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नन्हें कबीर के पीछे बैठा महावत हाथ नचा-नचाकर इसी खिड़की की ओर देखकर लगातार कुछ कह रहा है -
"बहन जी एक रुपया दोगी, तो बच्चे को उतारूँगा, बस एक रुपया।"

खिड़की के फ्रेम में बंसी नहीं, प्रेमा है, उनकी पत्नी प्रेमा क़बीर की माँ।
कबीर भी महावत की हर चीख में अपनी चीख जोड़ रहा है, "माँ मत देना, मुझे नहीं उतरना, मैं नहीं उतरूँगा।" मानो एक आरोह हो, तो दूसरा अवरोह।

हाथी पर बैठे कबीर को देख प्रेमा कुछ हैरान हुई, "अरे, किससे पूछकर बैठाया था हाथी पर?"
"बैठाया तो मैंने, पर तुम एक रुपया दोगी, तो उतारूँगा!"
"मैं नहीं उतरूँगा, नहीं उतरूँगा!"
"चुप रह! रुपया लिए बिना तो मैं तुझे उतारूँगा भी नहीं!" महावत झल्लाकर बोला।
"नहीं देना, माँ नहीं देना!" कबीर ने हाथी पर तबला-सा बजाया।

तभी एक पड़ोसन रुआँसा-सा बच्चा चिपकाए तेज़ कदमों से इस ओर आई, "बहन जी, दे दो, एक रुपए की तो बात है, मेरा बेटा रो-रोकर अधमरा हो गया, तब भी नहीं उतारा इसने, फिर दो रुपए लिए, तुमसे तो एक की कह रहा है।"
"नहीं दूँगी तो क्या करेगा?" प्रेमा ने कलफदार आवाज़ में महावत से पूछा।
"नहीं दोगी तो समझ लो, बच्चा गया।"
"गया! कहाँ गया?"
"गया, हमेशा के लिए गया, समझ लो अब!" महावत पर नशा-सा तारी था।
"जा, ले जा फिर!" प्रेमा की आँखों में शरारती तारे टिमटिमा उठे, "अरे, एक दिन तो रखकर दिखा इसे, औरों जैसा समझा है क्या! हाथी समेत लौटाने आएगा तू खुद ही!"

माँ का जवाब सुनकर कबीर को ढ़ाँढ़स बँधा कि अभी हाथी की सवारी कुछ और करने को मिलेगी। वह तालियाँ बजाने लगा, "चलो, अगली गली में चलो!"

प्रेमा ने खिड़की बंद कर दी तो महावत का सारा नशा दिमाग़ से उतरकर जूतों में पहुँच गया। कुछ क्षण असमंजस में रहकर उसने एक मोटी-सी गाली देते हुए झटके के साथ कबीर को बगल से पकड़कर उतार दिया। उतरते ही कबीर ने हाथी की सूँड पर लटकना चाहा। महावत को कबीर से बचकर वहाँ से जाना मुश्किल हो गया। कबीर को डपटता हुआ उसे वहीं छोड़ वह जैसे-तैसे आगे निकल पाया था।

वह महावत तो उसे लौटाकर आगे निकल गया था पर इस बार, इतने साल बाद! एक हूक-सी उठी बंसी के सीने में, क्या हर महावत लौटाता है? इस बार तो हम एक रुपया क्या, अपना सब कुछ देने को तैयार हैं, पर वह महावत।
उस दृश्य ने हौले से अपनी पलकें झपका लीं तो बंसी ने चश्मे पर आ गई नमी को साफ़ करते हुए कमरे की ओर रूख़ किया। आराम कुर्सी पर खुद को छोड़ते हुए उन्होंने महसूस किया कि उनकी दाईं आँख की नमी में कुछ आगे-पीछे हो रहा है। चश्मे को हाथ में पकड़े हुए उन्होंने आँख की ओर ध्यान केंद्रित किया तो मुँह ने बुदबुदाया, "कितनी बड़ी केतली!"

इतनी दूर का दृश्य अपने इतने पास पाकर बंसी कुछ अचकचा-से गए। उन्हें याद आया, एक दिन लगभग दो-ढ़ाई साल के कबीर की नन्हीं शैतान हथेली थामे वह पार्क की ओर जा रहे थे कि कबीर ने एक ओर उँगली से इशारा करते हुए शोर मचा दिया था, "कितनी बड़ी केतली, पापा, कितनी बड़ी केतली!"

पहले तो बंसी कुछ समझ नहीं पाए थे, फिर उन्होंने कबीर की उँगली के इशारे की सीध में देखा और पाया कि पार्क के किनारे एक ऊँट बैठा है। ठहर कर देखा तो अचंभित हुए। बैठा हुआ ऊँट सचमुच एक बड़ी-सी केतली लग रहा था।

स्मृतियाँ मन में गहरे कहीं सींझती हैं जैसे मिट्टी में बीज। समय उन्हें सींचता है तो उन पौधों की शाखों पर नन्हीं-नन्हीं कलियाँ खिल आती हैं, जो मन के इस अनमने शहर को आबाद होने का भ्रम दे जाती हैं। ठंडे फेन-सा मीठा भ्रम! एक दिवास्वप्न!

कबीर का सेना में भर्ती होना खुद कबीर का कम और बंसी का ज़्यादा बड़ा सपना था। सैनिक स्कूल में बतौर मास्टर काम करते हुए बंसी की हर साँस ने चाहा था कि कबीर सेना का बड़ा अधिकारी बने - मेजर, लेफ्टनेंट कर्नल और फिर कर्नल। बंसी रोज़ सुबह सैर करते समय परिंदों को दाना देते थे। यह सपना भी उनके लिए सुबह के किसी परिंदे से कम न था।

बी.ए. के बाद कबीर का आई.एम.ए., देहरादून में भर्ती होना उस सुबह के परिंदे की वह पहली उड़ान थी, जो बहुत ऊँची तो नहीं होती, मगर होती बहुत कठिन है। आई.एम.ए की परीक्षा के लिए कबीर का वजन कम करने के प्रयास में, लगता था, घर की हर चीज़ कुछ हल्की हो जाएगी। बंसी की देख-रेख में कबीर की घंटों की दौड़ और व्यायाम तथा कम भोजन तक ही बात कैसे सीमित रहती! जून की दोपहर में घर में पंखे चलने मना थे। कबीर को दो दिन तक उस गर्मी में बिना कुछ खाए-पिए घंटों कंबलों में लपेट कर रखा गया था। आखिरी दिन जब वज़न देखा गया तो पूरा घर मानो बिना वज़न के तैर रहा था - आकाश से कहीं ऊपर स्पेस में!

और फिर शुरू हुआ आई.एम.ए. के प्रशिक्षण का वह कठिन दौर, जो देश भर के अलग-अलग परिवारों, अलग-अलग संस्कृतियों से आए लड़कों को एक-से साँचे में ढाल देता है। साल के अंत में उस पास आउट परेड में, जब टोलियों में जवान मार्च पास्ट करते हुए सामने से गुज़र रहे थे, बंसी हैरान थे। वह अपने कबीर को पहचान नहीं पा रहे थे। हर जवान पर उन्हें कबीर होने का संदेह हो रहा था। फिर कुछ देशभक्ति के गीत गाकर राष्ट्रीय गान के बाद सभी जवानों ने अपनी टोपियाँ हवा में उछालकर लपकी थीं तो बंसी की आँखों में खुशी छलछला आई थी। सिर के ऊपर से उड़ान भरती परिंदों की एक टोली गुज़र गई थी। उन्होंने साथ खड़ी प्रेमा का स्वर सुना था, "आज हमारा बेटा फौज का हो गया।" भीतर भी एक परिंदा पंख लहरा रहा था।

देहरादून में औपचारिक रूप से उन्होंने और प्रेमा ने खुद अपने हाथों से कबीर की वर्दी पर बिल्ले लगाए थे। वे बिल्ले! जिन पर लिखा था - इलैवन जाट रेजीमेंट। उस सजीली वर्दी में लंबी कद-काठी वाला कबीर इतना जँचेगा, प्रेमा ने कभी सोचा न था। बंसी एकटक देख रहे थे कि आज उनका सपना सजा-सँवरा खड़ा है। प्रेमा ने नज़रें फेर ली थीं - 'कहीं नज़र न लग जाए!' उन्हें लगा था कि माँ की नज़र का भी क्या भरोसा करना म़ोह की नज़र जो ठहरी!
"आज से मैं जाट हो गया!" कबीर मुस्करा रहा था।

और बंसी ने अगले तीन सालों में महसूस किया था कि कबीर धीरे-धीरे जाट होता जा रहा है। उसकी बोली, उसका लहजा, उसकी बातें, उनके कबीर की नहीं बल्कि कैप्टेन कबीर कौल, इलैवन जाट रेजीमेंट की थीं। उठते-बैठते वह अपने जाट होने का सबूत देना न भूलता था।

एक दिन उन्हें चाबियों का गुच्छा लिए अलमारी के पास खड़े कुछ सोचते देखा तो एक लापरवाह-सी आवाज़ में बोला था, "क्या पापा, आप ताले-चाबी में लगे रहते हैं। हम फौज के जाटों में तो ट्रंक-अलमारियों में ताले का टंटा, मेरा मतलब, कंसेप्ट ही नहीं है!" फिर हल्की हँसी के साथ जोड़ा था उसने, "ताला होता है तो घी के कनस्तर पर, बस!"

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