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"धरे के धरे रह गए तुम्हारे
सब अरमान कि मैं ये कर दूँगा और मैं वो कर दूँगा। अरे! जो करना
है सब ऊपरवाले ने करना है, हमारे तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं।"
वह बिना रुके बोलती ही चली जा रही थी, "स्साले!...सभी तो पंगे लेते
रहते हैं मोहल्ले वालों से घड़ी-घड़ी। अब किस-किस को समझाती
फिरूँ? कि इनकी तो सारी की सारी पीढ़ियाँ ही ऐसी हैं, मैं क्या
करूँ? पता नही मैं कहाँ से इनके पल्ले पड़ गई? अच्छी भली तो
पसंद आ गई थी उस इलाहाबाद वाले को लेकिन! अब किस्मत को क्या
दोष दूँ? मति तो आखिर मेरी ही मारी गई थी न? इस बावले के चौखटे
में शशि कपूर जो दिखता था मुझे। अब मुझे क्या पता था कि ये भी
असली शशि कपूर के माफिक तोन्दूमल बन बैठेगा कुछ ही सालों में?
तोन्दूमल सुनते ही मुझे गुस्सा आ गया और ज़ोर से चिल्लाता हुआ
बोला, "क्या बक-बक लगा रखी है सुबह से? चुप हो लिया करो कभी कम
से कम।" ये क्या कि एक बार शुरू हुई तो भाग ली सीधा सरपट
समझौता एक्सप्रेस की तरह पता है ना! अभी पिछले साल ही बम
फटा है उसमें? चुप हो जा एकदम से कहीं मेरे गुस्से का बम ही
ना फट पड़े तुझ पर।" मैं दाँत पीसता हुआ बोला। "होली से दो दिन पहले ही खुद मुझे अपने गाँव ले जाने के लिए आ गया था नत्थू कि खूब मौज करेंगे। मैं भी क्या करता? कैसे मना करता उसे? कैसे कंट्रोल करता खुद पे? कैसे उभरने नहीं देता अपने लुके-छिपे दबे अरमानों को? आखिर! मैं भी तो हाड़-माँस का जीता-जागता इनसान ही था ना? मेरे भी कुछ सपने थे, मेरे भी कुछ अरमान थे। पट्ठे ने! सपने भी तो एक से एक सतरंगी दिखाए थे कि खूब होली खेलेंगे गाँव की गोरियों के संग और मुझे देखो! मैं बावला... अपने काम-धंधे को अनदेखा कर चल पड़ा था बिना कुछ सोचे समझे उसके साथ... "आखिर में मैं लुटा-पिटा-सा चेहरा लिए भरे मन से घर वापस लौट रहा था, यही सोच में डूबा था कि घर वापस जाऊँ तो कैसे जाऊँ? और किस मुँह से जाऊँ?" "बडी डींगे जो हाँकी थी कि मैं ये कर दूँगा और मैं वो कर दूँगा। पिछली बार का बदला ना लिया तो! मेरा भी नाम राजीव नहीं, कोई कसर बाकी नहीं रखूँगा।" "अब क्या बताऊँगा और कैसे बताऊँगा बीवी को कि मैं तो बिना खेले ही बाज़ी हार चुका हूँ, क्या करूँ? अब इस कमबख़्त मरी भांग का सरूर ही कुछ ऐसा सर चढ़ कर बोला कि सब के सब पासे उलटे पड़ते चले गए। कहाँ मैं स्कीम बनाए बैठा था कि मुफ़्त में माल तो पाडूँगा ही और रंग से सराबोर कर डालूँगा सबको सो अलग! हालाँकि बीवी ने मना किया था कि ज़्यादा नहीं चढ़ाना लेकिन अब इस कमबख्त नादान दिल को समझाए कौन? अपुन को तो बस! मुफ़्त की मिले सही फिर कौन कंबख्त देखता है कि कितनी पी और कितनी नहीं पी? पूरा टैंकर हूँ! पूरा टैंकर, कितने लोटे गटकता चला गया, कुछ पता ही ना चला। मदमस्त हो भांग का सरूर सर पे चढ़ता चला जा रहा था, लेकिन! सब का सब इतनी जल्दी काफूर हो जाएगा ये सोचा ना था। पता नहीं किस-किस से पिटवाया उस नत्थू के बच्चे ने। स्साले ने! पिछली बार की कसर पूरी करनी थी, सो मीठा बन अपुन को ही पट्टू पा गया था इस बार। उल्लू का पट्ठा! दावत के बहाने ले गया अपने गाँव और कर डाली अपनी सारी हसरतें पूरी। शायद! पट्ठे ने सब कुछ पहले से ही सेट कर के रखा हुआ था। वर्ना मैं? मैं भला किसी के हत्थे चढ़ने वाला कहाँ था? स्साले! वो आठ-आठ लाठियों से
लैस एक तरफ़ और दूसरी तरफ़ मैं निहत्था अकेला, बेवकूफ़! अनपढ़
कहीं के भला ऐसे भी कहीं खेली जाती है होली? अरे! खेलनी ही है
तो रंग से खेलो, गुलाल से खेलो, जम के खेलो और...ज़रा ढंग से
खेलो। कौन मना करता है और! करे भी क्योंकर? आखिर! त्योहार है
होली, पूरी धूमधाम से मनाओ।" ये क्या कि पहले तो किसी निहत्थे
को टुल्ली करो तबीयत से फिर उठाओ और पटक डालो सीधा बासी गोबर
से भरे हौद में? ऊपर से! बाहर निकलने का मौका देना तो दूर अपने
मोहल्ले की लड़कियों से डंडों की बरसात करवा दी सो अलग! हुँ...ह!
बड़ी आई लट्ठमार होली।" |
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१७ मार्च २००८ |
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