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वह
नहीं जानती थी कि टिकट के लिए उसे रुपए उधार लेने पड़े होंगे।
वह कब चाहती थी कि उसकी वजह से उस पर उधार चढ़े। वह कह देता तो
वह बारह-चौदह दिन बाद चली जाती।
वह कुछ न कहकर कपड़े लपेटने लगी।
''हट माँ, तुझे बिस्तर बाँधना आता भी है?'' बिन्नी आगे बढ़
आया।
''उल्टी-सीधी रस्सी बाँधेगी, कहीं से मोटा कर देगी, कहीं से
पतली। हट जा, मैं एक मिनट में बाँध देता हूँ। ऐसा बिस्तर
बँधेगा कि रास्ता-भर तेरा खोलने को भी जी नहीं चाहेगा''
''तू रोटी खा ले, मैं बाँध लेती हूँ,'' बचन की आँखें भर आई।
''रोटी खानेवाला आदमी साथ
लाया हूँ,'' वह माँ के लपेटे हुए कपड़ों को फिरसे फैलाता हुआ
बोला,''यह इसलिए आया है कि तू चली जाएगी तो तेरे हाथ की दाल
फिर कहाँ मिलेगी?''
बचन की गीली आँखों में हल्की-सी मुस्कुराहट भर गई।
''यह भी खा ले,''वह बोली,''मैं अभी दो फुलके और बना देती हूँ''
''और बनाने की ज़रूरत नहीं। जो है वही खा लेंगे''
''पहले मैं खा लूँ, फिर बचें वो इसे दे देना'' कहकर शशि गरदन
उठाकर हँस दिया। बिन्नी बिस्तर बाँधता रहा। वह उन दोनों के लिए
रोटी डाल लाई।
''तैयार!'' बिन्नी ने हाथ
झाड़े और शशि के साथ खाना खाने डट गया।
''माँ अपने लिए रख लेना और जितना बचे वह हमें ला देना''
शशि दाल सुडकता हुआ बोला। वे दोनों खा चुके तो बचन ने जल्दी से
बरतन समेट दिए।
''अब माँ, तू भी जल्दी से खा ले,'' बिन्नी ने कुल्ला करके हाथ
पोंछते हुए कहा।
''मैंने खा लिया है''
''कब?'' किसी ने पास जाकर उसके कन्धे पकड़ लिए।
''तेरे आने से पहले''
''झूठी!''
''सच मैंने खा लिया है''
''आगे तो कभी इतनी जल्दी नही खाती''
''आज खा लिया है। घर से जाना था न। तुम दोनों तो भूखे नहीं
रहे?''
''एक चौथाई भूखे रह गए'' शशि ने डकार लेकर तौलिये से मुँह
पोंछा और खूँटी पर टाँग कर हँसने लगा।
स्टेशन पर उसे गाड़ी में
बिठाकर वे दोनों प्लेटफार्म पर टहलने लगे। रात को भी बचन ने
ठीक से नहीं खाया था, इसलिए भूख के मारे उसका सिर चकरा रहा था।
वह जानती थी कि बिन्नी को पता है उसने कुछ नहीं खाया। इसलिए
उसके मना करने पर भी वह आधा दर्जन केले रख गया था। वह एक बार
मना कर चुकी थी, इसलिए नहीं खा रही थी। मगर बिन्नी और शशि
टहलते हुए दूर चले गए थे और शायद अब भी उनमें बहस जारी थी।
उसकी समझ में नहीं आता था कि ये लोग कोई इतनी बहस क्यों करते
हैं! हर वक्त बहस, बहस, बहस! बहस का कोई अन्त भी होता है। जैसे
सारी दुनिया के झगड़े उन्हीं को निपटाने हों। फटे हाल रहेंगे,
सेहत का जरा ध्यान नहीं रखेंगे और बातें, जैसे संसार की
सम्पत्ति के यही स्वामी हों और उसे बाँटने की समस्या इन्हीं के
सिर पर आ पड़ी हो।
वे दोनों प्लेटफार्म के उस
सिरे तक हो कर वापस आ रहे थे। वह उनके चेहरे देख रही थी।
माथे पर सलवटें डालें वे हाथ हिला-हिला कर बातें कर रहे थे,
फिर भी बच्चे-से दीखते थे। उस समय शायद वे यह भी भूल गए थे कि
वे उसे गाड़ी पर चढ़ाने आए हैं। सहसा गार्ड की सीटी सुन कर वे
उसके डिब्बे के पास आ गए परन्तु वहाँ आ कर भी उनकी बहस चलती
रही -- करघे का काम रूक जाएगा तो लाखों आदमी बेकार हो जाएँगे
और जैसे कोमल रोएं हाथ के कपड़े के होते हैं, वैसे मशीनी कपड़े
नहीं हो सकते!
बचन सोचने लगी कि ये लोग कभी
अपने कपड़े क्यों नहीं देखते? इन्हें अपनी बेकारी की चिन्ता
क्यों नहीं होती?
गाड़ी चलने लगी तो जैसे बिन्नी को होश हुआ और उसने उसका हाथ
पकड़ कर कहा,''अच्छा माँ!''
बचन के होठों पर रूखी-सी मुस्कुराहट आ गई। उसने उसके सिर पर
हाथ फेर दिया।
''अब कब आएगी?''
''जब तू बुलाएगा''
गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली। वह देर तक खिड़की से सिर निकाल कर
उन्हें देखती रही। वे हाथ-में-हाथ डाले गेट की ओर जा रहे थे।
उनकी बहस शायद अब भी चल रही थी।
बचन को घर आए पन्द्रह दिन हो
गए थे।''बिन्नी की चिठ्ठी नहीं आई?'' उसने लाली के कमरे के
बाहर रुक कर पूछा। लाली से सवाल पूछने में उसके स्वर में
शासित-का सा भाव आ जाता था। वह बेटा बड़ा होते-होते इतना बड़ा
हो गया था कि वह अपने को उससे छोटी महसूस करने लगी थी।
''आ जा माँ,'' लाली ने
काग़ज़ों से आँखे उठा कर कहा।
''चिठ्ठी उसकी आज भी नहीं आई। न जाने इस लड़के को क्या हो गया
है?''
''तू काम कर, मैं जा रही हूँ,'' वह बोली।''सिर्फ़ चिठ्ठी पूछने
ही आई थी''
वह बरामदे से हो कर अपने कमरे
में आ गई। वह जानती थी कि लाली का समय कीमती है। वह आधी-आधी
रात तक बैठ कर दूसरे दिन का केस तैयार करता है। मुवक्किलों की
वजह से उसका खाने-पीने का भी समय निश्चित नहीं रहता। छ: महीने
में उसकी व्यस्तता पहले से कहीं बढ़ गई थी। नए घर में आ जाने
से जगह का आराम अवश्य हो गया था, पर कचहरी पहले से भी दूर हो
गई थी। उसकी व्यस्तता के कारण वह कई बार सारा-सारा दिन उससे
बात नहीं कर पाती थी। रात को जब वह बैठक से उठ कर जाता, तो
सीधा सोने के कमरे में चला जाता। दिन-भर की थकान के बाद वह
उसके आराम में विघ्न नहीं डालना चाहती थी। सबेरे वह कुसुम से
पूछ लेता कि रात को उसकी तबीयत कैसी रही है? कुसुम संक्षेप में
उसे हाल बता देती।
''सोने से पहले उसके सिर में बादामरोगन डाल दिया करो,'' वह
कहती।
''मैं कई बार कहती हूँ, पर वे डलवाते ही नहीं,'' कुसुम जैसे
रटा-रटाया उत्तर देती।
''मुझे बुला लिया करो, मैं आ कर डाल दूंगी''
''डालने को नौकर है मगर वे डलवाते ही नहीं''
वह जानती थी कि सिर में
बादामरोगन डलवाने के लिए लाली को किस तरह मनाया जा सकता है।
मगर कुसुम अपने को अधिक अन्तरंग समझती थी। और उसके सुझावों से
सहमति प्रकट करती हुई भी करती वही थी जो उसके मन में होता था।
वह जिस शिष्टता और कोमलता से बात करती थी उससे बचन को लगता था
कि वह उस घर में केवल मेहमान है। दिनभर उसके करने के लिए वहाँ
कोई काम नहीं होता था। खाना बनाने के लिए एक नोकर था और उपर का
काम करने के लिए दूसरा। उसके काम की देखभाल के लिए कुसुम थी।
जब भी बचन कोई काम करने के लिए कहती तो कुसुम नौकर का ज़िक्र
कर देती -- नोकर के रहते अपने हाथ से काम करने की क्या ज़रूरत
है? यही बात लाली भी कह देता है --''माँ, तू काम करेगी तो घर
में दो-दो नौकर किस लिए हैं?''
बचन सोचती थी कि काम करने के
लिए नोकर है और देखभाल के लिए कुसुम है, फिर घर में उसका होना
किस लिए है? सबेरे पाँच बजे से रात के दस बजे तक वह क्या करे?
पन्द्रह दिन पहले वह आई ही थी, तो बच्चे उसके गिर्द हुए रहते
थे। उन्हें दादी से हज़ारों बातें कहनी और शिकायतें करनी थीं।
मगर चार दिन में ही उनके लिए उसकी नवीनता समाप्त हो गई थी।
उनकी अपनी छोटी-छोटी व्यस्तताएँ थी, जिनमें उनका समय बँटा हुआ
था।
कुमुद कभी-कभी ज़रूर उसके पास
आ जाती थी और उसके कमरे में खामोश खेलती रहती थी। उसे दादी
शायद इसलिए अच्छी लगती थी कि माँ दोनो भाइयों से अधिक स्नेह
करती थी।
बचन कमरे में आ कर चारपाई पर
लेट गई। मन ताने-बाने बुनने लगा। बिन्नी ने अभी तक चिठ्ठी
क्यों नहीं लिखी? अंधेरे घर में इस समय वह अकेला सोया होगा।
रोटी का जाने उसने क्या डौल किया है? उसने चलते समय उससे पूछा
तक नहीं कि वह पीछे कैसे रहेगा, कहाँ रोटी खाएगा? उसके रहते वह
तन-बदन की होश भूला रहता था, अब जाने उसकी क्या हालत होगी?
चिठ्ठी ही लिख देता तो कुछ तसल्ली हो जाती। मगर उसे चिठ्ठी
लिखने की होश आएगी?
कमरे में खिड़की खुली थी और
दूर तक खुला आकाश दिखाई देते हुए उन नक्षत्रों के विन्यास से
वह परिचित थी। वही नक्षत्र, वह बम्बई की उस मनहूस बस्ती में
ऊपर भी झिलमिलते देखा करती थी। यहाँ से वे उसे तिरछे कोण से
दिखाई देते थे, वहाँ वह अहाते में लेटकर उन्हें ठीक अपने ऊपर
देखा करती थी। उसी तरह लेटे हुए वह बिन्नी की आहट की प्रतीक्षा
करती थी। हुंफ्-हुंफ् की ध्वनियाँ पास आती और दूर चली जाती
थीं। फिर दूर से फटे हुए गले की बेहूदा आवाज सुनाई देने लगती
थी, 'ओ डैडाई है डि्वजो फेंजल।' उस आवाज़ से वह कितना घृणा
करती थी! यहाँ इस एकान्त बंगले में आसपास मे कोई आवाज़ नहीं
आती थी। नौ-साढ़े नौ बजे बच्चों के सो जाने के बाद निस्तब्धता
छा जाती थी। केवल रंगीलाल के बरतन मलने या चौका धोने की ही
आवाज़ सुनाई देती थी।
उसने करवट बदल ली कि किसी तरह
नींद आ जाए! नींद न आना रोज की बात हो गई थी। कहाँ दस बजे से
ही उसकी आँखों में नींद भर जाती थी और कहाँ अब वह ग्यारह, बारह
और एक के घण्टे गिनती रहती थी। 'जाने क्यों?' वह सोचती रह
जाती।
रात को वह देर से सोई मगर
सुबह जल्दी उठ गई। उठने पर उसका हृदय रात से अधिक अस्थिर और
अशान्त था। इतना बड़ा पहाड़-सा दिन और उसके बाद फिर वैसी ही
रात! लम्बी निष्क्रियता की कल्पना से एक बड़ा शून्य उसके अन्तर
को घेरे था। आकाश में चिडियों के गिरोह उड़ रहे थे। रसोईघर में
रंगी स्टोव में हवा भर रहा था। उसे साहब के लिए बिस्तर पर चाय
पहुँचानी थी। बम्बई में सुबह जब वह कमरे में बाल्टी रखकर नहा
रही होती, तो बिन्नी बाहर से चाय की माँग करने लगता था। उससे
उसके भजन में बाधा पड़ती थी और उसे उलझन होती थी, पर वह चुपचाप
उसके लिए चाय बना देती थी। परन्तु आज उसे इस बात की उलझन हो
रही थी कि उसका भजन में मन क्यों नहीं लगता? अब जब कि भजन के
लिए पूरा अवकाश था, उसकी प्रवृत्ति उसकी ओर क्यों नहीं होती
थी?
वह कुछ देर बरामदे में खड़ी
हो कर सूर्योदय के स्वर्णिम रंग को देखती रही। क्षितिज के एक
कोने से दूसरे कोने तक झिलमिलाती हुई स्वर्णिम आभा धीरे-धीरे
बिखर रही थी। लगता था, जैसे गोलक में बन्द उजाला फूटकर बाहर
निकलने के लिए संघर्ष कर रहा हो। उजाले की बढ़ती हुई झलक से हर
क्षण ऐसी प्रतीति होती थी। उसने बरामदे से उतर कर पूजा के लिए
गेंदे के कुछ फूल चुन लिए और रसोईघर में चली गई।
रंगी स्टोव से केतली उतार कर
चायदानी में पानी डाल रहा था। उसने अपने आँचल के फूल आले में
डाल दिए। रंगी ट्रे उठा कर चलने लगा, तो उसने ट्रे उसके हाथ से
ले ली।
''रहने दे, मैं ले जाती हूँ'' और वह ट्रे लिए हुए लाली के कमरे
की ओर चल दी।
''माँ जी, आप न ले जाइए, साहब मुझपर नाराज होंगे।'' रंगी ने
पीछे से संकोच के साथ कहा।
''इसमें नाराज़ होने की क्या बात? मैं तेरे कहने से थोड़े ही
ले जा रही हूँ?'' और वह थोड़ी खांस कर लाली के कमरे में चली
गई।
लाली कम्बल ओढ़कर बिस्तर पर
बैठा था। कुसुम सोई हुई थी।
लाली के हाथ में कुछ कागज थे, जिन्हें वह ध्यान से पढ़ रहा था।
उसने यह लक्षित नहीं किया कि चाय ले कर माँ आई है। बचन ने ट्रे
मेज पर रख प्याली में चाय बनाई और उसके पास ले गई। लाली ने चाय
के लिए हाथ बढ़ाया तो देखा कि प्याली लिए माँ खड़ी है।
''माँ, तू?'' उसने आश्चर्य के
साथ कहा।
बचन ने प्याली उसके हाथ में दे दी। उसने पहली बार लक्षित किया
कि लाली के बाल कनपटियों के पास से सफेद हो गए हैं। चश्मा उतार
देने से उसकी आँखों के नीचे गहरे गड्ढ़े नज़र आ रहे थे। लाली
ने कागज रख कर चश्मा लगा लिया।
''रंगी और नारायण क्या कर रहे हैं?'' उसने पूछा।
''नारायण दूध लाने गया है,'' वह बोली, ''रंगी रसोईघर में
हैं।''
''तो उससे नहीं आया जाता था? तू सुबह-सुबह उठकर चाय लाए, वाह
इससे अच्छा है मैं आप ही बनाकर पी लूँ।''
''तू बनाकर पी लेगा, जिसे यह
नहीं पता कि दूध कौन-सा है और चीनी कौन-सी!'' वह थोड़ा हँस दी।
तभी कुसुम करवट बदल कर उठ बैठी।
''माँ जी, आप?'' उसने भी आँख मलते हुए उसी आश्चर्य के साथ कहा।
फिर झट से कम्बल उतार कर वह बिस्तर से निकल आई।
''आप रहने दीजिए माँजी, मैं बनाती हूँ।''
कुसुम दूसरी प्याली में चाय बनाने लगी। बनाकर प्याली उसने बचन
की ओर बढ़ा दी।
''मैं अभी नहाई नहीं। अभी से चाय पी लूँ?''
''पी भी ले माँ!'' लाली बोला,''कभी तो धरम-करम को छोड़ दिया
कर।''
''नहीं, मैं ऐसे नहीं पीती। तुम्हीं लोग पियो।''
कुसुम प्याली लेकर अपने
बिस्तर पर चली गई। बचन लाली के पैताने बैठ गई। लाली और कुसुम
खामोश चाय पीते रहे!
कमरे में हर चीज़ व्यवस्थित ढंग से रखी थी। अंगीठी पर नीले रंग
का कपड़ा बिछा था, जिस पर कुसुम ने सफ़ेद डोरे से कढ़ाई की थी।
वही एक ओर अखरोट की लकड़ी का बना गौतम बुद्ध का बस्ट पड़ा था
और दूसरी ओर हाथी-दाँत की हंसों की जोड़ी रखी थी। सन्दूकों पर
गद्दे बिछाकर उन्हें लाल कपड़े से ढँक दिया गया था। कोने में
कुसुम की सिलाई की मशीन पड़ी थी और वहाँ पास ही लाली की अधसिली
कमीज़ के टुकड़े बँधे रखे थे। मेज पर छोटे-से शेल्फ़ में लाली
की किताबें पड़ी थीं और पास ही टेबल-लैंप रखा था। दूसरे कमरे
में खुलने वाले दरवाज़े के पर्दे पर भी कुसुम ने अपने हाथ से
कढ़ाई कर रखी थी। उधर से करवटें बदलने की आवाज़ आ रही थी।
बच्चों की भी नींद खुल गई थी।
''लाली ने चाय पीकर प्याली
मेज पर रख दी। कुसुम अर्थपूर्ण दृष्टि से उसके चेहरे को देख
रही थी। बचन उठ खड़ी हुई।
''चल दी माँ?'' कहते-कहते लाली ने काग़ज़ उठा लिए।
''हाँ, तू अपना काम कर। मैं जा कर नहा-धो लूँ।''
''कोई ख़ास बात तो नहीं थी?''
''नहीं, कोई खास बात तो नहीं थी। नौकर चाय ला रहा था, मैंने
कहा, मैं ले जाती हूँ।''
लाली की आँखें काग़ज़ों पर झुक गई। कुसुम चाय के हलके-हलके
घूँट भर रही थी। बचन चलने के लिए उद्यत हो कर भी खड़ी रही।
''एक बात सोचती हूँ'' वह कहने लगी।
लाली ने काग़ज़ फिर से रख दिए।
''हाँ-हाँ।''
''इतने दिन हो गए, बिन्नी की चिठ्ठी नहीं आई।''
''मैं अब उससे कोई गिला नहीं करता,'' लाली चिढ़े हुए स्वर में
बोला।'' गफ़लत की भी हद् होती है। इस लड़के का घरवालों से जैसे
कोई रिश्ता-नाता ही नहीं है।''
बचन चुप रही।
''यहाँ रहकर बी.ए. कर लेता तो
कुछ बन-बना जाता। अब साहब ज़िन्दगी भर आवारागर्दी करेंगे।''
बचन की आँखें भर आई। उसने चेष्टा की कि आँसू आँखों में ही रुक
जाएँ पर यह सम्भव नहीं हुआ तो उसने पल्ले से आँखें पोंछ ली।
''यह लड़का न जाने कब अपना होश रखना सीखेगा। अपनी जान की भी तो
फिक्र नहीं करता। वहाँ रहकर मैं ही जो थोड़ा-बहुत देख लेती थी,
सो देख लेती थी। कभी-कभी सोचती हूँ कि मैं वहाँ उसके पास ही
रहूँ तो ठीक है।'' और वह निर्णय सुनने के ढंग से लाली की ओर
देखने लगी। लाली गम्भीर हो गया, बोला नहीं।
''मैं कहती हूँ मेरी आँखों के
सामने रहेगा तो मुझे पता तो चलता रहेगा कि क्या करता है, क्या
नहीं करता।'' उसके स्वर में थोड़ी याचना भी आ गई।
''माँ जी का यहाँ दिल नहीं लगा।'' कुसुम ने प्याली रखते हुए
कहा। पलभर लाली की आँखें उससे मिली रहीं।
''अभी तो माँ तू आई ही है,'' वह बोला,''दस-पंद्रह रोज़ में
दीवाली है।''
''मेरा बच्चों को छोड़ कर जाने को मन करता है क्या? मैं वैसे
ही बात कर रही थी।'' वह फिर से चलने के लिए तैयार हो कर बोली,
''पता नहीं रोटी भी ठीक से खाता है या नहीं।''
कुसुम उठ कर रंगी को आवाज़ देती हुई बाहर चली गई।
''तू जाना चाहे तो और बात है।'' लाली के चेहरे पर कुछ
अन्यमनस्कता आ गई।
''जाने की बात नहीं है, मैं तो वैसे ही सोचती थी।''
''जाना है, चली जा। नहीं खामखाह चिन्ता से परेशान रहेगी।''
बचन कुछ क्षण खामोश रही। लाली
अपनी उँगलियाँ मसलता रहा।
''किस गाड़ी से चली जाऊँ?''
''रात की गाड़ी ठीक रहती है। उसमें भीड़ कम होती है।''
''तेरी तबीयत की चिन्ता रहेगी।''
''मेरी तबीयत ठीक ही है।''
''तू चिठ्ठी लिखता रहेगा न?''
''हाँ, मैं नहीं लिखूँगा तो कुसुम लिख देगी।''
''अच्छा!''
रात की गाड़ी में उसे अच्छी
जगह मिल गई। जनाने डिब्बे में उसके अतिरिक्त दो ही सवारियाँ
थीं। कुसुम नारायण को ले कर उसे छोड़ने के लिए आई थी। लाली
मुवक्किलों की वजह से नहीं आ पाया था। कुसुम गाड़ी चलने तक
उसके पास बैठ कर बातें करती रही कि दादी के पीछे बच्चे फिर
उदास हो जाएँगे, तीन चार दिन घर सूना-सूना लगेगा और कहा कि
रास्ते के लिए खाना बनवाकर ले जाती तो अच्छा था। गाड़ी ने सीटी
दी तो कुसुम प्लेटफार्म पर उतर गई।
''जाते ही चिठ्ठी लिखिएगा,'' उसने कहा।
''तुम लाली की तबीयत का पता देती रहना,'' बचन ने कहा।
सहसा उसे लाली के सफ़ेद बालों का ध्यान हो आया।
''रात को उसे देर-देर तक न पढ़ने देना और उससे कहना कि सिर में
बादामरोगन डलवा लिया करे।''
कुसुम ने सिर हिला दिया। गाड़ी चल दी तो उसने हाथ जोड़ दिए।
प्लेटफार्म पीछे रह गया तो
बचन आकाश की ओर देखने लगी। उसके अन्तर में फिर एक शून्य-सा
भरने लगा। क्षितिज के पास वही नक्षत्र चमक रहे थे। बचन अपलक
दृष्टि से उन्हें देखती रही। वह जहाँ जा रही थी उस घर का नक्शा
धीरे-धीरे उसकी आँखों के आगे घूमने लगा। नीची छत वाला वह
टूटा-फूटा कमरा, मादा सुअर और उसके बच्चों की हुंफ्-हुंफ् और
कुएँ की तरफ़ से आती हुई मोटी, भद्दी फटी हुई आवाज़ -- ओ डैडाई
है डिवंजो - फ़ेंसल, अंधेरा, एकान्त, बिन्नी, शशि और उसके
दोस्त, बहसें और दाल रोटी के लिए उन लोगों की छीना-झपटी।
उसकी आँखें भर आई। क्षितिज के पास चमकते हुए नक्षत्र धुंधले
पड़ गए।
उसने आँखें पोंछ लीं। नक्षत्र फिर चमकने लगे। |