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<title>अभिव्यक्ति: साहित्य का सुरुचिपूर्ण साप्ताहिक</title>
<description>अभिव्यक्ति ३० जून २०१० </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org</link>

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<title>डॉ. सुधा पांडे की पुराण कथा- नंदनवन का पारिजात</title>
<description>“हे सर्वात्मन, भयानक नरकासुर ने देवताओं, सिद्धों, और असुरों सहित राजाओं की कन्याओं को भी अपने अंतःपुर में बंद कर दिया है... वरुण का जल वर्षा करने वाला छत्र मणिपर्व छीन लिया है और मंदराचल के एक प्रदेश पर भी अपना अधिकार जमा लिया है।“ त्रस्त देवराज ने अचानक द्वारका आकर श्रीकृष्ण से निवेदन किया, “इतना ही नहीं उसने मेरी माँ अदिति के अमृतवर्षी दोनो दिव्य कुंडल भी छीन लिये हैं और अब ऐरावत को छीनने की आकांक्षा लिये मेरी ओर बढ़ा चला आ रहा है.. अनर्थ हो जाएगा द्वारकाधीश...आप ही मुक्ति दिलाइये इससे।“ पृथ्वीपुत्र प्राग्ज्योतिरीश्वर नरकासुर से संतप्त हो इंद्र विचलित हो उठे थे और द्वारका दौड़े गए थे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/nandanvanka_parijat/nandanvan1.htm</link>
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<title>डॉ. नरेन्द्र कोहली की दृष्टिकोण- माखनचोरी</title>
<description>वृन्दावन के नंद के विषय में कुछ बातें स्पष्ट नहीं हैं। वे साधारण गोप भी हैं, और कहीं कहीं तो कवियों ने उन्हें एक छोटे मोटे राजा का ही स्थान दे दिया है। नंद सब के लिए आदरणीय हैं, और साधारण गोपों से कुछ श्रेष्ठ हैं। उनके घर में आर्थिक तंगी भी दिखाई नहीं देती। वे कभी गउवें चराने के लिए वन जाते भी दिखाई नहीं पड़ते। इसका अर्थ है कि या तो वे अधिक समृद्ध हैं, या फिर उनकी अवस्था इतनी हो चुकी है कि वे वन जा कर गउवों की रखवाली का काम नहीं कर सकते। उनका वृन्दावन का मुखिया होना सिद्ध है। उनकी आर्थिक स्थिति शेष लोगों से कुछ अधिक समृद्ध है। सूरदास के पदों में श्रीदामा ने कृष्ण को उपालंभ दिया है : ''खेलन में को काकों गुसैयाँ।`` ''नाहीं बसत तुम्हारी छैया।`` ''अधिक तुम्हारी हैं कछु गैयाँ।`` इन में कृष्ण के अर्थात् नंद के कुछ धनी होने के संकेत हैं।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/drishtikone/2010/makhanchori.htm</link>
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<title>वीरनारायण शर्मा का आलेख- दो भूली बिसरी कृष्णभक्त कवयित्रियाँ</title>
<description>जिस प्रकार कवि रसखान और रहीम कृष्ण भक्ति से प्रभावित होकर हिंदी साहित्य में श्रेष्ठ हुए उसी प्रकाऱ कुछ मुसलमान कवयित्रियाँ भी कृष्ण भक्ति की धारा में डूबकर हिंदी साहित्य में प्रसिद्ध हुईं। ताज और शेख नाम की इन कवयित्रियों का नाम इनमें सर्वोपरि है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/taaj_shekh.htm</link>
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<title>सिद्धेश्वर सिंह का संस्मरण- स्मृतियों का राग मद्धम</title>
<description>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी .किसी समय यह हमारे लिए 'अट्टमी' या 'डोल धरना' नामक उत्सव  हुआ करता था और एक दिन, दो दिन का नहीं बल्कि पूरे सप्ताह भर का उत्सव हुआ करता था। भादों के महीने में जब बारिश की टिपिर - टिपिर झड़ी लगी होती थी तब आनंद का एक साप्ताहिक उत्सव हमारे लिए बहुत बड़ा आयोजन  हुआ करता था। पूरे टोले के घर - घर से रंग बिरंगी साड़ियाँ और चादरें मांगकर तथा अपने गाँव-गिराँव व निकटवर्ती कस्बे में उपलब्ध सामग्री से 'झुलना' सजाकर हम लोग अट्टमी मनाते थे। हर घर से चंदा होता था और जनम की रात धनिया की पंजीरी के साथ आटे का चाँड़ा हुआ हलुआ और 'खीरे का 'फूट'  प्रसादके रूप में वितरित होता था। तब तक गाँव में बिजली नहीं आई थी इसलिए 'गेस' या पेट्रोमैक्स के प्रकाश में यह सब संपन्न होता था। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2010/janmashtami.htm</link>
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<title>देश विदेश से साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार</title>
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<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>मन्नू भंडारी की कहानी सयानी बुआ</title>
<description>फैजाबाद की ओर जाने वाली किसान एक्सप्रेस रद्द थी। इसके सब पर मानो बुआजी का व्यक्तित्व हावी है। सारा काम वहाँ इतनी व्यवस्था से होता जैसे सब मशीनें हों, जो कायदे में बँधीं, बिना रुकावट अपना काम किए चली जा रही हैं। ठीक पाँच बजे सब लोग उठ जाते, फिर एक घंटा बाहर मैदान में टहलना होता, उसके बाद चाय-दूध होता। उसके बाद अन्नू को पढने के लिए बैठना होता। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/sayani_bua/sayanibua1.htm</link>
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<title>अशोक गीते का व्यंग्य- रिश्वतऽमृतमश्नुते</title>
<description>हर बच्चे के पिता को ईमानदारी के साथ यह मानकर चलना चाहिए कि जैसे कैसे उनका बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर भले ही बन जाए लेकिन उसके बाद भी उसके हाथ में रिश्‍वत लेने का हुनर नहीं तो वह आगे परिवार की तो छोड़िए अपने खर्चे भी पूरे नहीं कर सकता। और नतीजा…. सपने बंदे को खुदकुशी तक ले जा रहे हैं। हमारे संस्थान ने इसी बात को ध्यान में रख समाज और देश हित में रिश्‍वत पर विशेष पाठ्यक्रम चलाए हैं ताकि आपका लाडला रिश्‍वत देकर छोटी-मोटी नौकरी पाने के बाद हीनता का शिकार न हो। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/rishwat.htm</link>
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<title>सुबोध कुमार नन्‍दन का आलेख- बैजनाथधाम का श्रावणी मेला</title>
<description>शिवभक्‍त सावन माह में बिहार के विभिन्‍न शिव मंदिरों में शिवलिंग पर जल अर्पित करते ही हैं पर बैद्यनाथधाम के शिवलिंग पर जलाभिषेक के लिए बिहार के लोग ही नहीं उमड़ते हैं बल्कि देश-विदेश जैसे - नेपाल, भूटान, मॉरिशस, फिजी, पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, थाईलैंड, बर्मा, तिब्‍बत आदि से लाखों शिवभक्‍त के मनोकामना लिंग के दर्शनार्थ उमड़ पड़ते हैं और पूरा सावन माह बोल बम एवं हर हर महादेव के उद्घोष से गुजायमान रहता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2010/shravani_mela.htm</link>
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<title>प्रभु जोशी के शब्दों में- राजा रवि वर्मा का कला संसार</title>
<description>राजा रवि वर्मा भारतीय कलाजगत में एक ऐसे समय में अवतरित हुए थे, जब कला के सिर्फ दो छोर थे- एक तो था, 'शास्त्र`, जो सामंतयुगीन उच्चवर्ग के अधीन था और दूसरा था 'लोक`, जो ग्रामीण जनसमुदाय के बीच ही अपना सर्वस्व जोड़े हुए था। 
शास्त्र के नाम पर दो-तीन स्पष्ट वर्गीकरण थे। मसलन, चित्रांकन की राजपूत शैली तथा मुगल कलमकारी। लेकिन, दोनों शैलियाँ ही अपने शानदार अतीत का वैभव खोना शुरू कर चुकी थीं। वे एक ध्वंस का सामना कर रही थीं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kaladirgha/aalekh/rrvarma/rrvarma.htm</link>
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<title>मनोहर पुरी की कलम से- प्यारा सा बंधन रक्षाबंधन </title>
<description>साधारणत: दुनिया का कोई भी प्राणी किसी प्रकार का भी बंधन स्वीकार नहीं करता। मानव जिस बात को बंधन समझता है वह तुरंत उसे काट डालने का प्रयास करता है। प्रेम ही एकमात्र ऐसा बंधन है जिसमें बँधने की इच्छा हर किसी की होती है। इस संदर्भ में राखी एक न्यारा और प्यारा बंधन है। भाई बहन के प्रेम को भारतीय समाज ने सबसे अधिक पवित्र माना है। इसीलिए रक्षा बंधन की सर्वव्यापकता को भाई बहन के परस्पर स्नेह के माध्यम से व्यक्त किया गया है। आज यह एक प्रतीक रूप में विशाल अर्थ ग्रहण कर चुका है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2006/rakshabandhan.htm</link>
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<title>सुकेश साहनी की कहानी- पुल</title>
<description>फैजाबाद की ओर जाने वाली किसान एक्सप्रेस रद्द थी। इसके बावजूद इलाहाबाद पैसेंजर में, जिसे हम प्यार से लढ़िया कहते थे, अधिक भीड़ नहीं थी। घर से चलते समय हमें इस बात का कतई अनुमान नहीं था कि राजनीतिक हो–हल्ले का इतना अधिक असर दिखाई देगा। बहुत से लोगों ने आज एहतियातन अपनी यात्राएँ स्थगित रखी थीं। हमारे डिब्बे में डेली पैसेंजर अधिक थे। माहौल भी रोज जैसा ही था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/pul/pul1.htm</link>
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<title>बलराम अग्रवाल की लघुकथा- गुलमोहर</title>
<description>मकान के बाहर लॉन में सूरज की ओर पीठ किए बैठे जतन बाबू न जाने क्या-क्या सोचते रहते है। मैं लगभग रोजाना ही देखता हूँ कि वह सवेरे कुर्सी को ले आते हैं। कंधों पर शाल डाले, लॉन के किनारे पर खड़े दिन-ब-दिन झरते गुलमोहर की ओर मुँह करके, चुपचाप कुर्सी पर बैठकर वह धूप में सिंकने लगते हैं। कभी भी उनके हाथों में मैंने कोई अखबार या पुस्तक-पत्रिका नहीं देखी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/mahanagar_ki_kahaniyan/2010/gulmohar.htm</link>
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<title>तुलसी जयंती के अवसर पर संकलित आलेख- हुलसी के तुलसी</title>
<description>गोस्वामी तुलसी दास जी के जन्म संवत् और जन्म स्थान के सम्बन्ध में मत भेद है। अधिकतर लोगों का मानना है कि उनका जन्म सम्वत् १५५४ की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में बाँदा जिले के राजा पुर नामक स्थान गाँव में हुआ था। कुछ विद्वानों ने एटा जिले के सोरों नामक स्थान को उनकी जन्म भूमि माना है। तुलसी दास जी के बचपन का नाम राम-बोला बताया जाता है। उनके पिता का नाम आत्मा राम और माता का नाम हुलसी था। अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण उन्हें माता-पिता ने त्याग दिया। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2003/tulsi.htm</link>
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<title>मजीद अहमद का निबंध- तुलसीदास की प्रथम रचना- राम लला नहछू</title>
<description>'रामलला नहछू' गुसाईं तुलसीदास की प्रथम रचना है। इस लघु कृति के बीस सोहर छंदों में नहछू लोकाचार का वर्णन हुआ है। 'सोहर' अवध प्रांत का एक अति ख्‍यात छंद है। इसके अतिरिक्‍त कर्णवेध, मुंडन और उपनयन संस्‍कारों तथा नहछू लोकाचारों पर स्त्रियाँ इसे गाती हैं। कवि ने जीवन में शास्‍त्र सम्‍मत विधानों के साथ लोकाचार के परिपालन का भी महत्त्व निरूपित किया है - 'लोक वेद मंजुल दुइ कूला'। वेदाचार लिखित संविधान की भांति ग्रंथबद्ध और व्‍यापक है, लेकिन लोकाचार परंपराओं पर आधारित होता है। नहछू लोकाचार का शास्‍त्रीय विधान न होते हुए भी अवध में कम से कम पाँच सौ वर्षों से व्‍यापक रूप से प्रचलित है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/raamlala_nahchhu.htm</link>
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<title>डॉ.अनुराग विजयवर्गीय से जानें- तुलसी का महत्त्व </title>
<description>तुलसी भारतीय घरों में सबसे अधिक पाया जानेवाला पौधा है। यह झाड़ी के रूप में उगता है और १ से ३ फुट ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ बैंगनी आभा वाली हल्के रोएँ सो ढकी होती है। पत्तियाँ १ से २ इंच लम्बी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती हैं। पुष्प मंजरी अति कोमल एवं ८ इंच लम्बी और बहुरंगी छटाओं वाली होती है, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। बीज चपटे पीले रंग के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2010/tulsi.htm</link>
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<title>शुभदा मिश्र की कहानी- मुक्ति पर्व</title>
<description>फँस गईं दीदी आप ...' सामने वाली पड़ोसिन अपने फाटक पर दोनों कुहनियाँ टिकाए, हथेलियों में चेहरा रखे विगलित दृष्टि से उन्‍हें देखती कह रही थीं। वे जा रही थीं सामने सड़क पर, थकी-हारी क्‍लांत। एक हाथ में दवाइयों का पैकेट लिए और साथ ही साड़ी का पायचा उठाए, दूसरे हाथ में गर्म पानी की बोतल और छाता लिए। इधर दो दिन से लगातार बारिश हो रही थी।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/mukti_parv/muktiparv1.htm</link>
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<title>आचार्य संजीव सलिल का प्रेरक प्रसंग- भारतमाता का घर</title>
<description>भारत माता ने अपने घर में जन-कल्याण का जानदार आँगन बनाया। उसमें शिक्षा की शीतल हवा, स्वास्थ्य का निर्मल नीर, निर्भरता की उर्वर मिट्टी, उन्नति का आकाश, दृढ़ता के पर्वत, आस्था की सलिला, उदारता का समुद्र तथा आत्मीयता की अग्नि का स्पर्श पाकर जीवन के पौधे में प्रेम के पुष्प महक रहे थे।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prerakprasang/2010/bharatmatakaghar.htm</link>
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<title>डॉ. बसंतीलाल बाबेल से जानकारी- हमारा संसद भवन</title>
<description>हमारा संसद भवन देश की वास्‍तुकला की अमूल्‍य धरोहर और बेजोड़ मिसाल है। यह विश्‍व के श्रेष्‍ठतम भवनों में से एक है। विश्‍व विख्‍यात वास्‍तुविद् सर हरबर्ट बेकर तथा सर एडविन लूटयंस की कला का यह अनूठा उदाहरण है। इस भवन का डिजाइन सन् १९१९ में तैयार किया गया था और इसका शिलान्‍यास १२ फरवरी, १९२१ को ड्यूक ऑव कनॉट द्वारा संपन्‍न हुआ था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/sansad_bhawan.htm</link>
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<title>गोपीचंद श्रीनागर का निबंध- डाकटिकटों में अशोक स्तंभ</title>
<description>हमारा राष्ट्र चिह्न भारतीय टिकटों पर बहुतायत से दिखने को मिलता है। यह स्वाभाविक भी है। किसी भी देश के राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र चिह्न का उसके जनजीवन में बहुत महत्त्व होता है। भारत का राष्ट्र चिह्न भारत के समृद्ध अतीत की कहानी कहता है। ईसा से लगभग २७२ वर्ष पूर्व भारतीय इतिहास के स्वर्णिम नक्षत्र सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से संबंधित पवित्र स्थानों पर सुंदर स्तंभों वाली पत्थर की लाटें स्थापित करवाई थीं। देश भर में बिखरी इन लाटों पर अशोक महान के आदेश ब्राह्मी लिपि में खुदे मिलते हैं। ऐसी १७ लाटों का अबतक पता चला है। सारनाथ में स्थित इसी प्रकार की एक लाट के ऊपरी सिरे पर निर्मित मूर्तिभाग को हमारे राष्ट्र चिह्न के रूप में स्वीकार किया गया है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/tikat_sangrah/ashok_stambh/ashok_stmabhi.htm</link>
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<title>राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह का आलेख- वंदे मातरम की रचना </title>
<description>बंगाल में बंगला के लेखक, कवि और उपन्यासकार तो बहुत से हुए हैं, पर बंकिम बाबू की अपनी एक शैली थी और उन्होंने 'वंदे मातरम्' गीत लिखकर अपने को अमर कर दिया। मुझे याद आते हैं वे दिन जब एक तरफ यह गीत लोगों में स्वतंत्रता-संग्राम के लिए जोश पैदा करता था वहीं दूसरी ओर देश की परतंत्रता पर उन्हें दुखी करता था।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/vandemataram.htm</link>
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<title>राजी सेठ की कहानी- तुम भी</title>
<description>रात जब उसकी नींद खुली तो आज फिर वह बिस्तर पर नहीं था। दो क्षण अडोल पड़ी रही। बाथरूम की दिशा में कान दिए...रात खामोश थी...कोई आवाज़ न होने से उसे लगा, दिन होने में देरी है...बीच रात का पहर है...सन्नाटे से भरा। दरवाज़े की साँकल हलकी-सी बजी...खिस्स-खिस्स की ध्वनि। पूर्व ज्ञान न होता तो शायद समझ न पाती कि बोरी घसीटी जाकर दरवाज़े के पीछे रख दी गई है। प्राण जैसे कहीं और बँधे हों, ऐसी सीने के भीतर टँगी जाती साँस, ...चुप पड़ी रही। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyanhttp://www.abhivyakti-hindi.org/gauravgatha/2010/tum_bhi1.htm</link>
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<title>शम्भूनाथ सिंह का व्यंग्य- बाजार में निकला हूँ</title>
<description>इन दिनों बाजारों का मिजाज का नये ढँग और निराले अंदाज में है। अर्थशास्त्र के नियम से बँधा तो कत्तई नहीं। माँग और आपूर्ति के आधार पर भी नहीं। बस यों समझ लीजिए कि बिल्कुल एक नये आकर्षक रूप में। एकदम बदला-बदला रंग ढंग। अब आप को ढूँढे से भी वो बाजार नहीं मिलेगा, जहाँ सौदा-सुलुफ निबटाकर लोग पत्ते के दोने में कचौड़ी और जलेबी का आनंद लेते थे। ऐसा आनंद जैसे 'आठहु सिधी नवों निधि` को प्राप्त कर गये हो। अब वो शर्मा जी भी नहीं रहे, जो परले दर्जे के बाजारू किस्म के जीव हुआ करते थे। चाहे साँस लेना भूल जाएँ, बाजार जाना नहीं भूलते थे। वो भी खरीददारी करने कम, मोल भाव करने ज्यादा, मगर जाते जरूर थे। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/baazar.htm</link>
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<title>योगेश विक्रान्‍त का आलेख- हिंदी रंगमंच : मंचन के पीछे की पीड़ा</title>
<description>हिन्‍दी रंगमंच के उद्भव काल को स्‍मरण करें तो अब तक एक दीर्घ अवधि बीत चुकी है। भारतेन्‍दू हरिश्‍चन्‍द्र के युग में जो नाट्यान्‍दोलन हिन्‍दी क्षेत्र में आरंभ हुआ उससे हिन्‍दी रंगमंच को एक निश्चित दिशा अवश्‍य मिली परन्‍तु उसकी जड़ें स्‍थाई नहीं बन पाईं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/natak/rangmanch/2010/manchan.htm</link>
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<title>वीरेंद्र मेंहदीरत्ता की कलम से सुषम बेदी का उपन्यास- गाथा अमरबेल की</title>
<description>गाथा अमर बेल की सुषम बेदी का पाँचवाँ उपन्‍यास है। इनके तीन उपन्‍यासों 'हवन', 'लौटना' तथा 'इतर' का संबंध अमेरिका तथा यूरोप  के भारतीय अप्रवासियों की परिवेशजन्‍य दबावों में टूटती-बिखरती जि़दगियों से है, उन पात्रों से है जो बिखरते जीवन मूल्‍यों तथा परि‍वर्तित सांस्‍कृतिक आघात से उबरने के प्रयत्‍न में हैं तथा आत्‍मरक्षा के लिए संबल बटोर रहे हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/gatha.htm</link>
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<title>घर परिवार में गृहलक्ष्मी के सुझाव- रंग लाती है हिना </title>
<description>सावन हो, तीज-त्योहार हो या विवाह का अवसर हिना या मेंहदी के बिना सूना है। हाथों पैरों और शरीर को अलंकृत करने का यह पारंपरिक तरीका कब शुरू हुआ इसके बारे में कोई निश्चित सूचना प्राप्त नहीं होती पर इतना तो निश्चित है कि फारस से आई इस छोटी सी पत्ती ने भारत की सांस्कृतिक धरोहर पर अपना गहरा रंग छोड़ा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/2001/henna.htm</link>
</item>

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<title>पावन की कहानी- तेईस साल बाद</title>
<description>मिस अनुरीति, द्वारा श्री राधा रमण वर्मा, सी-१५, पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट क्वाटर्स, मौरिस नगर, दिल्ली-११०००७ ---  पता हमारा था पर यहाँ अनुरीति कोई नहीं थी। डाकिया मुझसे दस रुपये ले गया था, कहा था, गोवा से आया है, और इस पर पूरी कीमत का टिकट नहीं लगा है। उसे दस रुपये देने से पहले मैंने एक बार उसे कहा भी था कि यहाँ कोई अनुरीति नहीं रहती, पर फिर एक लड़की का नाम देखकर और लिफाफे का पीलापन और धुँधला चुका पता लिखा देख भीतर अजीब सी उत्सुकता हुई थी और मैंने पत्र ले लिया था। लिफाफा मैं खोल चुका था। पत्र का कागज चार तहों में था, जो इतना जीर्ण हो चुका था कि तहों वाले मोड़ों से फट चुका था और वो चार टुकड़ों में मेरे सामने था। उसका लिफाफा मेज पर रखा था, जो शायद कभी झक सफेद रहा होगा आज पीला, भूरा, जर्द था। अलग-अलग टुकड़ों को एक करके मैं पत्र पढ़ने लगा </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/teis_saal_baad/tsb1.htm</link>
</item>

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<title>पवन चंदन का व्यंग्य- झाँको, खूब झाँको, झाँकते रहो</title>
<description>झाँको, खूब झाँको। आदत से बाज नहीं आया करते। खुद कैसे हो इस बात पर गौर न करो। पड़ौसी कैसा है, इस बात पर ज्यादा ध्यान दो। पड़ौसी के पड़ौस में क्या चल रहा है, ये भी आपको पता होना चाहिए। अमेरिका को देखो न पड़ौसी के पड़ौसी के पड़ौसी को भी देख लेता है। ये जो दो-दो दीदे दिये हैं भगवान ने, ये दूसरों को देखने के लिए ही दिये हैं, खुद को देखने के लिए नहीं। इनका रुख कभी अपनी तरफ होता है क्‍या..?</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/jhanko.htm</link>
</item>


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<title>मधुलता अरोरा की कलम से- कथा यू.के. के सोलह साल</title>
<description>इंदु शर्मा कथा सम्मान और कथा यूके एक दूसरे के पर्याय हैं। सन् १९९५ में भारत में इंदु शर्मा मेमोरियल की नींव रखी गई। संभावनाशील कवियत्री एवं कहानीकार इंदु शर्मा का कैंसर से संघर्ष करते हुए अल्पायु में ही निधन हो गया था। तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी पत्नी इंदु की यादों को सहेजते हुए मुम्बई में 'इंदु शर्मा कथा सम्मान' की शुरूआत की, जिससे राहुलदेव, विश्वनाथ सचदेव और सिने अभिनेता नवीन निश्चल ट्रस्टी के रूप में जुड़ गये। जहाँ तक मुझे याद आता है भारत का शायद यह पहला सम्मान है जो एक लेखक द्वारा अपनी लेखिका पत्नी की स्मृति में किसी कथाकार को दिया जाता है।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2010/kathaUk.htm</link>
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<title>शैलेन्द्र चौहान का निबंध- साहित्य में वैज्ञानिक एवं सामाजिक चेतना</title>
<description>भारतीय मानस तपस्या, हवन, पूजा आदि से ऐसी दैवी शक्तियों तथा असाधारण सामर्थ्य की अवधारणा करता रहा है जो आज वैज्ञानिक अनुसंधानों के रूप में हमारे समक्ष भौतिक रूप में विद्यमान हैं। महाभारत, रामायण आदि प्राचीन ग्रंथों में युद्ध में प्रयुक्त विशेष अस्त्र शस्त्र जो पारंपारिक अस्त्रों से भिन्न दैवी वरदान के रूप में प्राप्त होते थे उनकी तुलना आज के अत्याधुनिक अस्त्रों से की जा सकती है। इसी तरह रामायण में प्रयुक्त पुष्पक विमान किसी छोटे हेलीकॉप्टर या हावर क्राफ्ट की तरह लगता है।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2002/vigyan.htm</link>
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<title>देश विदेश से साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार</title>
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<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>महेन्द्र दवेसर की कहानी- सुरभि</title>
<description>कहानियों सी कहानी नहीं हूँ मैं! मगर कहानी बन गयी हूँ, और कुछ कर नहीं सकती! जज साहिब ने प्रेस पर से रिपोर्टिंग की पाबन्दी क्या हटाई, मैं तो वेश्याओं से भी बदतर हो गयी । वेश्याएँ बिकती हैं तो बन्द कमरों में नग्न होती हैं। मैं तो नंगी की जा रही हूँ खुले आम– सड़कों पर, दुकानों में, किसी की भी गोद में, मेज़ पर, बिस्तर में . . . कहीं भी! मैं पढ़ी जा रही हूँ, कही जा रही हूँ, सुनी जा रही हूँ!! पत्रकार तो वैसे ही बढ़ा चढ़ाकर, नमक मिर्च लगाकर लिखते हैं। रही सही कसर लोग पूरी कर देते हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/vatan_se_door/2010/surabhi/surabhi1.htm</link>
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<title>प्रेम जनमेजय का व्यंग्य- राधेलाल का कुत्ता</title>
<description>सुबह-सुबह स्वास्थ्य लाभ के लिए सभी को घूमने का शौक होता है। किसी के लिए घूमना विवशता होती है,किसी के लिए आवश्यक्ता और किसी के लिए शौक। आज सुबह देखा तो सामने से राधेलाल जी एक कुत्ते की जंजीर थामे, कुत्ते के कारण कभी दक्षिण और कभी वाम की ओर खिंचते, चले आ रहे हैं। समझ नहीं आ रहा था कि वे कुत्ते को घुमा रहे हैं या कुत्ता उन्हें घुमा रहा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/radhelal.htm</link>
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<title>जे.पी.सिंघल से प्रभु जोशी की भेंट- कला मेरे लिये कुरुक्षेत्र ही थी</title>
<description>घर के जिस हिस्सों में हम बैठे थे, वहाँ छत अपेक्षाकृत कुछ नीची थी और वहाँ से धीमे-धीमे जलती लकड़ियों की आँच-सा तांबई आलोक झर रहा था, जिसमें कभी-कभी, बाहर हीरा-पन्ना मॉल के सामने से गुज़रती सड़क का शोर रूक-रूक कर अंदर आ जाता, जो कमरे की अभिजात खामोशी के बीच विचित्र जान पड़ता। जैसे महानगर की हवा में रहने वाला कोलाहल, अपनी कर्कशता को बाहर छोड़कर, भीतर आते हुए थोड़ा विनम्र हो आया हो। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kaladirgha/aalekh/jps/jpsinghall.htm</link>
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<title>नवीन पंत का आलेख- लोकमान्य तिलक की कानूनी लड़ाइयाँ</title>
<description>लोकमान्‍य बालगंगाधर तिलक आजीवन कानूनी लड़ाइयों में व्‍यस्‍त रहे। उनके विरूद्ध सरकार ने राजद्रोह के तीन मुकदमे चलाए। लोकमान्‍य ने सन १९१५ में लंदन टाइम्‍स के सर वेलेंटाइन शिरोल के विरूद्ध मान‍हानि का मुकदमा दायर किया। स्‍वयं उनको मानहानि के एक मुकदमे का सामना करना पड़ा। लोकमान्‍य ने अपने तीन मित्रों के विरूद्ध चलाए जा रहे मुकदमों में उनकी हर तरह से सहायता की। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2010/tilak.htm</link>
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<title>कनीज भट्टी की कलम से- दो विदेशियों की प्रेम कहानी भारत में </title>
<description>दो विदेशियों को राजस्थानके गूजरों की वेशभूषा में, अपने कार्यालय में देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, किन्तु मैं और भी अचंभित हो गयी जब मैंने देखा कि वे मेरे सामने नमस्ते करके बैठ गये और हिंदी में बातचीत करके वह सूचना माँगने लगे जो उन्हें चाहिए थी। मुझे बिलकुल भी एहसास नहीं हुआ कि मैं किन्हीं विदेशियों से बात कर रही हूँ। ऐसा लग रहा था कि - जैसे मैं राजस्थान के किसी गाँव के एक गूजर दंपति से बात कर रही हूँ।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2002/jyotinashi.htm</link>
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<title>रमणिका गुप्ता की कहानी- ओह ये नीली आँखें</title>
<description>'ओह ये नीली आँखें!`
मैं कुछ बदहवास, कुछ हताश-सी बुदबुदा उठी। दरअसल रेखा चिल्ला रही थी कि किचन में घुस कर बिल्ली सारा दूध पी गयी है। वह उसे खदेड़ते हुए मेरे बेडरूम तक ले आई थी। मैंने उसे कहा, 'इसे मारो मत।` एक टुकड़ा टोस्ट का तोड़ कर मैंने जमीन पर फेंक दिया था। बिल्ली ने उसे खाकर पुन: मेरे हाथ में बचे टोस्ट पर अपनी नीली आँखें गड़ा दीं। जैसे ही मेरी आँखें उसकी आँखों से टकराईं मुझे बरसों पहले बंबई से मद्रास की यात्रा करते समय नीली आँखों वाला सहयात्री याद आ गया। वह इस बिल्ली की तरह ही मेरी देह को ललचायी आँखों से टकटकी लगाए रातभर देखता रहा था। वैसे मुझे बिल्ली का यों कातर होकर ताकना अजीब-सा लग रहा था!  आमतौर पर बिल्लियाँ कभी कातर नहीं होतीं। वे तो हिंसक होती हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/ohye_neeli_aankhen/oh1.htm</link>
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<title>सुरेन्द्र कुमार का व्यंग्य- जूतों का महत्त्व</title>
<description>गत दिनों मुझे एक जोड़ी जूते खरीदने थे। सो जूतों के बारे में सोचता रहा। दो दिन बाद मैं बहुत चौंका कि चिंतन में लगातार जूता ही चल रहा है यानि कि जूता दिमाग में भी चलने लगा। अब तक तो यही सुना था कि जूता लोगों के बीच में चलता है। अब दिमाग में जूता घुसा तो ऐसा घुसा कि जूते के विषय में नये-नये तथ्य सामने आने लगे। यों तथ्यों को नये कहना भी गलत होगा। हैं तो वो बहुत पुराने बहुत आम, पर अब तक दिमाग में नहीं आए। दूकानदार ने तो दार्शनिक मुद्रा में सत्य उद्घाटित किया कि 'जूतों से आदमी की पहचान होती है, आदमी की सबसे पहली नज़र जूतों पर ही पड़ती है। जूतों से आदमी का स्तर नापा जा सकता है। यानि कि जूते स्टैंडर्ड की पहचान होते हैं।  </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/juton.htm</link>
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<title>राधेश्याम का आलेख- विश्व का पहला उपन्यास- गेंजी की कहानी</title>
<description>विश्‍व में सामाजिक उपन्‍यासों के लेखन का इतिहास एक हजार वर्ष पुराना है। इसके पूर्व कहानियाँ एवं कविताओं के माध्‍यम से धार्मिक संदेशों तथा उपदेशों के प्रचार के प्रमाण तो मिलते हैं, लेकिन मानव संघर्ष की घटनाओं का कथात्‍मक संयोजन उपन्यास के रूप में नहीं मिलता। आधुनिक उपन्‍यास लेखन का ऐसा स्‍वरूप भारतीय साहित्‍य में ही नहीं, बल्कि विश्‍व साहित्‍य में भी सिर्फ जापानी साहित्‍य में मिलता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/genji.htm</link>
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<title>अचला दीप्ति कुमार का संस्मरण- मेरा न्यायधीश</title>
<description>हम लोगों के मानस-पथ से न जाने कितने लोग गुज़रते हैं। कुछ लोग हल्के-हल्के कदम उठाते हुये, कुछ ऐसे ढंग से कि उनके पदचिह्ण ढूँढे से भी नहीं मिलते, कुछ क़दम जमा-जमा कर हर पदक्षेप के साथ अपनी पहचान बनाते हुए। डेविड इस दूसरी श्रेणी के लोगों में एक था। आज सालों बाद भी उसकी याद मेरे मन में ताज़ा है और वह अपराधबोध भी जो उसकी याद के साथ अखण्ड रूप से जुड़ा है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2010/mera_nyayadish.htm</link>
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<title>विनीता शुक्ला और दीपिका जोशी से जानकारी- वट सावित्री पर्व </title>
<description>उत्तर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के अनेक भागों में 'वट सावित्री' या 'वट अमावस्या' का पर्व परिवार में सुख और स्त्रियों में सौभाग्य के लिये विशेष रूप से मनाया जाता है। जेठ मास की अमावस्या के दिन मनाए जाने वाले इस पर्व में भारत के राष्ट्रीय वृक्ष बरगद की पूजा एक विशेष आयोजन है जो इसे सीधा प्रकृति चेतना से जोड़ता है। अन्य पर्वों की भाँति व्रत, पूजा और शृंगार के साथ-साथ महिलाओं का मिलजुल कर बैठना इस उत्सव में भी होता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/parva/alekh/2002/vatamavastya.htm</link>
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<title>हृषिकेश सुलभ की कहानी- वसंत के हत्यारे</title>
<description>लगभग तीस घंटे पहले वारदात हुई थी। कल की बात है। कल हुई थी हत्या। सुबह छह बजे। कल भी, आज सुबह जैसी ही ठंड थी। हाड़-हाड़ कँपा देने वाली ठंड। दिसम्बर महीने की शुरुआत में ऐसी ठंड पहले नहीं पड़ती थी। कल सुबह, जब मैं बन-सँवरकर घर से निकला, घना कोहरा था। ओस से गीली हो रही थी धरती। शहर की गंदगी समेटकर बहते नाले के बाँध पर पसरी दूब की नोक से शीत की बूँदें टपक रही थीं। इसी नाले के किनारे, बाँध के उस पार हमारी बस्ती थी। कुछ झुग्गियाँ... कुछ टिन के टप्परों वाले घर, ...और कुछ छोटे-छोटे कमरोंवाले छतदार पक्के मकान थे। अपने घर से निकलकर इसी बाँध की पगडन्डी पर चलते हुए मैं आता। दूसरी ओर के बाँध पर सड़क थी, जिसे एक पतली पुलिया जोड़ती थी। मैं सड़क किनारे इसी पुलिया पर खड़ा होकर सिगरेट सुलगाता और स्कूल बस आ जाती।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/vasant_ke_hatyare/vasant1.htm</link>
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<title>मनोहर पुरी का व्यंग्य- भ्रष्टाचार बिना बिचौलिया</title>
<description>नेता जी ने कनछेदी को लाख समझाने का प्रयास किया कि उन्हें भ्रष्टाचार करने के लिए किसी दलाल की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि वह महात्मा गांधी के अनुयायी होने के कारण अपना काम स्वयं करते हैं। परन्तु कनछेदी था कि मानता ही नहीं था। उसका कहना था कि कहीं भ्रष्टाचार भी बिना बिचौलिये के होता है। महात्मा जी ने कभी किया ही नहीं था इसलिए उनके अनुयायियों को इसका कोई अनुभव हो ही नहीं सकता। यह तो वेश्यावृत्ति की भान्ति हमेशा से दबे मुँदे, चोरी छिपे ही होता है। जैसे वेश्याओं को दल्लों की जरूरत होती है वैसे ही भ्रष्टाचारियों को भी बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/bhrashtachar.htm</link>
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<title>स्वाद और स्वास्थ्य में- सेहत का नगीना पुदीना</title>
<description>पुदीने को गर्मी और बरसात की संजीवनी बूटी कहा गया है, स्वाद, सौन्दर्य और सुगंध का ऐसा संगम बहुत कम पौधों में दखने को मिलता है। पुदीना मेंथा वंश से संबंधित एक बारहमासी, खुशबूदार जड़ी है। इसकी विभिन्न प्रजातियाँ यूरोप, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया मे पाई जाती हैं, साथ ही इसकी कई संकर किस्में भी उपलब्ध हैं। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/ss/2010/pudina.htm</link>
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<title>श्यामाचरण दुबे का साहित्यिक निबंध-
साहित्य का सामाजिक प्रभाव</title>
<description>पिछले दशक में साहित्य की स्वायत्तता की चर्चा बहुत हुई है। एक सीमा तक साहित्य स्वायत्त भी हो सकता है। पर स्वायत्तता को उस सीमा से बाहर ले जायें और कहें कि हम अपना अलग समाज दर्शन विकसित करेंगे, इतिहास विधि विकसित करेंगे। समाजशास्त्र विकसित करेंगे तो कुछ गम्भीर प्रश्न हमारे सामने आते हैं। इतिहास के अध्ययन की जो नई विधा विकसित हो रही है, उसमें लोक साहित्य का बड़ी मात्रा में उपयोग किया जा रहा है। एक जो विवरण का इतिहास था, उससे अलग इतिहास में प्रयोग हो रहे हैं और ऐसे ग्रन्थ मौखिक विवरण पर आधारित होते हैं। 
</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2001/ssp.htm</link>
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<title>देश विदेश से साहित्यिक सांस्कृतिक समाचार</title>
<description> </description>
<link>http://abhivyakti-hindi.blogspot.com/</link>
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<title>पुष्पा तिवारी की कहानी- निर्विकल्प</title>
<description>''सुनिए, आप निशा आन्टी हैं न? अपना नाम सुनकर मैंने पीछे मुड़कर देखा। डाक्टर वर्मा के क्लीनिक को उसने कुछ दिन पहले ही जूनियर डाक्टर के रूप में ज्वाइन किया था। डाक्टर मिसेज वर्मा मेरी फेमिली डाक्टर थीं। मैं उनके क्लीनिक में रूटीन चेकअप के लिये आई थी। 
''हाँ डाक्टर मेरा नाम निशा ही है, लेकिन''
''आप मेरी मम्मी को जानती हैं न? सविता माथुर। वो तो आपकी दोस्त हैं न?''  एक ही साँस में वह यह सब कह गई। मैं समझ नहीं पाई कि उसने मुझसे कोई सवाल पूछा या जवाब दिया।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/nirvikalp/nirvikalp1.htm</link>
</item>

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<title>राजेन्द्र त्यागी का व्यंग्य- राजनीति में पालतू</title>
<description>शहर भर के पालतू सारी रात वार्तालाप में व्यस्त रहे। गली-मुहल्ले में जा-जाकर, घर-घर जा-जाकर। कई जगह तो नुक्कड़ सभाओं जैसा आलम था। शहर स्तब्ध था। एक-दूसरे को फूटी आँख भी न सुहाने वालों के बीच अचानक प्रेम संबंध! स्तब्ध होने के साथ-साथ शहर भयभीत भी था। शहर सोच रहा था कि पालतुओं के मध्य ऐसा प्रेम व्यवहार, ऐसा सौहार्द पूर्ण वार्तालाप पहले, न तो कभी देखा और न सुना! कहीं कोई मुसीबत न खड़ी कर दें। पालतू आने वाले खतरे को भी दूर से भाँप लेते हैं, पालतुओं के मध्य इतनी सक्रियता, कहीं संभावित खतरे के कारण ही तो नहीं! कारण कुछ भी हो, कोई न कोई खतरा तो अवश्य है। यही सोच-सोचकर शहर भयभीत भी था। बावजूद इसके शहर सोया, मगर श्वान निद्रा में! </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/rajniti.htm</link>
</item>


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<title>राकेश कुमार सिन्हा रवि से सुनें- गाथा वटवृक्ष की</title>
<description>मानव जीवन में प्रकृति प्रदत्त अमूल्य वस्तुओं में वृक्ष का महत्त्व अन्यतम है। प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज में प्राकृतिक देवों के अंतर्गत पीपल नीम वट तुलसी व स्थानानुसार कई तरह के अन्य वृक्षों की भी पूजा की जाती रही है और इन्हें पूर्ण देव के रूप में महिमामंडित किया गया है। प्राचीन ग्रंथ इनकी महिमा से भरे पड़े हैं। उनकी पूजा कर सुख और समृद्धि की कामना की जाती है। वृक्षों के विषय में कहा भी गया है कि इनके मूल में ब्रह्मा, छाल में विष्णु शाखाओं में शंकर तथा पत्ते पत्ते पर सब देवताओं का वास होता है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sanskriti/2010/akshayvat.htm</link>
</item>


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<title>आज सिरहाने-- सुरंग में सुबह</title>
<description>अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, अमृत पुरस्कार तथा साहित्य मार्तण्ड सम्मान से सम्मानित मिथिलेश्वर का राजनीतिक उपन्यास सुरंग में सुबह बड़े आकार का उपन्‍यास है। लोकतन्‍त्र विमर्श मुख्‍यत: उसके परवर्ती हिस्‍से में है। आधे से अधिक पृष्‍ठों में राजनीतिक, सामाजिक जीवन के उस यथार्थ को उभारा गया है, जिसकी देन लोकतन्‍त्र का यह संकट है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2010/surang_me_subah.htm</link>
</item>


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<title>भारतेंदु मिश्र के साथ रचना प्रसंग- दोहे की वापसी</title>
<description> समकालीन कविता में नवदोहा अभियान छंद की वापसी का प्रमुख दस्तावेज़ है। जिस प्रकार उर्दू का शायर एक शेर में ही बड़ी से बड़ी बात कह जाता है उसी प्रकार हिंदी में दोहा सूक्ष्मातिसूक्ष्म संवेदना को मुखर करने तथा गूढ़ातिगूढ़ वैचारिक दृष्टि को अभिव्यक्त करने की सामर्थ्य रखता है। दोहा लोकजीवन में रचा-बसा छंद है। संप्रति नये दोहे में आंचलिकता, ग्राम्यता, जनपदीयता के ललित सौंदर्य-बोध व महानगरीय विरूपता की विसंगतियाँ सुंदरतम ढंग से अभिव्यक्त की जा रही हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2005/dohe.htm</link>
</item>


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<title>पावन की कहानी- शिवरतन स्वामी और सुनयना </title>
<description>मैं आनन्द बाग, वाराणसी के श्री सारभूत मठ में रहता हूँ। इस मठ के कर्ता-धर्ता मेरे गुरूजी श्री सदानन्द जी स्वामी हैं। मुख्य व्यक्तियों में गुरूजी के अलावा श्री सजीवानन्द जी स्वामी और श्री तेजोमय जी स्वामी हैं। मैं मठ के विभिन्न कार्यों का संचालन व प्रबन्धन करता हूँ। आज गुरूजी एक विशेष पूजा पर बैठने वाले हैं जो सन्ध्या से आरम्भ होकर भोर तक चलेगी। इस पूजा में अन्य सामग्रियों के अलावा जो विशेष चीज चाहिए, वे हैं कमल पुष्प, डंठल सहित अट्ठारह कमल पुष्प, जिनका प्रबन्ध गुरूजी के एक भक्त द्वारा किया गया है जो लखनऊ में रहता हैं। इस पूजा का सारा प्रबन्ध मेरे जिम्मे है। अभी कुछ देर पहले जो बंडल नन्दन पुष्प विक्रेता ने भेजा है, वह मेरे सामने खुला रखा है... लेकिन आश्चर्य इसमें कमल के फूल नहीं हैं इसमें तो गुलाब की पंखुड़ियाँ हैं और एक संदेश है पत्र के रूप में</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/shivratanswami_aur_sunaina/ss1.htm</link>
</item>


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<title>मयंक सक्सेना का व्यंग्य- यथा राष्ट्र तथा पुष्प</title>
<description>अगर आप यह समझते हैं कि कमल भारत का राष्ट्रीय पुष्प इसलिए है कि यह हमारी सभ्यता और संस्कृति में गहरा पैठा है और हमारे लिए गर्व का विषय है तो आप गलत सड़क पर जा रहे हैं। राष्ट्रीय फूल चुनते समय गर्व और गरिमा तथा सभ्यता व संस्कृति जैसे भारी भरकम शब्दों की आवश्यकता नहीं होती है। उसके लिए देश का चरित्र देखा जाता है। राष्ट्र का चरित्र जिस प्रकार का होता है उसी के आधार पर राष्ट्रीय फूल का चुनाव किया जाता है। आइए अब यह देखें कि कमल के फूल का चरित्र किस प्रकार भारतीय जनता के चरित्र से मिलता जुलता है। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/yatha_rashtra.htm</link>
</item>


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<title>पंकज त्रिवेदी से जानकारी- कमल के पौराणिक उल्लेख</title>
<description>कमल के फूल का सौंदर्य प्रकृति अनुपम उपहार तो है ही भारतीय साहित्य और संस्कृति में भी इसको गहन निष्ठा और भावनात्मक तन्मयता के साथ स्वीकारा गया है। भगवत पुराण जो अट्ठारह पुराणों में से एक है, में सृष्टि के प्रारंभ का एक रोचक वर्णन मिलता है जिसमें कमल के फूल से सृष्टि की उत्पत्ति की कथा कही गई  है। एक बार भगवान विष्णु को विचार आया कि ऐसी दुनिया रचाई जाए जिसमें पृथ्वीलोक पर सभी मनुष्य का जीवन संभव हो। उन्होंने अपनी नाभि में से कमल की उत्पति की और कमल ब्रह्माजी की उत्पति हुई और ब्रह्माजी के द्वारा ही पूर्ण सृष्टि का निर्माण हुआ।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/2010/kamal.htm</link>
</item>


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<title>अर्बुदा ओहरी का आलेख- संस्कृति की साँसों में कमल</title>
<description>दलदल में उगने वाला कमल का फूल विश्व के सबसे आकर्षक फूलों में से एक है। भारत तथा वियतनाम के राष्ट्रीय फूल कमल का वनस्पतिक नाम नेलुम्बो नुसिफेरा है। यह नेलुम्बोनेसी परिवार का सदस्य और पानी में उगने वाला पादप है। अनुकूल परिस्थितियों में कमल के बीज कई वर्षों तक जीवित अवस्था में रह सकते हैं। पुराने दस्तावेज़ों के अनुसार चीन की एक सूखी झील में करीब तेरह सौ साल पुराने बीज से अंकुरण का ज़िक्र भी है।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/prakriti/2010/kamal.htm</link>
</item>


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<title>पूर्णिमा वर्मन के शब्दों में- डाक टिकटों पर काया कमल की</title>
<description> संपूर्ण विश्व की संस्कृति को जिस प्रकार कमल के फूल ने प्रभावित किया है उसको देखते हुए अनेक देशों के डाकटिकटों पर कमल की उपस्थिति स्वाभाविक ही है। भारत और वियतनाम का तो यह राष्ट्रीय पुष्प भी है इसलिए इन दोनो देशों के डाकटिकटों पर कमल का चित्र होना सबसे महत्त्वपूर्ण है। १ जुलाई १९७७ को डाक विभाग द्वारा जारी किए गए ऊपर दिखाए गए २५ पैसे के डाकटिकट को ४ डाकटिकटों के एक सेट के साथ जारी किया गया था। अन्य फूल थे- कदंब, बुरांस और करिहारी। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/gharparivar/tikat_sangrah/kamal/kamal_01.htm</link>
</item>


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<title>राजीव पत्थरिया की कहानी- मरब्बा </title>
<description>पंडित जी सुना है सरकार हमारे इलाके में डैम बनाने जा रही है, घसीटू बोला। ''हाँ कुछ-कुछ ऐसा मैंने भी सुना है। अगर यहाँ डैम बन गया तो हम लोगों के तो दिन फिर गए।`` घसीटू खुशी से अपना कुप्पा सा मुँह फुलाकर बोला।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2010/marabba/marabba1.htm</link>
</item>


<item>
<title>प्रमोद ताम्बट का व्यंग्य- मालामाल करने की चिरौरियाँ</title>
<description>वैसे तो हमारे खानदान में कभी किसी को कोई ईनाम-इकराम नहीं मिला, किसी की कोई लॉटरी नहीं लगी, किसी ने विरसे में हमारे लिए धनदौलत की कोई पोटली नहीं छोड़ी, मगर जबसे मैंने पत्राचार और ब्लॉगिंग के लिए इन्टरनेट का इस्तेमाल तेज़ किया है, दुनिया भर के सैकड़ों दयालु और उदार किस्म के बदमाश मुझे नाना तौर-तरीकों से जबरदस्ती मालामाल कर देने पर तुले हुए हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2010/malamal.htm</link>
</item>


<item>
<title>तिलक परमार का लेख- वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई</title>
<description>यह आश्चर्य की बात है कि वीरांगना लक्ष्मीबाई के जीवन का उज्ज्वलतम अध्याय उनके पति, झाँसी नरेश महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद ही प्रारंभ हुआ। </description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/itihas/2010/lakshmibai.htm</link>
</item>


<item>
<title>ज्योति खरे के साथ पर्यटन- दुर्ग कलिंजर का</title>
<description>कालिंजर बाँदा जनपद का ऐतिहासिक गौरव है। कहा जाता है कि यहाँ शंकर ने कालकूट विष पीकर शांति प्राप्त की। अनेक पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंग जुड़े हैं कालिंजर से। कालिंजर के दुर्ग ने देखे हैं अनेक युद्ध। अनेक आक्रमण झेले हैं उसने।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/paryatan/2010/kalinjar.htm</link>
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<item>
<title>फुलवारी में बच्चों के लिए वनमानुष के विषय में जानकारी, शिशु गीत और शिल्प  </title>
<description> गोरिल्ला, चिम्पैन्ज़ी, बबून और गिब्बन वनमानुष जाति के बंदर हैं। इनकी दुम नहीं होती है और वे मनुष्य की तरह दो पैरों पर शरीर को साध कर चल सकते हैं।</description>
<link>http://www.abhivyakti-hindi.org/phulwari/jaankari/junglekepashu/j_vanmanush.htm</link>
</item>


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