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दशहरे के दिन पिता में वाकई उत्साह होता। वे बुखारी से पुरानी तलवार को निकालते। उसके कटे-फटे म्यान को सँभालकर एक ओर रखते और फिर काफ़ी देर तक ईंट के टुकड़े से उसे चमकाते। वे बताते यह हमारे पूर्वजों की तलवार है। हम क्षत्रिय हैं और हमारा काम लड़ना है। तलवार की चमचमाहट वर्षों पहले गा़यब हो गई होगी। पर पिता उस दिन उसकी रूह निकाल देते। हम कल्पना करते कि हमारा कोई पुरखा घोड़े पर बैठा है। उसने पगड़ी बाँधी हुई है। उसके लंबी सफ़ेद दाढ़ी है। वह कोई योद्धा है। हमें वह महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसा लगता। एक रोमांच और गर्व से हम फूल उठते। पिता तलवार को तौलिये से पोंछकर और चमकाते और फिर ईंटों वाले उस ऊबड़-खाबड़ आँगन में तलवार चलाकर हमें दिखाते। पतले-दुबले पिता तलवार चलाते हुए हमें वीर योद्धा लगते। वे बड़ी फ़ुर्ती से वार करते और हवा में वार रोकने का प्रदर्शन करते। पिता आँगन में ईंट से लाइन खींचकर चार घेरे बनाते और हमें पैंतरों का ज्ञान कराते।

तलवार बिल्कुल सीधी और लंबी थी। उसकी नोक कुछ नुकीली थी और चमकाने पर भोथरी धार निखर आती थी। पिता उस पर सावधानी से उँगली फिराते थे और फिर कहते थे कि इसकी धार लगवानी पड़ेगी। गोबर के सिर बनाने के बाद आटे से रावण और उसकी अगल-बगल राम, लक्ष्मण बनाती माँ के तब कान खड़े हो जाते और वह कहती, "धार का क्या करना है? हमें कौन-सा युद्ध लड़ना है।"
पिता का क्षत्रिय होने का अहसास तब ज़ोर मारने लगता। वे कहते, "घर में हथियार हो तो बुराई का क्या है।"
माँ पूछती, "हमारा दुश्मन कौन है?"
पिता कहते, "कोई नहीं है पर कोई लुटेरा घर में आ जाए तो हथियार ही काम आते हैं।"
माँ प्रश्न करती, "चोर क्या तुम्हें ख़बर देकर आएगा और तुम बुखारी से पहले ही तलवार निकाल लोगे?" फिर माँ अंतिम फ़ैसला सुना देती कि बच्चों वाले घर में मैं तलवार जैसा हथियार बाहर निकालने के पक्ष में नहीं हूँ। पिताजी निरुत्तर हो जाते। वे रावण के पास तलवार खड़ी करके अपने काम में लग जाते। ऐसा प्राय: हर दशहरे पर होता। दशहरा पूजने के बाद जब माँ रावण को उठाती और हम सबको घर से बाहर जाना होता, तो माँ सबसे पहले तलवार को उसकी म्यान में डालकर बुखारी में रख आती। फिर एक साल तक तलवार की घर में कोई चर्चा नहीं होती। अलबत्ता जब घर में सफ़ेदी वगैरह होती तो वह म्यान सहित निकलती और हम उसे म्यान से निकालकर चलाना चाहते। लेकिन हमारा प्रयास तत्काल विफल कर दिया जाता और हम मन मसोसकर रह जाते।

इस बार दशहरे पर पता नहीं पिता को क्या सूझा, उन्होंने हम बच्चों से कहा कि जो भी तलवार चलाकर दिखाएगा, उसे इनाम मिलेगा। उन्होंने पहले पैंतरे सिखाए और फिर तलवार छोटू के हाथ में थमा दी। तलवार उसकी छाती तक आती थी। उसे हाथ में लेते ही, वह उत्साह और रोमांच से भर उठा। वह पिता की तरह तलवार चलाने लगा। पिता उसे देखकर मुग्ध हो रहे थे। उधर माँ ज़ोर-ज़ोर से उससे तलवार रख देने को कह रही थीं। मगर उसमें पता नहीं कहाँ से स्फ़ूर्ति और ताकत आ गई थी। वह और दुगने वेग से तलवार चलाने लगा। माँ और पिता के रोकते-रोकते वह घर से बाहर को भागा। हम भी पीछे-पीछे भागे। उसने शायद बाहर उस कुत्ते को देख लिया था जो मेहतरानी रोटी के लिए दरवाज़े के बाहर फसकड़ा मारकर बैठ जाती और कुत्ते से बात करती रहती। कुत्ता शांत और एकाग्र होकर सुनता। रोटी मिलने पर मेहतरानी उसे रोटी नहीं देती, तभी वह भौंकता। छोटू ने हमारे देखते ही देखते कुत्ते की तरफ़ तलवार कर दी। यह देखकर कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा। कुत्ते के भौंकने पर छोटू अक्सर दुम दबाकर भाग जाया करता था। पर आज तो उसके हाथ में लंबी तलवार थी। उसने उसकी नोक कुत्ते को चुभो दी। कुत्ता दर्द से चिल्लाने लगा और मेहतरानी 'राम-राम क्या ज़माना आ गया है', कहती हुई, कुत्ते को सहलाने लगी। हमारे देखते-देखते वह भोथरी तलवार कुत्ते को गहरा घाव दे गई। एक मनोवैज्ञानिक घाव पिता को भी लगा लेकिन माँ को कहीं अधिक। वह कुत्ते को हुई पीड़ा से बेहद दुखी हुई। वह छोटू को डाँटने लगीं। उससे तलवार छीन ली गई। त्योहार के दिन घर में हल्का-सा विषाद उतर आया। जो चुभते कोलाहल के ऊपर तैर रहा था।

माँ ने कहा, "मैं कहती हूँ इस तलवार को किसी को दे दो। हथियार अपने पराये में भेद नहीं करता।"
"क्या बात करती हो, पुरखों की तलवार किसी को दे दूँ,' पिता ने कहा।
"यह हमारे किसी काम की नहीं।" माँ ने कहा।
"क्या पुरानी है तो बेकार हो गई? कभी यह हमारे पुरखों के काम आई थी।" पिता ने कहा।
"पर अब यह बेकार है। कौन चोर तलवार लेकर आता है। आजकल चोर-लुटेरे देसी कट्टा रखते हैं।" माँ ने कहा और फिर गुस्से में फ़ैसला दे दिया कि मैं इस ख़तरनाक चीज़ को घर में हरगिज़ नहीं रखूँगी।

पिता को समझ नहीं आ रहा था कि वह इस तलवार पर गर्व करें या अभी जो हुआ है उस पर लज्जित हों। उनके पास कोई जवाब नहीं था।

माँ पिता की भावनाओं को समझ रही थीं। उन्होंने तलवार पर कलावे से नौरते बाँधे गए जो पहले नवरात्र को कनस्तर में बोये जाते थे और जो दशहरे पर लंबे-लंबे उग आते थे। फिर तलवार को रोष और निष्ठुर उपेक्षा के साथ रावण के पास पूजने के लिए रख दिया गया। उस दिन सारे परिवार को वह तलवार रावण की तरह लगने लगी।

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१ अक्तूबर २००६ 

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