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दिन-भर गली में यही सिलसिला चलता
था। आसपास सभी घरों ने सुअर पाल रखे थे। बस्ती में लोगों के दो
ही धन्धे थे -- सुअर पालना और नाजायज़ शराब निकालना। ये दोनों
चीजें उनके दैनिक आहार में सम्मिलित थीं। बस्ती सांटाक्रुज के
हवाई अड्डे से केवल आधा मील के फासले पर थी, पर पुलिस की आँख
वहाँ नहीं पहुँचती थी। मोनिका का बाप जेकब गली में ही भट्टी
लगाता था। वह गली का सबसे बड़ा पियक्कड़ माना जाता था और अक्सर
पी कर गली में गाता हुआ चक्कर लगाया करता था, 'ओ दॅट आई हैड
विंग्ज ऑफ एंजल्स, हियर टू स्प्रेड एण्ड हैवन वर्ड फ्लाई।'
उस समय वह रोज़ की तरह कुएँ के
मोड़ के पास से लड़खड़ाता आ रहा था। उसके शब्द बचन की समझ के
बाहर थे, परन्तु उसका स्वर उसके हृदय में दहशत पैदा करने के
लिए काफी था, 'ओ दॅट आई हैड विंग्ज ऑफ एन्जल्स, हियर टु
स्प्रेड एण्ड हैवनवर्ड फ्लाई! होई-हो! हो-हो-हो! ओ दॅट आई हैड
विंग्ज ऑफ एन्जल्स...'
उसका चौडा-चौकोर चेहरा वैसे
ही भयानक था, अपने ढीले-ढाले काले सूट में वह और भयानक दिखाई
देता था। चेचक के दागों और झुर्रियों से भरा उसका चेहरा दीमक
खाई लकड़ी की याद दिलाता था। दूर से ही उस आदमी की आवाज सुनकर
बचन का दिल धड़कने लगता था और वह अपना दरवाज़ा बन्द कर लेती
थी। उसने कितनी ही बार बिन्नी से कहा था कि वह उस बस्ती से
मकान बदल ले, पर वह हर बार यह कहकर टाल देता कि बम्बई की ओर
किसी बस्ती में बीस रुपए महिने में उतना अच्छा मकान नहीं मिल
सकता। बचन डर के मारे बिन्नी के आने तक लालटेन की लौ भी
ज़्यादा ऊँची नहीं करती थी। अंधेरा बहुत बोझिल प्रतीत होता था
पर वह मन मार कर बैठी रहती थी।
लालटेन की चिमनी नीचे से आधी
काली हो रही थी। बचन को उसे साफ करने का उत्साह नहीं हुआ।
अंधेरा होने लगा तो उसने जैसे कर्तव्य पूरा करने के लिए उसे
जला दिया और अज्ञात देवता के आगे हाथ जोड़ने की प्रक्रिया पूरी
करके घुटनों पर बाहें रखकर बैठ रही। सामने मोढ़े के नीचे लाली
का कार्ड रखा था। वह उन अक्षरों की बनावट जानती थी, पर हज़ार
आँखें गड़ाकर भी उनका अर्थ नहीं जान सकती थी। बिन्नी के सिवा
हिन्दी की चिठ्ठी पढ़ने वाला वहाँ कोई न था। बिन्नी से चिठ्ठी
पढ़वाकर भी उसे सुख नहीं मिलता था। वह लाली की चिठ्ठी इस तरह
पढ़ कर सुनाता था, जैसे वह उसके बड़े भाई की चिठ्ठी न हो कर
गली से किसी गैर आदमी के नाम आई किसी नावाकिफ़ आदमी की चिठ्ठी
हो। दो मिनट में वह पहली सतर से लेकर आखिरी सतर तक सारी चिठ्ठी
बाँच देता था और फिर उसे कोने में फेंक कर अपनी इधर-उधर की
हाँकने लगता था। हर बार उससे चिठ्ठी सुनकर वह कुढ़ जाती थी, पर
बिन्नी उसे नाराज़ देखता तो तरह-तरह की बातें बनाकर उसे खुश कर
लिया करता था।
उसे खुश होते देर नहीं लगती
थी। बिन्नी इतना बड़ा हो कर भी जब-तब उससे बच्चों की तरह लाड़
करने लगता था। कभी उसकी गोद में सिर रखकर लेट जाता और कभी उसके
घुटनों से गाल सहलाने लगता। ऐसे क्षणों में उसका हृदय पिघल
जाता और वह उसके बालों पर हाथ फेरती हुई उसे छाती से लगा लेती।
''माँ, तेरा छोटा लड़का कपूत है न!'' बिन्नी कहता।
''हाँ-हाँ'' वह हटकने के स्वर में कहती,''तू कपूत है? तू मेरे
चन्ना?'' और वह उसका माथा चूम लेती।
लेकिन अक्सर वह बहुत तंग पड़
जाती थी। अनेक रातें ऐसी गुज़रती थीं जब वह घर आता ही नहीं था।
अंधेरे घर की छत उसे दबाने को आती थी और यह सारी रातें करवटें
बदलती रहती थी। ज़रा आँख झपकने पर बुरे-बुरे सपने दिखाई देने
लगते थे। इसलिए कई बार वह प्रयत्न करके आँखें खुली रखती थी।
और वह आता था तो अपने में ही उलझा हुआ व्यस्त-सा।
वह नहीं समझ पाती थी कि उसे
किस चीज़ की व्यस्तता रहती है। जहाँ तक कमाने का सवाल था, वह
महीने में कठिनता से साठ-सत्तर रुपये घर लाता था। कभी दस रुपये
अधिक ले आता तो साथ ही अपनी पचास माँगें उसके सामने रख
देता,''इस बार माँ, दो कमीज़ें सिल जाएँ और एक बढ़िया-सा जूता
आ जाए'' उसकी बातों से बचन के होठों पर रुखी-सी मुस्कुराहट आ
जाती थी। दस रुपये में उसे घर-भर का सामान चाहिए। और जब वह साठ
से भी कम रुपए लाता, तो महिने भर की बड़ी आसान योजना उसके
सामने प्रस्तुत कर देता, 'दूध-दही का नागा, दाल, प्याज़ खुश्क
फुलके और बस!'
वह जानती थी कि ये रुपए भी वह
टयुशन-वुशन करके ले आता है, वरना सही अर्थ में वह बेकार है।
उसके दिल में बड़े-बड़े मनसूबे अवश्य थे और उनका बखान करते समय
वह छोटा-मोटा भाषण दे डालता था; परन्तु उन मनसूबों को पूरा
करने के लिए जिस दुनिया की ज़रूरत थी, वह दुनिया अभी बननी रहती
थी और वह जोश से उँगलियाँ नचा-नचा कर कहा करता था कि माँ, वह
दुनिया बन जाएगी तो तुझे पता चलेगा कि तेरा नालायक बेटा कितना
लायक है!
'चुप रह खतम रखना!' वह प्रशंसा की दृष्टि से उसे देखती हुई
कहती, 'बडा लायक एक तू ही है।'
'माँ, मेरी लियाकत मेरे पेट में बन्द हैं।' वह हँसता। 'जिस तरह
हिरन के पेट में कस्तूरी बन्द होती है न, उसी तरह। जिस दिन वह
खुल कर सामने आएगी उस दिन तू अचम्भे से देखती रह जाएगी।'
उसे उसकी बातें सुनकर गर्व
होता था। पर कई बार वह बहुत गुम-सुम और बन्द-बन्द सा रहता था,
तो उसे उलझन होने लगती थी। और उसके साथ उसके अजीब-अजीब दोस्त
घर आया करते थे। उन लोगों का शायद कोई ठोर-ठिकाना नहीं था,
क्यों कि वे आते तो दो-दो दिन वहीं पड़े रहते थे और खाने-पीने
में निहायत बेतकल्लुफ़ी से काम लेते थे। चूल्हे से उतरती हुई
रोटी के लिए जब वे आपस में छीना-झपटी करने लगते, तो उसे
आन्तरिक प्रसन्नता का अनुभव होता था। परन्तु प्राय: उसकी दाल
की पतीली खाली हो जाती थी और यह देखकर कि उन लोगों की खाने की
कामना अभी बनी हुई है, उसे घर का अभाव अपना अपराध प्रतीत होता
था। ऐसे समय उसकी आँखों में नमी छा जाती और वह ध्यान बँटाने के
लिए अन्य काम करने लगती। वे लोग रुखी नमकीन रोटियों की फ़रमाइश
करते तो वह चुपचाप बना देती, परन्तु उन्हें खिलाने का उसका
सारा उत्साह समाप्त हो चुका होता।
और उन लोगों के बहस-मुबाहिसे
कभी शान्त नहीं होते थे। वे सब ज़ोर-ज़ोर से बोलते थे और इस
तरह आपस में उलझ जाते थे; जैसे उनकी बहस पर धरती और ईश्वर की
सत्ता का दारोमदार हो। कई बार वे इतने गरम हो जाते थे कि लगता
था, अभी एक-दूसरे को नोंच डालेंगे; मगर सहसा उस उत्तेजना के
बीच से एक कहकहा फूट पड़ता और वे उठ-उठ कर एक-दूसरे से बगलगीर
होने लगते। बिन्नी बचपनमें बहुत खामोश लड़का था। अब उसे इस तरह
हुड़दंग करते देखकर उसे आश्चर्य होता था। कई-कई घण्टे घर में
तूफ़ान मचा रहता था। उसके बाद फिर नीरवता छा जाती, जो बहुत ही
अस्वाभाविक और दम घोटने-वाली प्रतीत होती थी। जब बिन्नी दो-दो
दिन घर नहीं आता, तो उस नीरवता के ओर-छोर गुम हो जाते और वह
अपने को सदा से गहरे शून्य एकान्त में पड़ी हुई महसूस करती।
अंधेरा गहरा होने लगा और
मोनिका का बाप जा कर अपने कमरे में बन्द हो गया, तो उसने
दरवाज़ा खोल दिया। मादा सूअर और उसके बच्चे सामने घर के आहते
में डेरा जमाए थे और एक मोटा सुअर नाली के पास हुंफ्-हुंफ् कर
रहा था। हवा तेज़ हो गई थी और तूत के बुढ्ढे पेड़ की डालियाँ
बुरी तरह हिल रही थीं। आसमान का जो छोर दिखाई देता था, वहाँ
रह-रहकर बिजली चमक जाती थी। दो महिने से प्राय: रोज़ ही वर्षा
हो रही थी। घर से कुएँ तक गली में कीचड़-कीचड़ भरा रहता था।
इस कीचड़ के लिए बचन को
लड़के-लडकियों की उन टोलियों से गिला था, जो वर्षा आरम्भ होने
से पूर्व आधी-आधी रात तक गली में घूमती हुई तार-स्वर में ईश्वर
से पानी बरसाने का अनुरोध किया करती थी। अब जैसे उन्हीं की वजह
से सारा दिन गली में चिपड़-चिपड़ होती रहती थीं।
डयोढ़ी के दरवाज़े पर फिर
दस्तक हुई। इरावती ने दरवाज़ा खोल दिया और बिन्नी उधर से
मुस्कुराता हुआ अन्दर आ गया।
''आगे की तरफ़ बहुत कीचड़ है; भाभी, माफ़ करना,'' कहता हुआ वह
अपने कमरे में आ गया। इरावती ने उस पर एक शिकायत की नज़र डालकर
दरवाज़ा बन्द कर लिया। उसके सिर के बाल बुरी तरह उलझे हुए थे
और कुर्ता पाजामा बहुत मुचड़े हुए थे। यह स्पष्ट था कि वह सुबह
जिस हाल में सो कर उठा था, अभी तक उसी हाल में था और अब तक उसे
मुँह-हाथ धोने का समय भी नहीं मिला था।
''माँ, जल्दी से रोटी डाल दे,
भूख लगी है'' उसने आते ही चारपाई पर पैर फैलाते हुए आदेश दिया।
बचन चुपचाप अपनी जगह पर बैठी रही। न उठी और न ही उसने मुँह से
कुछ कहा। कुछ क्षण प्रतिक्षा करने के बाद बिन्नी ने सिर उठाया
और कहा,''माँ, रोटी!''
''रोटी आजद्दनहीं बनी है,''
बचन बोली,''मुझे क्या पता था कि लाट साहब आज भी घर आएँगे कि
नहीं? रात की रोटी मैंने सबेरे खाई, सबेरे की अब खाई। मैं किस
तरह रोज़-रोज़ बासी रोटी खाती रहूँ? किसी तन्दूर पर जा कर खा
आ''
बिन्नी हँसता हुआ उठ बैठा और
माँ के मोढ़े के पास चला गया।
''यहाँ तंदूर हैं कहाँ, जहाँ
जा कर खा लूँ?'' वह बोला,''मेरे हिस्से की जो बासी रोटी रखी
थी, वह तूने क्यों खाई? मेरी वाली रोटी दे'' और वह माँ का
घुटना पकड़कर बैठ गया।
''मेरे पेट से निकाल ले अपनी
बासी रोटी!'' बचन ने वाक्य आरम्भ किया था मीठी झिड़की के रूप
में, पर समाप्त करते-करते उसकी आँखें गीली हो गई।
बिन्नी ने उसकी गीली आँखें
नहीं देखीं। वह उठ कर रोटी वाले डिब्बे के पास चला गया और
बोला,''डिब्बे में रखी होंगी, ज़रूर होंगी ''
बचन ने उसकी नज़र बचाकर अपनी
आँखें पोंछ लीं। बिन्नी रोटी वाला डिब्बा लिए हुए उसके सामने आ
बैठा। डिब्बे में कटोरा-भर दाल के साथ चार रोटियाँ एक कपड़े
में लपेटकर रखीं थीं। बिन्नी ने जल्दी से एक रोटी तोड़ ली!
''यह तो ताज़ी रोटी है!'' वह
ग्रास मुँह में ठूँसे हुए बोला।
''बाँसी रोटी खाने को माँ जो है!'' कहकर बचन उठ खड़ी हुई।
उसने पानी का गिलास भरकर उसके पास रख दिया। बिन्नी ने एक घूँट
में गटागट गिलास खाली कर दिया और बोला,''और!''
बचन ने गिलास उठा लिया और सुराही से उसमें पानी उंडेलती हुई
बोली,''लाली का कार्ड आया है''
''अच्छा!'' कहकर बिन्नी रोटी
खाता रहा। उसने कार्ड के सम्बन्ध में ज़रा जिज्ञासा प्रकट नहीं
की। बचन का दिल दुख गया। वह गिलास बिन्नी के आगे रखकर बिना एक
शब्द कहे अहाते में चली गई और चारपाई पर दरी डाल कर पड़ गई
उसका दिल उछलकर आँखों में बह आने को हो रहा था, पर वह किसी तरह
चेहरा सख्त करके अपने को रोके रही। थोड़ी देर में बिन्नी जूठे
पानी से हाथ धोकर, मुँह पोंछता हुआ अन्दर आ गया।
''कहाँ है कार्ड?'' उसने पूछा।
''कहीं नहीं है'' बचन ने रूँधे हुए स्वर में कहा और करवट बदल
ली।
''अब बता भी दे न, जल्दी से सब समाचार पढ़ दूँ''
''सो जा, मुझे कोई समाचार नहीं पढ़वाना है''
''पढ़वाने क्यों नहीं हैं, मैं अभी सब सुनाता हूँ,'' कहकर
बिन्नी अन्दर चला गया और कार्ड ढूँढ़कर ले आया। साथ लालटेन भी
उठा लाया।
आधे मिनट में उसने सरसरी नज़र से सारा कार्ड पढ़ डाला।
''भैय्या की तबीयत ठीक नहीं
हैं,'' वह लालटेन जमीन पर रखकर माँ की चारपाई के पैताने बैठ
गया। बचन सहसा उठकर बैठ गई। बिन्नी ने गुन-गुन कर के पहली डेढ़
पंक्ति पढ़ी और फिर से सुनाने लगा। लाली ने लिखा था कि उसका
ब्लडप्रेशर फिर बढ़ गया था, डॉक्टरने उसे आराम करने की सलाह दी
है। कुसुम का स्वास्थ्य अब ठिक है और उसका रंग लाली पर आ रहा
है। उन्होंने मकान बदल लिया है, क्यों कि पहला घर हवादार नहीं
था। और बच्चों को वहाँ से स्कूल जाने में भी दिक्कत होती थी।
अब दीवाली पास आ रही है इसलिए बच्चे माँ को बहुत याद करते हैं।
माँ को गए छ: महिने से ऊपर हो गए हैं, इसलिए सबका दिल माँ के
लिए उदास है।
''इस के बाद सब की नमस्ते
हैं'' कहकर बिन्नी ने कार्ड रख दिया।
''यह नहीं लिखा कि किस डॉक्टर का इलाज चल रहा है?''
''तू जैसे वहाँ के सब डॉक्टरों को जानती है''
बिन्नी ने बात अनायास कह दी थी, पर बचन का हृदय छिल गया। उसके
चेहरे पर फिर कठिनता आ गई।
''मैं कल वहाँ चली जाती हूँ'' उसने कहा।
''तू चली जाएगी तो मैं अकेला कैसे रहूँगा? मेरी रोटी?''
बचन ने वितृष्णा से उसके
चेहरे को देखा, जिसका अर्थ था कि क्या तेरी रोटी उसकी जान से
ज़्यादा प्यारी है?
''तू कौन घर की रोटी पर रहता है,'' मुँह से उसने इतना ही कहा।
''भैय्या का ब्लडप्रेशर कोई नया तो नहीं'' बिन्नी फिर कहने
लगा।
''तू रहने दे, मैं कल जा रहीं हूँ,'' बचन ने उसे बीच में ही
काट दिया। कई क्षण दोनों खामोश रहे। फिर बिन्नी 'अच्छा' कहकर
उठ गया।
अगले दिन सुबह ही वह 'अभी
थोड़ी देर में आऊँगा' कहकर गया और दोपहर तक लौटकर नहीं आया।
बचन का किसी काम में दिल नहीं लग रहा था। फिर भी उसने खाना
बनाया और घर के सभी छोटे-मोटे काम पूरे किए। बिन्नी की
चारों-पाचों कमीज़ें ले कर उनके टूटे हुए बटन लगा दिए। फिर
उसने अपनी दरी और कपड़े एक जगह इकठ्ठे कर लिये। यह निश्चित
नहीं था कि वह उस दिन वहाँ से जा पाएगी या नहीं। बिन्नी सुबह
उसे निश्चित कुछ बता कर नहीं गया था। यह भी सम्भव था कि बिन्नी
के पास किराये के लिए पैसे हों ही नहीं। महिने की उन्नीस तारीख
थी और उन्नीस तारीख को उसके पास कभी पैसे नहीं रहते थे। उस
स्थिति में उसे तीन-चार तारीख तक अपना जाना स्थगित करना होगा।
वह यह भी नहीं जानती थी कि दीवाली कौन तारीख को पड़ेगी। वह
सोचने लगी कि इस बीच लाली की तबीयत ज़्यादा खराब न हो जाए। उसे
ज़्यादा ही तकलीफ़ होगी, जो उसने चिठ्ठी में लिखा है, नहीं वह
चिठ्ठी में कभी न लिखता। यह पंद्रह-बीस दिन यहाँ से न जा सकी
तो?
तभी बिन्नी आ गया। उसके साथ
उसका लम्बे बालों वाला दोस्त शशि भी था, जिसकी गरदन बात करते
हुए तोते की तरह हिलती थी। वह उसकी दाल का सबसे बड़ा प्रशंसक
था। आते ही दाल की फ़रमाइश करता था। सदा की तरह वे गली से ही
उँचे स्वर में बातें करते हुए आए।
''टिकट ले आया हूँ,'' बिन्नी
ने आते ही कहा।''मंगलवाडी से शशि को साथ लिया और वहीं से टिकट
भी ले लिया। परन्तु तू अभी तैयार ही नहीं हुई!''
''तैयार क्या होती? तू मुझसे कहकर गया था?''
''जब रात को तय हो गया था, तो
सुबह कहने की क्या ज़रूरत थी? अब जल्दी तैयार हो जा। दो घंटे
में गाड़ी जाएगी। नकद सवा बीस खर्च करके आया हूँ और वे भी उधार
के'' बचन को बुरा लगा कि वह बाहर के आदमी के सामने ऐसी बात कह
रहा है। |