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फिर एक दिन कबीर राशि को मिलवाने घर लाया था। पहले तो लगा था कि अलग भाषा, अलग संस्कृति की राशि से कैसे निभेगी, पर फिर सोचा था कि जब बेटा जाट हो सकता है तो बहू पंजाबी क्यों नहीं! और हल्दी-मेहंदी की खुशबू लिए राशि ने कबीर के घर, उसके जीवन में प्रवेश किया था। कुछ ही दिन बाद कबीर उसे लेकर अपनी नई पोस्टिंग - इंफाल की अनजानी पहाड़ियों की ओर रवाना हो गया था। सुकून मिला था यह जानकर कि पोस्टिंग इंफाल में हुई है, कारगिल में नहीं।
सप्ताह में लगभग दो बार फोन पर फौजी बेटे की रोशनी-सी आवाज़ के स्पर्श के लिए कान सप्ताह के सातों दिन सावधान की मुद्रा में रहते थे। रात का विश्राम भी वस्तुत: कानों के लिए सावधान ही होता था। फौजी के पिता के कानों को भला विश्राम कैसा! फोन वहीं से आ सकता था। यहाँ उस खुफिया जगह का नंबर नहीं दिया जा सकता था। इसलिए सप्ताह भर के उन असंख्य पलों में से वे कौन-से जीवंत पल होंगे जो उस रोशनी को बंसी के कानों तक लाएँगे, खुद उन पलों को भी नहीं मालूम था। न ही लगभग तीन महीने बाद आने वाले वे बदनुमा स्याह पल जानते थे कि बंसी के कानों को वे कबीर की नहीं, इंफाल से ही किसी सेनाधिकारी की आवाज़ सुनाने वाले हैं कि 'कबीर इज नो मोर'

सुबह के उस परिंदे ने आकाश में उड़ान भरते हुए अचानक दम तोड़ दिया था। देश के लिए ख़बर थी कि एक और जवान आतंकवाद का शिकार हुआ। अख़बारों में खबर छपी कि जवान नहीं, कैप्टेन था यानी सेना का अधिकारी। पर बंसी, उनके लिए तो यह ज़िंदगी का ऐसा निष्ठुर सत्य था जिसे वह छूना नहीं चाहते थे, पर जो उनकी देह से चिपक गया था, जिसका स्पर्श उनकी त्वचा को भेद कर भीतर पहुँच गया था, जो उनकी रगों में एक जीवंत उपस्थिति की तरह लगातार बह रहा था। जब भीतर की ओर उन्मुख होते थे, तो वहाँ एक बहरा अंधेरा पाते थे। इतना बहरा कि वह चीखें भी न सुन पाता था। किससे कहते वह कि ईश्वर भटक गया है, उसे कोई उँगली पकड़कर सही राह तो दिखा दे! काश, ईश्वर का भी कोई ईश्वर होता!

वर्षों पहले रोम में 'माउथ ऑफ ट्रुथ' के सामने खड़े होकर उन्हें एक सिहरन हुई थी। सच का चेहरा! इतना भयावह, इतना विकृत! गोल चेहरे और टेढ़े मुँह वाला सच। पत्थर की दीवार पर बने उस सच के मुँह में सभी पर्यटक अब हाथ डालकर देखते हैं। पुरानी धारणा है कि अगर सच बोला होगा तो हाथ वापस आएगा, झूठ बोला होगा तो हाथ गँवाना होगा क्यों कि सच का मुँह जो ठहरा। स्वयं भले बने रहकर अपने विरोधियों को सजा देने का एक प्राचीन सामंती ढंग! एक अनजाना डर उनकी रगों में दौड़ गया था सरसराता हुआ। आज वह युग नहीं, वह सामंती प्रथा नहीं, सच-झूठ का फैसला नहीं, सिर्फ़ एक पर्यटक स्थल है यह 'सच का मुँह', पर रीढ़ तक में खौफ़ का वजूद महसूस करा देता है। क्यों? क्यों होता है सच का चेहरा इतना भयावह!

सच! एक सच और होता है जो हमें अपने मुँह में हाथ डालकर बाहर निकालने की कोशिश की मोहलत भी नहीं देता। बिना चेहरे वाला सच, जो अचानक सामने आता है बिन बुलाए ज़िंदगी को स्तब्ध कर देने के लिए, वहाँ हमेशा के लिए बस जाने को! जिसके सामने बिन झूठ बोले ही सिर्फ़ हाथ ही नहीं, न जाने कितनी ज़िंदगियों को गँवा बैठते हैं हम! न जाने कितनी ज़िंदगियाँ साँस लेती ज़िंदगियाँ!

उनकी निस्तेज आँखों ने इस अगोचर सत्य के छीटों से कुम्हलाया राशि का चेहरा देखा तो भीतर गाँठें-सी उभर आई थीं - एक के बाद एक, जो फंदों की तरह गले में अटकी जा रही थीं। उस बिलखती बहू को बाँहों में भरते हुए उन्होंने चाहा था कि उसका दुख अपने सीने में हमेशा के लिए दफन कर लें, पर उनके बेबस हाथ लौट आए थे। न जाने समय की अर्गला के पीछे अभी और क्या छिपा है!

उन्हें अपनी नानी का ख़याल हो आया, जो अक्सर कहा करती थीं, 'हम बूढ़ों को क्या आशीर्वाद चाहिए? यही कि हमारे बच्चे जीते रहें।' उन्होंने अचानक स्वयं को बूढ़ा हो गया पाया। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है, इंसान की पास की नज़र कमज़ोर होती जाती है, दूर की नहीं। पर आशीर्वाद तो दूर-दूर तक कहीं नज़र नहीं आया। अब क्या पास और क्या दूर! काश कि सारी दृष्टि धुंधला जाए हमेशा के लिए!

बहुमंज़िला मकानों को क्या चाहिए, उनमें बसने वाले लोग! लोगों को क्या चाहिए, भोजन और चाहिए रिश्तों का साया! बंसी को नानी का बूढ़ा चेहरा फिर याद हो आया। साए के लिए बाहर सेना के हरे-खाकी रंग के पैराशूट तंबू गाड़े गए थे, तेरहवीं पर आने वाले लोगों को धूप की तपन से बचाने के लिए।

लगभग तीन महीने पहले इसी तंबू के नीचे, इन्हीं कालीनों पर और इन्हीं कुर्सियों के आस-पास कबीर की बारात सज रही थी। शाम को सेना के ट्रक में कालीन समेटकर रखे गए। तंबू उखाड़े जाने लगे। बंसी ने सुना था कि जाट बहुत मुश्किल से जाता है। तेरहवीं तक उसके कभी भी लौट आने की उम्मीद, जिसे लोग विनोद से खतरा कहते हैं, बनी रहती है - जाट मरा तब जानिए, जब तेरहवीं हो जाए। अब आज तेरहवीं हो चुकी थी। जाट मर चुका था। उसके लौटने की कोई आस बाकी नहीं रह गई थी।

एक पहाड़ी मज़दूर है मन - पीठ पर बोझ लादे ऊँची-नीची पहाड़ियों पर चढ़ता-उतरता मज़दूर। नहीं, बल्कि उससे भी अधिक बलवान। जितना बोझ मन उठा सकता है, कोई हाथ, कोई कंधा या कोई पीठ नहीं। कबीर की चिता को मुखाग्नि देते हुए उन्हें याद आया था कि बचपन से जब-जब कबीर उन्हें या वह कबीर को छोड़कर कहीं शहर से बाहर जाते थे तो कबीर को दस रुपए देते थे। समय के साथ-साथ कबीर की आयु और रूतबा तो बढ़ा पर उसकी वह दस्सी बराबर दस्सी बनी रही थी।

आई.एम.ए. की पास आउट परेड के बाद जब कबीर से विदा होकर वह अपनी टैक्सी की ओर बढ़े थे तो कबीर ने उनकी बाँह पकड़ ली थी - "पापा दस्सी?"
नम आँखों की ओट से उन्होंने मुस्कुराते हुए उसे देखा था और एक दस का नोट थमा दिया था। और वह दिन जब कैप्टेन कबीर कौल उन्हें जम्मू जाने के लिए शालीमार एक्स्प्रेस में बैठाने आया था। गाड़ी ने सीटी दी, तो कबीर बाहर उनकी खिड़की के पास खड़ा था। गाड़ी चली, तो अचानक कबीर वहाँ नज़र नहीं आया। वह उचक-उचककर खिड़की से बाहर उसे ढूँढ़ रहे थे कि अचानक उन्हें गाड़ी के भीतर कबीर की आवाज़ सुनाई दी थी, "पापा।"
वह अचकचाकर पलटे, "अरे, गाड़ी चल चुकी है, तुम यहाँ अंदर! जाओ, तुम ज़ल्दी...!"
"कैसे जाऊँ? दस्सी तो दी नहीं!"

विस्मय, क्रोध, वात्सल्य - क्या था जिसने उनके शब्द हर लिए थे। जेब से पर्स निकालकर उन्होंने दस का नोट थमाया था।
"बाय पापा... अपना ख़याल रखना," कहता हुआ कबीर ओझल हो गया था।''
और उस चिता की लपटों की ओर सजल नेत्रों से देखते हुए उनका पसीने से नम हाथ जेब में रखे पर्स पर चला गया था। हथेली का दबाव बढ़ता चला गया था, पर्स को वहीं रोके रखने के लिए। उन्हें लगा था कि लपटों में से एक चीख उभर रही है, 'दस्सी तो दी नहीं, कैसे जाऊँ!'

हर वस्तु मरणासन्न है फिर स्मृतियाँ क्यों नहीं मरतीं? इन स्मृतियों को एक आस थीं फिर से खिलने की, फिर से मुस्कराने की। वह आस, जो राशि ने थमाई थी कि कुछ ही महीनों में नन्हा कबीर आने वाला है। शून्य को शब्द मिल गए थे। स्वप्न स्मृतियों से ही संभव है और स्मृतियाँ स्वप्नों से। जैसे एक खंबा गिरने से पूरा मकान ढह जाता है, वैसे ही यह आस भी भुरभुराकर ढह गई। अंधेरों में खो गई बहुत जल्द।

दूर कहीं फूल के टूटने की आवाज़ सुनाई दी थी। सीने में मानो बर्फ़ के पहाड़ उग आए हों। गर्म भाप वाले पहाड़! बोझिल पहाड़! ये पहाड़ साँसों के ऊपर रखे महसूस होते हैं। सीगल का रोना नवजात शिशु की आवाज़-सा होता है। लगा था कि समंदर की सतह पर ढेरों सीगलों ने रोते-रोते दम तोड़ दिया। धीमी आँच में किसी ने फूँक मार दी थी। अजीब ताप था, जो जला रहा था आत्मा को। कबीर को पंचतत्वों ने मानो, संपूर्णता में तो आज ही अपने में समोया था।

राशि और प्रेमा की बेबस नज़रों का लगातार सामना करने की हिम्मत अब उनमें नहीं बची थी। लगता था कि वे नज़रें उन्हें नोंच-नोंचकर पूछ रही हैं कि सुबह के परिंदों को दाना देना क्यों छोड़ दिया अब! मन अकेलेपन के लिए अकुला-सा गया। वह उठे और घर से बाहर निकल आए। जेब को टटोला तो एक में पर्स था और दूसरी में कबीर का एक बिल्ला। उसके सामान में से टोपी और पेटी निकाल उन्होंने सहेजकर अपनी अलमारी में रख ली थी और यह एक बिल्ला उसी दिन उनकी पतलून की जेब में आ गया था।

बाहर आए तो डाकिए ने एक खत थमा दिया - लेफ्टनेंट कर्नल बाबा का, जो इलैवन जाट रेजीमेंट के प्रभारी अधिकारी थे। नज़रों ने आखिरी पंक्ति पढ़नी चाही - इलैवन जाट परिवार इस शोक की घड़ी में। दृष्टि धुंधला गई। पूरा खत पढ़ने का मन न हुआ। उसे जेब में डाला और बस स्टॉप की ओर बढ़ गए।

जो बस खड़ी थी, उसी में चढ़ गए। लगभग खाली थी। खिड़की से झाँककर देखा-दौड़ते खंभे, फिसलते तार, भागते साइन बोर्ड और सिर के ऊपर से गुज़रते पुल-दर-पुल। सब कुछ भाग रहा है, चल रहा है। कहीं कुछ ठहरा है तो उनका अपना जीवन।

बस के ड्राइवर ने झटके से ब्रेक लगाया तो उन्हें होश आया। नहीं, भीतर कुछ चल रहा है, बल्कि दौड़ रहा है वेग के साथ - मन भर का एक मन। उसे भी ठहर जाना चाहिए अब। उसके चलने से भला चला है कभी कुछ!

वह बस से नीचे उतर आए। कुछ फासले पर यमुना दिखी। न जाने क्यों पाँव उसी ओर बढ़ गए। उस काली यमुना को उन्होंने बेरंग नज़रों से देखा। उनका हाथ अपनी पतलून की जेब में गया, जहाँ लेफ्टनेंट कर्नल का खत था।

उन्होंने वह खत निकाला और एक ठंडी सांस छोड़ते हुए यमुना के हवाले कर दिया। हाथ फिर जेब में गया तो उँगलियाँ बिल्ले से टकराई। मन ने कहा, 'इलैवन जाट रेजीमेंट'। न जाने क्यों उनकी उँगलियों ने हौले से उस बिल्ले को थामा और बाहर निकालकर उसे भी यमुना की लहरों को दे दिया।

क्या था यह! विसर्जन! शायद, हाँ। जिसका कभी सृजन किया था, उसी का विसर्जन। उस सृजन की स्मृतियाँ का भी विसर्जन। आत्म-विसर्जन! पर हो पाता है क्या! यादों से हम कितना घबराते हैं, उन्हें खत्म करना चाहते हैं, पर कर पाते हैं क्या!

बंसी ने हाथ जोड़कर यमुना में हिल रही डूबते सूरज की परछाई को प्रणाम किया और बस स्टाप की ओर लौटने लगे। मन ने चाहा, एक बार पलटकर देखे, पर हिम्मत नहीं हुई।

अगर उन्होंने देखा और लहरों में से आवाज़ आई - 'पापा दस्सी!' तब क्या होगा!

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