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 लेकिन रात में रामलीला देखकर देर से सोने के
बावजूद हम दशहरे के दिन जल्दी उठ गए थे। घर में सचमुच उत्साह था। हमारे नए कपड़े और
जूते रात में ही आ गए थे। हर दशहरे पर हमारे नए कपड़े बनते। पिता जूते बनाने वाले के पास हमें ले जाते। वह हमारे
पैरों की नाप लेता। दशहरे से पहले हमारे नये कपड़े सिलकर और जूते बनकर आ जाते। हम
झूठ-मूठ उन्हें पहनने का प्रदर्शन करते और खुश होते। माँ और पिता हमें खुश देखकर और
भी खुश हो जाते। नहा-धोकर जब हम नए कपड़े और जूते पहनकर मटकते तो माँ कहतीं, 'यह
रंग बब्बू पर खूब फबा है। दर्ज़ी ने इसकी निक्कर और बुशर्ट अच्छी सिली है पर जूते
वाले ने बूट की नोक ठीक नहीं बनाई है।' पिता तब समझाते कि यह चालू फ़ैशन के अनुसार
उन्हीं के निर्देश पर मोची ने बनाई है। ऐसे ही माँ अगर किसी बच्चे के कपड़े की
सिलाई में कोई कमी निकालतीं तो पिता फ़ैशन का तर्क़ देकर उन्हें चुप करा देते। हमें
वे बेहद साधारण कपड़े और जूते तब बेहद अच्छे लगा करते। हम अपने को शहज़ादा समझते।
मोहल्ले के दूसरे घरों में भी कुछ बच्चे अपने नए कपड़े और जूते एक-दूसरे को दिखाते
और हर अपनी चीज़ को ज़्यादा कीमती और आकर्षक मानता। पर किसी को भी हीन भावना नहीं
होती थी। पूरा मोहल्ला ही प्राय: निम्नमध्यवर्गीय परिवारों वाला था। एकाध जो रईस
परिवार था भी उनके बच्चों के कपड़ों और जूतों से उसकी अमीरी नहीं टपकती थी। उन घरों
में प्राय: गाय या भैंस होती। एक-दो नौकर-चाकर होते। उनके बच्चे मौसमी फलों के
अलावा सेव और संतरे जैसे उन दिनों के महँगे फल खाते। कई बार वे अपनी जेबों में भरे
सूखे मेवों से हमें चिढ़ाते और फिर थोड़े अकड़वाले भाव से काजू और चिलगोज़े, बादाम
और किशमिश हमें चखा देते। इसके बावजूद हमें अपनी साधारणता को लेकर किसी भी तरह का
कोई कांप्लेक्स नहीं होता। हम उन रईस बच्चों के साथ उसी तरह खेलते और उनको पीट भी
देते। कई बार हमारी भी पिटाई हो जाती। कई बार उन बच्चों के पास क्रिकेट का बल्ला,
कैरम या बैडमिंटन का रैकेट होता, तब हमें वाकई ईर्ष्या होती और हम मां और पिता से
उन्हें दिलाने की मांग करते। अमीरों के बच्चे हमें अपने साथ जब ये खेल भी खिलाते तो
हमारी मांग धीरे-धीरे कम हो जाती। हम बचपन के उस तमाम सादेपन में भी खुश रहते।
दशहरे जैसे त्योहारों पर वह खुशी बढ़ जाती और कई-कई दिनों तक बनी रहती। हमें कभी
लगा ही नहीं कि हमारे पास अच्छे कपड़े या खिलौने नहीं हैं। जो भी हमारे पास था, उसे
ही हम बहुत ज़्यादा समझते थे और खुश रहते थे। उत्सव और मेले हममें उत्साह और
प्रसन्नता उँडेलते।
माँ और पिता के पास तो पहनने के लिए भी कपड़े नहीं थे, जितने हमारे पास थे। पर उनकी
खुशी हमसे कहीं ज़्यादा थी। माँ कम से कम पैसों में घर का खर्च चलातीं और पिता चार
वक्त की हमारी दाल-रोटी के साथ एक बार के दूध के लिए टयूशन करते। पर हाय-हाय उन्हें
नहीं थी। वे हर त्योहार को खुशी से मनाते थे और बिल्कुल साधारण-सी चीज़ें भी हमारी
खुशी का सामान बन जातीं। हमारा कच्ची छत और लखौरी इंटों के फ़र्श वाला छोटा-सा घर
उस खुशी में दीप्त हो उठता। माँ एक ढिबरी में खाना पकातीं और हम भाई-बहन पिता के
साथ लालटेन के चारों ओर बैठे पढ़ते रहते। हमें खिलाने के बाद ही माँ खातीं। अक्सर
सब्ज़ी या दाल बहुत कम होती। माँ अचार से उसे बिना किसी असुविधा के - बल्कि पूरे
स्वाद से खातीं। त्योहारों पर मीठी पूरियाँ, पूड़े, चिल्ले, जैसी चीज़ें बनतीं। ये
त्योहार बार-बार आते और पूरे घर को उत्साह से भर देते। इन साधारण घरेलू पकवानों का
स्वाद एक अलग ही उत्सुकता रचता था।
पिता कहते थे हमारे शास्त्रों के अनुसार हिंदुओं
के चार वर्ण हैं। रक्षाबंधन ब्राह्मणों का, दशहरा क्षत्रियों का, दीपावली वैश्यों
का और होली शूद्रों का त्योहार है लेकिन इनके मनाने में कोई विभाजन नहीं है। सब सभी
त्योहारों को समान रूप से मनाते हैं। लेकिन होली पर हम शूद्रों से गले नहीं मिलते
थे और दीपावली पर तमाम दलितों को हम खील-बताशे और मिठाई देते थे। तभी बचपन में यह
समझ बनी कि हम हिंदू अपने सभी त्योहारों में शूद्रों को शामिल नहीं करते। हम सिखों
के गुरु पूरब और
लोहड़ी तथा जैनों के जलसे-जुलूसों में ज़रूर शामिल हो जाते थे पर मुस्लिम छात्रों
के साथ पढ़ने और खेलने के बावजूद ईद हमने कभी नहीं मनाई। हम बचपन में गुरुद्वारों
और जैन मंदिरों में गए हैं, लेकिन मस्जिद में हम कभी नहीं गए। और तो और, वाल्मीकि
मंदिर में भी हमारा कभी जाना नहीं हुआ। मुसलमानों और शूद्रों के साथ हमने त्योहार
नहीं मनाए और जाने-अनजाने उनसे निष्क्रिय घृणा की। लेकिन यह भी सही है कि हमने कभी
उनका बुरा भी नहीं किया और न ही ऐसा सोचा कि उनका बुरा हो। पता नहीं यह कैसे हुआ कि
हमारे बचपन के वाटर टाइट कंपार्टमेंट में सिर्फ़ सवर्णों का ही प्रवेश हुआ। हमें
उनकी तमाम भावनाओं और संवेदनाओं में अपनी से एक रिश्ता लगता था, पर शूद्र और
मुसलमान हमें अपने से अलग लगते थे।
वैसे तब भी हमें थोड़ा अजीब-सा लगता था, जब पिता वर्ण-विभाजन बताते हुए कहते थे हम
खत्री हैं और हमारा त्योहार दशहरा है, पर जब हम देखते थे कि दूसरे सवर्ण भी हमारी
तरह ही दशहरा मना रहे हैं और हमारा परिवार भी उनकी तरह दीपावली, होली और रक्षाबंधन
मनाता है, तो हमारी जिज्ञासा मिटने लगती। मगर हम देखते थे कि ब्राह्मण परिवारों में
पुस्तक और कलम-दवात की, वैश्य परिवारों में तराजू और बही-खातों की तथा क्षत्रिय
परिवारों में प्राय: तलवार और कटार की पूजा ज़रूर होती है। कुछ परिवारों में ये
सारी चीज़ें पूजा में रखी जाती थीं, लेकिन अपने वर्ण को दर्शाने वाली चीज़ें वहाँ
ज़रूर होती थी। हम कल्पना करते कि दशहरे को शूद्र कैसे मनाते होंगे। क्या उनके यहाँ
भी गोबर के दस सिरों वाला रावण बनता होगा। पर जब हम इन त्योहारों पर इन्हें
त्योहारी या तिवहारी माँगते देखते तो हमें लगता कि हमारे कस्बे में तो दलित जातियाँ
हमारी तरह ये त्योहार नहीं ही मनाते। हम पिता से पूछते कि ब्राह्मण का प्रतीक चिह्न
तिलक, वैश्य का तराजू और क्षत्रिय का तलवार है तो शूद्र का क्या हुआ। वे कोई एक
प्रतीक न बता पाते और तब हमारे घर हर सुबह कमाने आने वाली मेहतरानी ही हमारे लिए
प्रतीक बन जाती, जिससे बचपन से ही हमारा रिश्ता एक कमीनी उपेक्षा का बनता गया।
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