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''केनो, केनो,'' पूछ-पूछकर जी हलकान कर बैठी थी वह।
''नहीं, बहुत जोखिम भरा काम है यह, और फिर ससुरारियों को किंचित शंका भी हो गई है तुम पर...।'' खित्तदा अँग्रेज़ों को ग़ुस्से में ससुरारी कहकर गलियाते थे।
''शक ससुरारी को नहीं, तुम्हें है खित्तदा, मेरी क़ाबिलीयत पर, जाने दो मुझे, विश्वास करो, काम पूरा किए बिना मरूँगी नहीं मैं।''

अगले रोज़ सुबह-सुबह एक पंजाबिन खित्तदा के दरवाज़े खड़ी थी।
''किसी चाहिए? हमने पहचाना नहीं आपको?'' खित्तदा ने विस्मय से पूछा तो वह झक्क से हँस दी, ''तुस्सी मैन्नू पहिचान सकदे ने? नई ना... तो ससुरारी मैन्नू किस तरा पहिचान सकदे हाँ? खित्तदा, तुस्सी शुबा ना करो, मैन्नू कम्म सोंपो...।''
''ओरी बाबा... तुमी अपूर्णा... ,'' कहते हुए खित्तदा ने खुशी से तीन बार ताली बजाई, ''खूब भालो, खूब भालो अपूर्णा।''
हाँ, अपूर्णा! यही तो नाम था उसका, नहीं अपूर्णा... कलकत्ता से अपूर्णा बन गया था। पर यही सही-सगा नाम था उसका, उसकी परिणति को दर्शाता। खित्तदा ने सबसे भारी काम सौंप दिया था उसे। वह निकल पड़ी थी उसे अंजाम देने। पर उधर किसी ने मुखबिरी की और उधर गोरों ने घेर लिया खित्तदा को। खित्तदा पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। काम पूरा कर लौटी तो पता चला। लगा जैसे अपूर्णा ही रह गई वह...। कितनी लंबी बरसात रही... अपूर्णा छिप-छिपकर रोती रही।

वक्त बीतता चला गया। खित्तदा की जगह कोई न ले सका। दल के सभी साथी बिखर गए। कुछ एक तो अलग दलों में जा मिले और प्रफुल्लो दा ने नीरा दी से ब्याह कर गृहस्थी बसा ली। बाबा ने सुयोग्य वर देखकर उसे भी ब्याह दिया। वह मन में एक टीस दबाए नियति के आगे नतमस्तक हो गई। ब्याह का विरोध कर पाने का संस्कार नहीं था उसके पास। एक हूक ही रह गई कि वह भी देश के काम आती।

दीपेन रोज़ सुबह-सबेरे घर से निकलते और देर रात लौटते।
''सुनोजी मैं बिसेस काज से दिल्ली जा रहा हूँ, सप्ताह भर में लौटूँगा, तुम्हें भय तो नहीं लगेगा?''
''मैं किसी से नहीं डरती।'' एकदम सधी आवाज़ में अपूर्णा बोली थी। दीपेन अकसर काम से दिल्ली-कलकत्ता करते रहते। एक दिन कुछ ज़्यादा ही विचलित दिखाई पड़ रहे थे।
''सुबह से देख रही हूँ, बरामदे में चहलक़दमी कर रहे हैं, कोई परेशानी है तो बताइए।''
और दीपेन ने पहली बार नज़र भर कर देखा था अठारह बरस की उस दिलेर लड़की को।
''जानती हो, मेरे जीवन का एक मिशन है, एक ध्येय - आज़ादी...सुराज...अपना देश...अपना राज...किसी की गुलामी नहीं...सुराज...सुराज।''

अपूर्णा को लगा जैसे उसका जन्म फिर अर्थ खोजने लगा। वह अपना टूटा तार फिर से जोड़ने लगी और बुलंद इरादों से खड़ी हो गई दीपेन के साथ। कदम-कदम पर ख़तरों से खेलना उसकी और दीपेन की दिनचर्या बन गई थी। दीपेन गर्म दल के सक्रिय कार्यकर्ता थे, स्वतंत्रता की ललक सर चढ़कर बोल रही थी। एक दिन उन्होंने अँग्रेज़ कलेक्टर पर बम फेंका, उन पर मुकदमा चला और वंदेमातरम का नारा लगाते वे फाँसी के फंदे पर झूल गए। अपूर्णा ने वैधव्य का सिंगार ओढ़ लिया। सूना माथा, सूने हाथ... शाखा-पोला, सब धरा का धरा रह गया। फिर पंद्रह अगस्त आया...स्वतंत्रता मिली...मिशन पूरा हुआ... खित्तदा का मिशन... दीपेन का मिशन। अपूर्णा का मिशन भी ठीक उसी रोज़ पूरा हुआ।
''मुबारक हो दीदी, बेटा हुआ है... नाम सोचा है कुछ? सुराज।'' अपूर्णा की मुँदी आँखों से जलधार बह निकली।

आज भी नयन कोर गीले हो गए बूढ़ी अपूर्णा के। किंतु नहीं... वह अपूर्णा थी ही कब... वक्त के हाथों नाचती कठपुतली थी वह। उसे गाना अच्छा लगता था, पर बाबा की इच्छा थी वह पढ़े, उसने पढ़ा-बंगला, हिंदी और थोड़ी अंग्रेज़ी भी। खित्तदा ने सिखाया देश पर उत्सर्ग होना...खुद उत्सर्ग हो गए। दीपेन की संगिनी बनी...दीपेन ने साथ छोड़ दिया। नीरा दी उसे कितना भाती थी। भर हाथ लाल-लाल चूडियाँ, ताँत की लाल पाड़ की साड़ी, माथे पर बड़ी-सी टिकुली और माँग में टिहु-टिहु लाल सिंदूर। वह देखती थी खुद को... ऐसे ही चूड़ियाँ छनकाते...सुराज के पीछे भागते...वह चाहती थी कि सुराज उसे दौड़ा-दौड़ाकर थका दे... पूछ-पूछकर, बोल-बोलकर माथा झुका दे। पर सुराज बिलकुल उलट था। शुरू से ही धीर-गंभीर, समझदार। वह बहुत भाँपकर चलता था कि कभी उसके किए से माँ को कोई तकलीफ़ न पहुँचे, बहू भी खूब ध्यान रखती थी अपूर्णा का।

लेकिन फिर भी, ज़िंदगी शायद नाम ही समझौतों का है। जब सुराज के बड़े बेटे को कनाडा जाना था नौकरी करने, तब वह कितना आहत हुई थी। पढ़ाई-लिखाई की यहाँ, लायक बनाया इस देश ने और सेवा करने चल दिया दूसरे देश? सुराज ने समझा-बहला दिया उसे। फिर उस रोज़ जब पासपोर्टवाला बाबू छानबीन करने आया था घर और पोते ने धर दिया था उसकी हथेली पर सौ का एक नोट, तब सुराज ने तो अनदेखा कर दिया पर वह न कर सकी... बिलकुल ही टूट गई वह। क्या इसी दिन के लिए जान हथेली पर लिए फिरते थे हम सब... क्या इसी दिन के लिए खित्तदा ने, दीपेन ने अपनी जान उत्सर्ग की? उसकी ज़िंदगी का आधे से अधिक हिस्सा, सुराजेर माँ के नाम से जाना जाता रहा... क्या यही था सुराज?

हिम जाग गया था और दा-दी पुकारकर उससे लिपट गया। कितनी मिठास थी इस एक संबोधन में - जैसे उसके मन का सारा अवसाद ब्लॉटिंग पेपर की तरह जज़्ब कर लिया हो हिम ने। वह झूल गया था दादी की टहनी-सी बाँह पर और लगा जैसे उसने हिला दी हो डाली फूलों की - ''तुम को फूला माँगता?'' ...और हर ओर जैसे हरसिंगार के सफ़ेद-सिंदूरी फूल-ही-फूल बिखर गए हों। ज़िंदगी आँख मिचौली खेलती उसी से पूछ रही थी। कौन हो तुम - पूर्णा... या अपूर्णा...

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१६ जनवरी २००७

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