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''मुझे मालूम नहीं पर शायद मुझी को बुलाया है।'' वह चाहती थी कि पापा सच जान जाएँ और सच बोलने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी।
पापा जान जाएँ और चुप रह अपनी सम्मति दे दें ऐसी ही भीतरी ख़्वाहिश थी उसकी।
''तो तुम्हारी इतनी दोस्ती है कि?''
''हूँ''
''क्या तुम उससे प्यार करती है?''
''हूँ? मालूम नहीं''
''अगर तुम उसके अपार्टमेंट में अकेली जा रही हो तो तभी जाओ अगर वह इन्सान तुम्हारे लिए ख़ास है, वर्ना कुछ ऐसा वैसा हो गया तो गलत होगा।''
''पापा वह ख़ास तो है।''
''इसका मतलब तुम उसे प्यार करती हो।''
''मालूम नहीं। हम बहुत पक्के दोस्त हैं।''
''या और कोई लड़का तुम्हारा इतना पक्का दोस्त है।''
''नहीं।''
''तो फिर यही तुम्हारा ख़ास है। तुम शायद उसे प्यार भी करती हो। मेरे सामने गवारा करने से घबराती हो।''
''अभी मालूम नहीं कुछ कह नहीं सकती। हो सकता है करती हूँ।''

नेहा हैरान थी यह कैसी बातचीत उसमें और पापा के बीच हो रही है आज? उसे अचानक महसुस हुआ कि पापा की निगाह में वह सचमुच बड़ी हो चुकी है। पापा समझते हैं सब। बस वही घबराती रही है इस तरह की बातचीत से।
''तुम चाहो तो मैं मिल लूँगा उससे।''
''लेकिन पापा ऐसी कोई सीरियस बात नहीं। मैं खुद भी नहीं जानती यह रिश्ता किस तरह का आकार लेगा।''
''पर अगर तुम्हें अपने पर भरोसा या उसके मन का ज्ञान नहीं तो उसके अपार्टमेंट में क्यों जा रही हो? एक बात कहूँ?''
अचानक एक डर का भाव जागा - क्या कहेंगे पापा?
''देखो बेटे मैं खुद चूँकि एक मर्द हूँ। इसलिए मर्द के नज़रिये की ही सलाह दूँगा। कोई भी लड़की इस तरह जब पुरुष के पास जाती है तो पुरुष उसकी कद्र नहीं करता। अपने आप को दुर्लभ बना कर रखो तो देखो कैसे लड़के पीछे भागते हैं।
''पापा! नेहा ने कहना चाहा कि अब तक तो उसने खुद को दुर्लभ ही बना कर रखा हुआ हैं। पर उसे ऐसे कोई पीछे भागने वाले नहीं मिले।

जो आए वे उससे पहले दोस्ती ही करना चाहते थे, उसे जानना चाहते थे अगर वह खुद सबसे दूर रहती है तो आत्मीयता ही कहाँ बनती, दोस्ती ही क्यों कर होती?

नेहा ने गौर किया कि पापा आखिर पापा ही थे। बेटी की अस्मत को लेकर घबराए हुए पर उनका कहने का अंदाज़ रौबीला नहीं दोस्ताना था।
पापा को आश्वस्ति देने का मन हो आया था नेहा का।
''हम लोग साथ-साथ एक प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहे हैं।''
''कैसा प्रोजेक्ट?''
नेहा को कहते हुए लगा कि वह झूठ नहीं बोल रही थी। पीटर और उसने इस बारे में काफी लंबी बातचीत कर रखी थी। चाहे आज वह सिर्फ़ इसी बातचीत के सिलसिले में नहीं जा रही थी और भी बहत सी गप्पे मारनी थीं।

कहीं उसे भी अंदाज़ था कि अपने अपार्टमेंट में के सूनेपन में छू भी सकता है और छूने से आगे भी । नेहा सिर से पाँव तक सिहर गई पर इस सिहरन में डर से ज़्यादा चुनौती थी और उसे महसूस हो रहा था कि वह हर तरह की चुनौती के लिए आज तैयार थी। साथ ही वह यह भी जानती थी कि पूरी तैयारी के बावजूद वह पीटर के साथ सिर्फ़ फिल्म का चर्चा करके भी आ सकती थी।
नेहा को भी समझ नहीं आता था कि क्या अच्छा है क्या ग़लत!

वे लोग हाईवे से उतर कर पहले एवेन्यू पर आ गए थे। सामने पीली बत्ती थी। पीछे गाडियाँ आ रही थीं। पापा बोले, ''चलती रहो'' और समझाने लगे उसे, ''पीली बत्ती पर गाड़ी रोकनी होती है पर अगर तेज़ गति से चल रहे हों और अचानक पीली बत्ती हो जाए तो गाड़ी की गति तेज़ कर के निकल जाना चाहिए वर्ना पीछे से उसी तेज़ गति से आती गाड़ी मार सकती है।

फिर अचानक जैसे ध्यान आ गया हो, बोले, ''कैसा फिल्म प्रोजेक्ट है?''
''अभी तो उसकी स्क्रिप्ट ही तैयार कर रहे है। सती पर फिल्म बनाएँगे।''
''सती?''
''हाँ, आप इतने हैरान क्यों है?''
''तुम क्या जानती हो सती के बारे में? क्या थीम होगी?''
''हम कहानी को उन्नीसवी सदी में जड़ रहे हैं। उसमें ब्रिटिश सुधारक भी होंगे। वह अंग्रेज़ सती होने वाली हीरोइन को बचा लेता है और फिर उन दोनों के संवादों के बीच से हीरोइन के नज़रिये में बदलाव लाया जाएगा।''
''तुम्हारा मतलब कि वह सती प्रथा का खंडन करेगी।
''पर उसे अपना धर्म बदलना पड़ता है क्योंकि हिन्दू समाज से उसे बहिष्कृत कर दिया जाता है कि वह पति की चिता से उठी क्यों?''

''पर हिन्दू धर्म हर औरत को पति के साथ जल मरने की आज्ञा तो नहीं देता। यह सब तुम्हारे अधकचरे ज्ञान को प्रगट करता है। मुझे तो इस कहानी में तुक नहीं नज़र आ रही।''
''दिस इज पोस्ट कोलोनियल स्टफ। दो बातें है पापा एक तो मैं अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म बनाना चाहती हूँ जो भारत और यहाँ, दोनों को समेटे ताकि दुनिया भर के दर्शक वर्ग को देखने में दिलचस्पी हो। दूसरे सती जैसी बुरी प्रथा पर फिल्म बनानी चाहिए और दुनिया के लोगों का इस पर ध्यान जाए ताकि इसके शमन की ओर कुछ किया जाए, तीसरे यह भी कि विषय ऐसा है कि हमें फिल्म बनाने के लिए पैसा मिलने में भी कम मुश्किल होगी।
''और तुम्हारा आर्किटक्चर?''
''फिल्म के साथ साथ वह भी चलाती रहूँगी। पीटर ने तो इसलिए हार्ड प्रेशर नौकरी छोड़ कर स्कूल में पढ़ाने का काम शुरू कर दिया है। ताकि फिल्म पर वक्त लगा सके। अभी तो शूटिंग की स्टेज आने में बहुत वक्त पड़ा है। अभी स्क्रिप्ट ही पूरा नहीं हुआ।''
उस दिन पापा ने उसे ड्राप कर दिया था। अजीब बात है कि पापा उसे समझते हैं और उसके दोस्त जैसे बनते जा रहे हैं।

जबकि ज्यों-ज्यों वह बड़ी हो रही है ममी का नज़रिया सकुचाया जा रहा है। एक उतावली और घबराहट-सी रहती है उनमें नेहा की शादी के मसले को लेकर। नेहा को लगता है कि यह सब उनकी अमरीका में बसी हिन्दुस्तानी सहेलियों का दबाव है। वर्ना ममी बड़े ही खुले सोच वाली थीं। उसने इस बात पर ममी से आमना-सामना भी किया था। चूँकि अंशुल सन्यासिनी हो गई तुम सोचती हो मेरे साथ की सारी लड़कियाँ पागल हैं? या हो जाएँगी?

''हाँ वक्त पर शादी होना बहुत ज़रूरी है।''
''जो न हो तो?''
''तो बहुत बुरा होगा?''
''क्या बुरा होगा?''
''आखिर ये रिवाज बने हैं तो इनका कुछ मतलब ही है न?''
''मतलब तो यही है न कि बच्चे पैदा करो और गृहस्थी में लग जाओ। पर मैं तो वैसे ही जुटी हूँ नौकरी में। फिल्म बनाने में। मेरे पास गृहस्थी चलाने की फुर्सत अभी कहाँ हैं?'' जब हुई तो सोच लूँगी औए कभी न हुई तो कभी नहीं सोचूँगी।''

यही तो मुश्किल है। तुम सोचती हो कि बिना गृहस्थी के सारी उम्र कट सकती है। तभी तुमने मेरे लाख कहने के बावजूद खाना तक बनाना नहीं सीखा।
''ममी मेरे साथ के ज़ादातर लोग खाना बाहर ही खाते हैं। किसी को बनाना नहीं होता। बनाने का शौक हो तो एकाध चीज़ सीखी भी जा सकती है। पर वह ऐसा कोई मस्ट नहीं हैं जैसा तुम समझती है।''
''जा जा, तेरे से बहस कौन करे।''

नेहा ममी के रूख से बेहद परेशान हो जाती थी। कहीं तो ममी दुनिया भर में ढिंढोरा पीटती थीं कि वह अपनी बेटी के साथ शादी की ज़बरदस्ती कभी नहीं करेंगी। अब जैसे उसकी उम्र के हर बढ़ते साल के साथ उल्टे रास्ते पर बढ़ती जा रही हैं।
नेहा का डर सच निकला। ममी ने पीटर के बारे में सवाल पूछ ही लिया।
जब पापा ने उसे पीटर के यहाँ ड्राप किया था उन्हीं दिनों ममी ने भी सवाल पूछा था उस रिश्ते में शादी की गंभीरता का।

ममी को टाल दिया था नेहा ने। पर अपने आप से यही सवाल वह बार बात पूछती थी और पीटर से भी। उस दिन जब पापा ने उसे पीटर के यहाँ ड्राप किया तो वही सब कुछ हुआ जिसका पापा को डर था। और फिर भी उसने सब कुछ नहीं होने दिया क्योंकि पापा की बात कहीं भीतर तक गड़ गई थी।
पीटर ने उसका हाथ छुआ ही था कि वह बोल पड़ी, ''अगर तुम्हारा शादी का ख़याल नहीं तो मैं इस रिश्ते को आगे बढ़ाना नहीं चाहूँगी।
पीटर ने घचके से हाथ पीछे कर लिया था। बहुत देर तक खामोश सोचता रहा था।

फिर पीटर ने उसका चेहरा दोनों हाथों मे लेकर चूम लिया और उसके कंधों को थपथपाता हुआ बोला था, ''इतनी टैंस क्यों हो तुम आज? रिलैक्स!''
''रिलैक्स करने का वक्त रहा नहीं। रोज़ किसी न किसी तरह से शादी की बात छिड़ ही जाती है।'' खुद को पीटर के स्पर्श से झटककर नेहा ने कहा था।
''तुम सचमुच शादी करना चाहती हो मुझसे?''

पता नहीं नेहा के मुँह से क्या निकला था। ममी पापा की पसंदगी नापसंदगी खुद पीटर के साथ भविष्य को लेकर संदेह कितना कुछ तो था इस जवाब की भूमिका बनता हुआ। वह शायद हाँ कहना चाहती थी पर मन में खीझ सी भरी हुई थी। उसकी ज़िन्दगी का सबसे अहम् फ़ैसला था और उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या फ़ैसला ले।
''तो मुझसे क्या उम्मीद करती हो मैं तो फिलहाल शादी वादी का सोचना चाहता ही नहीं। फिर यह भी तो ज़रूरी है कि हम एकदूसरे को भली-भाँति जान लें पूरी तरह से।
''जिस जानने की तुम बात करते हो वह शादी के बाद ही हो सकता है।''
''शादी का फ़ैसला मैं तभी कर सकता हूँ जब कि हमारी हर तरह से कम्पैटिबिलिटी हो।''
''मान लो मैं तुम्हारी बात मान भी लूँ तो क्या गारंटी है कि तुम मुकर नहीं जाओगे?''
''गारंटी तो कभी होगी ही नहीं, शादी के बाद भी नहीं। क्या तुम मुझे गारंटी दे सकती हो कि मुझे छोड़ कर नहीं जाओगी।''
''हाँ पर अगर तुम किसी दूसरी ओर आकृष्ट हो जाओ ता मैं तुम्हारे साथ चिपकी नहीं रहूँगी।''

''खैर ये सब कहने की बातें हैं। अगर गारंटियाँ होतीं तो इतने तलाक क्यों होते?'' हमारा रिश्ता आज सुखद है तो कल को बिगड़ भी सकता है। रह कर पता लगता है और साथ रहने से तुम घबराती हो?''
''तुम़्हें मेरी मजबूरी का पता है। मुझमें भी तुम्हें खुद को सौंप देने की उतावली तुमसे कम नहीं।''

''और इसके लिए तुम मुझसे शादी जैसी चीज़ में घसीटना चाहती हो। शादी का मतलब साथ रहना उतना नहीं जितना कि दुनियावी ज़िम्मेदारियों को निभाना होता है। ठीक-ठाक घर, ठीक-ठाक साज-सज्जा, ठीक-ठाक बच्चे, सब कुछ ठीक-ठाक होना होता है। मैं अभी इस सबके लिए तैयार नहीं। अगर तुम सचमुच मुझे प्यार करती हो तो उस चक्कर में डालना नहीं।

और फिर बात यहाँ तक पहुँच गई थी कि पीटर जब भी उसे छूने की कोशिश करता वह खुद को जकड़ लेती ताकि भाव में आकर कुछ गलत न कर बैठे।
एक बार उसने कह ही डाला था, ''क्या बात है मेरा स्पर्श तुममें भी प्रतिक्रिया जगाता नहीं?''

वह यों ही जकड़ी खामोश बैठी रही थी। फिर पीटर से मिलने से कतराने लगी थी। शायद पहले अपने भीतर को सुलझा लेना चाहती थी । किस पर भरोसा करे? पीटर पर या ममी पापा पर? वह खुद क्या चाहती है? अब छे महिने बाद ममी ने फिर वही सवाल दोहराया तो नेहा ने कितने सारे तनावों से एक साथ मुक्ति पाने के लिए बक दिया था, ''मुझसे मत पूछा करो यह सवाल! यहाँ के लड़को में कमिटमेंटही नहीं है। मैं क्या करूँ!''

नेहा के चेहरे पर जर्दी और लाली एक साथ आ जा रही थीं। ममी ने भाँप लिया था और किसी अविश्यंभावी खतरे ने उनको सहमा दिया था। नेहा उसे खतरा मानती हो या न पर मन अस्वस्थ ज़रूर हो रहा था। उसने पापा से कहा था, ''यहाँ मैनहैटन में गाड़ी चलाने का मौका ही नहीं मिलता इसीलिए कान्फिडेंस ही नहीं जमता। आपको फिर कुछ प्रैक्टिस करानी होगी।''
ममी ने उनके निकलने से पहले कह दिया था, ''तू मेरी बात मान तो अभी भी देर नहीं हुई। बात चलाती हूँ, कहीं न कहीं तो काम बनेगा ही।''

इतनी बड़ी आर्किटेक्ट है तू कल उमा कह रही थी कि उसकी सहेली का लड़का भी कुँवारा बैठा है। मीटिंग तय कर दूँ तुम दोनों की? अपने आप से ही बाहर कहीं मिल लो। हमें बीच में डालने की भी ज़रूरत नहीं।'' पापा ने ममी को डाँट दिया था, ''क्यों बार बात उसे एम्बैरेस करती हो? जब शादी को तैयार होगी अपने आप बता देगी। बड़ी हो गई है। अपने बारे में खुद फ़ैसला ले सकती है। तुम पहले तो उसे यहाँ के खुले ढंग से पालती रही हो। अब क्या फिर से पीछे ढकेलना चाहती हो?''

गाड़ी चलाते हुए नेहा को लगा कि उसकी ड्राइविंग पर पकड़ काफी अच्छी हो गई है। थोड़ी-सी प्रैक्टिस के बाद शायद वह अपने आप ही पूरे आत्मविश्वास के साथ चलाने लगेगी।
अचानक उसने पापा को कहते हुए सुना, ''लाल बत्ती पर हमेशा रूका करो। कई बार आस पास ट्रैफिक नहीं होता तो इंसान की प्रवृत्ति होती है कि चलता जाए। पर अगर लाल बत्ती पर सड़क पार करने की ऐसी आदत डाल लो तो अक्सर दुर्घटना होने का ख़तरा हो जाता है। क्योंकि ऐसा मुमकिन है कि आप ध्यान से न देख सकें और अचानक कोई गाड़ी कहीं से निकल कर आपसे टकरा जाए।'' और पापा ने दोहराया, ''सो लाल बत्ती के होते सड़क पार कभी मत करना यह चेतावनी तुम्हें बार-बार देता हूँ।''

नेहा चौंकी। पापा उसे क्यों बतला रहे थे यह सब। क्या उसने सचमुच लाल बत्ती पार की थी? या पापा का उसे आगाह करते रहना क्या पिता के धर्म पालन से ज़्यादा नहीं था? पापा के अपने मन के डर। कहीं ऐसा तो नहीं कि बत्तियाँ आए जाए, चली जा रही थीं, गाड़ियाँ निकले चली जा रही थीं और वह लाल बत्ती पर ही खड़ी थी।

पापा कहते चले जा रहे थे, ''यों तुम सीख तो गई हो अब। अच्छा चलाने लगी हो। बाकी जितना चलाओगी उतना ही आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। बस सड़क की लय सुनना मत भूलना यही एक अच्छे ड्राइवर की निशानी है। वर्ना बार-बार दुर्घटनाएँ होंगी। इस देश में अपने बूते जीने के लिए गाड़ी चलाना भी उतना ही ज़रूरी है जितना पढ़ना लिखना। इसलिए ज़रूरी है कि सड़क की लय को सुने को सुने और उसी हिसाब से चलाओ ताकि सेफ ड्राइवर बन सको।

सहसा नेहा को लगा जैसे जो पापा कह रहे हैं वह सुन नहीं रही है फिर भी कुछ सुन रही है। पर जो वह सुन रही है वह शायद पापा नहीं सुन रहे हैं या शायद पापा कह भी नहीं रहे पर नेहा सुन पा रही है। कुछ ऐसा जिससे न वह वाकिफ़ थी न ही जिसके प्रति सजग। जैसे वे स्वर कहीं दूर से किसी बहुत गहरे समुद्र से उठे हों बहुत अस्पष्ट, भारी और गीले से! अपने ही बोझ से झुके कि सतह पर आएँ भी तो जलराशी में निमग्न पहचान से बाहर जो किन्ही शब्दों में नहीं ढल पाते या सुने जाते। किसी लहर की ही तरह कहीं से उठते और वहीं समा जाते हैं।

क्या वही थी सड़क की लय!
पापा कह रहे थे, ''तुम मुझे पहले घर ड्राप कर दो, इसके बाद जहाँ जाना है चली जाना।''
पर यह तो पापा की आवाज़ नहीं थी। कुछ ऐसी आवाज़ थी कि लगता था उसकी अपनी आवाज़ से ही मिलती-जुलती है। सामने हरी बत्ती भी शायद। नेहा ने गाड़ी चला दी...

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जून २००१

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