कोशिश की है? देखने में तो यह कपड़े का नन्हा-सा टुकड़ा भर है लेकिन इससे नाक साफ़ करने से लेकर उपहार में देने तक सारे काम लिए जाते हैं!</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/2001/rumal.htm</link>
</item>

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<item>
<title>बलराम अग्रवाल की कहानी- खुले पंजोंवाली चील</title>
<description>दोनों आमने-सामने बैठे थे-काले शीशों का परदा आँखों पर डाले बूढ़ा और मुँह में सिगार दबाए, होठों के दाएँ खखोड़ से फुक-फुक धुँआ फेंकता फ्रेंचकट युवा। चेहरे पर अगर सफेद दाढ़ी चस्पाँ कर दी जाती और चश्मे के एक शीशे को हरा पोत दिया जाता तो बूढ़ा 'अलीबाबा और चालीस चोर' का सरदार नज़र आता और फ्रेंचकट लम्बोतरे चेहरे और खिंची हुई भवों के कारण वह चंगेजी-मूल का लगता था।</description>
<link>http://ww.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/khule_panjonwali_cheel/khulepanjonwalicheel1.htm</link>
</item>


<item>
<title>प्रमोद ताम्बट का व्यंग्य- आज़ादी सपने देखने की</title>
<description>''इलेक्ट्रिशियन बनने का सपना देख रहे हैं? हम आपको बनाएँगे ट्रेंड इलेक्ट्रिशियन।'' ऑटो की पीठ पर लिखा यह विज्ञापन देखकर बंदा अभिभूत हो गया। सच्ची, भारत ही दुनिया में एक ऐसा अद्भुत देश हो सकता है जहाँ हर नागरिक पूरी आज़ादी के साथ कुछ बनने का छोटा से छोटा या बड़ा से बड़ा सपना देख सकता है। पैदा हुए, मन हुआ स्कूल गए-नहीं गए, चौथी-पाँचवी तक पढ़े-पढ़े, नहीं पढ़े -नहीं पढ़े, फिर नवी, दसवी तक आते-आते रोटी-रोज़गार के सपने देखने लगे। </description>
<link>http://ww.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/aazadi.htm</link>
</item>


<item>
<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ का छठा भाग</title>
<description>मैंने इतनी लंबी सांस छोड़ी कि मनु कुछ घबरा ही गया।
"ममा। आप सुन रही हैं न!"
"सुन रही हूँ? नाच रही हूँ, गाने को जी चाहता है। समझ नहीं आ रहा कि इतनी खुश मैं पिछले पाँच सालों में कब हुई हूँ।"
"सही नहीं है, ममा। लीना और शान्तनु कल ही तो आए थे आपके पास।"
"तो तुम्हें पता है।"
"हम यहाँ आने से पहले मिले थे उन्हें। और फ्लाइट पकड़ने से पहले घर आकर आपको बताना चाहते थे कि आप निश्चिंत हो जाएँ। लेकिन जब दोनों ने खुशखबरी सुनाई तो मैंने सोचा कि हर ख़बर आपको अछूती मिलनी चाहिए।"
"लीसा कहाँ है?"
"यहीं बैठी है मेरे पास। आपसे बात करना चाहती है।"
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache06.htm</link>
</item>


<item>
<title>कैलाश जैन का आलेख- अद्भुत औषधि ईसबगोल</title>
<description>हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति मूलतः प्राकृतिक पदार्थों और जड़ी-बूटियों पर आधारित थी। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में साध्य-असाध्य रोगों का इलाज हम प्रकृति प्रदत्त वनस्पतियों के माध्यम से सफलतापूर्वक करते थे। समय की धुंध के साथ हम कई प्राकृतिक औषधियों को भुला बैठे। 'ईसबगोल' जैसी चमत्कारिक प्राकृतिक औषधि भी उन्हीं में से एक है। हमारे वैदिक साहित्य और प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। </description>
<link>http://ww.abhivyakti-hindi.org/ss/2009/isabgol.htm</link>
</item>


<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>

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<title>महेशचंद्र द्विवेदी की कहानी- 'चाची'</title>
<description>चाची! तुम पूछोगी नहीं, 'लला! मेम साहब कौ नाईं लाए का?' मैं आ गया हूँ और तुम्हें बताने को उत्सुक हूँ कि मेम साहब भी आईं हैं, मेरे पीछे बरामदे के दरवाज़े पर किवाड़ का सहारा लेकर खड़ीं हैं- तुम्हारे द्वारा पूछे जाने की प्रतीक्षा वह भी कर रहीं हैं। पर हम जानते हैं कि यह प्रतीक्षा तो हमारी मृगतृष्णा शांत करने को मृगमरीचिका मात्र है- तुम तो हमसे इतनी रूठ गई हो कि कभी भी हमसे कोई पूछताछ न करने का संकल्प ले चुकी हो। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/chachi/chachi1.htm</link>
</item>


<item>
<title>विनोद विप्लव का व्यंग्य- सच की नगरी और चोरों का राजा</title>
<description>एक जमाने में एक मुल्क हुआ करता था जिसकी सरहदें हिमालय की गगनचुंबी चोटी से लेकर हिन्द महासागर की अतल गहराई तक फैली हुई थीं। यह आजाद देश था और लिहाजा यहाँ के नागरिकों को और उनसे अधिक विदेशियों को, अपनी मर्जी के अनुसार कुछ भी करने, कुछ भी बोलने, कुछ भी देखने और कुछ भी दिखाने की पूरी आजादी थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/such.htm</link>
</item>


<item>
<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ का पाचवाँ भाग</title>
<description>राजन अपने ही घर का दरवाज़ा खोलने से पहले ठिठकते हैं, जैसे मुआइना कर रहे हो कि इनकी ग़ैरमौजूदगी में कुछ टूटा-फूटा तो नहीं। और शान्तनु जब जल्दी में होता है ताकि दरवाज़ा खुलने और भीतर आने में कम से कम वक्त लगे। आज भी शान्तनु ही था। टी.वी. रूम से किचन की तीन सीढ़ियों को डेढ़ फर्लांग में फाँद कर "हा डेड, हा मोम!'' कहता हुआ मेरे पास आकर रुका।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache05.htm</link>
</item>


<item>
<title>रामकृष्ण का आलेख- गीता की रचना</title>
<description>कलियुग के प्रारंभ होने के मात्र तीस वर्ष पहले, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन, कुरुक्षेत्र के मैदान में, अर्जुन के नन्दिघोष नामक रथ पर सारथी के स्थान पर बैठ कर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश किया था। इसी तिथि को प्रतिवर्ष गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2009/geeta.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. गुरूदयाल प्रदीप से जानें- सदुपयोग मकड़ी के जाले का </title>
<description>मकडियों तथा मकड़ियों के बनाए जाल से भला कौन नहीं परिचित है? तरह-तरह के रेशमी तंतुओं के उत्पादन में दक्ष होती है ये मकड़ियाँ। इन रेशमी तंतुओं का उपयोग ये मकड़ियाँ केवल शिकार फंसाने के लिए ही नहीं करतीं बल्कि अपने बिलों के द्वार को ढकने तथा इनकी भीतरी दीवारों पर नरम स्तर के निर्माण के लिए भी करती हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/vigyan/2004/sadupayog.htm</link>
</item>

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<item>
<title>भालचंद्र जोशी की कहानी- कहीं भी अँधेरा</title>
<description>मैंने बहुत सावधानी से चारों ओर देखा लेकिन मेरे सिवा वहाँ कोई नहीं था। मुझे तसल्ली हुई, जिसका कि कोई कारण नहीं था। चारों ओर घने और बड़े-बडे पेड़, मुझे अजीब-सा लगा। मैंने हाथ बढ़ाकर एक पेड़ को धीरे से सरकाया तो सहसा पीछे से एक दूसरा ही दृश्य सामने आ गया।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/kahibhi_andhera/kahibhi_andhera1.htm</link>
</item>


<item>
<title>हरिशंकर परसाईं का व्यंग्य- एक मध्यवर्गीय कुत्ता</title>
<description>मेरे मित्र की कार बंगले में घुसी तो उतरते हुए मैंने पूछा, ''इनके यहाँ कुत्ता तो नहीं है?'' मित्र ने कहा, ''तुम कुत्ते से बहुत डरते हो!'' मैंने कहा, ''आदमी की शक्ल में कुत्ते से नहीं डरता। उनसे निपट लेता हूँ। पर सच्चे कुत्ते से बहुत डरता हूँ।'' 
कुत्तेवाले घर मुझे अच्छे नहीं लगते। वहाँ जाओ तो मेज़बान के पहले कुत्ता भौंककर स्वागत करता है। अपने स्नेही से ''नमस्ते'' हुई ही नहीं कि कुत्ते ने गाली दे दी- ''क्यों यहाँ आया बे? तेरे बाप का घर है? भाग यहाँ से!'' </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/madhyavargiya.htm</link>
</item>


<item>
<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ का चौथा भाग</title>
<description>राजन अपने ही घर का दरवाज़ा खोलने से पहले ठिठकते हैं, जैसे मुआइना कर रहे हो कि इनकी ग़ैरमौजूदगी में कुछ टूटा-फूटा तो नहीं। और शान्तनु जब जल्दी में होता है ताकि दरवाज़ा खुलने और भीतर आने में कम से कम वक्त लगे। आज भी शान्तनु ही था। टी.वी. रूम से किचन की तीन सीढ़ियों को डेढ़ फर्लांग में फाँद कर "हा डेड, हा मोम!'' कहता हुआ मेरे पास आकर रुका।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache04.htm</link>
</item>


<item>
<title>कनीज भट्टी का लेख- रूप का रखवाला घूँघट</title>
<description>किसी परंपरा के बनने में सदियाँ लगती हैं, तो उसके टूटने में उससे भी अधिक समय और साहस की ज़रूरत पड़ती है। यह बात पर्दा-प्रथा पर भी लागू होती है। धीरे धीरे घूँघट को नकारा जा रहा है। नारी का कार्य क्षेत्र रसोईघर से ऑफ़िस तक प्रसारित हो जाने के कारण भी पर्दा उपेक्षित हुआ। कामकाजी महिलाओं के लिए अब यह अनुकूल नहीं रहा है। बतौर फैशन के नगरों में पर्दे का चलन बढ़ा भी है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2009/ghoonghat.htm</link>
</item>


<item>
<title>धर्मवीर भारती का संस्मरण- जब मैंने पहली निजी पुस्तक खरीदी </title>
<description>अगस्त १९८९, बचने की उम्मीद नहीं थी। तीन-तीन ज़बर्दस्त हार्ट अटैक, एक के बाद एक। एक तो ऐसा कि नब्ज़ बन्द, सांस बन्द, धड़कन बंद। डाक्टरों ने घोषित कर दिया कि अब प्राण नहीं रहे। पर डॉ. बोर्जेस ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी थीं। उन्होंने १०० वाल्ट्स के शाक्स दिए, भयानक प्रयोग। लेकिन वे बोले कि यदि यह मृत शरीर मात्र है तो दर्द महसूस ही नहीं होगा,पर यदि कहीं भी जरा भी एक कण प्राण शेष होंगे तो हार्ट रिवाइव कर सकता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2002/dharmveerbharti.htm</link>
</item>

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<item>
<title>मनमोहन भाटिया की कहानी- शिक्षा</title>
<description>मुख्य राजमार्ग से कटती एक संकरी सड़क आठ किलोमीटर के बाद नहर पर समाप्त हो जाती है। नहर पार जाने के लिए कच्चा पुल एकमात्र साधन है। जब नहर में अधिक पानी छोड़ा जाता है, तब पुल टूट जाता है और नाव से नहर पार जाया जाता है। अस्थायी पुल जिसे नहर पार के गाँव निवासी खुद बनाते है, बरसात के महीनों में और अधिक पानी के आ जाने पर टूट जाता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/shiksha/shiksha1.htm</link>
</item>

<item>
<title>अविनाश वाचस्पति का व्यंग्य- भिखारियों से भेदभाव क्यों</title>
<description>खबर है कि कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान भिखारियों को दिल्ली से बाहर खदेड़ने की तैयारिया चल रही हैं। मेरी दिल्‍ली में जब नेताओं से भी प्‍यार किया जाता है तो भिखारियों ने ऐसा कौन-सा गुनाह कर दिया है कि खेल कूद के मौके पर उन्‍हें भगाने की जुगत भिड़ाई जा रही है। इन्‍हें भगाने के बजाय सुंदर-सुंदर कपड़े पहनाकर दर्शकदीर्घा में बिठाया जाना चाहिए। जिससे सब लोग जान सकें कि भारत के भिखारी खेल प्रेमी हैं।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/bhikhariyon.htm</link>
</item>


<item>
<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ</title>
<description>मनु ने वही कहा जो उसे शिष्ट और उचित लगा।
"लेकिन आप वही कीजिए, जिसमें आप ज़्यादा खुश हैं।"
राजन ने अपना मत भी दिया और ऐसे कि मुझे अपना निर्णय लेने के नतीजे साफ़ हो जाएँ।
"तुम्हें तो यहाँ का माहौल दिल्ली से ज़्यादा चुनौति वाला लगता है न वापस क्यों जाना चाहती हो।"
"इसलिए कि मुझे अब तक किसी ने यहाँ टिके रहने का न्योता नहीं दिया।"
"अभी तुम्हारा कांट्रेक्ट ख़त्म होने में चार महीने हैं। मुझे नहीं लगता कि तुम्हारा डिपार्टमेंटल बास तुम्हें आसानी से हिन्दुस्तान वापस जाता देखना चाहेगा।"
शान्तनु का दो टूक जवाब मिला था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache03.htm</link>
</item>


<item>
<title>आज सिरहाने- प्रवास में पहली कहानी</title>
<description>२००८ में वाणी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित, उषा वर्मा द्वारा संपादित 'प्रवास में पहली कहानी' ब्रिटेन की महिला कथाकारों की गंगा-जमुनी संस्कृति का 'ऐतिहासिक दस्तावेज़' है। इसमें ब्रिटेन में बसी भारतीय उपमहाद्वीप की इक्कीस महिला कथाकारों की स्वदेश से दूर, परदेस में पहली बार लिखी कुल इक्कीस कहानियाँ संकलित हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2009/pravas.htm</link>
</item>


<item>
<title>फुलवारी में- कस्तूरी मृग के विषय में जानकारी </title>
<description>हिमवंत क्षेत्र के इस मृग का नाम 'कस्तूरी मृग' इसलिए पड़ा कि इसकी नाभी से कस्तूरी निकलती है। कस्तूरी अपनी सुगंध के लिए प्रसिद्ध है तथा दवाइयों में प्रयुक्त होती है। कस्तूरी प्राप्त करने के लिए सदियों से इसका अनियंत्रित वध हुआ है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/jaankari/junglekepashu/j_kasturi_mrig.htm</link>
</item>

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<title>रूपसिंह चन्देल की कहानी— 'हादसा'</title>
<description>पर्यावरण के संबन्ध में उसे इंडिया इंटरनेशनल सेण्टर में वक्तव्य देना था। हारवर्ड विश्वविद्यालय से 'पर्यावरण प्रबन्धन ' की उपाधि लेकर जब एक साल पहले वह स्वदेश लौटा, सरकार के पर्यावरण विभाग ने उसकी सेवाएँ लेने के लिए कई प्रस्ताव भेजे। लेकिन स्वयं कुछ करने के उद्देश्य से उसने सरकारी प्रस्तावों  पर उदासीनता दिखाई। वह जानता है कि ऐसी किसी संस्था से बँधने से उसकी स्वतंत्रोन्मुख सोच और विकास बाधित होंगे। वह स्वयं को अपने देश तक ही सीमित नहीं रखना चाहता, बावजूद इसके कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ देश के लिए देना चाहता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/hadasa/hadasa1.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रेम जनमेजय का व्यंग्य- अँधेरे के पक्ष में उजाला</title>
<description>मेरे मोहल्ले में अनेक चलते किस्म के लोग रहते हैं। मेरे मोहल्ले में पुलिस, न्यायालय, संसद, साहित्य, नौकरशाही आदि क्षेत्रों से जुड़े लोग रहते हैं। आप तो ज्ञानी ही हैं और जानते ही होंगें मनुष्य भी एक मशीन है और इस मशीन के पुर्जों का सही इस्तेमाल करना चलते किस्म के लोगों का ही कमाल होता है और ऐसे महापुरुषों को चलता पुर्जा भी कहा जाता है। मेरे मोहल्ले में इन्हीं 'चलताउ' किस्म के लोगों का साथ निभाने और नैतिक बल देने के लिए एक चलती सड़क भी है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/andhere.htm</link>
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<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ</title>
<description>हो सकता है कि अपने माँ-पापा का यह जज़बाती देना-पावना हमारे बेटों को एक नौसिखिए का अधपका बहीखाता लगता हो! उन दोनों में से एक ने अपना कैरियर चुना है फाईनैन्स में - असल-सूद, बचत-घटत, आमदनी-खर्च, कहीं किसी भूल-चूक का सही-सही ब्योरा न हो पाए तो अपना ही नहीं, लाखों-करोड़ों औरों का भी भटठा बैठ जाए। दूसरे को इन्फोर्मेशन टैकनॉलॉजी से कमाई है, सूचना संकलन,, विभाजन, प्रसारण कहीं से कहीं तक जमा-जुटा कर तुरंत प्रयोग के नए-नए साधनों का जुगाड़ न हो तो चलते फिरते लोग आगे कम बढ़े, टकराएँ ज्यादा। ख़बर कीमती हो, तो ख़रीददार कम नहीं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache03.htm</link>
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<title>वेद प्रताप वैदिक का दृष्टिकोण- इंदिरा गांधी ने बनाया भारत को महाशक्ति</title>
<description>भारत की विदेश नीति तो बनाई जवाहरलाल नेहरू ने और चलाई कई प्रधानमंत्रियों ने लेकिन जैसे झंडे इंदिरा गांधी ने गाड़े, कोई और नहीं गाड़ सका। ऐसे चमत्कारी काम कभी-कभी सुसंयोग और अनुकूल परिस्थितियों के कारण भी हो जाते हैं लेकिन जिन कामों का यहाँ जिक्र किया जा रहा है, वे हो ही नहीं सकते थे, अगर इंदिरा गांधी नहीं होतीं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2009/indira_gandhi.htm</link>
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<title>नरेन्द्र पुंडरीक का आलेख- जीवन सत्य के उद्घोषक कवि केदारनाथ </title>
<description>मेरा केदार जी से सर्वप्रथम परिचय एक वकील के रूप में हुआ। तब मैं आठवी में गौरमेन्ट स्कूल में गाँव से पैदल पढ़ने आता था। हमारे स्कूल जाने का शार्टकट रास्ता कचहरी के बीच से था सो आते-जाते हम काठ की कुर्सियों व लकड़ी के तख्तों में बैठे या इधर उधर आते-जाते काले कोट धारी वकीलों को देखा करते थे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2001/kedar/kedar1.htm</link>
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<title>शैली खत्री की कहानी— 'बादल छँट गए'</title>
<description>आँख के कोने से एक बूँद आँसू निकल आया। नहीं, ये आँसू दुख के नहीं बेबसी के हैं। परिस्थितियों का क्या किया जाए। सच, समय और परिस्थितियाँ बड़ी बलवान होती हैं। ये अपने इशारों पर नचा कर रख ही देती हैं। सपने तोड़ती नहीं हैं तो सपने पूरे भी नहीं होने देती। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/badal_chhant_gaye/badal1.htm</link>
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<title>हरिहर झा का व्यंग्य- भारतीय छात्र जाएँ भाड़ में</title>
<description>३१ मई, रविवार का दिन। ४००० विद्यार्थियों को मेलबर्न में इकठ्ठे होकर प्रदर्शन की क्या आवश्यकता पड़ गई? बेकार में कुछ छुटपुट घटनाओं को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की क्या जरूरत पड़ी? सोंचता हूँ कुछ तो खून-खराबा, लूट-खसोट, मारामारी दुनिया के हर कोने में होती है - आस्ट्रेलिया में भी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/bhartiya_chhatra.htm</link>
</item>


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<title> स्वदेश राणा का धारावाहिक- नचे मुंडे दी माँ</title>
<description>मनु का कहना है कि राजन समझौता कर तो लेते हैं लेकिन झुकते कभी नहीं और मैं उनका मान रखने के लिए पीठ दुहरा लेती हूँ अपनी। शायद इसीलिए कद्दावर राजन का मेरूदंड सठियाने का नाम नहीं लेता। और मेरी पीठ? दुखती तो है ही, दुखाती भी है। कभी शियाटिका बन कर टाँगों को जकड़ लेती है तो कभी स्पांडैलाइटिस बन कर काँधे कचोट लेती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/nache_mundedi_ma/nache01.htm</link>
</item>


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<title>स्वयं प्रकाश का आलेख- हिंदी नाटक कहाँ गया</title>
<description>अक्सर इस बात का रोना रोया जाता है कि हिंदी में अच्छे नाटक नहीं हैं। लेकिन इस बात पर कभी विचार नहीं किया जाता कि हिंदी में अच्छे नाटक क्यों नहीं हैं?  क्या हिंदी के लेखक प्रतिभाशून्य हैं? क्या वे आधुनिक रंगमंच की प्रविधियों से अनभिज्ञ हैं? क्या वे रंगकर्मियों के साथ सहयोग नहीं करना चाहते?</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/hindinatak.htm</link>
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<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>प्रतिभा राय की ओड़िया कहानी- पादुका पूजन</title>
<description>राम जैसा पितृभक्त कौन है, लक्ष्मण-भरत जैसा भ्रातृभक्त और कौन जनमा है अभी तक! पादुका पूजन में भरत से आगे निकल जाए- ऐसा आदमी नहीं है इस दुनिया में। विधानबाबू के घर पादुका पूजन देख कोई ऐसा सोचता है तो कोई हँसता है। कुछ सोचते हैं कि यह सब दिखावटी भक्ति है। पादुका पूजन, वह भी पिता का नहीं, ना ही माँ का, बल्कि पिता के छोटे भाई और विधानबाबू के चाचा का।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sahityasangam/2009/paduka_pujan/paduka_pujan1.htm</link>
</item>


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<title>योगेश अग्रवाल का व्यंग्य- हंगामा देवलोक में</title>
<description>इंद्रासन ले लो या शेषन का सिंहासन ले लो। अमेरिकी प्रशासन ले लो या फिर 'सुदर्शन' ले लो। कहीं का पीएम पद ले लो या ठाकरे श्री का उत्तराधिकार ले लो। कहो तो 'ए.बी.सी.' तुम्हारे नाम करा दें। हे युग पुरुष! माता लक्ष्मी को इस धर्म संकट से मुक्त करो और अपने इस 'एक वरदान' को छोड़कर कोई भी दूसरा वरदान माँग लो-कृपया। घंटों से चल रहा था यही सीन। मुझे मनाने का। पर मैं तटस्थ था अपनी ज़िद्द पर। मेरे एक ही वरदान ने चकरा दिया था धनदेवी को। अन्य देव भी दौड़ पड़े मुझे मनाने।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/hungama.htm</link>
</item>


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<title>पर्यटन में डॉ. विभा सिंह के साथ- राम का शरण स्थल चित्रकूट धाम</title>
<description>सदियों से हिंदुओं की आस्था का केंद्र चित्रकूट वही स्थान है, जहाँ कभी भगवान श्रीराम ने देवी सीता और लक्ष्मणजी के साथ अपने वनवास के साढ़े ग्यारह वर्ष बिताए थे। असल में कर्वी, सीतापुर, कामता, खोही और नया गांव के आस-पास का वनक्षेत्र चित्रकूट नाम से विख्यात है। चित्रकूट, चित्र और कूट शब्दों के मेल से बना है। संस्कृत में चित्र का अर्थ है अशोक और कूट का अर्थ है शिखर या चोटी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2009/chitrakoot/chitrakoot1.htm</link>
</item>


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<title>कृष्णकुमार यादव का आलेख- दीपावली मान्यताओं के दर्पण में</title>
<description>सामान्यत: त्यौहारों का संबंध किसी न किसी मिथक, धार्मिक मान्यताओं, परम्पराओं और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा होता है। मानवीय सभ्यता के आरम्भ से ही मनुष्य ऐसे क्षणों की खोज करता रहा है, जहाँ वह सभी दुख, कष्ट व जीवन के तनाव को भूल सके। आदिम युगीन समाज में शिकार करना केवल भय को शांत करने की आवश्यकता मात्र नहीं था वरन उत्साह एवं प्रसन्नता का प्रतीक भी था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2009/diwali.htm</link>
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<title>महेशचंद्र कटरपंच से जानें- दीपावली का दार्शनिक पक्ष </title>
<description>दीपावली दीपों का उत्सव हैं - जलते और जगमगाते दीपों का। इसीलिए इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। दीप जलता हैं-- अंधकार को दूर भगाने तथा अपनी ज्योति का आलोक बिखेरने। दीपावलियाँ अपने प्रकाश से तिमिर का संहार करती हैं। प्रकाश के समक्ष अंधकार ठहर सकता है भला।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2002/darshanik_paksh.htm</link>
</item>
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<title>सूरज प्रकाश का प्रहसन- हम कितना रोए</title>
<description>कमरे का दृश्य। मेज़ पर एक नेम प्लेट रखी है - उमा दत्त दूबे अनजान, उपन्यासकार। 
एक लेखकनुमा आदमी कमरे में तेज़ से चहलकदमी कर रहा है। बार-बार घड़ी देखता है मानो किसी का इंतज़ार का रहा हो। कभी हवा से बातें करता है तो कभी सोच कर खुश हो जाता है मानो कोई बहुत बढ़िया आइडिया आ गया हो। वह जेब से पैन निकाल कर लिखना चाहता है लेकिन उसे कहीं भी कोई काग़ज़ नज़र नहीं आता है। अपने आपको कोसता है - कैसा लेखक हूँ मैं, कमरे में एक भी काग़ज़ नहीं। मजबूरन मेज़ की धूल पर ही उँगली से लिखता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/natak/hkr/hkr1.htm</link>
</item>


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<title>गिरीश बिल्लोरे मुकुल की लघुकथा- शुभकामनाएँ-एक चिंतन</title>
<description>बात पिछली दीपावली की है। भूल गया था,  पर इस बार दीपावली की धूमधाम शुरू होते ही याद आ गई। त्योहार की धूमधाम भरी तैयारियों में पिछले साल श्रीमती गुप्ता ने ढेरों पकवान बनाए सोचा मोहल्ले में गज़ब का प्रभाव जमा देंगी।  बात ही बात में गुप्ता जी को ऐसा पटाया की यंत्रवत श्री गुप्ता ने हर वो सुविधा मुहैय्या कराई जो एक वैभवशाली दंपत्ति को को आत्म प्रदर्शन के लिए ज़रूरी थी। “माडल” जैसी दिखने के लिए श्रीमती गुप्ता ने साड़ी ख़रीदी और गुप्ता जी को कोई तकलीफ न हुई। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2009/shubhkamanayen.htm</link>
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<title>आज सिरहाने- कुँवर नारायण का खंडकाव्य वाजश्रवा के बहाने</title>
<description>वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण की नयी काव्य रचना 'वाजश्रवा के बहाने' को हम हिंदी भाषा का उपनिषद कह सकते हैं। स्थूल भौतिक रूपों के परे, गोचर के पार, हर वस्तु का, हर विचार का एक अपना अनंत संसार फैला हुआ होता है। जैसे दीपक का प्रकाश अनंत तक फैलता चला जाता है, भले ही उसकी आभा मद्धम होते-होते हमारी आँखों से अदृश्य हो जाए, वैसे ही वस्तुओं का विस्तार अनन्त और अनश्वर होता है। इस तरह के अगणित विस्तार एक दूसरे को आच्छादित किये हुए पसरे पड़े हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2009/vajshrava_ke_bahane.htm</link>
</item>


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<title>अर्बुदा ओहरी के सुझाव- प्रकृति प्रेम के संग दीवाली</title>
<description>साल भर से जिस महत्त्वपूर्ण त्योहार का इंतज़ार रहता है वह अब आने ही वाला है। त्योहारों के इस पूरे महीने में हर जगह धूम रहती है। बाज़ार-दूकानें, गलियाँ-चौबारे, घर-आँगन सभी सजे रहते हैं। रौनक से भरा यह त्योहार रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ मिल कर मनाने से और भी मज़ेदार बन जाता है। पर यह मज़ा पर्यावरण को शुभता प्रदान करे और प्रदूषण कम से कम हो इसका ध्यान रखना भी आवश्यक है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/2009/diwali.htm</link>
</item>


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<title>दीपावली की तैयारी- कंदील, बंदनवार, उपहार और पकवानों के साथ </title>
<description>दीपावली की तैयारी- कंदील, बंदनवार, उपहार और पकवानों के साथ  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/jaankari/tyohar/s_diwali1.htm</link>
</item>
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<title>मनोज तिवारी की कहानी- जय माता दी</title>
<description>शहर की आबादी से करीब पचास किलोमीटर दूर सिद्धेश्वरी माता का मंदिर। आस-पास के गाँवों में इसकी बड़ी आस्था है और वे इसे दुर्गा का ही एक रूप मानते हैं। लोगों का मानना है कि देवी के दरबार में जो भी सच्चे मन से मुराद माँगता है देवी उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करती हैं। यहाँ पर लोग पहली बार आकर मन्नत माँगते हैं और माता को याद कराते रहने की गरज से एक धागे में गाँठ लगाकर छोड़ जाते हैं। जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती तो वे अगली बार आकर उस गाँठ को खोल देते हैं। नवरात्रि के अवसर पर तो यहाँ श्रद्धालुओं का अपार जनसमूह इकट्ठा होता ही है लेकिन वर्ष के बाकी महीनों में भी कुछ न कुछ भीड़ बनी रहती है। मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग पाँच सौ सीढ़ियाँ हैं जिन पर चल कर मंदिर तक पहुँचना अपने आप में किसी तप से कम नहीं है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/jai_matadi/jaimatadi1.htm</link>
</item>


<item>
<title>सूर्यकांत नागर की लघुकथा- देवी पूजा</title>
<description>वे देवी भक्त हैं। सामान्यत तो रोज़ ही देवी की पूजा करते हैं, नव रात्र के दिनों में देवी का विशेष ध्यान रखते हैं। लम्बी पूजा होती है। दुर्गा सप्तशतीका पाठ होता हे। इसके लिये उन्हें शुद्ध जल, पूजन सामग्री, घी के दीप, ताजे पुष्प और आरती के लिये कपूर आदि कि आवश्यकता होती है। पत्नी इन समस्त वस्तुओं को पहले से जुटा, पूजा की तैयारी कर देती है ताकि पतिदेव स्नान करके आते ही आसन पर विराजमान हो पूजा प्रारंभ कर सकें। उस दिन आकर बैठे तो ऊँचे स्वर में बोले,
"फूल कहाँ हैं? और माचिस व अगर बत्ती भी नहीं है। ईश्वर सेवा में तुम्हारा तनिक ध्यान नही है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2009/devipuja.htm</link>
</item>


<item>
<title>देव प्रकाश से जानकारी- दुर्गा पूजा का सांस्कृतिक विश्लेषण</title>
<description>दुर्गा पूजा का पर्व भारतीय सांस्कृतिक पर्वों में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय है। लगभग दशहरा, दीवाली और होली की तरह इसमें उत्सव धार्मिकता का पुट आज सबसे ज़्यादा है। बंगाल के बारे में कहा जाता है कि बंगाल जो आज सोचता है, कल पूरा देश उसे स्वीकार करता है। बंगाल के नवजागरण को इसी परिप्रेक्ष्य में इतिहासकार देखते हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2009/bastar_dasahra.htm</link>
</item>


<item>
<title>लाला जगदलपुरी के साथ देखें बस्तर का दशहरा</title>
<description>बस्तर अंचल में आयोजित होने वाले पारंपरिक पर्वों में बस्तर दशहरा सर्वश्रेष्ठ पर्व है। इसका संबंध सीधे महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा से जुड़ा है। पौराणिक वर्णन के अनुसार अश्विन शुक्ल दशमी को माँ दुर्गा ने अत्याचारी महिषासुर को शिरोच्छेदन किया था। इसी कारण इस तिथि को विजयादशमी उत्सव के रूप में लोक मान्यता प्राप्त हुई। जाहिर है कि बस्तर अंचल का दशहरा पर्व रावण वध से संबंध नहीं रखता।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2005/hindi_haiku.htm</link>
</item>


<item>
<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>
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<title>अभिव्यक्ति: साहित्य का सुरुचिपूर्ण संसार</title>
<description>अभिव्यक्ति २१ सितंबर २००९ </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org</link>

<item>
<title>धीरेन्द्र अस्थाना की कहानी- जो मारे जाएँगे</title>
<description>ये बीसवीं शताब्दी के जाते हुए साल थे- दुर्भाग्य से भरे हुए और डर में डूबे हुए। कहीं भी, कुछ भी घट सकता था और अचरज या असंभव के दायरे में नहीं आता था। शब्द अपना अर्थ खो बैठे थे और घटनाएँ अपनी उत्सुकता। विद्वान लोग हमेशा की तरह अपनी विद्वता के अभिमान की नींद में थे-किसी तानाशाह की तरह निश्चिंत और इस विश्वास में गर्क कि जो कुछ घटेगा वह घटने से पूर्व उनकी अनुमति अनिवार्यत: लेगा ही। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/jomarejayenge/jmj1.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. सरोजिनी प्रीतम का व्यंग्य- नमकहीन नमकीन</title>
<description>सूरजमुखी ने देखा कि जब से घर में दावत हुई थी, उसके पति का चैन हराम हो गया था, नींद की गोली खा लेने के बाद भी वे करवट पर करवट बदलते रहे, फिर उठकर चहलकदमी करने लगे। उनका मन डोल रहा था, शरीर चल रहा था। अजीब-सी हरकत हो रही थी। बचा-खुचा सामान भी दावत में हुई गुलछर्रेबाजी की घोषणा कर रहा था। पति की यह हालत देखकर सूरजमुखी ने उनके मस्तिष्क में बसी सौंधी गंध को बाहर निकाल देने के लिए अपने प्रवचन आरंभ किए।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/namakheen.htm</link>
</item>


<item><title>यश मालवीय का ललित निबंध- गीत की चिड़िया</title>
<description>गीत की चिड़िया कहीं दूर उड़ गई-सी लगती है, लेकिन मेरी हिमाकत देखिए कि मैं उसे अलगनी पर बैठा हुआ देख रहा हूँ। यह चिड़िया वस्तुतः जीवन राग की है, जो उड़ गई-सी लगती भले हो, पर कहीं दूर नहीं गई है। अकसर ही मुंडेर पर, अलगानी पर, हमारे आसपास एक गूँज की शक्ल में उभरती है। हमारे मन के आँगन में बिखरे संवेदना के दाने चुगती है, चहचहाती है कहीं आत्मा में। हमें अलस्सुबह नींद से जगाती है और लोरियाँ भी सुनाती है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2009/geet.htm</link>
</item>

<item>
<title>नारायण भक्त का आलेख- मंच से उजड़ी मन में बसी: नौटंकी</title>
<description>यह कहना कठिन है कि नौटंकी का मंच कब स्थापित हुआ और पहली बार कब इसका प्रदर्शन हुआ, किंतु यह सभी मानते हैं कि नौटंकी स्वांग शैली का ही एक विकसित रूप है। भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में जिस ''सट्टक'' को नाटक का एक भेद माना है, इसके विषय में महाकवि एवं नाटककार जयशंकर प्रसाद तथा हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का कहना है कि सट्टक नौटंकी के ढंग के ही एक तमाशे का नाम है। प्रसाद जी अपने निबंध 'रंगमंच' में नौटंकी को नाटक का अपभ्रंश मानते हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/nautanki.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. जगदीश व्योम के साथ रचना प्रसंग- हिंदी में हाइकु कविता</title>
<description>हिंदी साहित्य की अनेकानेक विधाओं में 'हाइकु' नव्यतम विधा है। हाइकु मूलत: जापानी साहित्य की प्रमुख विधा है। आज हिंदी साहित्य में हाइकु की भरपूर चर्चा हो रही है। हिंदी में हाइकु खूब लिखे जा रहे हैं और अनेक पत्र-पत्रिकाएँ इनका प्रकाशन कर रहे हैं। निरंतर हाइकु संग्रह प्रकाशित हो रहे हैं। यदि यह कहा जाए कि वर्तमान की सबसे चर्चित विधा के रूप में हाइकु स्थान लेता जा रहा है तो अत्युक्ति न होगी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2005/hindi_haiku.htm</link>
</item>

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<title>चाँद शुक्ला हदियाबादी की कहानी- अंतिम पड़ाव</title>
<description>पिछले दो हफ्तों से कोहरे की चादर ने डेनमार्क के शहर नोरेब्रो को अपनी जकड़ में ले रखा था, लेकिन यह कोई अनोखी या नई बात नहीं थी। बर्फ़ीली सर्द हवायें डेन्मार्क के लम्बे ठन्डे मौसम की शान होती हैं, लेकिन जब किसी दिन कोहरे की घनी चादर को चीरकर सूरज अपनी चमक को धरती पर बिखेरता है तो इन्सान ही नहीं, वनस्पतियाँ भी उसकी रोशनी के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछा देती हैं। उजाले की किरणें अपनी छठा बिखेरती हैं तो सार्वजनिक स्थल युवाओं की मदहोश साँसों और बच्चों की किलकारियों से गुन्जायमान हो जाते हैं। वृद्ध भी इस उन्मुक्त वातावरण में जोश से भर जाते हैं। यहाँ तक कि, चिकनी साफ़ सड़कें भी बेकार और बेमकसद आवा-जाही की चहल पहल से भर जाती हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2009/antim_padav/antim_padav1.htm</link>
</item>


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<title>डॉ. टी महादेव राव का व्यंग्य- बिन सेलफोन सब सून</title>
<description>आज का जीवन इतना सरल, सफल और असहज हो गया है तो इसका कारण आप सभी जानते हैं... जी हाँ सेलफोन। हर आदमी के कर की शोभा बना सेल अपने आप में एक दिव्यास्त्र की तरह शोभायमान और सदैव सेवा में तत्परता लिए हुए विष्णु के सुदर्शन चक्र की भाँति निरंतर चलायमान रहता है। विष्णु तो जब चाहते थे तभी सुदर्शन चक्र उनकी तर्जनी में दर्शन देता और दुष्टों का काम तमाम करता पर सेलफोन ते कर की शोभा बन हर एक का काम हमेशा तमाम करने पर लगा रहता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/bincellphone.htm</link>
</item>


<item><title>अनंत राम गौड का आलेख- खानपान नवाबों के</title>
<description>दिल्ली में जब मुगल सल्तनत लाल किले की चार दीवारियों में ही सिमटकर रह गई थी, और शहंशाह कमज़ोर होकर मराठों से दबा हुआ महसूस कर रहा था, तब अवध की रियासत नवाबों के आधीन सांस्कृतिक दृष्टि से खूब फूल-फल रही थी। वास्तु और ललित कलाएँ, नृत्य और संगीत, हाथ की कारीगरी और चित्रकारी के साथ-साथ पाक कला भी खूब पनप रही थी। हिंदू और मुसलिम सभ्यताओं की सर्वोत्तम परंपराओं से मिलकर अवध में एक तरह की गंगा जमुनी संस्कृति परवान चढ़ रही थी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2009/khanpan.htm</link>
</item>

<item>
<title>राधेश्याम बंधु से जानें- गीत का आधुनिक स्वरूप नवगीत</title>
<description>नवगीत ने गीत को परंपरावादी घिसे-पिटे रूढ़ वातावरण से निकलकर यथार्थ का एक ठोस धरातल प्रदान करके संरक्षण प्रदान किया है। इसीलिए नई कविता को जनता द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने के कारण नवगीत की ओर अब सबका ध्यान आकृष्ट हो रहा है। नवगीत ने विशेष रूप से आज़ादी के बाद भारतीयों में आई नैराश्य की भावना को अपनी अंतर्वस्तु के रूप में आत्मसात करने और उसे अभिव्यक्त करने के लिए मध्यवर्गीय पारिवारिक बिखराव, टूटन, असंतोष और बेमानी रिश्तों की घुटन को अपना विषय बनाया है और भ्रष्ट शासनतंत्र द्वारा पैदा की गई अराजकता और शोषण के युगीन संदर्भों को भी गीतों में व्यक्त करने की सक्षम भूमिका निभाई है। ।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2009/navgeet.htm</link>
</item>


<item>
<title>डॉ. गुरुदयाल प्रदीप की चेतावनी- सावधान! खतरों की भी है संभावना</title>
<description>आजकल सूचना संप्रेषण के क्षेत्र में मोबाइल फोन ने धूम मचा रखी है। क्या शहर, क्या कस्बा, क्या गाँव... सभी जगह- क्या अमीर, क्या गरीब... जिसे देखो वही जेब में मोबाइल लिए घूमता है और जब चाहता है तब देश परदेश कहीं भी अपने प्रियजनों का चलते-फिरते हाल-चाल जानकर आश्वस्त हो जाता है। सूचना संप्रेषण के क्षेत्र में कितनी बड़ी सुविधा एवं क्रांति ले आया है यह मोबाइल! दूसरी तरफ बिना किसी धुएँ-धक्कड़ के त्वरित ढंग से खाना पकाने अथवा गरम करने के लिए माइक्रोवेव अवन का चलन भारत जैसे विकासशील देश में धीरे-धीरे बढ़ ही रहा है। बीसवीं सदी के आविष्कृत क्रांतिकारी घरेलू उपभोक्ता उपकरणों में संभवतः इसका स्थान अनूठा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/vigyan/2004/mobile_microwave.htm</link>
</item>

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<title>फ़ज़ल इमाम मल्लिक की कहानी- उदास आँखोंवाला लड़का </title>
<description>स्टेडियम के एक सिरे पर बने लोहे के फाटक को थामे वह चुपचाप खड़ा था... उदास... उदास...। जगमगाती रोशनी... छूटती फुलझड़ियाँ... और लोगों के हजूम में चुपचाप उदास खड़े उस लड़के को देख कर भीतर कहीं कुछ हुआ था... कुछ टूटा-सा खट से... ये तीसरा दिन था जब उसके चेहरे पर सन्नाटा पसरा रहा था और वह लोहे के फाटक से लगा लोगों को खुशियाँ मनाते चुपचाप देख रहा था... आखिर वह क्यों उदास है। जैसे किसी ने चुपके से मुझसे पूछा। आज तो उसे खुश होना चाहिए।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/udaas_ankhonwala_ladka/udaas1.htm</link>
</item>


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<title>डॉ. अशोक गौतम का व्यंग्य- परेशान पड़ोसी</title>
<description>खुदा सभी को सभी कुछ दे पर परेशान पड़ोसी न दे। वह कई दिनों से मुझे परेशान किए बैठे था, खुद तो परेशान था ही। इधर कमबख्त अपनी ही परेशानियाँ क्या कम हैं, ऊपर से पड़ोसी की परेशानियाँ और। चलो पड़ोसी की परेशानियों में खुद को शामिल कर भी लिया जाए,पर पड़ोसी भी तो उस लायक होना चाहिए। भाई साहब, आप हर चीज़ से पीछा छुड़ा सकते हैं पर दो चीज़ों से नहीं, एक प्रेमिका से और दूसरे पड़ोसी से।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/pareshan_padosi.htm</link>
</item>


<item><title>ऋषभदेव शर्मा का आलेख- हिंदी में वैज्ञानिक लेखन</title>
<description>आज २१वीं शताब्दी के पहले दशक में जब हिंदी में वैज्ञानिक विषयों पर पुस्तकों की माँग की जाती है तो प्रायः यह सुनने में आता है कि इसके लिए आधारभूत सामग्री उपलब्ध नहीं है और हिंदी आदि भारतीय भाषाएँ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को अभिव्यक्त करने की दृष्टि से समर्थ नहीं हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/vigyan/2009/hindi_vigyan.htm</link>
</item>

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<title>कुबेर नाथ राय का ललित निबंध- कुब्जा सुंदरी</title>
<description>हमारे दरवाज़े की बगल में त्रिभंग-मुद्रा में एक टेढ़ी नीम खड़ी है, जिसे राह चलते एक वैष्णव बाबा जी ने नाम दे दिया था, 'कुब्जा-सुंदरी'। बाबा जी ने तो मौज में आकर इसे एक नाम दे दिया था, रात भर हमारे अतिथि रहे, फिर 'रमता योगी बहता पानी'! बाद में कभी भेंट नहीं हुई। परन्तु तभी से 
यह नीम मेरे लिए श्रीमद्भागवत् का एक पन्ना बन गई।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2004/kubja_sundari.htm</link>
</item>


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<title>साहित्य समाचार </title>
<description>देश-विदेश के साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>

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<title>सुषम बेदी की कहानी- तीसरी दुनिया का मसीहा </title>
<description>ब्रूनो ने बात कहते-कहते स्टीयरिंग से हाथ उठा लिए और सही लफ़्ज़ों की तलाश की जद्दोजहद में हाथों की संप्रेषण शक्ति की पूरा इस्तेमाल करते हुए पूरे जोशोख़रोश के साथ अपनी बात खोलने लगा।
''-- इस देश में आदमी का जिस्म भी एक इंडस्ट्री है... सारे डॉक्टर उसी की कमाई खाते हैं... कोई न कोई बीमारी उगाकर पैसा बनाने की फ़िराक़ में रहते हैं। इन डॉक्टों में कोई इंसानी हमदर्दी थोड़े न है... जितनी बड़ी आपकी बीमारी हो उतना ही खुशी से वे फूलते-फैलते हैं। आप तो दर्द से कराह रहे होते हैं और वह आपकी नब्ज़ पर हाथ रखे कोई बेहतर नई गाड़ी या बड़े से बड़ा घर ख़रीदने की सोच रहा होता है...''</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2009/teesari_duniyaka_maseeha/tdkm1.htm</link>
</item>


<item>
<title>अनूप शुक्ला का व्यंग्य- रामू ज़रा चाय पिलाओ</title>
<description>गर्मी का मौसम बदस्तूर जारी है। बारिश आई लेकिन हाँफते हुए। लगता है बादलों का पानी रास्ते में बिचौलिए ले उड़े। या फिर बादलों को लग रहा होगा कहीं उन्हें धरती पर सम्मानित न कर दिया जाए इस डर से तमाम बादल रास्ते से कट लिए। इन्द्र भगवान हलकान हैं। उनको तमाम इलाकों से बारिश की प्रार्थनाओं के पैकेज मिले थे। कई भगवानों ने सिफ़ारिशें की थीं कि फ़लाँ इलाके में एक बादल ज़्यादा पानी गिरा देना वहाँ हमारा भक्त रहता है। भक्त भगवान से विनती करते हुए कई बार चेतावनी दे चुका है- अबकी पानी न बरसाया तो दूसरा भगवान ज्वाइन कर लूँगा। ऐसे भगवान का क्या फ़ायदा जो मौके पर बारिश भी न करा सके। हमें कमी नहीं है भगवानों की। आप अकेले नहीं हैं। करोंड़ों भगवान हैं। रोज़ फ़ोन आते हैं मोबाइल पर। सस्ती प्रार्थना दर पर भगवान की सेवाएँ प्राप्त करें।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/ramu.htm</link>
</item>


<item><title>डॉ. इंद्रजीत सिंह का लेख- गीतकार शैलेन्द्र </title>
<description>फ़िल्मी गीतों के माध्यम से साहित्य की अमृतमयी गंगा बहानेवाले यशस्वी गीतकारों में शीर्षस्थ स्थान शैलेंद्र का है। उनके गीत स्तरीयता एवं लोकप्रियता के अद्भुत दस्तावेज़ हैं। भाव एवं शिल्प की दृष्टि से कालजयी गीतों की रचना के कारण ही 'काव्य रसिकों' ने उन्हें 'गीतों का राजकुमार' कहा है। शैलेंद्र मूलतः संवेदनशील कवि थे और कवि धर्म का सफल निर्वाह करने के कारण ही आँचलिक उपन्यासों के पुरोधा फणीश्वर नाथ रेणु ने उन्हें 'कविराज' की उपाधि से अलंकृत किया। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/shailendra.htm</link>
</item>

<item>
<title>रंगमंच में- यह समाज यह संस्कृतिः आज का नाटक</title>
<description>बुराइयों पर अच्छाइयों की जीत वाले इस समाज में अचानक लगने लगा है कि जीत बुराइयों की ही होती है। स्मार्ट किस्म के लोगों की इज़्ज़त समाज में बढ़ गई है जो अपनी चालाकियों से वह सब कुछ पा लेने का दावा करते हैं जो एक ईमानदारी का जीवन जीने वाला आदमी परिश्रम और संघर्ष के रास्ते चलकर हासिल नहीं कर पाता है। ईमानदारी के जीवन की मूर्खता और पराजय से तुलना कर दी जाती है। खुलकर यह प्रचारित किया जा रहा है कि स्मार्ट और चालाक लोग ही सफल माने जाएँगे। दबंग होना एक गुण मान लिया गया है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/ajkanatak.htm</link>
</item>


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<title>फुलवारी में गैंडे के विषय में-जानकारी, शिशु गीत और शिल्प </title>
<description>गैंडा प्रकृति का वीर योद्धा है। उसकी विशेषता उसके नाक पर सींघ का होना है। नाक पर लम्बे-लम्बे और अति मोटे बाल एक लसदार पदार्थ से चिपक कर सींघ का रूप धारण कर लेते हैं। सींघ का नाक की हड्डी से कोई सम्बन्ध नहीं होता। शत्रु पर वह सींघ से प्रबल प्रहार करता है।प्राचीन काल में गेंडे की खाल से ढाल बनाए जाते थे। तलवार के वार का उस पर कोई असर नहीं होता। किंतु यह विचार ग़लत है कि गोली का उस पर असर नहीं होता। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/jaankari/junglekepashu/j_gainda.htm</link>
</item>

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<title>ईश्वरसिंह चौहान की कहानी- रति का भूत </title>
<description>अमावस की काली रात ने गाँव को धर दबोचा था। चौधरियों के मोहल्ले में से बल्बों की रोशनी दूर से गाँव का आभास करवाती थी। आठ बजते-बजते तो सर्दी की रात जैसे मधरात की तरह गहरा जाती है। कहीं कोई कुत्ता भौंकता तो कभी कोई गाय रंभाती पर आदमी तो जैसे सिमट कर अपनी गुदड़ी का राजा हो गया हो। कभी-कभी बूढ़े जनों की खराशकी आवाज़ आती थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/rati_ka_bhoot/rati1.htm</link>
</item>


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<title>अविनाश वाचस्पति का व्यंग्य दाल गल रही है</title>
<description>दाल गलना एक मुहावरा है। दाल न गलना यानि काम न होना। लेकिन जिस तरह आजकल महँगाई बढ़ रही है उसे देखकर कहना पढ़ता है कि महँगाई की दाल खूब गल रही है। अरहर की दाल के दाम आसमान छू रहे हैं। यही दाल है जो भारतीय परिवारों में रोज़ खाई जाती है। दाल अरहर की है पर इसे बाँटने में दिल्‍ली सरकार की जो खिचड़ी बन रही है, वो बीरबल की खिचड़ी की याद दिला रही है। दाल ऐसा शेयर बन चुकी है जिसकी कीमत गिरती नहीं है और काबू में नहीं आ रही है। हाल ये है कि कीमते बढ़ने की बजाय तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ रही हैं और वो भी आम आदमी की जेब दर जेब, आँख दर आँख और कंधा दर कंधा मिलाकर बिल्‍कुल अंधा करती हुई।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/daal.htm</link>
</item>


<item><title>घर परिवार में अर्बुदा ओहरी के सुझाव पर्यटन और स्वास्थ्य </title>
<description>गर्मी के दिनों के साथ छुट्टियों की भी शुरुआत हो गई है। छुट्टी मनाने के लिए कहीं भी जाएँ, घूमने-फिरने या रिश्तेदारों के पास, घर लौट कर सूटकेस के वज़न के साथ-साथ बहुत कुछ और अनचाहा भार भी ढोना पड़ता है। अरे भई यह भार अपना खुद का वज़न होता है जो मौज मस्ती, चाट-पकौड़े, मिठाई-मेवे के लज़ीज़ स्वाद के साथ बिन माँगे मिल जाता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/2009/paryatan_aur_swasthyai.htm</link>
</item>

<item>
<title>भवानी प्रसाद द्विवेदी का निबंध- झूला लगाल कदंब की डारी</title>
<description>सावन का सुहाना माह। मैदानों में बिछी गुदगुदाने वाली हरी मखमली घास। खेतों और बगीचों में भी बस हरीतिमा ही हरीतिमा। आसमान में उमड़ते-घुमड़ते कजरारे बादलों की अनुपम छटा। मयूरों का नर्तन। बालू में नहाती हुई चिड़ियों का कलरव। सावन के झूले में झूलती हुई ललनाएँ और पेंग बढ़ाते हुए ग्रामीण सुकुमार। तभी रिमझिम बारिश की झड़ी लग जाती है और अधरों पर रसीली कजरी के मधुर स्वर फूट पड़ते हैं - झूला लागल कदम की डारी
झूलें कृष्ण मुरारी ना</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2002/kajari.htm</link>
</item>


<item>
<title>रसोईघर में बरसात की विशेष मिठाई- अनरसे </title>
<description>अनरसों की एक आसान व्यंजन विधि</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rasoi/mithai/anarse.htm</link>
</item>

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<title>रमाकांत श्रीवास्तव की व्यंग्य कथा इंडियागेट की बकरी</title>
<description>देश की बकरियों के भविष्य पर गंभीरता से विचार करने के लिए दिल्ली में इंडिया गेट पर एक सभा हुई। तीन दिनों तक तंबू-टेंट तने रहे। भाषण होते रहे, भोजन-पानी चलता रहा और पुलिसवाले भी खड़े रहे। भारत के कोने-कोने से प्रतिनिधियों का आना जारी रहा। प्रस्ताव में कहा गया कि बकरियाँ इस देश की अमूल्य पशुधन हैं। राष्ट्र के सकल उत्पादन में बकरियों का योगदान तेरह अरब रुपए हैं। बकरियाँ इस महान देश को हर साल पच्चानबे करोड़ लीटर दूध, उन्नीस करोड़ किलोग्राम मांस और सात करोड़ किलो खाल देती हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/indiagate_ki_bakri/indiagate1.htm</link></item>

<item>
<title>नरेन्द्र कोहली का व्यंग्य- खाली करनेवाले</title>
<description>मैं समय से स्टेशन पहुँच गया था। गाड़ी प्लेटफार्म पर लग तो गई थी, किंतु अभी उसकी सफ़ाई हो रही थी। सफ़ाई कर्मचारी ने दरवाज़ा बंद कर रखा था, इसलिए अंदर घुसना संभव नहीं था। इच्छा तो हुई कि उससे कहूँ कि भैया तुम अपना काम करते रहो, किंतु मुझे अपने स्थान पर बैठ जाने दो। न मैं तुम्हारे लिए कोई बाधा उत्पन्न करूँगा, न तुम मेरे लिए कोई परेशानी पैदा करो। पर मेरी सारी अनुनय विनय को उसने शांत मन से सुना और मुसकरा कर बोला, ''साब! सफ़ाई कर लेने दो। झाडू के आक्रमण को आप झेल नहीं पाएँगे। उड़ती धूल में बैठना संभव नहीं है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/khali.htm</link>
</item>

<item><title>राजेन्द्र उपध्याय की कलम से स्वतंत्रता की साधक सुभद्रा कुमारी चौहान</title>
<description>सुभद्रा कुमारी चौहान की 'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी' कविता की चार पंक्तियों से पूरा देश आज़ादी की लड़ाई के लिए उद्वेलित हो गया था। ऐसे कई रचनाकार हुए हैं जिनकी एक ही रचना इतनी ज़्यादा लोकप्रिय हुई कि उसके आगे की दूसरी रचनाएँ गौण हो गईं, जिनमें सुभद्राकुमारी भी एक हैं। उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं लिखा है। उनकी एक ही कविता 'झाँसी की रानी' लोगों के कंठ का हार बन गई है। एक इसी कविता के बल पर वे हिंदी साहित्य में अमर हो गई हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/subhadra_kumari_chauhan.htm</link>
</item>

<item>
<title>डॉ. के. एन. पी. श्रीवास्तव का आलेख आज़ादी में पत्रकारिता का योगदान</title>
<description>भारत के पत्रकार मूलतः जनता का प्रतिनिधि मानकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आए थे। यदि सही ढंग से आँका जाए तो स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि पत्रों एवं पत्रकों ने ही तैयार की, जो आगे चलकर राजनेताओं एवं स्वतंत्रता संग्रामियों को पहले पत्रकार बनने के लिए प्रेरित किया। पं, बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू एवं डॉ. राजेंद्र प्रसाद आदि सभी पत्रकारिता से संबद्ध रहे। 
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/azadi_me_patrakarita.htm</link>
</item>


<item>
<title>मिथिलेश श्रीवास्तव की रचना कला में आज़ादी के सपने</title>
<description>आज हमारी कला पर भले ही बाज़ार और व्यापारी हावी हो गया है, पर स्वाधीनता संघर्ष के दिनों में अनेक कलाकार आंदोलन से जुड़े थे। नंदलाल बसु और यामिनी राय गांधी जी से बहुत प्रभावित थे। देवी प्रसाद राय चौधरी के बनाए हुए स्वाधीनता संबंधी स्मारक कला और स्वाधीनता संघर्ष से जुड़ाव के अनोखे प्रमाण हैं। सन बयालीस की अगस्त क्रांति को आज केवल 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो' या 'करो या मरो' के क्रांतिकारी नारी के लिए याद किया जाता है। लेकिन वास्तविकता इतनी सी नहीं थी। 
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2005/kalaa.htm</link>
</item>

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<title>रमानाथ राय की बांग्ला कहानी- तिमंज़िले का कमरा</title>
<description>तिमंज़िला मकान। पहली मंज़िल पर तीन कमरे। एक रसोईघर, एक बैठक और सोने वाला कमरा। सोने वाले कमरे में मेरी बूढ़िया रहती है। पोते-पोतियाँ रहते हैं। दोमंज़िले पर तीन कमरे हैं।  एक कमरे में बड़ा बेटा रहता है, बड़ी बहू रहती है। और एक कमरे में छोटा बेटा रहता है, छोटी बहू रहती है। इसके बाद वाले कमरे में मेरी बेटी रहती है। मगर तिमंज़िले पर सिर्फ़ एक कमरा है। उस कमरे में मैं अकेला रहता हूँ। हर वक़्त अकेला रहना अच्छा नहीं लगता। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sahityasangam/2009/timanzile_ka_kamra/timanzile1.htm</link>
</item>

<item>
<title>महेश सांख्यधर का व्यंग्य- जिन लूटा तिन पाइयाँ</title>
<description>लूट चाहे राम-नाम की ही क्यों न हो, रामभरोसे रहनेवालों के हाथ कुछ भी आनेवाला नहीं। यहाँ तो गीता की शरण जाना ही अभीष्ट है- कर्मण्ये वाधिकारस्ते, अर्थात लूटने के कर्म का पूरा अधिकार है तथा लूटने के बाद क्या होगा- मा फलेषु कदाचन। इसकी चिंता मत कर।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/jinloota.htm</link>
</item>

<item><title>सुषम बेदी का निबंध- प्रवासी भारतीयों का साहित्यिक उपनिवेशवाद</title>
<description>सन सत्तानवे की पहली जुलाई को जब कैनेडा दिवस मनाया जा रहा था तो मैं कैनेडा के एक प्रांत नोवास्कोशिया में छुट्टी मनाने गई हुई थी। नोवास्कोशिया के उत्तरी हिस्से के एक द्वीप केप ब्रेतान में पाँच सौ बरस पहले उस भूमि पर पैर रखने वाले जान कैबोट की पाँच सौ वीं वर्षगाँठ (१४९७-१९९७) मनाई जा रही थी। वर्षगाँठ के उत्सव का एक मुख्य आकर्षण था जान कैबट के उस धरती पर पैर रखने की घटना का नाट्यांकन। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/pravasi.htm</link>
</item>

<item>
<title>आज सिरहाने मन्नू भंडारी की कृति- एक कहानी यह भी</title>
<description>‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ जैसे उपन्यास और अनेक बहुपठित-चर्चित कहानियों की लेखिका मन्नू भंडारी इस पुस्तक में अपने लेखकीय जीवन की कहानी कह रही हैं। यह उनकी आत्मकथा नहीं है, लेकिन इसमें उनके भावात्मक और सांसारिक जीवन के उन पहलुओं पर भरपूर प्रकाश पड़ता है जो उनकी रचना-यात्रा में निर्णायक रहे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2009/ek_kahani_yeh_bhi.htm</link>
</item>


<item>
<title>विज्ञान वार्ता में डॉ. गुरुदयाल प्रदीप का आलेख- हमारी नींद हमारे सपने</title>
<description>नींद भला किसे नहीं प्यारी होती? कड़ी मेहनत के बाद थकान से चूर व्यक्ति मौका लगते ही गहरी नींद में सो जाता है तो हर समय चिंतित रहने वाला व्यक्ति नींद न आने से परेशान रहता है। येन-केन-प्रकरेण वह भी सोने की हर चंद कोशिश करता है। सो कर वह भी चिंताओं से मुक्त होना चाहता है, चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/vigyan/2003/neend.htm</link>
</item>

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<item>
<title>राहुल ब्रजमोहन की कहानी- विनिवेश</title>
<description>मैंने चाबी के छल्ले की तरह गोल-गोल रूमाल घुमाकर उमस में भीजते जिस्म के साथ अपनापा निभाने की सतही कोशिश ही की थी, कि वह पूछ बैठे, ''कितने घंटे का रन है जी उज्जैन तक?'' 
''बमुश्किल दो घंटे।'' कमोबेश हैरत भरे अंदाज़ में मैंने जवाब दिया।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/vinivesh/vinivesh1.htm</link>
</item>

<item>
<title>शरद उपाध्याय का व्यंग्य- साहब का जाना</title>
<description>साहब चले गए। सब कुछ अचानक ही हुआ। मुख्यालय से अचानक आदेश आया और हँसते-खेलते साहब चले गए। वे हँस रहे थे, ठहाके लगा रहे थे, अठखेलियाँ कर रहे थे, भक्तजनों की भीड़ में मगन थे, भक्तजन मुग्धभाव से उनकी लीलाओं को देख रहे थे। सामान्यजन, भक्तजनों द्वारा किए गए वर्णन को सुनकर धन्य महसूस कर रहे थे। कि अचानक साहब चले गए। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/sahab.htm</link>
</item>

<item><title>डॉ. राजेन्द्र गौतम का आलेख- नवगीत का मूल्यांकन कुछ महत्त्वपूर्ण कृतियाँ</title>
<description>समकालीन कविता का मूल्यांकन करते समय नवगीतों के संबंध में इतना नहीं लिखा गया है जितना कविता की अन्य विधाओं के विषय में। पिछले तीन दशकों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन एवं शाम शेर ने बहुत अच्छी छंदोबद्ध रचनाएँ दी हैं पर  इनकी और निराला की परम्परा में जो वस्तुपरक, समाज-सापेक्ष, संघर्षमुखी प्रगतिशील नवगीत है उसकी चर्चा बहुत कम हुई है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/rachanaprasang/2009/navgeet_ka_mulyankan.htm</link>
</item>

<item>
<title>राजेश कुमार सिंह से जानकारी- डाक टिकटों में गांधी</title>
<description>डाक टिकट देश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतिनिधि तो होते ही हैं उस देश पर पडने वाले राजनैतिक प्रभाव और उसकी जनता के भावात्मक झुकाव को भी प्रदर्शित करते हैं।
भारत की आज़ादी में सत्य और अहिंसा के हथियारों से विजय प्राप्त करने वाले गांधी का यह प्रभाव पूरे विश्व के डाकटिकटों पर दिखाई देता है। देश विदेश के टिकटों में देखें तो गांधी का पूरा जीवन चरित्र पाया जा सकता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/tikat_sangrah/gandhi/gandhi_01.htm</link>
</item>


<item>
<title>साहित्य समाचार</title>
<description>देश-विदेश से साहित्यिक-सांस्कृतिक सूचनाएँ</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>

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<title>मधुलता अरोरा की कहानी- छोटी छोटी बातें</title>
<description>यह अलार्म भी अजीब है, कभी बजना नहीं भूलता। शुभि घड़ी देखती है। अभी पाँच ही बजे हैं। कुछ सोचकर उठती है, फ्रिज में से ठंडी रुई निकालती है, आँखों पर रखकर फिर लेट जाती है। कुछ समय बाद अलार्म फिर घर्रा उठता है। अब कोई चारा नहीं। उठना ही पड़ेगा। आज शुभि अपने शरीर में भारीपन महसूस कर रही है। पूरा बदन अलसा रहा है। कोई भी काम करने का मन नहीं कर रहा है। लेकिन बलि का बकरा कब तक खैर मनाएगा। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/chhoti_chhoti_baten/chhoti_chhoti_baten1.htm</link>
</item>

<item>
<title>सुरेश उनियाल की लघुकथा- विदाई</title>
<description>वह एक बहुत बड़ा शहर था, जिसे मैं छोड़ रहा था। वहाँ मेरे दोस्तों की संख्या बहुत ज़्यादा थी। अक्सर मेरी शामें खाली नहीं गुज़रती थीं।
स्टेशन पर मैं गाड़ी छूटने से लगभग आधा घंटा पहले पहुँच गया था। मुझे पूरा विश्वास था कि मेरे कई दोस्त स्टेशन पर मुझे विदाई देने पहुँचे हुए होंगे, पर गाड़ी छुटने में सिर्फ़ दस मिनट रह गए थे और कोई भी स्टेशन नहीं पहुँचा था। चाय की तलब हो रही थी। अब तक तो सिर्फ़ इसीलिए दबाता आ रहा था कि दोस्तों के आने पर उनके साथ पीऊँगा, लेकिन अब दोस्तों के आने की उम्मीद कम हो गई थी, इसलिए चाय के लिए बाहर स्टाल पर आ गया।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2009/vidai.htm</link>
</item>

<item><title>मोहन टंडन का आलेख- मुट्ठी का महत्त्व </title>
<description>मुट्ठी का अपना ही महत्व है। बँधी हुई मुट्ठी कई बार बड़े-बड़े फैसले सहज ही करा देती है। कसकर बंद की हुई मुट्ठी और आँखों में उभरते लाल डोरे यदि थोड़ा-सा भी प्रभाव विपक्षी पर डाल सकें, तो उसकी चीं बोलते देर नहीं लगती। वैसे भी यदि किसी को थप्पड़ मारा जाए, तो वह उतना कारगर साबित नहीं होता, जितना कि यह बँधी हुई मुट्ठी। इसका भी एक कारण है। थप्पड़ मारते समय हथेली खुली रहती है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2009/mutthi.htm</link>
</item>

<item>
<title>स्वाद और स्वास्थ्य में- पौष्टिक पपीते के गुण </title>
<description>पपीते में पपेन नामक पदार्थ पाया जाता है जो मांसाहार गलाने के काम आता है। भोजन पचाने में भी यह अत्यंत सहायक होता है। पपीते के नियमित सेवन से अरूचि दूर होती है, कब्ज़ ठीक होता है और भूख बढ़ती है। पपीता स्वादिष्ट होने और अपने सुंदर रंग के कारण जैम, जेली, हलवे और शीतल पेय के लिये प्रयोग में लाया जाता है। यकृत तथा पीलिया के रोग में पपीता अत्यंत लाभकारी है। सौन्दर्य प्रसाधनों में भी इसका प्रयोग किया जाता है। 
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/ss/papeeta.htm</link>
</item>


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<title>राजपाल सिंह की कलम से- उदयपुर में सास-बहू के मंदिर </title>
<description>झीलों की नगरी उदयपुर से मात्र अट्ठाइस किलोमीटर की दूरी पर है- जगप्रसिद्ध एकलिंग जी का मंदिर। इस मंदिर से थोड़ा पहले, कच्चे रास्ते पर खड़े हैं वास्तुकला के बेजोड़ नमूने- सास-बहू के मंदिर। इन्ही मंदिरों के आसपास कभी मेवाड़ राजवंश की स्थापना हुई थी। इनकी पहली राजधानी थी- नागदा। नागदा के वैभव की याद दिलाने में ये सास-बहू के मंदिर आज भी सक्षम हैं। मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा रावल ने अपना प्रारंभिक जीवन यहीं नागदा में व्यतीत किया था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2009/udaypur%20ke%20saas_bahu%20mandir/sb_mandir1.htm</link>
</item>


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<title>पारुल पुखराज की कहानी कहानी- झूला पड़ा कदंब की डारी</title>
<description>फोन जमशेदपुर से था नरेन का, हमें लॉन वाला घर मिल गया है नीता, जल्दी आ जाओ फ़र्निश करने का बजट भी दो चार दिन में मिल जाएगा। मानो पंख लग गए थे मेरी आत्मा को कैसे तो जा पहुँचूँ और हरियाले टुकड़े को किस तरह अपनी बाहों में समेट लूँ। छुट्टियों में मायके आई थी दो हफ्ते के लिए लेकिन चार दिन में ही वापस भागी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/jhoola/jhoola1.htm</link>
</item>

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<title>पुष्पा भारती का संस्मरण- विरह विगलित कदंब  </title>
<description>साहित्य सहवास में चारों ओऱ बड़े करीने से हरियाली उग आई थी। अपनी मेहनत की सफलता पर खुश भी थे भारती जी कि सहसा उनका वही मूल भागवत-प्रेम उनके मन में हिलोरें लेने लगा और जाने कहाँ भटक-भटककर ले आए कदंब वृक्ष का पौधा, खुद उसकी देखरेख की। बालकनी में खड़े होकर उसकी बढ़त देखते और प्रसन्न होते रहते। कुछ वर्ष बाद जब उस वृक्ष में पहली बार फूल आए तो उनके आह्लाद का कोई छोर नहीं था। लरजती आवाज़ में दसियों मित्रों को फोन किए गए, निमंत्रण दिए गए- कदंब के फूल खिले देखने के लिए। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/virah.htm</link>
</item>

<item><title>नीलांबर शिशिर का ललित निबंध- कदंब का रोम रोम अनुराग </title>
<description>भागीरथी के इस तीर पर कदंब के पेड़ की छाया में बैठा जलधारा के उद्दाम वेग में उलझती, उपलाती नावों को- अपने सरस गीतों की मुखरता और जल-प्रवाह के गुंजन के बीच सुर और लय में साम्य स्थापित करते उसमें बैठे माँझियों को- और कभी-कभी जल-सतह से उभरते सों-सों की विचित्र घुलटन को- जब मैं अपनी आँखों में समेट लेना चाहता हूँ, तब पता नहीं क्यों, मेरा मन इतिहास, संस्कृति, साहित्य और अतीत की उलझी लताओं में अटक जाना चाहता है या फिर कुछ ढूँढ़ निकालना चाहता है, उन्हीं उलझनों में से कुछ काम की चीज़। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/lalit_nibandh/2009/kadamb.htm</link>
</item>

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<title>अर्बुदा ओहरी की कलम से- संस्कृति पर छाया कदंब </title>
<description>भारतीय साहित्य और संस्कृति में जिन वृक्षों का सबसे अधिक उल्लेख हुआ है कदंब उसमें से एक है। ब्रज का यह प्रसिद्ध फूलदार वृक्ष जब फूलता है, तब हल्के पीले रंग के छोटे-छोटे फूलों से भर जाता है। उस समय इसके फूलों की मादक सुगंध से ब्रज के समस्त बन और उपवन महकने लगते हैं। कदंब का भारतीय संस्कृति तथा साहित्य के साथ गहरा नाता है। वटवृक्ष, पीपल, नीम, आँवला, पलाश, अशोक आदि वृक्षों की भाँति कदंब भी जनमानस में रचा बसा है।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2009/kadamb.htm</link>
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<title>प्रवीण सक्सेना का आलेख- उपयोगी ढंग कदंब के</title>
<description>कदंब भारतीय उपमहाद्वीप में उगने वाला शोभाकर वृक्ष है। सुगंधित फूलों से युक्त बारहों महीने हरे, तेज़ी से बढ़नेवाले इस विशाल वृक्ष की छाया शीतल होती है। इसका वानस्पतिक नाम एन्थोसिफेलस कदम्ब या एन्थोसिफेलस इंडिकस है, जो रूबिएसी परिवार का सदस्य है। उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल, उड़ीसा में यह बहुतायत में होता है। इसके पेड़ की अधिकतम ऊँचाई ४५ मीटर तक हो सकती है। पत्तियों की लंबाई १३ से २३ से.मी. होती हैं। अपने स्वाभाविक रूप में ये चिकनी, चमकदार, मोटी और उभरी नसों वाली होती हैं, जिनसे गोंद निकलता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2009/upyogi.htm</link>
</item>

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<title>यू.एस.ए. से रचना श्रीवास्तव की कहानी- पार्किंग</title>
<description>हवाओं में नया गीत था और चिडियों के कलरव में ताजगी। भास्कर देव भी अपनी मतवाली चाल में धीरे-धीरे ऊपर आ रहे थे। उनकी किरणे लाल से पीली होकर वातावरण को एक मोहक रूप प्रदान कर रही थी। नए देश में ये नई सुबह बहुत ही प्यारी लग रही थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2009/parking/parking1.htm</link>
</item>

<item>
<title>अविनाश वाचस्पति का व्यंग्य- ओबामा ने मारी मक्खी </title>
<description>सी.एन.बी.सी. के साथ साक्षात्कार में अमेरिकी प्रेजीडेंट ने मक्खी मारकर दुनिया भर को चर्चा का एक विषय दे दिया है। ज्यादातर लोगों का विचार है कि इस हालिया कारनामे को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में स्थान दिया जाना चाहिए जबकि बुक वाले इस ओर से बेरूखी दिखला रहे हैं। दूसरी ओर मक्खियों का एक प्रतिनिधिमंडल अपने समुदाय के एक प्राणी की अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथों मारे जाने वाले मसले पर शांत होता नहीं दिखलाई दे रहा है। यहाँ भी राष्ट्रपति की ही चल रही है। वे नहीं चाहते कि दुनिया उन्हें मक्खीमार का खिताब दे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/obama.htm</link>
</item>

<item><title>भगवानदास मोरवाल के उपन्यास रेत का अंश- महफिल </title>
<description>सारी तैयारियाँ हो गईं महफ़िल की। ऊपर खुली छत पर एक तरफ़ डी जे, तो ठीक उसके सामने दीवार के सहारे नीचे फ़र्श पर मुलायम गद्दे बिछा कतार में गाव-तकिए लगवा दिए गए। अपनी परिकल्पना के अनुसार बुआ ने मेहमानों के बैठने की ऐसी व्यवस्था करवाई कि आनेवाले को पहली नजर में लगे, वह सचमुच किसी महफिल में आया है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/upanyas/mehfil/mehfil1.htm</link>
</item>

<item>
<title>आज सिरहाने नरेंद्र नागदेव का कहानी संग्रह- वापसी के नाखून  </title>
<description>वापसी के नाखून’ हिन्दी के एक विशिष्ट और प्रतिष्ठित कथाकार नरेन्द्र नागदेव की बहुचर्चित बारह कहानियों का संकलन है। ये कहानियाँ मूल्य-विघटन के इस दौर में, स्नेहिल मानवीय सम्बन्धों पर हावी होते निर्मम भौतिकतावाद और इस टकराहट से उत्पन्न धीमी आँच में झुलसती संवेदनाओं की कहानियाँ हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2009/vapasike_nakhoon.htm</link>
</item>


<item>
<title>फुलवारी में भेड़िये के विषय में जानकारी, शिशु गीत और शिल्प</title>
<description>भेड़िये की दो प्रमुख जातियाँ हैं। लकड़ी जैसे भूरे रंग वाले और लाल रंग वाले। उत्तर अमेरिका, उत्तर एशिया, भारत और यूरोप के जंगलों में भूरे काले रंग के भेड़ियों की कई किस्में मिलती हैं। लाल रंग का भेड़िया बहुत दुर्लभ है और अमेरिका के दक्षिणी पूर्वी भागों में पाया जाता है। भेड़िया गाँवों की खुली ज़गहों या जंगलों में रहता हैं।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/jaankari/junglekepashu/j_bhediya.htm</link>
</item>
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<title>यू.एस.ए से सुदर्शन प्रयदर्शिनी की कहानी- धूप</title>
<description>अब हम साथ नहीं रह सकते। रेखा नहीं जानती थी कि ये शब्द कैसे अपने-आप आज निकले थे, जो विशाल तक पहुँचने से पहले उसके हाथ में पकड़े चाय के कप पर ठहर गये थे और चाय की ऊपरी सतह पर तैर रहे थे। चाय के कप का कंपन बढ़ गया था। शायद इन शब्दों का भारीपन सतह पर बैठ नहीं पा रहा था। दोनों की नजरें मिली जैसे खाली कोटर हों और जिनका सब कुछ बहुत पहले ही झर चुका हो।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2009/dhoop/dhoop1.htm</link>
</item>

<item>
<title>स्नेह मधुर का व्यंग्य- कैसे कैसे अभिनंदन समारोह </title>
<description>पेट्रोल लेने के लिए पेट्रोल पम्प पर स्कूटर रोकी तो पांडे जी को अपनी चमचमाती कार के पास कार की खूबसूरती निहारते हुए पाया। उनका नौकर कार चमकाता जा रहा था और कार की बढ़ती चमचमाहट के साथ पांडे जी की मुस्कुराहट भी गहरी होती जा रही थी। पांडे जी पेट्रोल पम्प के मालिक हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/abhinandan.htm</link>
</item>

<item><title>डॉ. राजकुमार सिंह का निबंध- हिंदी काव्य में गंगा नदी</title>
<description>भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। हिन्दी काव्य साहित्य के आदि महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ में ‘गंगा’ नदी की चर्चा अनेक प्रसंगों में की गई है-
इंदो किं अंदोलिया अमी ए चक्कीवं गंगा सिरे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2009/hindikavyameganganadii.htm</link>
</item>

<item>
<title>संस्कृति में मानसी से जानकारी भारतीय शास्त्रीय संगीत </title>
<description>भारतीय संगीत का अभिन्न अंग है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आज से लगभग ३००० वर्ष पूर्व रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। ऐसा मानना है कि ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को संगीत वरदान में दिया था। चारों वेदों में, सामवेद के मंत्रों का उच्चारण उस समय के वैदिक सप्तक या समगान के अनुसार सातों स्वरों के प्रयोग के साथ किया जाता था। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/shastriya_sangeet.htm</link>
</item>


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<title>स्वाद और स्वास्थ्य में स्वास्थ्यवर्धक संतरे</title>
<description>क्या आप जानते हैं कि भारत, चीन, भूटान और मलेशिया को संतरे का उद्गम स्थल माना जाता है, १५वीं शताब्दी से पहले यूरोप में लोग संतरे के बारे में नहीं जानते थे और
यूरोप के लिए संतरे की खोज अपनी यात्राओं के दौरान कोलंबस ने की थी।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/ss/santara.htm</link>
</item>


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<title>समाचारों में देश-विदेश से साहित्यिक-सांस्कृतिक सूचनाएँ</title>
<description>जून माह के साहित्य समाचार</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
</item>

<item>
<title>अजय कुमार गुप्ता की कहानी रेलगाड़ी</title>
<description>यह जीवन तो एक रेलगाड़ी के सदृश्य है, जो एक स्टेशन से चलकर गंतव्य तक जाती है। न जाने कितने स्टेशनों से होकर गुज़रती है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/railgadi/railgaadi1.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रमोद ताम्बट का व्यंग्य ये मीठे मीठे लोग </title>
<description>इन दिनों लोग बेहिसाब मीठे होने लग पड़े हैं। नख से लेकर शिख तक। क्यों ना हों, पैदाइश से ही गपा-गप मीठा खाना भारतीयों की वह छिछोरी आदत होती है, जिसे छोड़ने के लिए कहे जाने पर वे आगबबूला होकर किसी के भी प्राण ले सकते हैं।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/meethe_meethe.htm</link>
</item>

<item><title>डॉ. ओमप्रकाश पांडेय का आलेख भारतीय संस्कृति में डूबा एक फ़्रांसीसी परिवार</title>
<description>पेरिस में, अतिथि आचार्य के रूप में नियुक्त होकर आने पर, मुझे जिन फ्रांसीसी परिवारों में विशेष आत्मीयता मिली, उनमें प्रो. पियर सिल्वां फिलियोजा का परिवार प्रमुख है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2009/filliozat.htm</link>
</item>

<item>
<title>प्रशांत पंड्या के साथ शौक डाक-टिकटों के संग्रह का</title>
<description>सुंदर और उपयोगी वस्तुओं का संग्रह मानव का स्वभाव है। हर चीज को संग्रह करने में मज़ा है और हर एक चीज के संग्रह के साथ कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त होता है लेकिन डाक टिकटों के संग्रह का मज़ा कुछ और ही है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/tikat_sangrah/2009/tikatsangrah.htm</link>
</item>


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<title>स्वाद और स्वास्थ्य में स्वास्थ्यवर्धक संतरे</title>
<description>क्या आप जानते हैं कि भारत, चीन, भूटान और मलेशिया को संतरे का उद्गम स्थल माना जाता है, १५वीं शताब्दी से पहले यूरोप में लोग संतरे के बारे में नहीं जानते थे और
यूरोप के लिए संतरे की खोज अपनी यात्राओं के दौरान कोलंबस ने की थी।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/ss/santara.htm</link>
</item>


<item>
<title>दीपक शर्मा की कहानी- माँ का दमा</title>
<description>पापा के घर लौटते ही ताई उन्हें आ घेरती हैं, ''इधर कपड़े वाले कारखाने में एक ज़नाना नौकरी निकली है। सुबह की शिफ़्ट में। सात से दोपहर तीन बजे तक। पगार, तीन हज़ार रुपया। कार्तिकी मज़े से इसे पकड़ सकती है...''
''वह घोंघी?'' पापा हैरानी जतलाते हैं।
</description>
<link>http://abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2009/maa_ka_dama/maa1.htm</link>
</item>

<item>
<title>रमाशंकर श्रीवास्तव का व्यंग्य- तारीफ़ भी एक बला है </title>
<description>मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि किसी की तारीफ़ करना अपनी शामत बुलाना है। हम सभी मानते हैं कि किसी के अच्छे कार्यों के लिए उसकी समुचित प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए। अगर हम उसकी तारीफ़ नहीं करते हैं तो उसके साथ बेइंसाफ़ी होती है। लेकिन तारीफ़ करना ख़तरे का काम है। ऐसा ज़ोखिम उठाना सबके बस की बात नहीं। शब्दों का संतुलन ज़रा-सा बिगड़ जाए तो बनता काम भी बिगड़ जाएगा। काजल को कालिख बनते देर नहीं लगती। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2009/tareef.htm</link>
</item>

<item><title>सुधा अरोड़ा की लघुकथा सुरक्षा का पाठ </title>
<description>राघव अपनी अमरीकी बीवी स्टेला और दो बच्चों - पॉल और जिनि के साथ भारत लौट रहा है, सुनकर मेरा कलेजा चौड़ा हो गया। आखिर अपना देश खींचता तो है ही। मेरा बेटा राघव तो अमरीका जाने के बाद और भी भारतीय हो गया था। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2009/surakasha.htm</link>
</item>

<item>
<title>कोनी का संस्मरण- मेरे मित्र लियो तोल्स्तोय</title>
<description>६ जून, १८८७ की एक सुन्दर गुनगुनी सुबह। मैंने मास्को-कुर्स्क रेलवे के यसेन्की स्टेशन पर स्प्रिंगवाली गाड़ी में सीट ग्रहण की जो मेरे लिए भेजी गई थी, और यास्नाया पोल्याना के लिए प्रस्थान किया। 
१० बजे मैं तोल्स्तोय परिवार के सदस्यों के साथ बाहर लॉन में फैले लाइम वृक्षों के नीचे नाश्ता ले रहा था। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2009/leotolstoy.htm</link>
</item>


<item>
<title>दिविक रमेश का निबंध- मिथक: अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम</title>
<description>अंग्रेजी के शब्द मिथ का हिन्दी रूप मिथक है और इस शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में हुआ। यह शब्द हिन्दी जगत को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से मिला। ध्यान देने योग्य बात यह है कि मिथ और मिथक अपनी अर्थगत संकल्पनाओं में समान नहीं हैं। मिथ प्राय: तर्क के विपरीत कोरा कल्पनाधर्मी अधिक माना जाता रहा है जबकि मिथक अलौकिकता का पुट रखते हुए भी लोकानुभूति का वाहक होता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2001/myth.htm</link>
</item>



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