| ३ |
मेरी सहेलियाँ, आस-पास के सब
छोटे और मेरे साथ के बड़े बच्चे घेर कर खड़े थे, हमारी कार। और
क्या अब तो कार हमारी ही थी। मैंने सबको दूर किया था, अरे सबके
सब गंदे हाथ से छुए डाल रहे थे, वैसे मैंने भी पहली बार कार
छुई थी, पर कार तो मेरी थी तो मना भी मैं ही करूँगी ना। इतनी
चिकनी इतनी बड़ी, ऑटो तो छोटा-सा, पुराना भी कितना था।
मम्मी पापा बाहर आए और आज किसी
से बोले ही नहीं। सब पड़ोसी, कुछ घरों के भीतर से और कुछ बाहर
निकल कर देख रहे थे, हमारी कार। उसकी सीट कितनी चिकनी थी,
प्रिन्स और मुझे पापा ने जैसे ही इशारा किया, खट्ट से पीछे बैठ
गए, सही में बहुत मुलायम सीट थी। मम्मी भी पीछे बैठ रही थी, कि
पापा बोल पड़े, उस चमक दमक से दूर हमारी
बस्ती में जिसके सामने वो ऊँची इमारतें हैं, कितनी फीकी-सी है।
पर मैं तो रहती हूँ यहीं, प्रिन्स मम्मी और पापा भी। यही तो है
वो जगह जहाँ से गाँव से यहाँ आए मेरे पापा के आगे बढ़ने बड़ा
आदमी बनने के सपने शुरू हुए थे। चमक-दमक, कार, ये घूमना-फिरना
एक दिन की खुशी है और हमारी बस्ती हमेशा साथ रहने वाली खुशी,
पर हाँ ये त्योहार भी तो एक दिन की खुशी ही तो हैं। पता नहीं
पूछूँगी कभी किसी से कि कौन-सी खुशी बड़ी है। मुझे तो लगता है
कि खुशियाँ तो बस खुशियाँ हैं, छोटी बड़ी कैसे? पता नहीं। वो १२
बजे घर से ही देखा था अभी, कहीं पटाखे छूट रहे थे...कितनी चमक
थी। जैसे कितने सारे तारे एक साथ निकल आए थे ऊपर आसमान में,
गिरते हुए से, छिटक कर हर कहीं फ़ैलते हुए से। दूसरी डायरी ये एक नया साल है नए दिन, ५ जनवरी, नीता का नया भोर का तार चिपका होगा आकाश के किसी कोने में, हाँ एकदम ताज़ा नया नहीं ५ दिन बूढ़ा। इतने दिन हम बस इतने व्यस्त थे, इतने खुश थे की सोच ही नहीं पाए कि कोई डायरी भी थी जो रोज़ लिखी जाती थी। ३१ दिसंबर, दिल्ली की
सर्दियों में तो, शाम के ३ कब बजे गए पता ही नहीं चला था, और
आगे का समय जाने कहाँ पंख पसारे उड़ता चला गया, वो तो एकदम
ख़याल ही नहीं। घर की डोर बेल बजी, नीता लेटी थी, मैंने उठ कर
दरवाज़ा खोला तो, सामने क्या देखता हूँ, उदय खड़ा था। हाँ उदय
आया, बिना बताए, "सरप्राइज़ पापा...सरप्राइज़।'' किसी समय
एकाएक इतनी खुशी मिले तो शब्द भी साथ छोड़ देते हैं। नीता ने
आवाज़ सुन ली थी, उसी से बँधी दौड़ती चली आ रही थी, बाहर आई, और
हर बार की तरह मुझे भूल नीता से लिपट गया उदय। एक लड़की भी साथ
थी, मैं समझ गया, आशा है। पीछे सामान खींचती-सी, चुपचाप खड़ी
थी। कुछ दिनों पहले उदय ने हमें आशा के बारे में बताया था। सामने खड़ी आशा माँ बेटे को
ऐसे मिलते देख मुसकरा रही थी। मुझसे "हाय" किया उसने, फिर शायद
उसे ही अटपटा-सा लगा और "नमस्ते" में हाथ जोड़ दिए। शुद्ध हिंदी
उच्चारण, "जी में आशा हूँ"। मैं तो खुश हुआ ऐसा उच्चारण यहाँ
लोगों का न हो। माँ बेटे के मेल-मिलाप के बीच
आशा से बातें कीं, कहीं अपने को अकेला ना समझने लगे। नीता तो
बस बेटा दिख जाए मगन हो जाती है, फिर और कुछ दिखता नहीं उसे।
आशा ने मुझसे न्यू इयर सेलिब्रेशन प्लान के बारे में पूछा। मैं
याद करते हुए बताता हूँ कि आज से ५ साल पहले जब मैं रिटायर हुआ
था, ऑफ़िस की पार्टी मेरी भी लास्ट न्यू इयर पार्टी थी। उसके
बाद हमने इलाहाबाद छोड़ दिया। यहाँ दिल्ली में आकर रहने लगे।
आशा की आँखें भी हँसती हैं जब वो हँसती है। खुश थी कि मैंने
यहाँ आकर रुकने की कोशिश नहीं की, बिजनेस शुरू किया, वो काम
शुरू किया जो घर बैठे हो सकता था, अरे भई ऑटो चलते हैं,
अस्थाना साब के। हर किसी के लिए खुशियाँ
अलग-अलग परिभाषा रखती हैं। आज खाली बैठा था, नीता भी सो रही
थी, तो कार ड्राइवर प्रकाश से बात हुई, अभी थोड़ी देर पहले।
काफ़ी देर बाद शरमाते हुए बताया उसने कि जब हम न्यू इयर पार्टी
में थे, वो अपने परिवार को उसके शब्दों में "सहर घुमाने नए साल
पर" ले गया था। उसका न्यू इयर सेलिब्रेशन। सबकी एक अलग दुनिया
सबका एक छोटा-सा स्वर्ग। अपने बच्चों, क्या नाम बताया था
ज्योना या ज्योती और हाँ प्रिन्स के बारे में बताता रहा। |
|
| पृष्ठ : १. २. ३. |
७ जनवरी २००८ |