मुखपृष्ठ

पुरालेख-तिथि-अनुसार -पुरालेख-विषयानुसार -हिंदी-लिंक -हमारे-लेखक -लेखकों से


ऐसा पहले नहीं हुआ। रिश्तेदारों को मेरे आने की जानकारी पहले से होती। वे मेरे पहुँचते ही आ टपकते। कई बार वे माँ-बाबू जी के पास पहुँच कर मेरे आने का इंतज़ार करते। पट्टीदार दिन में कई बार हाजिरी लगा जाते। कोई दूध पहुँचा जाता तो कोई दही। सेवाभाव प्रदर्शित करने में कोई पीछे रहता। सबके अपने-अपने स्वार्थ थे। बिना स्वार्थ कोई नहीं आता, ऐसी मेरी धारणा थी।

वे माँ-बाबू जी को पहले का प्रयास करते। फिर उनकी बैसाखी के सहारे मुझ तक अपनी अपेक्षाओं को पहुँचाते और मन की मुराद पूरी न होते देख, अपनी वेदना को उलाहनों और तानों में व्यक्त करते लौट जाते।

सबकी अपेक्षाएँ अलग-अलग होतीं। मेरी साहबगिरी की खुरचन की आस में सब आते। दोनों मामा, माँ के माध्यम से अपना अधिकार जताते। वे यह जताना चाहते कि उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना भाँजे का दायित्व है। माँ की स्थिति बड़ी अजीब होती। वह समझदारी से कम, भावुकता से ज़्यादा काम लेती। दरअसल उसे मेरी सीमाओं की जानकारी न थी। वह जल्द रिश्तेदारों की बातों में आ जाती। वह भी यही समझती कि अफ़सर माने सब कुछ। वह मेरे इनकार से आहत होती। उसे लगता मैं बहू के इशारों पर रिश्तेदारों से विमुख हो रहा हूँ। फिर भी वह दोनों मामा के सामने मेरा बचाव करती और कभी-कभी रिश्तेदारों की स्वार्थपूर्ण अपेक्षाओं को सुन नाराज़ हो जाती।

दोनों मामा को लगता मैं बहाना बना रहा हूँ या मतलबी हो गया हूँ और उनकी समस्याओं पर ग़ौर नहीं करना चाहता। 'अब बहिना कि दुवार पर हम लोग झाँकने नहीं आएँगे' वे हर बार नाराज़ हो कर सुनाते जाते। जाने के पहले वे मेरे पट्टीदारों के दरवाज़े पर जा बैठते। ऐसे समय, पट्टीदार लोग उन्हें सहज उपलब्ध होते। तब वहाँ दोनों मामा की बातों को भरपूर समर्थन मिलता, वह भी सहानुभूति के घलुवे के साथ। गाँव के और लोग उतना उत्साह नहीं दिखाते जितना पट्टीदार। शायद औरों और पट्टीदारों में यही फ़र्क होता हो या यह मेरी नकारात्मक सोच हो।

मैं अब पहले की अपेक्षा, गाँव कम जाता हूँ। बच्चे बड़े हो गए हैं। अपनी छुट्टियों के साथ-साथ बच्चों की छुट्टियों और परीक्षाओं का ख़याल रखना पड़ता है। यही स्थिति मेरे छोटे भाई की है। वह साल में एक बार चक्कर लगा ले, वही बहुत है। या यों समझिए कि उसे गाँव जाना पसंद नहीं है।

हम लोगों की परिस्थितियाँ और सोच अपनी जगह हैं तो माँ-बाबू जी की पीड़ा अपनी जगह, ''बेटे लोग अपने बेटे-बेटी, मेहरारू के साथ हैं। हम लोगन को कौन पूछता है? बुढ़ापे में अकेला छोड़ दिए हैं।'' वे सबसे शिकायत करते। वे लोगों को यह नहीं बताते कि बेटे पिछले दो साल से शहर चलने के लिए मान-मनौव्वल कर रहे हैं, पर वे सुनते ही नहीं। एक बार ज़िद पकड़ ली तो पकड़ ली। कभी माँ ढीली पड़ती तो बाबू जी ऐँठ जाते। कभी बाबू जी पिघलने का मन बनाते तो गाँव वाले खुरपेंच लगा देते। कितनी बार समझाया-बुझाया, उम्र का आभास कराया, परंतु बाबू जी पीठ पर हाथ नहीं रखने देते। 'जब तक जांगर चल रहा है, चलाएँगे। यहीं पैदा हुए हैं, यहीं मरेंगे। कहीं और नहीं जाएँगे। केहू के आगे हाथ नहीं फैलाएँगे। मुझे पंखे की हवा नहीं खानी है। ज़िंदगी भर बँसवारी की हवा खाएँ हैं. वहीं खाएँगे। अपनी ज़मीन में दफ़न होंगे।''

बाबू जी की चिंता ज़र-ज़मीन को लेकर ज़्यादा थी, ''अरे जब बेटा लोग खेत-बारी की देख-रेख नहीं करेंगे तो लोग कब्जा कर लेंगे। पेड़ कटवा लेंगे। पट्टीदार तो मुँह बाए ताक रहे हैं कि कब बुड्ढ़ा-बुड्ढ़ी मरें और कब उनका घर-दुवार हथियाएँ।'' इस आशंका के जनक वह खुद थे। गाँव वाले जब-तब माँ-बाबू जी को सुना-सुना कर उनकी पीड़ा और सुलगाते रहते, ''जब बेटे गाँव-घर से लगाव नहीं रखेंगे तो पोते का रखेंगे? खेत-बारी का चिन्हेंगे? पढ़ाने-लिखाने का यही फल मिलना कुढ़ते, बोलते कुछ नहीं। पर माँ बँसवारी में बैठ गालों पर लोर चुवाती रहती। पट्टीदारी की भौजाई ऐसे समय में माँ को ढाढ़स बँधाने पहुँच जातीं, ''मत रोईए छोटकी माई! हम लोग हैं न। हम लोग आप लोगन को थोड़े छोड़ देंगे? बाबू लोग जीरात (ज़राअत) की देखभाल नहीं करेंगे तो हम लोग करेंगे। खानदान की ज़मीन-जायदाद किसी और को हड़पने देंगे?'' भौजाई की बातों से माँ की आशंका कम होने के बजाए और गहरा जाती।

छोटे जीजा ने बाबू जी के सामने एक बार प्रस्ताव रखा था कि अन्य लोगों को खेत बटाई देने के बजाए उन्हें दे दिया जाए। खेती वहीं करेंगे, सास-ससुर की देखभाल भी। जो अधिया बटाईंदारों का होता है, वह उनका होगा। परंतु बाबू जी ने इनकार कर दिया। उन्हें लगा दामाद के जी में लालच समा गई है। एक बार ससुराल में पाँव जमाया तो हटाना मुश्किल होगा। क्या पता आगे कोई बखेड़ा खड़ा कर दे या गाँव के लोग भड़का दें तो क्या होगा? फिर दूसरा दामाद क्या सोचेगा?

''बाबू! मेरी ओर भी निगाह कीजिए।'' बड़े मामा अक्सर ख़ास स्टाइ में मुझसे अनुरोध करते। वह बात तब शुरू करते, जब मेरे पास कोई और नहीं होता। यद्यपि मैं उनकी बातों पर ग़ौर नहीं करता। बस अनमने मन सुनता और जब ऊब जाता तो अपनी मजबूरी बता कर उठ जाता। मामा इससे और कुढ़ते। उन्हें मेरी बातों पर विश्वास नहीं होता। उन्हें मेरा स्वभाव नहीं भाता। समझते कि भाँजा बहाना बना रहा है या हम लोगों से कोई मतलब नहीं रखना चाहता। वह अपने चेहरे के भावों से मुझे याद दिलाते कि किस प्रकार बचपन में ममहर में मेरा ख़याल रखा जाता था। गर्मी की छुट्टियों में आम के बगीचे में या नाना के संग चरवाही में मुझे शैतानी करने की छूट थी तो सुबह-शाम नानी सजाव दही सबसे पहले मुझे ही परोसती थीं। हर बार फसल कटते ही कुछ न कुछ सीधा (राशन/अनाज) की गठरी, पका कटहल या सुथनी मामा पहुँचा देते थे। गरीबी के दिनों में मेरे पढ़ने के लिए उन्होंने एक लालटेन भी ख़रीदी थी। कई मेलों में बड़े मामा ने कंधे पर बैठाकर मुझे घुमाया था, जलेबी और घुघुनी खिलाई थी।

शायद इसलिए मामा पुरानी स्मृतियों में डूबते-उतराते, स्वयं को कुरेदते हुए बोलते जाते, ''गाँव-जवार के लोग कहते हैं कि तोहार भगिना इतना बड़ा साहब हो गया है। ऊ जवन चाहे तवन कर सकता है। खाली हुकुम करने भर की देर है।''

मैं मामा की बात का आशय समझ जाता। वह हर बार अपने कक्षा आठ पास बेटे को काम दिलाने की सिफ़ारिश करते। कभी बाबू जी से तो कभी माँ से ज़ोर डलवाते। मैं उस स्थिति में खुद को फँसा महसूस करता। मेरी तरफ़ से मनमाफ़िक जवाब न पा कर बड़े मामा अंदर ही अंदर कुलबुलाते। फिर सहानुभूति बटोरने के लिए गाँव वालों को सुनाते फिरते, ''आगे बढ़ जाने पर लोग, गरीब-गुरबों को भूल जाते हैं। हित-मीत का ख़याल नहीं करते। निगाह फेर लेते हैं। गँवई, मनई उन्हें गन्हाते हैं।'' फिर गला खँखारने के बाद अपनी बात पूरी करते, ''...सारे जवार के लोग कहते हैं कि तोहार भगिना इतना बड़ा अफ़सर हो गया है, गाड़ी, बंगला, नौकर-चाकर सब कुछ है उसके पास। शहर मेम से शादी किया है। शहर में ठाट से रहता है और आप लोगों के लड़के बेकाम घूम रहे हैं? साहब होने का यही मतलब है? वह चाहे तो एक मिनट में काम दिला दे। असल बात चाहने की है? बड़े-बड़े फैक्ट्री वाले, ऐसे साहबों के आगे-पीछे घूमते हैं।'' लोग उनकी बातों के समर्थन में सिर हिला देते। इससे मामा की सोच और वेदना और मज़बूत हो जाती।

एक बार मन में विचार आया कि बड़े मामा के बेटे को अपने गाँव का बता कर किसी अफ़सर के यहाँ लगवा दूँ। खाना-कपड़ा के अलावा हज़ार, डेढ़ हज़ार पा ही जाएगा। गाँव में पड़े-पड़े क्या करेगा? थोड़ी-सी ज़मीन-जायदाद से खाने को लाले पड़े रहते हैं। फिर सोचता कि बात छिपेगी भला? और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मामा इसके लिए तैयार होंगे? हरगिज़ नहीं। मैं उनके स्वभाव से परिचित था। अशिक्षित लोग बेमतलब की बातों को मान-सम्मान से जोड़ लेते हैं। मैं जानता था, वह सुनते ही बिगड़ जाएँगे और कहेंगे, ''यही सब करेगा मेरा बेटा। मैं मर गया हूँ का? जिसका भाई एतना बड़ा अफ़सर, ऊ झाडू लगाएगा? बरतन धोएगा?'' मैं मन ही मन सकपकाता, इस विचार को झटकता और फिर अपने ख़यालों का मज़ाक उड़ाते हुए खुद को चिढ़ाता, ''तो क्या अफ़सर बनेगा?''

छोटे मामा की अलग समस्या थी। उनकी चार बेटियाँ थीं। खेती-बारी से नून-रोटी का जुगाड़ मुश्किल से हो पाता था। वह बड़ी बेटी की शादी करना चाहते थे, परंतु हाथ खाली होने के कारण निर्णय नहीं ले पा रहे थे। पिछली बार मुझसे दस हज़ार रुपए उधार माँगे थे। मैंने मना कर दिया था। क्यों कि पिछला उधार अभी तक चुकाए नहीं थे। तब छोटे मामा सूजा हुआ मुँह लेकर लौट गए थे।

दो साल पहले वह मुझसे दो हज़ार रुपए ले गए थे, साल भर में लौटाने का करार कर के। परंतु अब तक लौटा नहीं पाए थे। कहाँ से लौटाते? कोई आमद तो थी नहीं। नाना ज़िंदा थे तो गाय, भैंसे, बकरियाँ पालते थे। दूध, दही, गाय, भैंस, बछड़ों या बकरियों के बेच कर अपनी गृहस्थी चला लेते थे। नाना के मरते ही दोनों मामियों ने घर में ऐसा महाभारत शुरू किया कि जल्द ही दो चूल्हे जलने लगे। खेत बँटे तो जानवर भी बँटे। नाना की तरह जानवरों को चराने वाला कोई था नहीं। लिहाज़ा एक-एक कर वे बिकते गए। तब नानी, छोटे मामा के हिस्से में आ गई थीं।

मेरी अपनी समस्याएँ थीं। अब बच्चे बड़े बाल बिखरे हुए। देख कर ही घिन्न आती है।''

मेरी बीवी, भौजाई की सेवा, तत्परता से विभोर होने के बजाय, पिंड छुड़ाने के फिराक में ज़्यादा रहती। ख़ासकर रसोई के कामों से। पर भौजाई थीं कि टकसने का नाम न लेतीं। बिना कहे किसी न किसी काम में स्वयं को लगा लेतीं। में जब तक उनके सेवाभाव के पीछे रहस्य को भाँप पाता, वह एक दिन बोल पड़ी, ''बाबू! हाथ खाली चल रहा है। लड़के कहीं लगे नहीं। ज़र-ज़मीन के बारे में आप जानते ही हैं। माया की शादी करनी है। लड़के वाले साठ हज़ार माँग रहे हैं। आपके भाई, बहुत परेशान रहते हैं। रात में उन्हें नींद नहीं आती। शरीर गल गया है। दमा ने ज़ोर पकड़ लिया है। खेती ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। कईसे काम चलेगा, समझ नहीं पा रही हूँ?'' बोलते-बोलते सुबकने लगीं थीं भौजाई। मेरी ओर से सहानुभूति के शब्द न निकलते देख, फिर धीरे से बोलीं, ''कुछ मदद कीजिए बाबू! ज़्यादा नहीं, बस दस हज़ार की। धीरे-धीरे लौटा दूँगी।''

मैं भौजाई की बात सुनकर सकपका गया। कहाँ से लौटाएँगी? माँगते-माँगते थक जाना पड़ेगा। संबंधों में ऊँच-नीच होगा सो अलग।

मैं जितने दिन गाँव रहता, अपेक्षाओं के भार से हल्का हो जाता। बाबू जी की अपेक्षाएँ अलग थीं। यद्यपि घर की हर आवश्यकता मैं पूरी कर देता, हर महीने उन्हें दो हज़ार रुपए भेज देता, लेकिन बाबू जी इससे संतुष्ट नहीं होते। उन्हें बटाईदारों से इतना अनाज मिल जाता कि तीस-चालीस हज़ार का बेच लें। फिर भी वह हर बार बखेड़ा खड़ा कर देते। लोगों को सुना-सुना कर मुझे कोसते, ''धान-गेहूँ बेच कर काम चला रहा हूँ। लड़िका लोग के भरोसे गृहस्थी नहीं चल रही है। जो ये लोग देते हैं, तंबाकू भर का होता है। नून, तेल, दवा, खेती-बारी के लिए मुझे इस उमिर में काम करना पड़ता है। कवनो सुख नहीं है बेटा लोग से।''

माँ इस मामले में ज़्यादा समझदारी से काम चलाती। वह इस प्रसंग पर बाबूजी से लड़ जाती, ''पइसा, पइसा किए रहते हैं रात-दिन। का करेंगे? बाँध के ले जाएँगे? सब बेटे करते हैं, पर रात दिन बेटों को कोसते रहते हैं। कभी प्यार से नहीं बोलते। गाँव-जवार में घूम-घूमकर शिकायत करते रहते हैं। कवनों लाज-शरम नहीं है इनको।''

आख़िर बाबू जी करते क्या हैं रुपयों का? मैं अक्सर सोचता रहता। बाद में मुझे जानकारी मिली कि वह सूद पर रुपए चलाते हैं। महाजनी शुरू कर रखी है। जो काम बबुआन लोग करते हैं, वही बाबू जी कर रहे हैं। पर वह हिसाब-किताब कैसे रखते होंगे? बबुआन लोग तो बकायदा रजिस्टर में अँगूठा लगवाते हैं। दबंगाई के कर्ज़ वसूल लेते हैं। बाबू जी किस बल पर यह काम कर रहे हैं? बुढ़ापे में अनपढ़ आदमी को यह काम नहीं करना चाहिए।

एक बार मैंने बाबू जी को समझाने की कोशिश की थी, ''सूदखोरी का काम आप को नहीं करना चाहिए। सूदखोरी गरीबों का खून चूसते हैं और वैसे भी आप की उम्र ज़्यादा हो गई है। कोई रुपए न लौटाए तो?'' पर बाबू जी मानते नहीं। मुझसे लड़-झगड़ कर जो रुपए लेते, वह सूद पर चलाते। यह कार्य मुझे भाता नहीं। स्वयं बाबू जी को मालूम है कि साहूकार के थोड़े से कर्ज़ के सूद से वह पंद्रह साल में मुक्त हुए थे। मैं सोचता, अब बाबू जी को किस चीज़ की कमी है? क्यों पैसों के पीछे भागते रहते हैं? इस उम्र में उन्हें सारी चिंता छोड़ मेरे पास रहना चाहिए। आराम करना चाहिए। लेकिन बाबू जी को समझा पाना आसान न था।

बाद में मैंने बाबू जी को रुपए देने बंद कर दिए और माँ के हाथों में घर-गृहस्थी के वास्ते रुपए पकड़ाने लगा।

धीरे-धीरे मैं गाँव के लोगों की बातों से ऊबने लगा था। मुझे हर किसी की बात चाटुकारिता लगती। गरीबी, भूख और बीमारी की भयावहता तो गाँव में थी। पर इसे मैं दूर नहीं कर सकता था। आगे बढ़ने का यह मतलब तो था नहीं कि अपना सब कुछ लुटा दिया जाए? और ऐसा कर के भी तो समस्या ख़त्म नहीं होने वाली थी।

इस बीच मेरे गाँव के मेधावी लड़के, प्रमोद की बीमारी ने मुझे खुद की आवश्यकताओं, सीमाओं को तोड़ने को बाध्य कर दिया। प्रमोद के बाबू जी, में बस गए, अब बहिन को कइसे याद रखेंगे?'' बड़ी दीदी ने अपनी पीड़ा और ताने को माँ से कह दिया था।

पट्टीदारी की भौजाई बारी-बँसवारी में महिलाओं को सुनाती फिरतीं, ''पट्टीदारी को कौन पूछता है? दुवार लीपते-लीपते बुढ़ा गई, उनकी टहल-टकोरी करती रही पर मेरी ओर निगाह नहीं किए साहब।''

इसी बीच गाँव के पुरोहित, बाबू जी को अलग उकसाने में लगे थे, ''अरे साहब को समझाइए भगत जी। धन कमाया जाता है पुण्य के कामों में लगाने के लिए, इधर-उधर छींटने के लिए नहीं। ऐसा काम किया जाता है जिससे खानदान का नाम रोशन हो, लोग माँ-बाप का नाम आदर से लें।'' फिर कुछ क्षण के लिए रुक गए पुरोहित। माथे पर हथेली को फिराते हुए कुछ सोच कर बोले, ''काहे ना साहब आपके नाम से गाँव में एक मंदिर बनवा देते हैं। ज़िंदगी भर लोग नाम गाएँगे भगत जी। इह लोक और परलोक दोनों सुधर जाएगा।''

बाबू जी को पुरोहित की बात पसंद नहीं आई। वह सोचने लगे, मंदिर से का भला होगा? माना कि बेटे ने पैसा लुटाया है, पर बुरा काम तो नहीं किया है? पुरोहित खामखाह आग लगा रहे हैं।
परंतु इसका यह मतलब नहीं कि बाबू जी का गुस्सा उतर गया था।

बाबू जी की पीड़ा अंदर-अंदर सुलगती रहती। जब कोई कर्ज़ माँगने आता तो भभक पड़ते, ''मेरे पास रुपिया कहाँ है? बेटा लोग कानी-कौड़ी नहीं देते हैं। परमारथ से कुछ बचे तब न।''

दशहरा की छुट्टियाँ यों ही गुज़र गई थीं। बोझिल और उखड़ी हुई। कभी किसी से खुल कर बात नहीं हुई। रिश्ते मुझे तौलना चाहते थे और मैं मेढ़क की तरह उनकी तराजू से छिटक जा रहा था। ऐसे माहौल में पता नहीं बीवी-बच्चों ने कैसा महसूस किया होगा, मैं जान नहीं पाया था।

एक बार मन में विचार आया कि बड़े मामा के बेटे को अपने गाँव का बता कर किसी अफ़सर के यहाँ लगवा दूँ। खाना-कपड़ा के अलावा हज़ार, डेढ़ हज़ार पा ही जाएगा। गाँव में पड़े-पड़े क्या करेगा? थोड़ी-सी ज़मीन-जायदाद से खाने को लाले पड़े रहते हैं। फिर सोचता कि बात छिपेगी भला? और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मामा इसके लिए तैयार होंगे? हरगिज़ नहीं। मैं उनके स्वभाव से परिचित था। अशिक्षित लोग बेमतलब की बातों को मान-सम्मान से जोड़ लेते हैं। मैं जानता था, वह सुनते ही बिगड़ जाएँगे और कहेंगे, ''यही सब करेगा मेरा बेटा। मैं मर गया हूँ का? जिसका भाई एतना बड़ा अफ़सर, ऊ झाडू लगाएगा? बरतन धोएगा?'' मैं मन ही मन सकपकाता, इस विचार को झटकता और फिर अपने ख़यालों का मज़ाक उड़ाते हुए खुद को चिढ़ाता, ''तो क्या अफ़सर बनेगा?''

छोटे मामा की अलग समस्या थी। उनकी चार बेटियाँ थीं। खेती-बारी से नून-रोटी का जुगाड़ मुश्किल से हो पाता था। वह बड़ी बेटी की शादी करना चाहते थे, परंतु हाथ खाली होने के कारण निर्णय नहीं ले पा रहे थे। पिछली बार मुझसे दस हज़ार रुपए उधार माँगे थे। मैंने मना कर दिया था। क्यों कि पिछला उधार अभी तक चुकाए नहीं थे। तब छोटे मामा सूजा हुआ मुँह लेकर लौट गए थे।

दो साल पहले वह मुझसे दो हज़ार रुपए ले गए थे, साल भर में लौटाने का करार कर के। परंतु अब तक लौटा नहीं पाए थे। कहाँ से लौटाते? कोई आमद तो थी नहीं। नाना ज़िंदा थे तो गाय, भैंसे, बकरियाँ पालते थे। दूध, दही, गाय, भैंस, बछड़ों या बकरियों के बेच कर अपनी गृहस्थी चला लेते थे। नाना के मरते ही दोनों मामियों ने घर में ऐसा महाभारत शुरू किया कि जल्द ही दो चूल्हे जलने लगे। खेत बँटे तो जानवर भी बँटे। नाना की तरह जानवरों को चराने वाला कोई था नहीं। लिहाज़ा एक-एक कर वे बिकते गए। तब नानी, छोटे मामा के हिस्से में आ गई थीं।

मेरी अपनी समस्याएँ थीं। अब बच्चे बड़े बाल बिखरे हुए। देख कर ही घिन्न आती है।''

मेरी बीवी, भौजाई की सेवा, तत्परता से विभोर होने के बजाय, पिंड छुड़ाने के फिराक में ज़्यादा रहती। ख़ासकर रसोई के कामों से। पर भौजाई थीं कि टकसने का नाम न लेतीं। बिना कहे किसी न किसी काम में स्वयं को लगा लेतीं। में जब तक उनके सेवाभाव के पीछे रहस्य को भाँप पाता, वह एक दिन बोल पड़ी, ''बाबू! हाथ खाली चल रहा है। लड़के कहीं लगे नहीं। ज़र-ज़मीन के बारे में आप जानते ही हैं। माया की शादी करनी है। लड़के वाले साठ हज़ार माँग रहे हैं। आपके भाई, बहुत परेशान रहते हैं। रात में उन्हें नींद नहीं आती। शरीर गल गया है। दमा ने ज़ोर पकड़ लिया है। खेती ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। कईसे काम चलेगा, समझ नहीं पा रही हूँ?'' बोलते-बोलते सुबकने लगीं थीं भौजाई। मेरी ओर से सहानुभूति के शब्द न निकलते देख, फिर धीरे से बोलीं, ''कुछ मदद कीजिए बाबू! ज़्यादा नहीं, बस दस हज़ार की। धीरे-धीरे लौटा दूँगी।''

मैं भौजाई की बात सुनकर सकपका गया। कहाँ से लौटाएँगी? माँगते-माँगते थक जाना पड़ेगा। संबंधों में ऊँच-नीच होगा सो अलग।

मैं जितने दिन गाँव रहता, अपेक्षाओं के भार से हल्का हो जाता। बाबू जी की अपेक्षाएँ अलग थीं। यद्यपि घर की हर आवश्यकता मैं पूरी कर देता, हर महीने उन्हें दो हज़ार रुपए भेज देता, लेकिन बाबू जी इससे संतुष्ट नहीं होते। उन्हें बटाईदारों से इतना अनाज मिल जाता कि तीस-चालीस हज़ार का बेच लें। फिर भी वह हर बार बखेड़ा खड़ा कर देते। लोगों को सुना-सुना कर मुझे कोसते, ''धान-गेहूँ बेच कर काम चला रहा हूँ। लड़िका लोग के भरोसे गृहस्थी नहीं चल रही है। जो ये लोग देते हैं, तंबाकू भर का होता है। नून, तेल, दवा, खेती-बारी के लिए मुझे इस उमिर में काम करना पड़ता है। कवनो सुख नहीं है बेटा लोग से।''

माँ इस मामले में ज़्यादा समझदारी से काम चलाती। वह इस प्रसंग पर बाबूजी से लड़ जाती, ''पइसा, पइसा किए रहते हैं रात-दिन। का करेंगे? बाँध के ले जाएँगे? सब बेटे करते हैं, पर रात दिन बेटों को कोसते रहते हैं। कभी प्यार से नहीं बोलते। गाँव-जवार में घूम-घूमकर शिकायत करते रहते हैं। कवनों लाज-शरम नहीं है इनको।''

आख़िर बाबू जी करते क्या हैं रुपयों का? मैं अक्सर सोचता रहता। बाद में मुझे जानकारी मिली कि वह सूद पर रुपए चलाते हैं। महाजनी शुरू कर रखी है। जो काम बबुआन लोग करते हैं, वही बाबू जी कर रहे हैं। पर वह हिसाब-किताब कैसे रखते होंगे? बबुआन लोग तो बकायदा रजिस्टर में अँगूठा लगवाते हैं। दबंगाई के कर्ज़ वसूल लेते हैं। बाबू जी किस बल पर यह काम कर रहे हैं? बुढ़ापे में अनपढ़ आदमी को यह काम नहीं करना चाहिए।

एक बार मैंने बाबू जी को समझाने की कोशिश की थी, ''सूदखोरी का काम आप को नहीं करना चाहिए। सूदखोरी गरीबों का खून चूसते हैं और वैसे भी आप की उम्र ज़्यादा हो गई है। कोई रुपए न लौटाए तो?'' पर बाबू जी मानते नहीं। मुझसे लड़-झगड़ कर जो रुपए लेते, वह सूद पर चलाते। यह कार्य मुझे भाता नहीं। स्वयं बाबू जी को मालूम है कि साहूकार के थोड़े से कर्ज़ के सूद से वह पंद्रह साल में मुक्त हुए थे। मैं सोचता, अब बाबू जी को किस चीज़ की कमी है? क्यों पैसों के पीछे भागते रहते हैं? इस उम्र में उन्हें सारी चिंता छोड़ मेरे पास रहना चाहिए। आराम करना चाहिए। लेकिन बाबू जी को समझा पाना आसान न था।

बाद में मैंने बाबू जी को रुपए देने बंद कर दिए और माँ के हाथों में घर-गृहस्थी के वास्ते रुपए पकड़ाने लगा।

धीरे-धीरे मैं गाँव के लोगों की बातों से ऊबने लगा था। मुझे हर किसी की बात चाटुकारिता लगती। गरीबी, भूख और बीमारी की भयावहता तो गाँव में थी। पर इसे मैं दूर नहीं कर सकता था। आगे बढ़ने का यह मतलब तो था नहीं कि अपना सब कुछ लुटा दिया जाए? और ऐसा कर के भी तो समस्या ख़त्म नहीं होने वाली थी।

इस बीच मेरे गाँव के मेधावी लड़के, प्रमोद की बीमारी ने मुझे खुद की आवश्यकताओं, सीमाओं को तोड़ने को बाध्य कर दिया। प्रमोद के बाबू जी, में बस गए, अब बहिन को कइसे याद रखेंगे?'' बड़ी दीदी ने अपनी पीड़ा और ताने को माँ से कह दिया था।

पट्टीदारी की भौजाई बारी-बँसवारी में महिलाओं को सुनाती फिरतीं, ''पट्टीदारी को कौन पूछता है? दुवार लीपते-लीपते बुढ़ा गई, उनकी टहल-टकोरी करती रही पर मेरी ओर निगाह नहीं किए साहब।''

इसी बीच गाँव के पुरोहित, बाबू जी को अलग उकसाने में लगे थे, ''अरे साहब को समझाइए भगत जी। धन कमाया जाता है पुण्य के कामों में लगाने के लिए, इधर-उधर छींटने के लिए नहीं। ऐसा काम किया जाता है जिससे खानदान का नाम रोशन हो, लोग माँ-बाप का नाम आदर से लें।'' फिर कुछ क्षण के लिए रुक गए पुरोहित। माथे पर हथेली को फिराते हुए कुछ सोच कर बोले, ''काहे ना साहब आपके नाम से गाँव में एक मंदिर बनवा देते हैं। ज़िंदगी भर लोग नाम गाएँगे भगत जी। इह लोक और परलोक दोनों सुधर जाएगा।''

बाबू जी को पुरोहित की बात पसंद नहीं आई। वह सोचने लगे, मंदिर से का भला होगा? माना कि बेटे ने पैसा लुटाया है, पर बुरा काम तो नहीं किया है? पुरोहित खामखाह आग लगा रहे हैं।
परंतु इसका यह मतलब नहीं कि बाबू जी का गुस्सा उतर गया था।

बाबू जी की पीड़ा अंदर-अंदर सुलगती रहती। जब कोई कर्ज़ माँगने आता तो भभक पड़ते, ''मेरे पास रुपिया कहाँ है? बेटा लोग कानी-कौड़ी नहीं देते हैं। परमारथ से कुछ बचे तब न।''

दशहरा की छुट्टियाँ यों ही गुज़र गई थीं। बोझिल और उखड़ी हुई। कभी किसी से खुल कर बात नहीं हुई। रिश्ते मुझे तौलना चाहते थे और मैं मेढ़क की तरह उनकी तराजू से छिटक जा रहा था। ऐसे माहौल में पता नहीं बीवी-बच्चों ने कैसा महसूस किया होगा, मैं जान नहीं पाया था।

पृष्ठ : . . ३.

आगे-

1

1
मुखपृष्ठ पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार । अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़े
1
1

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।