मुखपृष्ठ

पुरालेख-तिथि-अनुसार -पुरालेख-विषयानुसार -हिंदी-लिंक -हमारे-लेखक -लेखकों से


2
दादी गहरे ख्वाब में डूबती जा रही थी। क्या नाम था उसका? कुछ था तो, अच्छा-सा...। हिम उसके पोते का बेटा... यानी चौथी पीढ़ी। वह बेटी से पत्नी, फिर माँ, फिर दादी अब परदादी बनी। वह झुल-झुल बुढ़िया अपने हाथों-पैरों को देखती है तो लगता है कि ये सूखी लकड़ियाँ अब होम हो जानी चाहिए। पर अपने हाथ में क्या है? आँखों की बरौनियाँ तक पककर सफ़ेद हो चुकी है। यह लंबा सफ़र उसे ताउम्र भटकाता रहा... छलता रहा। वह आँखें मूँदकर फिर खोलती है, कुछ खोजने की कोशिश में - अपना नाम... अपना परिचय... क्या था भी कभी?

इसी दशहरा की तो बात है, उसका बड़ा पोता कनाडा से आया हुआ था। घर में बड़ी पूजा थी, खाते-पीते अच्छी दोपहर हो गई थी। पोते की बहू उसे खिला-पिलाकर पैर दबाने लगी तो उसके रोम-रोम ने आशीर्वाद दिया। इतने में छोटा पोता हँसकर पूछने लगा, ''चीन्हती भी है दादी, कौन पैर दबाती है?''
''अरे हाँ रे, तेरी दुलहिनिया है।''
''ना दादी, ये तो भाभी है।''
उसने झट आँखें तरेरकर खंडन किया। ''विदेसी बहू को कहाँ फुरसत है मेरी सेवा की,'' इस पर सुराज ने समझाया था, ''हाँ माँ, ये बड़के की दुलहिन है।''

सच है उम्र का एक लंबा दौर उसने काट दिया है। पीछे पलटकर देखती है तो बचपन को सीधे-सीधे नहीं पकड़ पाती। लंबी सुरंग-सी ज़िंदगी... हाँ, उलटे-उलटे पैर लौटे तो कुछ-कुछ ध्यान आता है। हिम-सुराज के छोटे बेटे का बेटा है जिसका कोई तीन-चार साल पहले ही ब्याह हुआ था। सुराज का बड़ा बेटा कनाडा में नौकरी करता है। उसके एक बेटा और एक बेटी है जो अकसर दुर्गापूजा में घर आते हैं। इस बार भी आया था तो उसके लिए बड़ी सुंदर चिकनी-सी साड़ी लाया था, पर वह उसे बहुत नहीं पहन पाती है, माथे से सरका जाती है साड़ी। अब तो बाल भी गिनती के रह गए हैं सिर पर। उसने सिर पर हाथ फेरा... सन-से सफ़ेद-भुट्टे जैसे बाल...। बचपन में भुट्टे के बाल इकट्ठे किया करते थे हम... वह सोचने लगी। और सोचते हुए अपने बाबा के मकान के पिछवाड़े जा पहुँची... बरसों पीछे मिट्टी का घर, ऊपर खपरैल का छत... पिछवाड़े में खड़ा नीम गाछ। वह संभ्रांत बंगाली परिवार की लड़की थी, उस ज़माने में भी काफ़ी आधुनिक सोच वाले थे उसके माता-पिता। मास्टर जी घर पर आते थे पढ़ाने के लिए, तब वह इसी पिछवाड़े छिप जाया करती। कभी भुट्टे के बाल अपने बालों पर ढक देती और बुढ़िया बनकर हैरानी से सोचती- क्या कभी सचमुच ऐसी ही बुढ़ी हो जाएगी वह भी? वक्त आज उसे अजीब से मोड़ पर ले आया था। आज वह बूढ़ी जर्जर अपने बचपन को टटोल रही थी।

''गुड्डी... गुड्डी... '' माँ पुकार रही थी, ''खित्तदा आए हैं कहाँ छिपी बैठी है?'' पहले भी दो रोज़ लौट गए थे खित्तदा। माँ झल्ला रही थी जब नहीं पढ़ना चाहती तो ज़रूर है पढ़ाना... छोड़ो भी, लड़की है, कोई लड़का तो है नहीं कि कमाकर खिलाए। माँ बड़बड़ाती हुई बाबा पर गुस्साने लगी, ''अरे लड़की को सिलाई-बिनाई सिखाना चाहिए, खूब पढ़-लिखकर क्या करेगी, अपना नाम लिख लेती है, बस हो गया।''
''अपना नाम... '' हाँ, यही तो टूटा तार था उसका। उसने लिखा है अपना नाम, इन्हीं उँगलियों से... पर आज याद नहीं आ रहा। नाम... जिसे दुनिया में उजागर करने की प्रेरणा देते थे खित्तदा...हाँ, खित्तदा, नाम तो था क्षितिज, पर खित्तदा ही पुकारते थे सब उन्हें। कैसी जोश भरी बातें करते थे खित्तदा, ''जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है। जानती हो, हमारा देश अभी आज़ाद नहीं है, अंग्रेजों के शिकंजे में जकड़ा है और पराधीन जीवन व्यर्थ है, एकदम व्यर्थ...। हमें कुछ करना चाहिए, इस देश का क़र्ज़ा है हम पर, हमें उसे खून देकर भी चुकाना होगा। ये जो तुम भागती हो पढ़ने से क्या सोचती हो, तुम लड़की हो तो फारिग हो गई इस ज़िम्मेवारी से?''
वह हैरान देखती, ''आमी की, कैनो...मैं क्या, कैसे कर सकती हूँ खित्तदा?'' ''तुम क्या नहीं कर सकती? देखो तुम लड़की हो, तुम्हें देखकर कोई शक भी नहीं करेगा...हमारी कितनी चिट्ठी-पतरी पहुँचा सकती हो... पर नहीं, तुम्हारे बस का नहीं। तुम तो एक डरपोक लड़की हो और पढ़ाई-लिखाई से भी तुम्हारा दूर-दूर तक वास्ता नहीं... ना-ना तुम से न होगा।''

वह आज भी विह्वल हो गई है। खित्तदा ने उसकी ज़िंदगी को नया अर्थ दिया था, उद्देश्य दिया था। कितनी ही बार उसने उनके ज़रूरी काग़ज़ इधर-उधर पहुँचाए थे, किसी को कानोंकान ख़बर न हुई थी। एक बार कालीबाड़ी के पीछे से निकलते हुए गीली मिट्टी पर पैर फिसल गया और उसकी चीख निकल आई। गोरे सिपाही दौड़कर आए थे, घेर लिया उसे।
''किधर जाता? नाम केया तुम्हारा?'' एक पल को घिग्घी बँध गई उसकी, पर फिर अगले ही पल वह और गँवारों-सी मुँह फाड़कर रोने लगी, ''आमार नाम केया।'' ''केया... ? वाट... ? नाम बताओ... जल्दी, नहीं तो अरेस्ट कर ले जाएँगे।''
''ओई तो... आमार नाम केया, केया तुमी जानो ना? एकटा फूल होए।'' और ऊपर डाल पर लगे फूल की ओर इशारा किया था उसने।
''तुम को फूल माँगता?'' गोरा हँसने लगा और डाल हिलाकर ढेरों फूल गिरा दिए उसने... नीचे हरसिंगार के सफ़ेद-सिंदूरी फूल-ही-फूल बिछ गए थे।

वह हँस पडी... केया, नहीं यह तो यों ही, अंग्रेज़ों के वाट-वाट, केया-केया सुनकर रख लिया था उसने और यही नाम काम कर गया था। बहरहाल, केया नाम भी बुरा नहीं था। खित्तदा हौले-से हँसे थे उसकी चातुरी पर।
''देखो केया, ज़ोखिम भरा काम है यह, जान भी जा सकती है इसमें।''
''जानती हूँ खित्तदा, जग्ग(यज्ञ) में आहुति तो देना ही पड़ता है। मैं तैयार हूँ... आप आगे का काम बताएँ,'' उसने कमर कस ली थी। ऐसे कितने ही अवसर आए थे। वह घर से निकलती तो एक बार भर आँख देखती थी अपना घर और पिछवाड़े का नीम गाछ।

''काम होने पर मिलूँगी खित्तदा,'' कहकर एक आशा बाँधे सख्त बनकर निकल पड़ती थी।
समय जैसे पींग बढ़ा रहा था, अब वह भी खित्तदा के दल और अभियान का एक ज़रूरी हिस्सा थी। ऐसा सिर्फ़ एकबार ही हुआ था कि कोई काम उसे सौंपने से मना कर दिया था खित्तदा ने।

पृष्ठ : 1. 2. 3

आगे-

1

1
मुखपृष्ठ पुरालेख तिथि अनुसार । पुरालेख विषयानुसार । अपनी प्रतिक्रिया  लिखें / पढ़े
1
1

© सर्वाधिका सुरक्षित
"अभिव्यक्ति" व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक
सोमवार को परिवर्धित होती है।