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आज वह उन सभी सड़कों पर घूमना चाहती थी जहाँ उसने अपने बचपन और युवावस्था के दिन बिताए थे। मीठी यादों के दिन झंझट झंझावातों के दिन फिर धीरे-धीरे रूप बदलती स्थितियों में डूबते उबरते नितांत पारिवारिक दिन।

सात दशक- साल, महीने, दिन सब चंद घड़ियों में सिमट आए थे। आज वह सारी ज़िंदगी जैसे दोबारा जी रही थी। यादें इससे पहले भी तीव्र होतीं थीं पर इतनी तीव्रता उनमें कभी न थी। कभी दायें कभी बायें मुड़वा कर वह टैक्सी को विभिन्न गलियों में ले जाती। हालाँकि टैक्सी चालक इन सब से भली भाँति परिचित था पर उसने इन बहती गलियों को कभी ऐसे न देखा था। वह बड़े ध्यान से मैरी के व्याख्यान को सुन रहा था। आज इस स्त्री के अंदाज़ेबयाँ से शहर बदल गया था। इस शहर के शोरगुल और भीड़भाड़ में दबी कहानियों से अनभिज्ञ ही था वह। तकनीकी युग की पहचान बनी इन गलियों की बहुमंज़िली इमारतों के नीचे उसे अदभुत इतिहास नज़र आ रहा था जो बहुत पुराना तो नहीं पर हृदय को छूने वाला था।

और यह छोटी-सी बुढ़िया. . .वह लगातार बोले जा रही थी, उसने बताया कि कहाँ उसका स्कूल था और कहाँ वह पेड़ जिस पर चढ़ कर वह खेला करती थी। दो ब्लाक छोड़ दाहिनी ओर स्कूल के नज़दीक ही चर्च था, हर इतवार अपने माता-पिता के साथ वह वहाँ आती। चर्च आज भी वहीं है, बदला है तो बस उसके चारों ओर का माहौल। पास की लाइब्रेरी होते-होते बहुत बड़ी हो गई है। कोयले और लकड़ी की जगह अब गैस लाइन पूरी बिल्डिंग को गरम रखती है। क्रिसमस की शाम और नए साल के जश्न के बाद अपनी सहेली व स्कूल के अन्य साथियों के साथ इसी चर्च में पहली बार उसके साथी जॉन ने विवाह का प्रस्ताव उसके सामने रखा था। और फिर औपचारिक रूप से उसके माता-पिता की सहमति ले कर इसी चर्च में उनका विवाह हुआ था।

पास ही की गलियों में उसकी सहेलियों के मकान हुआ करते थे। घर के सभी काम प्राय: स्त्रियों के ही ज़िम्मे हुआ करते थे। घर की लड़कियाँ इस ज़िम्मेदारी को निभाने में माँ की मदद करतीं। उसे याद है कि पिता के आने पर घर भर उनकी देखभाल में जुट जाता। सारा दिन काम से आए पुरुष की सेवा-सुश्रूषा का आधार स्त्रियाँ ही बनी रहतीं, आज की तरह घर के सभी सदस्य रोजी कमाने नहीं जाते। काम को बाँटने का आधार ही अलग था। उसे तो आज भी खुद काम करने के बावजूद आज के समाज की नई शैली समझ नहीं आती थी। बच्चे होते ही उसने सब छोड़ घर की ज़िम्मेदारियों पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर लिया था। काम बहुत किए पर सब काम पैसे के ही लिए नहीं किए थे। सालों साल उसने पास पड़ोस की स्त्रियों को कढ़ाई-बुनाई-सिलाई आदि सिखाए कभी चर्च के माध्यम से तो कभी औरतों की गोष्ठियों में।

शहर बढ़ने लगा और व्यवसायिक केंद्र बनने लगा, ज़मीनों के दाम बढ़े तो उसके परिवार के सभी यहाँ की ज़मीन-मकान बेच न्यूजर्सी में जा बसे। दूरी कम ही सही पर इस बदल बदलाव में कई सहेलियों से मिलना जुलना छूट गया। वह बता रही थी कि कौन से मकानों कौन सी सहेलियाँ रहती थी। वहाँ क्या-क्या बन गया है आदि। इस शहर ने जहाँ सबको पनाह और तरक्की दी वहीं कइयों को अलग भी किया।
यह बात अलग है अब वहाँ बहुमंज़िली इमारतें बन चुकी थीं। उसे आज भी याद है कि शादी के तुरंत बाद उन्होंने मेन रोड पर एक छोटा-सा मकान किराये पर लिया था। शुरू में उनके पास कार न थी तो बस व रेल इत्यादि पकड़ने में सुविधा रहती थी। जल्दी ही वे कार और उसके बाद एक मकान ले चुके थे। बच्चों के जन्म के बाद उन्होंने शहर से दूर एक खुले और स्वस्थ माहौल में मकान लेने का निश्चय किया और न्यूजर्सी में आ बसे ताकि बढ़ते शहर की बढ़ती बेचैनियों की जगह बच्चे हरियाली और अपनेपन की छाँव में बड़े हों। फिर वहाँ से यह अवसरों का शहर भी दूर थोड़े ही था।

एक-एक कर कई मित्रों-रिश्तेदारों का कुल मिला कर अच्छा समूह बन गया था। गर्मियों में बहुत-सी पिकनिकें समुद्र तट पर होतीं और सर्दियों में घर रह कर फायरप्लेस के आगे खाने-पीने और ताश आदि खेलों से महफ़िल जमती। कभी रिकार्ड पर गाने बजा कर नाचने का कार्यक्रम तो कभी विभिन्न तरह के संगीत उपक्रम। धीरे-धीरे उनकी इकलौती संतान भी बड़ी हुई और पॉप हिप्पी युग की भेंट चढ़ी। वरना आज वह दादी बनी कहानियाँ सुनाती होती। फिर वह दिन भी आया जब अचानक एक दिन बैठे-बैठे जॉन उसे छोड़ गया। उस अचानक हुए आघात के लिए उसने बहुत शिकायतें की थीं भगवान से पर आज सोचती है कि काश वह भी यों मृत्यु के इंतज़ार में घड़ियाँ न गिन अचानक बिना किसी ऐसी यात्रा की योजना किए चली जाती तो कितना अच्छा होता। पर चाहे से सब थोड़े ही होता है। प्रकृति में सब ही शायद योजना-पूर्वक चल रहा है। एक निश्चिंतता वाली साँस छोड़ती है मैरी।

वक्त कब ठहरा है, बस ले दे कर कुछ यादें ठहर जाती हैं। उन्हीं यादों की डोर के सहारे कभी-कभी वह बीते वक्त को बरबस खींच लाती है। आज वह इस डोर को काफ़ी मज़बूती से गिरफ़्त कर रही थी और धीरे-धीरे बीते दिनों की यादें ताज़ा हो रहीं थीं जैसे कल ही की बात हो। फिर दौर चला कौन से साल में कौन बिछुड़ गया आदि-आदि। वह जीती रही है और जब एक-एक कर मित्र व परिवार के सभी जाते रहे थे उसे एकदम अकेला छोड़। अब जीवन के इस मोड़ पर कम से कम उसे इंतज़ार नहीं किसी का।

बातों-बातों में दिन निकल आया था और टैक्सी कार पते पर खड़ी थी। वहाँ के कर्मचारी पहले से तैयार थे, उनके पहुँचते ही मदद के लिए दो व्यक्ति आ गए थे। स्त्री एक लंबी साँस ले कर टैक्सी से उतरी और कहा कि मैं जब तक यहाँ रहूँगी आज की यात्रा याद रहेगी। तुमने बड़े धैर्य से मेरी बातें सुनी और जगह-जगह रुकते झुँझलाए भी नहीं। उसने पैसे के लिए अपने पर्स में हाथ डाला तो अनजाने ही ड्राइवर यानि निकोलस ने उसे रोकने के लिए हाथ पकड़ लिया। अपने से कद में काफ़ी छोटी और पतली-दुबली स्त्री को गले लगाया तो महसूस हुआ कि उस स्त्री की पकड़ कुछ पलों तक छूटी नहीं है। कुछ ही मिनटों में ही एक पहचान बन गई थी।
यों तो वह बरसों से इन्हीं सड़कों पर टैक्सी में घूमता रहा है। उसे लगा आज पहली बार उसने स्वयं कोई अर्थपूर्ण यात्रा की है। उसने आकाश की ओर देखा तो लगा जैसे सुबह का उगता सूरज मुसकुराता रात ढलने की प्रतीक्षा में हो।

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९ जनवरी २००५

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