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विमल महाजन को एयरलाइन की नौकरी करते तीस वर्ष हो गए थे। बस, चार-पाँच वर्ष में रिटायर होने वाले थे। सारी दुनिया ही उनके छोटे से संसार का हिस्सा बनी हुई थी। एक विमान-परिचारक की हैसियत से उन्होंने नौकरी शुरू की थी। परंतु अपनी मेहनत व ईमानदारी के बल पर इस उच्च पद पर पहुँच गए थे। इस बीच उनका विवाह भी हुआ और तीन बच्चे भी। कैसे समय निकलता जा रहा है उनकी मुठ्ठी से! वैसे उन्हें देखकर कोई यह नहीं मान सकता था कि वे दो-दो बच्चों के नाना भी हैं। इसका कारण संभवत: उनका पहनावा था, जिसके प्रति वे अतिरिक्त सचेत थे। इतने ही वे अपनी सेहत के बारे में भी थे। स्पष्टवादिता उनकी एक और विशेषता थी, जिसके कारण वे कभी प्रशंसा तो कभी आलोचना के पात्र बनते थे।

विमल महाजन ने समाचार-पत्र को दो-तीन बार उलट-पुलटकर देख लिया था और आरामकुर्सी पर अलसा रहे थे तभी फ़ोन की घंटी बजी। उन्हें काफ़ी कोफ़्त हुई। आज का दिन वे आराम से ही बिताना चाहते थे। टेलिफ़ोन या और कोई भी विघ्न उन्हें नहीं चाहिए था। अन्यमनस्क भाव से उन्होंने फ़ोन उठाया, फ़ोन एअरपोर्ट से ही था। वे झुंझलाए से स्वर में बोले, "भई, आज तो आराम करने दो।"
महाजन साहब, ग़ज़ब हो गया। 'ज़ीरो नाइन वन क्रैश हो गई। लंदन के पास।"
"क्या? मैं अभी पहुँचता हूँ।"
विमल महाजन के जबड़े थोड़े भिंच गए थे। वे जैसे याद करने का प्रयत्न कर रहे थे कि 'ज़ीरो नाइन वन', पर कौन-कौन क्रू-मेंबर होगा। लगभग बदहवासी की सी स्थिति में उन्होंने कपड़े पहने और ऑफ़िस चलने को तैयार हो लिए।
रंजना, उनकी पत्नी, समझ गई कि कोई गड़बड़ अवश्य है। जब कभी विमल महाजन परेशान होते तो उनके जबड़े भिंच जाते थे।
"क्या बात है? आप तो आज आराम करने वाले थे। फिर एकाएक कहाँ की तैयारी होने लगी है?"
"रंजू, न्यूयार्क फ़्लाइट क्रैश हो गई है। दफ्तर..."
"क्या? अरुण भी तो न्यूयार्क ही गया है।"
"अरुण! हे भगवान! सब ठीक हो। देखों, मैं अभी ऑफ़िस जाकर तुम्हें फ़ोन करूँगा।" विमल महाजन का स्वर भर्रा उठा था और वे अपनी बात पूरी नहीं कर पाए थे।

रास्ते-भर अरुण के विषय में ही सोचते रहे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अरुण की पत्नी को वे कैसे समाचार दे पाएँगे। अरुण उन्हें अपने बेटे के समान प्रिय था। उसके विवाह में वे अपने सारे सिद्धांतों को ताक पर रखकर, सिर पर पगड़ी बाँधकर, घोड़ी के सामने नाचे थे। अनुराधा, अरुण की पत्नी भी उनका बहुत आदर करती थी। उनके हाथ ठंडे हुए जा रहे थे। नास्तिक होते हुए भी, भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि अरुण सुरक्षित हो।

दफ्तर के बाहर कुछ लोग जमा थे यानी ख़बर फैल चुकी थी। सबके चेहरों पर सहमी हुई उत्सुकता थी। सब दुर्घटना के विषय में जानना चाहते थे। पर कैसे पूछें, कौन पूछे। उनके सहायक अफ़ज़ल ख़ान ने ही उन्हें बताया, "सर, फ्लाइट ज़ीरो नाइन वन माँट्रियल से लंदन आ रही थी। रास्ते में ही लंदन के करीब सागर के ऊपर ही फ्लाइट में एक धमाका हुआ और फ्लाइट क्रैश हो गई। अभी पूरी डिटेल्स आनी बाकी है।"

विमल महाजन ने अपने आपको व्यवस्थित किया, और लंदन फ़ोन मिलाने लगे ताकि पूरा समाचार मिल सके और वे आगे की कार्यवाही आरंभ कर सकें। परंतु फ़ोन मिल नहीं पा रहा था।
क्रू लिस्ट देखी। अरुण का नाम उसमें नहीं था। उन्हें काफ़ी राहत महसूस हुई। पर...पर जो लोग फ्लाइट पर थे, वे सभी उनके अपने परिचितों में से थे।

रमेश कुमार! जिसका अभी-अभी तीन महीने पहले ही विवाह हुआ था। माँ-बाप की इच्छा के विरुद्ध एक पारसी एअर होस्टेस से विवाह किया था उसने। दोनों ही इस फ्लाइट पर थे। काश, यह ख़बर झूठी हो! वे मन-ही-मन प्रार्थना कर रहे थे।

ख़बर फैलने के साथ-साथ लोगों की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। फ़ोन-पर-फ़ोन आ रहे थे। पर विमल महाजन का मन हो रहा था कि वे कानों पर हाथ रखकर बैठ जाएँ चुपचाप। किसी के प्रश्नों का कोई उत्तर न दें। पर चिंतित संबंधियों की जिज्ञासा शांत करना उनका कर्तव्य था।
यदि विमल महाजन स्वयं इस दुर्घटना से इतने विचलित हो गए हैं तो जिनके भाई-बहन, माँ-बाप, पति और न जाने कितने रिश्तेदार उस विमान में आ रहे थे, उनकी चिंता स्वाभाविक थी। और वे बिना अपना धैर्य खोए फ़ोन 'अटैंड' करने लगे।
टेलेक्स की खटखट शुरू हुई। लंदन से पहला संदेश आया: 'अनुमान है कि विमान आतंकवाद का शिकार हुआ है। विमान में 'क्रू' व यात्रियों सहित तीन सौ उनतीस लोग थे। अभी किसी के बचने की कोई सूचना नहीं' य़दि कोई बचा भी तो क्या ठंडे एटलांटिक के बर्फ़ीले पानी में जीवित रह पाएगा? विमल महाजन के मस्तिष्क के घोड़े जा रहे थे कहाँ तो यात्री और क्रू-मेंबर लंदन पहुँचने के बारे में सोच रहे होंगे, और कहाँ गहरे सागर का काला अंधेरा!

'क्या आतंकवाद का कोई धर्म होता है?' सोच जारी थी, 'क्या एक विमान उड़ा देने से आतंकवादियों की बातें मान ली जाएँगी? क्या इन तीन सौ उनतीस लोगों को भी शहीद कहा जाएगा? जलियाँवाला बाग में भी तो बिल्कुल इतने ही लोग शहीद हुए थे। देश उन्हें आज तक नहीं भुला पाया। क्या इन शहीदों को भी लोग याद रख पाएँगे? मारा तो उन्हें भी गोरी सरकार के आतंकवादी/अफ़सरों ने था। निहत्थे वे भी थे और निहत्थे ये भी। क्या फिर ऊधमसिंह खड़ा होगा जो कि इन आतंकवादियों का सफ़ाया करेगा?'

टेलिफ़ोन की घंटी बजी। विमल महाजन की तंद्रा टूटी। फ़ोन घर से था। रंजना भी अरुण के लिए परेशान थी।
शाम के सात बज गए थे। यात्रियों के नाते-रिश्तेदारों के टेलिफ़ोनों का तांता लग गया था। अब तो लोग एअरपोर्ट पर इकठ्ठे हो चुके थे। सबके मुँह पर एक ही सवाल था, 'कोई ख़बर आई?' सब मन-ही-मन अपने संबंधियों की ख़ैर की प्रार्थना कर रहे थे। उन सबकी भावनाओं के तूफ़ान को सँभाल पाना एअरलाइन के कर्मचारियों के लिए कठिन पड़ रहा था। विमल महाजन स्वयं सबको तसल्लियाँ दे रहे थे। लंदन से विस्तृत समाचार की प्रतीक्षा हो रही थी।
पत्नी का फ़ोन फ़िर आया। "आप एक बार घर आकर खाना खा जाते।" उन्होंने अपनी झुंझलाइट रंजना पर ही उतार दी।

ऐसे में भला कोई खाने के विषय में कैसे सोच सकता है? किंतु नहीं, उनके मातहत एक-एक करके अपने पेट को खूब शांत कर आए थे। केवल विमल महाजन स्वयं लोगों को दिलासा देने में व्यस्त थे। टेलेक्स से समाचार आ रहे थे। लंदन से सत्तर मील दूर आकाश में एक धमाका हुआ था और विमान सागर में खो गया था। यह भी कि नौकाएँ और पनडुब्बियाँ खोज के लिए भेजी जा रही हैं। विमल महाजन यंत्रवत अपना काम किए जा रहे थे। निश्चय हो गया था कि कोई नहीं बचा इस दुर्घटना में।

जहाज़ के प्तान विक्रम सिंह विमल महाजन के मित्र थे। बंबई में जब कभी इकठ्ठे होते तो दोनों खार जिमखाना में शामें बिताया करते थे। ब्रिज दोनों का प्रिय खेल था। पर विमल महाजन कभी पैसे लगाकर ताश नहीं खेलते थे। कप्तान विक्रम सिंह सदा ही उन्हें 'पोंगा पंडित' कहकर चिढ़ाते थे। छ: महीने में ही रिटायर होने वाले थे। पर अब जैसे कुछ भी शेष नहीं रहा था! न ब्रिज, न पोंगा पंडित कहने वाला उनका दोस्त।

फ्लाइट परसर अनिरुद्ध सेन की तो केवल छ: महीने की बेटी है जब उनकी पत्नी को यह समाचार मिलेगा तो वह कैसे सहन कर पाएगी इस वज्रपात को? कई क्रू-मेंबर एअरपोर्ट पर इकठ्ठे हो गए थे। विमल महाजन ने कुछ लोगों को घरों में जाकर सूचना देने का काम सौंपा। बहुत कठिन काम था, वे जानते थे। समाचार सुनकर घर के सदस्यों की प्रतिक्रिया सोचकर उनका दिल बैठा जा रहा था। कैसे कहेंगे एक पत्नी को कि उसका पति अब कभी नहीं लौटेगा? कैसे कहेंगे एक बच्ची को कि तुम्हारे पापा अब कभी भी तुम्हारे लिए 'मिकी माउस' और 'डोनाल्ड डक' के खिलौने नहीं लाएँगे?

तीन-चार दिन सब कुछ अस्त-व्यस्त रहा। एअरपोर्ट पर संबंधियों का तांता लगा रहा। विमल महाजन भी पिछली कई रातों से सो नहीं पाए थे। समाचार-पत्रों में भी एक ही समाचार सुर्खिय़ों में था। विमान-दुर्घटना के कारणों का पता लगाना था, 'ब्लैक बॉक्स' की चर्चा थी, जाँच-समिति का गठन, और बहुत-सी औपचारिकताएँ।

दो दिनों से फाका करते, सड़क के किनारे पर बैठे ननकू को भी कहीं से ख़बर लग गई थी। पोलियो ग्रस्त हाथ से सींगदाना चबाते हुए उसने अपने साथी पीटर को ख़बर सुनाई थी, "यार, यह विमान अगर गिरना ही था, तो साला समुद्र में क्यों गिरा? सोच, कितनी बढ़िया-बढ़िया चीज़ें-वी.सी.आर., टी.वी., सोना, साड़ियाँ सब-के-सब बेकार! यहीं कहीं अपने शहर के आसपास गिरता तो कुछ तो अपने हाथ भी लगता।"
"ए मैन, अभी धंधे का टाइम है। खाली पीली टाइम वेस्ट करने का नहीं क्या... हाँ भाई, गॉड का वास्ते इस ग़रीब को भी कुछ दे दो। जीज़स क्राइस्ट भला करेगा।"

विदेश के कई आतंकवादी गुटों ने इस दुर्घटना का उत्तरदायित्व ओढ़ा। जैसे कोई बहुत महान कार्य किया गया हो और वे उसका श्रेय लेना चाहते हों। बीमार, विकृत मानसिकता के लोग, जो निर्दोष लोगों को मौत की नींद सुलाकर गर्वान्वित अनुभव कर रहे हैं। विमल महाजन का मन वितृष्णा से भर गया।

एअरलाइन के हेड क्वार्टर में कई मीटिंगें हुई। तय हुआ कि विदेशी नागरिकों का वहाँ के कानून के अनुसार मुआवज़ा दिया जाएगा और भारतीयों को भारतीय कानून के अंतर्गत। रंगभेद का यह भी एक रूप था, चमड़ी-चमड़ी में फ़र्क जो है।
विमल महाजन ने प्रस्ताव रखा कि एक विमान 'चार्टर' किया जाए और मरने वालों के निकटतम संबंधियों का लंदन भेजा जाए, जिससे वे अपने प्रियजनों की लाशें तो पहचान सकें। उच्च अधिकरियों ने स्वीकृति दे दी।

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