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साधू स्त्री ने दाँत पीसे, सब काम हमारे मत्थे डाला हुआ है। इनको तो चिलम चढ़ाकर गरमी आ जाती है, हमारा पूरा मरन है यहाँ। हम तो टेन्ट नं० ६ में हैं। रात में बालू की ठंडक से हड्डी, हड्डी जम गई है। घर से दूर आकर मिट्टी खराब किया हमने। पता चला ये स्त्रियाँ सारा दिन सेवा में लगी रहती हैं। इनकी दिनचर्या जो प्रयाग मे है वही हरिद्वार में, वही ऋषिकेष में। तारा डूबने से पहले स्नान करती हैं। स्वामी जी देर से उठते हैं। उनके उठने तक पूरे आश्रम की सफाइयाँ, हवन की तैयारियाँ, दूध चाय का इन्तजाम।

'कितना दूध पी लेते हैं स्वामी जी?' चारू ने शरारत से पूछा।
'पाँच सेर। एक बार में सेर पक्का पीते हैं।'
'कहां से आता है?'
'भगत लोग दे जाते हैं।'
'रोज?'
'किसी दिन कम आए तो राम घाट पे घोसी है।'
'बाजार की तरफ घूमी हो बडी रौनक है?'
'नहीं सेवा से फुर्सत नहीं।'
'रामलीला देखी? मुरारी बाबू का प्रवचन सुना?'
'नहीं सेवा जो करनी हुई।'
'इतनी सेवा करनी पडे तो शादी क्या बुरी थी?' चारू ने कहा।
'आदमी किसी काम का होता तो यहां क्यो आती?'
'पति-सेवा और संत सेवा में कोई फर्क दिखता है?'
'बिल्कुल। स्वामीजी कभी हाथ नहीं उठाते, मीठा बोलते हैं। आदमी बात-बात पर लडता था। कौन जनम भर मार खाता। यहां चैन है।'
'घर कब छोडा?'
'ग्यारह साल पहले।' तभी अन्दर से स्वामी जी की आवाज आई 'प्रेमदासी।'
कंपकपाती ठंड के बावजूद मेला क्षेत्र में ठंड कुछ कम लगती थी। इतने इंसानों की एक दूसरे से निकटता, उनकी सांसो की गर्मी और असंख्य बल्बों की रोशन-गर्माहट।

इस बीच शिविर में एक भव्य सी युवती आई स्वामी मौन सुन्दरी। उसने ३१ साल की ही उम्र में संसार से विरक्त हो कर सन्यास ले लिया। लेकिन अभी वह पूरी तरह से सम्प्रदाय में समायी नहीं है। बीच-बीच में विदेश चली जाती है। उसका गेटअप प्रभावशाली था। नौ मीटर का गेरुए पालियेस्टर का गाउन देखने में ड्रेसिंग गाउन ज्यादा लग रहा था। बालों में लाल मेंहदी। होंठों पर नेचूरल शाइन कलर। नाम के विपरीत वह मुखर सुन्दरी निकली। चारू से बहुत जल्द खुल गई। उसके बोलने का अंदाज बडा आकर्षक था हालांकि बातों में परिपक्वता की कमी। आपका ध्यान जरा भी भटका कि वह कहती 'यू आर नॉट वाइब्रेटिंग विद मी।'

उसने बताया 'आय एम स्टिल सर्चिंग ए परफेक्ट गुरू। आय हैवन्ट फाउंड।'
'आप अपना समय नष्ट कर रही हैं।' चारू ने कहा। उसे अफसोस हो रहा था कि इतनी अच्छी महिला एक व्यर्थ तलाश में तल्लीन है। इसे तो जिन्दगी के बीचोंबीच होना चाहिए।'
मौन सुन्दरी ने कहा 'कल मौनी अमावस्या है। हम सब को मौन रहना है। आज सारी रात मैं बोलूँगी। तुम सुनोगी।'
'एज लांग एज आय वाइब्रेट।'
'अच्छे हैं, पर अहंकारी।'
'इससे पहले कहाँ थी?'

'स्वामी रामानन्द की साथ। वे भी अच्छे थे पर उन्हें भी देह की दानवी भूख थी। टेल यू। एक रात मैं उन्हें जे कृष्णमूर्ति की फिलासफी समझा रही थी। मुश्किल से नौ बजे थे। उन्होंने मेरे चोंगे में हाथ डाल दिया। बाय गॉड। मैने प्रोटेस्ट किया तो बोले 'कौन देखेगा। किसी को पता नहीं चलेगा।'

मैंने उन्हें बदनामी का डर दिलाया। वे हंसे, 'कैम्प में सब बुढिया भक्तिन हैं, खा पी कर सोई हैं।' मै विरक्त हो गई 'मेरा शरीर मेरा है, मै इसका बदइस्तेमाल नहीं होने दूँगी।'
'क्या फर्क पडता है, जब तुम कुंवारी नहीं हो' कह कर वे मुझ पर हावी हो गए।'
'उस अनुभव के बाद तो मैं सिनिक हो गई। कनखल में उन्हें ढूंढती मैं गाती रहती 'कहाँ गिराई चढ्डी मैंने, कहाँ गिराई चोली मैं तो राम नाम मय होली।'
चारू विस्मित श्रोता बनी रही, स्वामी मौन सुन्दरी ने कहा, 'जानती हो, एक मिनट को यहाँ बत्ती चली जाती है तो कितने बलात्कार हो जाते हैं इस बीच।'
'यू आर ऑब्सेड' चारू ने कहा। उसे यह मौन नहीं मुखर सुन्दरी लगी।
'यू आर कैलस' स्वामी मौन सुन्दरी ने कहा।

मौनी अमावस्या पर भीड उमड़ी और घटाएं घुमड़ीं। आठ बजते तक बारिश शुरू हो गई। जो बारिश से पहले नहा लिए, वे तो सकुशल अपने कैम्प लौट आए। मुश्किल बाद में जाने वालों की हुई। चारू सुबह कैम्प के नल पर नहा ली। वह भी गंगा जल ही था आखिर। पर तट घूमने का मोह व नहीं छोड सकी। एक की जगह दो-दो शॉल बदन पर लपेट कर वह जाने लगी तो चरनी मासी ने टोका, 'इकल्ली कहाँ जा रही है, गँवा जाएगी।'
'मैं सुई नहीं मासी।'
'मैं चलां नाल।'
'ना बाबा, आपसे चला जाता नहीं, गिर जाएँगी।'
मौन सुन्दरी ने साटन की रजाई से अपना सिल्की चेहरा निकाला, 'मैं चलती हूँ ठहरो।'

उसने झटपट गाउन पहना, लम्बे बालों की उँची नॉट बनाई, गेरुए रंग की चप्पलें पैर में डाली और तैयार हो गई। सन्यास में भी वह विन्यास के प्रति सचेत थी।

भक्तों के उमडते रेले देख कर वह प्रफुल्ल हो गई, 'देखो चारू मैं इस प्रोफेशन को क्यों पसंद करती हूँ। इस करोड की भीड़ में अगर पांच लाख भी मेरे अनुयायी बन जायं तो मैं दूसरी रजनीश मानी जाऊँ। है इतनी सम्भावना और किसी पेशे में ?'
'अध्यात्म को पेशे के रूप में लेना गलत है।' चारू ने आहत हो कर कहा, 'यह तो अन्दर की आस्था से विकसित होने वाली वैचारिक, आत्मिक सामर्थ्य है।'
'शिट, इट्स ए प्रोफेशन। तुम यहाँ रहती हो और तुम्हें खबर ही नहीं। यह इस समय मिलियन डॉलर प्रोफेशन है।'

ज्यादा बात करना सम्भव नहीं था। भीड़ उन्हें कभी आगे तो कभी बगल में धकेल रही थी। लोग जैसे एक धुन में बढ़े चले जा रहे थे।

रास्ते में पुलिस के पथ-प्रदर्शकों की मदद से वे काफी आगे सही दिशा में पहुँच गई। अद्भुत दृश्य उपस्थित था, एक पसारा-स्नान- ध्यान- अर्पण- तर्पण- दान- पुण्य का। एक नाववाले से पूछा। उसने किराया बताया पन्द्रह रुपये सवारी। चारू ने कहा, 'नगरपालिका ने तो तीन रुपये सवारी रेट बनाया है।'

'तीन रुपये तो सिपाही ले लेते हैं।' नाव वाले ने कहा।

नाव यात्रियों से खचाखच भरी थी। वे दोनों भी सवार हो गईं। बारिश अब भी हो रही थी। एक तरह से सबका स्नान हो रहा था फिर भी संगम की धारा का स्पर्श पाने को आतुर थे स्नानार्थी।

नहा कर गीले कपडों में ही सब नाव पर सवार हो गईं। सबने अपनी गंगाजली भी संगम जल से भर ली। कृशकाय मल्लाह पूरी ताकत से नाव खे रहा था लेकिन नाव का संतुलन गड़बड़ा रहा था।

उन्होंने देखा स्त्रियाँ मौन भाव से बैठी थी, सबकी मुख मुद्रा शान्त, अविचलित।

अभी तट दूर ही था कि नाव एक ओर बिल्कुल ही झुक आई। लगा कि जल समाधि मिलने में बस क्षणांश का ही विलम्ब है।

मौन सुन्दरी और चारू के मुँह से चीख निकली 'बचाओ, नाव डूब जायगी भैया।' मल्लाह अपने दोनों पैरों की बीच वृहत्तर अंतराल दे दोनों ओर के चप्पू चला रहा था। शेष स्त्रियाँ कैसे बोलें, उन्होंने मौनव्रत धार रखा था इस घड़ी। पर उनकी आँखों में दहशत उतर रही थी।

मौन सुन्दरी नाव में खडी हो गई, 'अरे कोई है, नाव डूब रही है, मर जाएँगे हम सब लोग।'

स्त्रियों ने त्योरी चढ़ा कर इन दोनों महिलाओं की ओर देखा। शोर मचा कर ये अपने प्रति पाप का प्रयोजन जुटा रही थीं। साथ ही उनके व्रत में भी विध्न डाल रही थीं। जो स्त्रियाँ उठंग छोर पर आसीन थीं, आग्नेय दृष्टि से उन्हें देख रही थीं।

तभी संकट पहचान कर रिजर्व पुलिस की मोटर बोट उनकी नाव के साथ आ सटी। सिपाहियों ने सहारा दे कर उभी सवारियों को मोटर बोट में पहुँचाया। दो वृद्धाएं पानी में फिसल गई थीं। उन्हें भी बचा लिया गया।

रिजर्व पुलिस की मोटर बोट बिना रोक टोक किनारे पहुँच गयी।

चारू ने देखा सभी सवारियाँ एक दूसरी के गले लग कर रो रही थीं, मौन रोदन, जिसमें शब्द की जगह सिसकियाँ थीं, अश्रु की जगह आँखों में भय। चारू ने खैर मनाई कि मासी बारिश के पहले आधी रात के मुहूर्त में ही स्नान कर आईं। वे साथ होतीं तो दहशत से अधमरी हो जातीं।

मौन सुन्दरी रास्ते भर वापसी में स्त्री स्नानार्थियों की मूढ़ता और निरीहिता पर खीझती रही।
'हैरानी तो यह है कि यह इन स्त्रियों का स्थायी भाव नहीं है। अपने घरों में ये अपने बेटे-बहुओं को खूब डपटती होंगी, पातों-पोतियों को घुड़कती होंगी पर इतनी सारी अग्निमुखी, उग्रमुखी औरतें, संतो के आदेश पर होंठ सिल लेंगी, जान निकल जाय पर बोलेंगी नहीं।

लौट कर शिविर का भोजन रोज से स्वादिष्ट लगा। चार-पाँच घन्टों की कवायद जो हो गई। राजमा, गोभी मटर की सब्जी और गाजर का हलवा बना था।

चारू से अलथी-पलथी मर कर नहीं बैठा जाता। जैसे ही उसने कौर तोडा, खाना परोसने वाले सेवादार ने डाँटा, 'उल्टे पांव पंगत में बैठी हो, कहाँ से आई हो। भोजन का कायदा नहीं मालूम।'

'पैरो में दर्द है, पलथी नहीं लगती।'
पास बैठी बलिष्ठ औरत ने झट उसके पांव खोल पालथी लगा दी, 'नहीं उलटे पांव पंगत में नहीं बैठ सकते।'
इस मौनी अमावस्या का महात्म्य और भी बढ गया क्यों कि यह सोमवार को पडी, सोमवती मौनी अमावस्या।

अगले दिन का तुमुल नाद पिछले दिन के मौन का उपहास करने लगा।

गौरां ने सवेरे ही विलाप करना शुरू कर दिया, 'हाय नी मैं मर जावां, कल नहां दे वेले कोई मेरी कलाई से कड़ा उतार कर ले गया। पूरे चार तोले दा सी।'

सत्या और गौरां का दिन रात का साथ था। दोनों होशियारपुर की थीं।

'तेरे हाथ में तो स्र्माल बंधा था। कडा कदौं पाया सी।'

'लै मैं झूठ बोल दी हं।' पानी गंदला था। रेत की दलदल में कमर तक धंस गई थी गौरां। दो आदमियों ने पकड कर निकाला उसे। कैम्प में लौट कर टोटी के नीचे नहाई।

'कल तो तूने बताया नहीं?'

'संतो ने कहा था चुप रहना, किद्दा दसदीं।'

सबने हिसाब मिलाया। सबके चेहरे पर बदहवासी। पन्डे से लेकर नाव वाले तक ने लूटा, बचा खुचा गंगा मैया ने। डुबकी लगाई, गले से कंठी गायब। कहाँ गई, कुछ खबर नहीं। कोई अचानक से उतार ले गया। हवा से भी हलका हाथ रहा उसका। रपट क्या लिखाएँ। कुछ पता हो तब न। कहाँ गिरी, किसने छीनी। करमां दियाँ गल्लां। लाल सड़क पर स्वामी सुरेशानन्द के शिविर के बाहर एक औरत बिलख-बिलख कर रो रही हे। नाम अमरो, जिला जालौन। पति साथ आया था। कल की धकापेल में बिछुड गया। जमां पूंजी उस उसी के पास है।

एक सिपाही उसे भूले भटके शिविर में बैठा आया। लाउडस्पीकर पर उसके पति के लिए मुनादी करवानी थी। 'एनाउन्सर ने पूछा, 'आदमी का नाम?'

'हाय दैया कैसे बोलें।'

'नाम नहीं बोलोगी तो बाजे पर क्या बोलेंगे हम, कौय आय।' अमरो धोती का सिरा दाँतो से दबा लेती है।
'अच्छा नाम नहीं ले सकती तो कुछ अता-पता दो।'
अमरो आसमान की ओर इशारा करती है।
'सूरज'
'ना'
'चाँद'
'उई दैया।'
नाम बोला जाता है चंदादीन।
दो दिन बीत गये। अमरो का पति नहीं आया। प्रशासन का कारिन्दा कहता है 'रेल का किराया देंगे, घर चली जाओ।'

'नाहीं। जब तक बुलाने नहीं आएँगे वह नहीं जायेगी, सात फेरे वाली हैं हम, कोई नचनी पतुरिया नहीं। गंगा मैया हमार भतार भेजें नहिं हम ऐहि मां कूद कर पिरान दे दैवे।'

न जाने कितनी अबोध लडकियाँ पाई गइ हैं कल। गंगा स्नान के बहाने घरवाले लाये थे घर से, और छोड गए मंझधार। जल पुलिस ने बताया- 'बाइस'।

ये सब पीड़ा के प्रसंग हैं। इनके सही आंकडे और ब्योरे प्रशासन की फाइलों में हैं।

मासी की ऐनक बन कर आ गयी है। सत्य के स्कूटर पर वापस घर जाते समय चारू सोच रही है, इतना विशाल मेला क्या कुछ भी कलातीत सिखा पायेगा या सब वैसे के वैसे अपने संकीर्ण सरोकारों में वापस हो जाएँगे। जो झूठ बोलता था, बोलता रहेगा, जो घूस लेता था, लेता रहेगा, जो मिलावट करता था, करता रहेगा, जो चोरी करता था, करता रहेगा, और जो कामचोरी करता था करता रहेगा। औरतों की जीवन में इस एक डुबकी से क्या हो जायेगा। उनकी हालत बदलेगी? गंगामाई में पाप सचमुच धुले या यह भी एक सरलीकरण है जिसकी स्वीकृति में ही फिलहाल निष्कृति है।                

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१ मार्च २००१

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