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आज भी पहले निक ने पाँच दस
मिनट इंतज़ार किया, जब घर से कोई नहीं निकला तो उसे लगा शायद
यात्री ने जाने का विचार स्थगित कर दिया हो। पूछ लेने के लिए
उसने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाए।
ठक! ठक!!
ठक! ठक! ठक!!
और एक चुप्पी थी दरवाज़े के उस पार. . .
घर में मद्धम-सी रोशनी बता रही थी कि कोई जग रहा है। उसने
बढ़कर दरवाज़े पर फिर थाप दी अंदर से कुछ घिसटने और घसीटने
की आवाज़ आई। फिर एक चुप्पी. . .
वह पुन: दरवाज़ा खटखटाने को ही था कि इस बार घिसटने की आवाज़
नज़दीक जान पड़ी और कुछ ही देर में दरवाज़ा खुल गया। एक
बूढ़ी स्त्री अटैची घसीटती हुई दरवाज़े तक आई थी।
निक ने पूछा कि क्या वह
सामान टैक्सी में पहुँचा दे, स्त्री ने हाँ में सिर हिलाया
तो वह अटैची को कार में रखने चला गया। स्त्री उसके पीछे नहीं
आई तो उसे अहसास हुआ कि संभवत: उसको मदद की आवश्यकता होगी।
मुड़कर पुन: दरवाज़े तक पहुँचा तो उसने ध्यान दिया कि जहाँ
तक दिखाई देता था घर का सारा फर्नीचर और सामान सफ़ेद चादरों
से ढका था। एक कोने में डिब्बा भर क्राकरी व अन्य छुटपुट
बरतन रखे थे। मन ही मन उसने सोचा कि बुढ़िया बहुत सफ़ाई व
करीना-पसंद औरत है। लंबे समय के लिए किसी रिश्तेदार के यहाँ
या फिर किसी दूर पर्यटन स्थान पर छुट्टियाँ मनाने जा रही
लगती है। उधर वह स्त्री चुपचाप थोड़ी देर तक कमरे और गलियारे
के चप्पे-चप्पे का मुआयना करती रही।
अब निक यानि कि हमारी कहानी
का टैक्सी डाइवर लगभग झुंझला उठा था। प्राय: रात के इस पहर
में जाने वाले लोग जल्दी में होते हैं और यहाँ कोई जल्दी ही
नहीं जान पड़ती थी। यों भी नहीं कि स्त्री कोई आवश्यक काम
निपटाने की आपाधापी कर रही हो। इसके पहले कि वह कुछ कहे
स्त्री टैक्सी की ओर चल दी।
टैक्सी में बैठते ही उसने
अपने गंतव्य का पता पकड़ा दिया। यह जगह न्यूयार्क के ही एक
मध्यम इलाके में है और बहुत दूर भी नहीं यह बात वह पहचान गया
था। भीड़भाड़ का समय नहीं, अभी साढ़े चार बज रहे हैं छ: तक
पहुँच जाएँगे, वह ऐसा सोच ही रहा था कि स्त्री ने ड्राइवर से
कहा कि जानती हूँ हाइ-वे से जाना नज़दीक होगा पर मैं शहर की
चंद सड़कों से गुज़रना चाहती हूँ। उसकी आवाज़ में एक रौब था
और अनकहा सुकून और लापरवाही भी। अपनी इच्छा ज़ाहिर कर वह
निश्चिंत बैठ गई थी क्यों कि वह जानती थी कि ड्राइवर ना नहीं
कहेगा। लंबे रास्तों से जाने में उसका तो फ़ायदा ही है। निक
ने पता देखते समय ही जान लिया था कि यह पता एक 'होसपिस' का
है। जब डाक्टर मौत का फ़ैसला सुना चुके होते हैं तो 'होसपिस'
वह जगह है जहाँ ज़िंदगी के बचे दिन बिताने जाया जाता है।
कहने को वहाँ घर जैसा रहने का माहौल चिकित्सकों व मददगारों
के नेतृत्व में उपलब्ध कराया जाता है। स्त्री ने जिसका कि
नाम मैरी है, बताया कि उसका रोग असाध्य है और आज वह जहाँ जा
रही है उसे कोई जल्दी नहीं है, पहुँचने की। वह नए साल की
सुबह की इस अंतिम यात्रा को भरपूर जीना चाहती है। ज़ाहिर था
उसे इस बात की चिंता न थी कि लंबी सड़कें लेने पर खर्चा अधिक
आने वाला है।
यकायक वाहन-चालक का हाथ
मीटर पर पहुँचा और कुछ अधिक सोचे बग़ैर उसने मीटर बंद कर
दिया। आज की रात की आख़िरी सवारी थी। इसके बाद और काम न कर
वह घर जाकर सोने का इरादा रखता था। कार शहर की ओर बढ़ चली।
स्त्री इस सब से अनभिज्ञ उसे सड़क पर कभी गति धीमी करने को
कहती और कभी किसी इमारत के आगे रोकने को।
एक बड़े बहुमंज़िले संयुक्त
बाज़ार के आगे स्त्री ने टैक्सी रोकने को कहा और एक नज़र
उसने नीचे से ऊपर तक, गरदन उठा पाने की हद तक, उस विशालता को
देखा। फिर नीचे देखती कुछ सोचती, बतियाती और बताती रही कि
वहाँ कभी हरे-भरे पेड़ों के बगीचे थे और वहीं पास एक घर में
उसकी सहेली रहा करती थी। स्कूल के बाद रोज़ाना वह दोनों यहीं
बैठ कर पढ़ा करतीं थीं। बचपन की बहुत-सी सुनहरी शामें उन
दोनों ने यहाँ टहलते बतियाते बिताई थीं। अतीत के सारे के
सारे पन्नों को आज वह एक साथ एकत्र कर पुन: एक नज़र पढ़ लेना
चाहती थी।
पड़ोस के एक युवक ने टायर
पेड़ पर लटका झूला बनाने में उनकी मदद की थी। पहली बार झूले
पर बैठी तो उसकी नई लंबी स्कर्ट कच्ची ज़मीन पर बुहारती घिस
गई थी, उसकी माँ ने कितने जतन से सिली थी उसके लिए। डाँट भी
खूब पड़ी थी क्यों कि खूब रगड़ने पर भी मिट्टी और गीली घास के
मिले-जुले निशान साफ़ नहीं हुए थे। उन्हीं छुट्टियों में
उसने निश्चय कर लिया था कि वह खुद कपड़े सिलना सीखेगी ताकि
उसे माँ के सिले कपड़ों का इंतज़ार न करना पड़े। उस समय
सिलाई के सामान की एक ही दुकान हुआ करती थी जहाँ सिलाई करना
सिखाया भी जाता था बशर्ते सामान उन्हीं से ख़रीदा जाए। हर
साल गर्मी और सर्दियों की छुट्टी में वह यहाँ सिलाई सीखने
लगी थी। माता-पिता के सहयोग ने उसकी इस कला को निखारने में
भरपूर मदद की थी और फिर वह खुद तरह-तरह की सिलाई-कढ़ाई
सिखाने लगी थी।
सर्दी के उत्सव से पहले
बड़े मेले में उसने अपने काम की नुमाइश भी लगानी शुरू कर दी
थी। छोटे भाई बहन बड़े उत्साह से उसकी मदद करते। यहीं पर
उसकी मुलाक़ात विदेश से आए उस युवक से हुई जिसके माता-पिता
राजनीतिक यातनाओं का शिकार होकर मारे गए थे, वह अकेला इस देश
में अपने चाचा के साथ स्वतंत्रता की शरण में आया था। अपनी
पहली कमाई से कुछ ख़रीद कर अपनी चाची को देना चाहता था। एक
बहुत खूबसूरती से कढ़ाईदार तस्वीर दीवार की सजावट के लिए ले
भी गया था। उसके बाद कभी वह खुद तो कभी चाची के साथ आता ही
रहा। उसकी आँखों में एक अनजाना अपनापन था। अक्सर वह खुद को
उसके इंतज़ार में पाती।
फिर जब दोनों में दोस्ती हो
गई तो वह उसके माता-पिता की इजाज़त से बतौर डेटिंग उसे
घुमाने ले जाता था। इसी दायीं तरफ़ की गली में एक बड़ा-सा
हॉल था जो सुबह के समय खेलों व शाम को बॉलरूम डांस के लिए
इस्तेमाल किया जाता था। जहाँ वह एक नवयुवती की तरह अपने युवक
मित्र के साथ डांस के लिए आया करती थी। उन दिनों समय की
पाबंदियाँ कड़ी थीं, सोने के समय में एक मिनट भी इधर उधर
होना उसके पिता को गवारा न था। रात के खाने और सोने के समय
के बीच का बहुत ही छोटा-सा समय का टुकड़ा उसे मिल पाता था
अपने प्रेमी के साथ गुज़ारने के लिए। आज भी उसे याद है कि
उसकी भावनाओं को समझते हुए उसकी माँ ने कई बार खाने के बाद
बरतनों को साफ़ करने व सुखा कर रखने के उत्तरदायित्व से उसे
छुट्टी दे देतीं थीं ताकि वह ठीक से सज-सँवर कर निकले।
जल्दबाज़ी में वह कई बार बिना किसी तैयारी और साज-शृंगार के
ही निकल जाया करती थी। |