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'क्रू यूनियन' ने प्रत्येक मृतक क्रू-मेंबर के परिवार के लिए एक-एक लाख रुपया देने का फ़ैसला किया था। विमल महाजन को झटका-सा लगा जब रमेश कुमार के पिता उनसे मिलने दफ्तर पहुँचे।
"मिस्टर महाजन, मैं रमेश का पिता हूँ। आजकल मैं और मेरी पत्नी तलाक लेकर अलग-अलग रह रहे हैं। आपको याद होगा कि पिछले क्रैश में मेरी बेटी नीना की मौत हो गई थी। उस समय भी एअरलाइन और क्रू-यूनियन ने मुआवज़ा मुझे ही दिया था। मैं चाहता हूँ कि अब भी मेरे बेटे और बहू की मृत्यु का मुआवज़ा मुझे ही मिले। इससे पहले कि मेरी पत्नी इसके लिए अर्ज़ी दे, मैं आपके पास अपने क्लेम की यह अर्ज़ी छोड़े जा रहा हूँ ताकि आप इन्साफ़ कर सकें। मैं तो अब बूढ़ा हो चला हूँ। कमाई का अब और कोई ज़रिया है नहीं।"
"ठीक है, आप अर्ज़ी छोड़ जाइए। समय आने पर उस पर विचार किया जाएगा।"
"बड़ी कृपा होगी आपकी। नहीं तो इस उम्र में कोर्ट कचहरी जाने की तो शरीर में ताक़त नहीं रह गई। चलता हूँ।"
विमल महाजन किंकर्तव्यविमूढ़ से कुर्सी पर बैठे थे।
शिनाख़्त के लिए संबंधियों को लंदन ले जाने की पूरी ज़िम्मेदारी विमल महाजन को ही सौंपी गई। लंदन जाने के लिए संबंधियों का तांता लग गया था। विमल महाजन तय नहीं कर पा रहे थे कि किसे भेजें, किसे रोकें। हर रिश्तेदार अपना रिश्ता अधिक नज़दीकी बताता था ।

लंदन जाने के लिए विमान तैयार था। रोते-कलपते रिश्तेदारों के बीच विमल महाजन को स्वयं को संयत रख पाना काफ़ी मुश्किल लग रहा था।
मिसेज़ वाडेकर की हिचकियाँ अभी भी जारी थीं। उनका बेटा विदेश से बंबई केवल विवाह करने के लिए आ रहा था। उन्हें क्या पता था लंदन जाना पड़ेगा, डोली के स्थान पर अर्थी लेने। "मैं तो अपने बेटे को दूल्हा बनाकर ही विदा करूँगी।" मिसेज वाडेकर विक्षिप्त अवस्था में बड़बड़ाए जा रही थीं।
मगनभाई की बीस वर्षीया पोती विदेश से अकेली आ रही थी। उसके पिता को छुट्टी नहीं मिल पाई थी उसके साथ आने के लिए। खिड़की के पास बैठे हुए वे जैसे शून्य में देख रहे थे।

दो-दो मौतों का बोझ लिए दीपिंदर विमान में बैठा था। पिछले सप्ताह ही उसके पिता का देहाँत हो गया था और उन्हीं के अंतिम संस्कार के लिए उसका भाई सुक्खी अमेरिका से आ रहा था। दु:ख में सब एक थे। किसी का भी कोई धर्म, मज़हब नहीं था। सुख में था भी तो आतंकवादियों को उससे कोई लेना-देना नहीं था। वह हर धर्म वाले को अपनी पशुता का शिकार बना लेते हैं।

विश्व-भर से अलग-अलग एजेंसियों ने एटलांटिक में खोजबीन शुरू कर दी थी। पहले विमान के कुछ क्षतिग्रस्त हिस्से मिले। फिर विक्षिप्त लाशें मिलनी शुरू हुई। लाशों को जैसे किसी ने उधेड़ दिया हो, चिंदी-चिंदी हुए शरीर। लाशें पहचानना भी बहुत कठिन काम था।

लंदन में सभी रिश्तेदारों के रहने, खाने-पीने की व्यवस्था एयनलाइन की ओर से मुफ्त की गई थी। विमल महाजन सभी कार्य बड़ी तत्परता से निभा रहे थे। स्वयं उन्हें अपने खाने-पीने और सोने का भी ध्यान नहीं था। वंचित लोगों की सेवा करके संभवत: वे स्वयं को संतुष्ट करना चाहते थे। उनका यही प्रयत्न था कि किसी भी यात्री को कोई शिकायत या असुविधा न हो।

एक यात्री विमल महाजन तक पहुँचा, "मिस्टर महाजन, खाना-पीना तो ठीक है, पर हमें आप कुछ अलाउंस वगैरह भी दिलवाने का प्रबंध करवा दें तो अच्छा होगा। हम सब इतनी जल्दी में आए हैं कि एफ़.टी.एस. का प्रबंध नहीं हो पाया। कम-से-कम इतना रोज़ाना भत्ता तो हमें मिलना चाहिए, जिससे हमें कहीं बाहर आने-जाने में मुश्किल न हो।"
विमल महाजन हैरान!

शीला देशमुख के पिता किसी सरकारी महकमे में उच्च अधिकारी थे, "महाजन साहब, हमारी बेटी ने तो एअरलाइन के लिए जान दे दी। उसके बदले में आप हमें क्या देंगे? चंद रुपए। इस बुढ़ापे में हम उन स्र्पयों का क्या करेंगे? हमारी दूसरी बेटी अमेरिका में रहती है। हम चाहते हैं कि जब तक हम जिएँ, मुझे व मेरी पत्नी को हर वर्ष अमेरिका आने-जाने का मुफ़्त टिकट मिले, मैं मिनिस्टर साहिब से भी इस विषय में बात करूँगा।"

विमल महाजन की इच्छा हुई कि सब काम-धाम छोड़कर वापस चले जाएँ। इंसान इतना स्वार्थी भी हो सकता है! ये भावनाविहीन लोग इस हादसे से अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश में लगे हैं। पर वे तो यह सारा काम अपने सहयोगियों को श्रद्धांजलि के रूप में कर रहे थे। उन्हें यह सब करना ही होगा। धैर्य के साथ...

लंदन के विक्टोरिया अस्पताल का एक हिस्सा। वहाँ लाशें इकठ्ठी की गई थीं। लाशें! लाशें!! गहरे नमकीन पानी में से निकाले गए विकृत शरीर। कौन कैसे पहचान कर पाएगा! भगवान ने कितनी दर्दनाक मौत लिखी थी कुछ इन्सानों के लिए! नवजात शिशु से लेकर सत्तर वर्ष तक की बूढ़ी लाशें। कहीं हाथ ग़ायब है तो कहीं टाँग नदारद। कहीं केवल धड़ ही है-ऊपर और नीचे के दोनों ही हिस्से गायब। किसी की अंगूठी पहचानने की कोशिश की जा रही थी, तो किसी का लॉकेट।
केवल एक लाश साबुत मिली थी। अपने मासूम चेहरे पर अपार दर्द लिए नैंसी, माँ और तीन छोटी बहनों का पेट भरने वाली नैंसी। चेंबूर की झोंपड़पट्टी से ऊँची उठी नैंसी। बिन बाप की बेटी नैंसी। कमज़ोर नारी होते हुए भी बलवान पुरुषों से कहीं अधिक पौरुषपूर्ण नैंसी। अब कभी भी खड़ी न हो पाएगी। माँ पछाड़ खाकर गिर पड़ी और सँभली। एक सच्चे ईसाई की भाँति वीरता दिखाई। बेटी की लाश को चूमा। बूढ़ी कोख में हलचल हुई। अपना पराया हो गया। किंतु अभी तीन बेटियाँ और घर में हैं। एक ने इसी साल बी.ए. किया है, बाकी दोनों स्कूल में हैं। उनके लिए माँ को मज़बूत बनना है। बेटी को घर ले जाने की तैयारी करने लगीं।

चेहरों पर निराशा साफ़ दिखाई देने लगी थी। किसी भी और लाश को पहचानना लगभग असंभव-सा लग रहा था। फ़ैसला किया गया कि सभी लाशों का सामूहिक क्रिया-कर्म किया जाए। यह भी तय किया गया कि क्रिया-कर्म सागर-तट पर ही होगा और वहीं मरने वालों की याद में एक स्मारक भी स्थापित किया जाएगा ताकि विश्व को चेतावनी मिले कि आतंकवाद क्या कर सकता है।

विमल महाजन धम्म से कुर्सी पर बैठ गए। रिश्तेदारों की दिक्कतें दूर करते, ब्रिटिश सरकार व एअरलाइन अधिकारियों से संपर्क व बातचीत करते उनका शरीर व दिमाग दोनों की थक गए थे। उस पर इतनी सारी लाशों का सामूहिक क्रिया-कर्म, उन्होंने आँखें मूँद लीं।
"मिस्टर महाजन!"
"जी।" उन्होंने आँखें मूँदे ही पूछा।
"आपसे एक सलाह चाहिए।"
"कहिए।" नेत्र खुले।
"जिस काम के लिए आए थे, वो तो हो गया। ज़रा बताएँगे, यदि शापिंग वगै़रह करनी हो तो कहाँ सस्ती रहेगी? नए हैं न..."
उसके आगे बात सुनने की ताक़त विमल महाजन में नहीं थी।

हाउंसलो हाइ स्ट्रीट पर पचास-सौ की गिनती बढ़ने से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। हर काम यथावत जारी है। डिक्संज़, बूट्स, मार्क्स, वुलवर्थ हर जगह कुछ अनजाने चेहरे दिखाई दे रहे थे। कल सुबह तो वापस बंबई चले जाना है। सभी यथासंभव सामान बटोरने में लगे थे।

लंदन में गर्मियों में भी सूर्य-देवता आँख मिचौली खेलते रहते हैं। आज उन्होंने पूर्ण विश्राम करने का निर्णय ले लिया है। बादल आसमान में चहलकदमी कर रहे थे। एअरपोर्ट पर एअरलाइन के काउंटर पर भी जो नज़ारे थे, वे कुछ कम क्षोभ पैदा करने वाले नहीं थे। सभी यात्री अधिक-से-अधिक सामान के साथ 'चेक-इन' करने की कोशिश कर रहे थे। काऊंटर क्लर्क शौकत अली जी को समझा रहा था।
"मिस्टर, पच्चीस किलो का तो आपका टी.वी. ही है। कुल मिलाकर साठ किलो वज़न है आपके सामान का। और हैंडबैग अलग। आप केवल बीस किलो सामान ले जा सकते हैं।"
"मगर मैं तो यहाँ अपने भाई की लाश पहचानने आया हूँ। हमारा केस फ़र्क है।"
"यह भाई की मौत का वज़न से क्या संबंध है?" एक बार फिर विमल महाजन को ही जा कर अनुरोध करना पड़ा। क्षुब्ध विमल महाजन जैसे-तैसे सबको समझाकर यात्रियों को 'चेक-इन' करवा पाए।

विमान ने उड़ान भरी। सीट-बेल्ट बाँधने के संकेत बंद हुए, तो केबिन में हलचल बढ़ने लगी। विमल महाजन अपनी रिपोर्ट लिखने में व्यस्त थे। यात्रियों को खाना दिया गया। विमल महाजन केबिन का मुआयना कर रहे थे। मिसेज़ वाडेकर ने खाने को छुआ तक नहीं था। वह अपने बेटे की लाश को दूल्हा नहीं बना पाई थीं। लाश की शिनाख्त ही नहीं हो पाई।
दीपिंदर दस दिन में दो-दो लाशों के क्रियाकर्म के ग़म से उबर नहीं पाया था।

कुछ यात्री ग़म ग़लत करने के लिए पेग-पर-पेग चढ़ा रहे थे।
"यार, पी ले आज, जी भरके। हमें कौन-से पैसे देने हैं। यह काम अच्छा किया है एअरलाइन ने।"
विमल महाजन थोड़ा और आगे बढ़े।"
"क्यों ब्रदर, आपने कौन-सा वी.सी.आर.लिया?"
"मुझे तो एन.वी.४५० मिल गया।"
"बड़ी अच्छी किस्मत है आपकी। मैंने तो कई जगह ढूँढ़ा। आख़िर में जो भी मिला, ले लिया। हमें कौन-सा बेचना है!"
"..."
"..."
"आपने 'सोनी' ढूँढ़ ही लिया। कितने इंच का लिया?"
"२७ इंच का। और आपने?"
"हमारे भाग्य में कहाँ जी! जे.वी.सी. का लिया है। पर देखने में अच्छा लगता है। फिर च्वाइस कहाँ थी!"
मौसम में थोड़ी ख़राबी हुई, यात्रियों को एक झटका-सा महसूस हुआ। विमान 'ब्लैक सी' के नज़दीक उड़ान भर रहा था।

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