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ममा तो आजतक नहीं सीखीं। तो इतनी कोई बात नहीं देर से सीखने में।
पर नेहा अब तैयार है हर चीज़ के लिए। यों नेहा हर काम सीखने के लिए वक्त से पहले तैयार रहती है। उसके स्कूल की टीचर भी यही कहा करती थी। यही बात है कि उसे हर काम आसान लगा करता था। क्लास में वह हमेशा आगे ही रही। पर उसके इसी गुण को लेकर ममी की सहेली ने नेहा को प्रिकाशस बच्ची कहा था यानी कि वक्त से पहले ही ''प्रिपेयर्ड'' । वह गुण की तरह नहीं बल्कि एक दोष की तरह ही सुनाया गया था यों बात भी कुछ अजीब-सी हो गई थी। तब वह ग्यारह बरस की रही होगी। क्लास में जैनी ने सब लड़कियों से पूछा था तुम में से कौन कौन वर्जिन है।

नेहा को वर्जिन का मतलब ही नहीं पता था। पर उसने देखा कि जिस लड़की ने भी कहा कि वह वर्जिन है उसका जैनी और उसकी सहेलियों ने खूब मज़ाक उड़ाया था। ना ही नेहा की हिम्मत पड़ती थी अपनी सहपाठियों पर अनजानापन ज़ाहिर करने की। पर घर आकर उसने पहला काम यही किया कि ममी के अपनी सहेली के साथ बैठे होने पर भी ध्यान न दे टपककर सवाल पूछ लिया, ''ममी वर्जिन क्या होता है?''

ममी अभी सवाल के प्रति सतर्क भी नहीं हुई थीं कि नेहा ने जोड़ दिया, ''मैं तो वर्जिन नहीं हूँ न ममी?''
इससे पहले कि ममी के अवाक चेहरे पर कोई हरकत होती ममी की सहेली बोल उठी थीं, ''माई गॉड, कितनी प्रिकाशस बच्ची है। मुँह से दूध निकला नहीं कि वर्जिनिटी के सवाल उठने लगे। भई अभी तो तुम्हारे पढ़ने खेलने की उम्र है। यह सब जानकर करना भी क्या है?

ममी ने मानो होश में आते हुए कहा था, ''नेहा तुम ते इतनी अच्छी इतनी अकलमंद बच्ची हो तुम्हें इन सब बातों में नहीं पड़ना चाहिए। ऐसी अमरीकी लड़कियों की संगत में पड़ो ही ना। बस अपना फोकस पढ़ाई पर ही रखो।

अपनी नज़र में आज भी नेहा उतनी ही भोली या समझदार थी जितनी कि सवाल पूछने से पहले लेकिन उसे लगा कि सवाल मात्र पूछने से ही वह ममी पापा की नज़र में कुछ और हो गई थी। तब से नेहा को लगा कि ममी पापा को वह सबसे प्यारी तभी लगती है जबकि वह भोली नन्हीं बच्ची बनी रहती है। जिसे कुछ नहीं मालूम दुनिया दीन का। पापा बेहद खुश होते जब वह तोतली ज़बान में हिन्दी में बतियाती।

पर जहाँ स्कूल के काम का सवाल था वे उससे पूरी बल्कि सामान्य से ज़्यादा परिपक्वता की उम्मीद करते। उसे याद है कि एक बार उसके इम्तहान में नम्बर कम आए थे तो उन्होंने कहा था, ''डोंट एँड अप बिइंग मेडयाकर यू मस्ट एक्सेल इन योर स्टडीज़।''

अब इतने बरसों बाद भी परिपक्वता या अपरिपक्वता की वह द्विविधा शायद सुलझी नहीं दिखती। किन चीज़ों में बढ़िया हो जाना चाहिए और किन में नहीं इसका माप तोल चलता ही रहता है।

एक बार गाड़ी चलाना सीखते-सीखते वे लोग मैनहैट्टेन को दाएँ बाएँ से घेरने वाली हाईवे पर आ गए थे। पर नेहा अभी भी धीमी गति से ही चला रही थी। पापा बोले जब तुम हाईवे पर चलती हो ते स्पीड तेज़ रखनी होती है। सड़क भी खूब चौड़ी होती है और लाल बत्तियाँ भी नहीं होतीं। साथ ही दूसरी कारें भी इतनी तेज़ी से चल रही होती हैं कि अगर तुम धीमा चलाओगी तो सारे यातायात में व्यतिक्रम और गतिरोध पैदा हो जाएगा। इसी से कह रहा हूँ कि सड़क की लय को सबसे पहले समझना चाहिए। तभी तुम अच्छी और सेफ ड्राइवर बन सकती हो।

नेहा अब बहुत-सी उन चीज़ों के लिए भी तैयार है जिसे पापा जानते समझते हुए भी चर्चा से बचते आए हैं।

नेहा का महसूस होता है कि ममी पापा इस बारे में ही स्पष्ट नहीं है कि उनकी बेटी को लड़का अपनी मर्ज़ी से अपने आप खोजना चाहिए या कि वे इसके लिए 'इंतज़ाम करेंगे।' ममी की बड़ी बहन की बेटी की शादी जोधपुर रहने वाले एक लड़के से तय हुई थी। यहाँ आने के बाद उसका अजीब-सा ही सलूक रहा और अंतत: उसका शादी का हश्र तलाक में हुआ था। तभी से ममी नेहा की किसी हिन्दुतान के लड़के से शादी तय करने को खिलाफ़ थीं।

पर अब नेहा के बड़ी हो जाने के बाद कभी तो वह कह देतीं कि फलाँ आँटी तुमको एक लड़के से मिलवाना चाहती हैं। यह भी साथ ही जोड़ देतीं कि तुम मिलना चाहती हो तो मिलो वर्ना ऐसी कोई ज़बरदस्ती नहीं। ममी कहतीं, ''आई डोंट वाँट यू तू ह्युमिलिएटड।''
कभी वह कह डालतीं, ''यों ठीक है पढ़ती रहो और नौकरी भी करो पर देखा जाए तो बाइस तेईस साल में शादी तो हो ही जानी चाहिए लड़कियों की। मैं तो इक्कीस भी पूरे नही कर पाई थी जब शादी हुई।''

नेहा को लगा कि ममी के रवैये में बदलाव इस पर भी मुनस्सर करता था कि उन दिनों वे किस से मिल रहीं थी। अपनी अमरीकी सहेलियों से, कुछ पुराने ख़यालों की हिन्दुस्तानी सहेलियों से, या किसी रिश्तेदार से। ममी उनके सवालों और टिप्पणियों से बहुत जल्दी बहक जाती।

इसलिए शायद ममी नेहा से कभी यह भी कह देतीं, ''देख हमारा तो जमाना और था यहाँ कोई शादी की जल्दी नहीं मचाता। जब कोई ढंग का टकरा जाए तो कर लो वर्ना अपने काम में लगे रहो। कोई बंदिश तो नहीं। हिन्दुस्तान में तो अब तक सारे रिश्तेदार पीछे पड़ गए होते कि भई लड़की को क्यों अभी तक कुँवारा बैठा रखा है।

और साथ ही जोड़ देतीं, ''वैसे तो शादी हो जानी चाहिए लड़कियों की ठीक उम्र में वर्ना न तो अच्छे लड़के हीं बचे रहते हैं और लड़कियों का स्वभाव भी इतना पक्का हो जाता है कि मन माफिक लड़का मिलना ही मुश्किल हो जाता है।''

नेहा को मालूम था कि ममी का इशारा उसकी सहेली अंशुल की ओर था। अंशुल उनत्तीस बरस की हो चली थी। तीन साल पहले एक भारतीय मूल के लड़के के साथ उसका संबंध बढ़ा था और दोनों एक साथ रहने लगे थे। फिर साल भर बाद उस लड़के ने कहा था कि उसका अंशुल से शादी का विचार नहीं। वे चाहें तो यों ही साथ रहते रहें। कभी भविष्य में भी उसका शादी का इरादा होगा इसका भी कोई आश्वासन नहीं था।

अंशुल ने रिश्ता तोड़ लिया था। उसके बाद जो भी रिश्ता बने उसका हश्र कुछ ऐसा ही हो रहा था। एक लैटिन अमरीकी लड़का था जिसके साथ वह शादी नहीं करना चाहती थी। एक काला लड़का था जिससे शादी करने से उसने माँ बाप ने सख़्त विरोध किया था। यों माँ बाप की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाकर चाहे वह शादी कर ही लेती पर वह रिश्ता खुद ही टूट गया।

अब वह अचानक उनतीस बरस की उम्र में सन्यासिन बनने की ठान कर बैठ गई थी। न तो अब वह वैसे झमक-झमक गहने पहनती थी न ही चेहरे पर गहरा मेकअप करती। सफ़ेद साड़ी पहन घंटो ध्यान में लगी रहती। उसने अपने अपार्टमेंट में ही एक कोने में मूर्तियाँ रख कर मंदिर बना लिया था।

आए दिन दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक कार्यक्रमों को संगठित करती और नारीवाद की हिमायत करती। कितनी कड़वाहट भर गई थी अंशुल में मर्दजात के प्रति। एक उग्रनारीवादी बन कर उसने यही कड़वाहट सारे समाज में फैलाने का बीड़ा उठा लिया था।
नेहा उस कड़वाहट से बचना चाहती हैं।

ममी को डर लगता कि ठीक उम्र में नेहा किसी से बंधी नहीं तो पता नहीं किस दिशा में मुड़ जाए। अंशुल का ज़िक्र कर वह कह देती, ''यह भी कोई उम्र है सन्यास लेने की। उनत्तीस बरस में तो लड़की सर से पाँव तक गृहस्थी में रमी होती है। तुम्हारी पीढ़ी की तो बातें ही निराली है। कभी तो इतना राग रंग और कभी धूनी रमा लो।''

नेहा हँस देती, ''ममी ये सब फ़ैड हैं। कल को अंशुल को कोई मन पसंद लड़का मिल गया तो सन्यास वन्यास सब भूल जाएगी। उसे रोज़ ही जीने का कोई नया मक़सद खोजना होता है।''
''वह तो ठीक है पर कुछ टिकाव भी होना चाहिए ज़िन्दगी में। अब इस उम्र में तो किसी के साथ बंध ही जाना चाहिए न?''
नेहा को खुद भी तो नहीं पता कि सही दिशा क्या हैं।

अपने माँ बाप के तरीके की तयशुदा शादी उसकी कल्पना के बाहर है। बाकी किसी से रिश्ता जोड़ने में वह भी घबराती है। जो भी रिश्ता जोड़ता है उसे अंत तक पूरे चरम तक पहुँचाना होता है। तभी कोई गंभीरता से विवाह की बात सोचता है। और इसी चरम तक आज़मा लेने के दौरान पता नहीं कब क्या चटख जाएगा कि पूरा रिश्ता ही चकनाचूर हो जाता है। उसकी सहेलियों के साथ यही कुछ तो हो रहा है। इसी डर से वह किसी लड़के के साथ गहरी आत्मीयता का रिश्ता नहीं जोड़ पाई। मन के रिश्ते से शरीर के रिश्ते को परे रखना नामुमकिन हो जाता है। बल्कि यह भी एक शर्त हो जाती है कि मन को समर्पित कर दिया तो शरीर क्या चीज़ है। उसे उलझने में हिचक क्यों?

इसी उलझन में उसका शरीर अभी तक कुँवारा है। अतृप्त है। पर वह कब तक खुद को सँभाल कर रखती रहेगी। ममी हमेशा उसे खुद को बचाए रखने के लिए शादी तक कुँवारापन बनाए रखने का पाठ बचपन से पढ़ाती रही हैं।

क्या जब तक सही लड़का नहीं मिलता वह यों ही रहे? केवल शरीर की तृप्ति के लिए शादी के बंधन में पड़ जाना तो अक्ल की बात नहीं। ऐसा नहीं होने देगी वह?
नेहा समझ नहीं पाती कि ममी सचमुच मे क्या चाहती है! कभी तो इतने खुले दिमाग वाली अमरीकी महिलाओं जैसी बन जाती हैं तो कभी एकदम दकियानूसी।

उस दिन उसने सुना ममी की एक हिन्दुस्तानी सहेली कह रही थीं, ''आजकल तो ज़माना बदल गया है क्या पता कल को लड़की आकर यह कहे कि मैं फलाँ लड़के के साथ रहना चाहती हूँ शादी किए बग़ैर। हमारे रोकने से कोई सुनेंगे भला? मुझे तो ऐसे ख़याल डराते रहते हैं। अगर कुछ ऐसा हुआ तो सारे समाज में बदनामी हो जाएगी।

शायद उन्हीं की बात का असर होगा कि अगले दिन ममी नेहा से पूछ रही थीं, ''तेरे दिमाग में कोई लड़का है तो हमे बता दे। अगर तुम किसी के साथ वाथ रहने की सोच रही हो तो हम तुम्हारी मँगनी किए देते हैं। यों ही नहीं रहने दूँगी मैं।''

नेहा खूब सोच रही है, आजकल सोचती ही रहती है कैसे सही रास्ते पर उतारे अपनी ज़िन्दगी।
नेहा के पास बहुत कुछ है बताने को! ममी की ऐसी बातें उसे आश्वासन नहीं देतीं और डरा देती हैं।

नेहा अभी किसी से मँगनी नहीं करना चाहती, वह सचमुच सिर्फ़ साथ रहकर देखना चाहती है। अभी उसका शादी में बँधने का इरादा नहीं। फिर भी किसी के प्रेम और साथ से खुद को वंचित नहीं रखना चाहती। ममी ने भी तो इक्कीस की उम्र में शादी कर ली थी। वह तो तेईस पार कर लगभग चौबीस की हो चुकी है। क्या वह ममी को बता सकती है कि वह लड़का साथ ही पढ़ता हुआ एक अमरीकी है? वह इस तरह से महात्वाकांक्षी नहीं जैसा ममी पापा अपने जवाई की कल्पना करते हैं। वह डॉक्टर, इंजिनियर या वकिल कुछ भी नहीं बनना चाहता। वह स्कूल टीचर है और इस देश के बच्चों को स्कूली शिक्षा की अच्छी नींव देने में विश्वास रखता है। उसे बच्चों के साथ काम करना पसंद है और वही कर रहा है, करना चाहता है। कैसे बताएगी उनको? वे तो कैसा मुँह बनाएँगे। ममी सोचेगी कैसा लद्धड़ लड़का चुना है स्कूली टीचर? वह ममी के चेहरे पर आए उतार चढ़ाव की बहुत सही कल्पना कर सकती है। उसके बाद ममी बहुत देर तक उससे बात नहीं करेंगी। सोंच में पड़ जाएँगी। शायद रोएँ धोयें भी कि उनके उम्र भर के ख़याली पुलावों पर पानी पड़ गया। कहाँ उनकी बेटी तो आर्किटेक्ट है और जँवाई स्कूली टीचर?

यों है तो नेहा के ही स्कूल ऑफ आर्किटेक्ट का स्नातक पर सर पर हाइस्कूल के बच्चों का दिमाग दुरूस्त करने का फितूर! ममी शायद किसी को उसके धंधे के बारे में बताना भी न चाहें। उसने ममी की प्रतिक्रियाओं को बहुत पहले से जान लिया है। उसकी एक सहेली के बारे में वे पहले ही कह चुकी है, ''नियति खुद ही इतनी ब्राइट और खुबसूरत लड़की है। यह एक स्कूली टीचर के शिकंजे में कैसे फँस गई? नेहा को ममी के कहने के अंदाज़ से बहुत बुरा लगा था। उसने नियति की पैरवी करते हुए ममी को समझाने की कोशिश भी की थी, ''ममी वह तो बड़ा आइडियलिस्टिक लड़का है। उसका ढेर सारे पैसे कमाने में विश्वास नहीं है। वह बच्चों की ज़िन्दगी बनाना चाहता है। ममी अगर स्कूली टीचिंग में अच्छे और ब्राइट लोग नहीं जाएँगे तो इस देश के नागरिक कैसे अच्छे बनेंगे? सब कोई युनिवर्सिटी में ही पढ़ने लगें और स्कूलों में न पढ़ाना चाहें तो युनिवर्सिटियों में पढ़ने कौन आएगा?''

ममी ने उसे चुप करा दिया था, ''फिक्र मत कर बहुत हैं स्कूलों में पढ़नेवाले। मैं तो सिर्फ़ यह कहना चाहती थी कि नियति उससे कही बेहतर के योग्य है। बाकी सयाना कौवा गू पर ही बैठे तो कोई क्या कर सकता है?''

नेहा फिर भी पैरवी करती ही रही थी, ''ममी अभी अगर वह स्कूली टीचर है तो इसका यह मतलब नहीं कि सारी उम्र यही बना रहेगा। यहाँ लोग प्रोफेशन बदलते रहते हैं। कल को युनिवर्सिटी में पी-एच. डी. में दाखिला लेकर बाद में युनिवर्सिटी का प्रोफेसर भी बन सकता है। या जो कुछ भी करना चाहे। यों स्कूली टीचर की तनख्वाह भी कालेज प्रोफेसर से कम नहीं होती बाकी यहाँ हिन्दुस्तान वाली बात नहीं है कि एक बार जो बन गए वही रास्ता सारी उम्र के लिए हो गया।''

''ठीक है ज़्यादा बड़ बड़ मत कर। हर वक्त मुझी को शिक्षा देती रहती है।'' ममी को इस बात का भी गुस्सा आता है कि बजाय वे अपनी बेटी को शिक्षा दें उल्टे वहीं उनको भाषण देती रहती है जैसे कि वह अनुभवी दादी अम्मा हो और ममी मात्र एक बच्ची? बच्ची को आज़ादी देने का यह फल मिल रहा है उनको! पर पापा से उसकी इस तरह पेश आने की हिम्मत नहीं होती। पापा से डरती है और उनकी बात ध्यान से समझती भी है। माँ को तो कुछ समझती ही नहीं।

पापा जब उसे सड़क की लय समझा रहे थे तो नेहा को लगा जैसे पापा बहुत कुछ समझते हैं। अब वे उसकी तोतली बोली सुनने की फ़रमाइश भी नहीं करते। ताकि उस बात का अपने ऊपर हँसते हुए ज़िक्र करते हैं कि कैसे उनको यह बोली पहले मीठी लगा करती थी।

पर अब नेहा बड़ी हो गई है और उसे बड़ों की तरह ही बोलना चाहिए। सोचते सोचते अचानक उसकी हिम्मत पड़ गई थी, ''पापा ड्राइविंग प्रैक्टिस के बाद मुझे पीटर के यहाँ छोड़ देंगे?''
''पीटर कौन? यह कोई नया दोस्त है तुम्हारा?''
''नया नहीं स्कूल में साथ पढ़ता था अब वह फिर न्यू यार्क में लौट आया है।''
''कहाँ छोड़ना है?''
''फोर्टी फिफ्थ स्ट्रीट पर।''
''क्या जगह? कोई रेस्ट्राँ है?''
''नहीं।''
''रहता हैं वहाँ?''
''हाँ'', कुछ हिचक के साथ नेहा ने उगला था छोटासा 'हाँ'
पापा ने हैरानी साफ़ न झलकाते हुए पूछा था,
''तुम उसके अपार्टमेंट में जाओगी?''
''मेरी उससे बहुत पुरानी दोस्ती है।''

पापा का भय, कर्तव्यपरायणता, समझदारी सभी कुछ उनके चेहरे पर भरपूर उतर आए थे। कुछ सचेष्ट संयमित स्वर में बोले, ''लेकिन जानती हो न किसी लड़के के अपार्टमेंट में इस तरह जाना क्या वहाँ और भी लोग होंगे?''

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