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पर उसी ने तो निकलवाया है कि एक साठ बरस की विधवा विवाह के लिए उपयुक्त पात्र खोज रही है?
उपयुक्त पात्र से क्या मतलब? शायद वह खुद भी इस मामले में साफ़ नहीं?
हाँ कोई लूला-लंगड़ा न हो! इतना तो साफ़ कह सकती है?
पर कहना चाहती क्या है?
मन किससे मिलेगा? क्या इसे साफ़ तौर पर लिखा जा सकता है?
क्या ऐसा कोई होगा जिसके साथ रहा जा सके?
कहने को तो यही कहा जाता है और वही कहा है उसने, अधेड़ उम्र का, पंजाबी हो पर किसी और प्रांत का भी हो सकता है, स्वस्थ, शराब न पीनेवाला, ऐब और बीमारियों से मुक्त, विधुर तलाकशुदा या अविवाहित।

चाहे छोटी बहन और जीजे ने ही सुझाया था यह सब पता नहीं गंभीर थे कि चस्के ले रहे थे मन ही मन तो वे दोनों भी हँसते ही होंगे पता नहीं किस-किस रिश्तेदार से चाहे बातें भी बनाते फिरें! कितना छिछला, कितना छिछेरा समझेंगे सब मन में उसे! वैसे तो जीजा-बहन बहुत मददगार बनते हैं स़लाह तो उन्हीं की दी हुई थी, उसको उबारने का ही यत्न था पर अगर रत्ना खुद न हामी भरती तो किसी को क्या पड़ी थी इश्तहार निकलवाने की, असली मर्ज़ी तो उसकी अपनी ही थी न, झुठलाएगी कैसे इस बात को!

मर्ज़ी थी किस बात की यह वह शायद खुद भी नहीं जानती। क्या सचमुच शादी रचाएगी किसी दूसरे पुरुष से? छि:छि:! कितनी घिनौनी बात है! और रत्ना के रोंगटे भी खड़े हो जाते! भीतर कहीं कुछ नरम-सी कुम्हलायी हुई-सी पंखुरी अंगड़ाई लेने लगती।
कहीं सचमुच? और नयी-नवेली दुल्हन-सी वह खुद से भी शर्मा जाती।
कोई पुरुष सचमुच उसे छुएगा? उसे अपनाएगा- उसका अपना होगा? बहुत अपना? अपने-सी बातें करेगा? उसका चेहरा, उसका जिस्म, उसके हाथ, उसके होंठ, उसकी आवाज़, उसकी मुस्कान, उसका सबकुछ इतना पास, इतना पहचाना? रत्ना सोचकर सिहर उठती है!

बच्चों की परवरिश में लगा उसका विधवा शरीर किसी कुँवारी से भी ज़्यादा कुआँरा हो चुका है- क्यों कि वहाँ किसी के आने का इंतज़ार नहीं, किसी के कभी न आने का मूक स्वीकार है। लकड़ी के गुलाब की तरह, जो एक बार खिलकर खिला ही रहे चाहे कोई आए न आए, उसे तो खिलना ही है। उन सब को अपने खिलाव से पोसना ही है जो उस पर निर्भर हैं। और अब तो कोई निर्भर नहीं, सब अपने-अपने ठिकाने पर पहुँच चुके हैं, तो किसके लिए खिला रहे गुलाब?
क्या झर कर खत्म हो? या दे जाए किसी और को अपनी रंगत का सुख और पा जाए खुद उस सुख का भोग?
घबरा जाती है रत्ना, उस भोग के नाम से भी।

साथ में पढ़े थे तस्वीरों के साथ भेजे गए उम्मीदवारों के जवाब भी, उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि उनको गौर से देख कुछ सोचे, फ़ैसला लेने की बात तो दूर रही।
भीतर एक ही बात चक्रवात की तरह घूम रही थी। आसमान में बैठे प्रताप कुमार क्या कह रहे होंगे? क्या हो गया है उनकी पत्नी को, अब तक जो उनको अनथक पूजती रही, हमेशा उनकी याद को सीने से लगा जीवन का हर कर्म सही ढंग से निभाती रही, आज इस पर तुल आई है!
यह क्या हो गया है उनकी विधवा सुपत्नी को!
और रत्ना के भीतर जैसे कोई तूफ़ान घिरे जा रहा था।
यह हो कैसे गया? क्यों हो गया?

प्रताप की स्मृति को क्यों लांछित कर रही है प़्रताप जी ने तो सिर्फ़ उसे प्यार दिया ब़हुत-बहुत प्यार दिया, यहाँ तक कि उसे अपने परिवार वालों के बोझ से भी बचाए रखा, ननद आके साथ रहना चाहती थी, पैसे भेज दिए पढ़ाई के लिए फ़िर दहेज के लिए भी, कहा कि रत्ना को कोई तकलीफ़ नहीं देगा।
प्यार दिया इसी से अभी तक कसक बनी ही हुई है च़ालीस बरस बीत गए उस विवाह को, आज भी वह प्रताप की ही दुल्हन है।
सचमुच कोई शिकायतें तो याद ही नहीं, हैं भी तो प्यार के ही उलाहने, वर्ना मौके-बेमौके पर दिल को छील जाने वाले उनकी अनुपस्थिति के अहसास!
तो फिर यह इश्तहार किसलिए?
कभी ऐसा कर पाएगी, उसने सोचा नहीं था,
लेकिन और कोई चारा बचा है सिवा निपट अकेलेपन के!
कोई तो उसका नहीं! तब वह क्यों किसी की परवाह करे!

विधवा हुई थी तो अकेली ही थी पर कभी उस तरह अकेला होना महसूस नहीं हुआ। किसी न किसी को साथ देते पाया ही। फिर अपने बच्चे तो हरदम घेरे ही रहते थे। अब उम्र का तकाज़ा, परदेस के रीतिरिवाज़, कहीं कुछ बात बन ही नहीं रही, न किसी से शिकायत करने जैसी, न खुद के जीने का ही कोई बंदोबस्त।
तो वह ऐसा सिर्फ़ अपने बच्चों को, अपने रिश्तेदारों को सज़ा देने के लिए, सिर्फ़ सज़ा देने के लिए ही कर रही है! यह बताने के लिए कि तुम्हारे घर में मेरे लिए जगह नहीं तो मेरे यहाँ भी तुम्हारी जगह तुम्हारा ख्य़ाल नहीं!
उन को तो अंदाज़ भी नहीं होगा?
अगर उनको अंदाज़ ही नहीं तो फिर
पर हाँ अगर सचमुच विवाह कर ले तो पता तो चलेगा ही त़ब चोट भी खाएँगे! क्या पता चोट लगे ही न क़िसी को कुछ फ़र्क पड़े ही न!
तब इस कुकर्म का लाभ ही क्या?
लेकिन देखा जाए तो तब वह सुख से जी सकती है। कोई उसके नए-नवेले जीवन में तब दखलअंदाज़ी तो नहीं करेगा न! न ही उसे किसी को कोई किफ़ायत देनी पड़ेगी!
और क्या सचमुच वह उनको चोट पहुँचाना चाहती है?

चोट पहुँचेगी कि नहीं पर उनका रास्ता साफ़ हो जाएगा? अब रत्ना को आश्रय देने का बोझ कोई महसूस नहीं करेगा- चाहे भाई-बहन हों या अपने बच्चे!
कोई नहीं कहेगा कि यहाँ तो सबको अपना-अपना इंतज़ाम करना होता है। किसी को दूसरे का मुँह नहीं जोहना चाहिए।
सब कहेंगे अब किसी को रत्ना की खोजखबर लगाने की ज़रूरत नहीं, अपना मज़े से रह रही है"- चाहे बेचारी का दम ही घुट रहा हो! किसी को क्या परवाह!
रत्ना ने हिम्मत करके एक लिफ़ाफ़ा खोला- अधेड़ से व्यक्ति की तस्वीर, खिचड़ी दाढ़ी और गंज, वितृष्णा-सी हुई उस को, कहाँ उसके पति प्रताप और कहाँ यह बूढ़ा-खूसट?

प्रताप आज होते तो क्या इस तरह लगते? नहीं, कतई नहीं, उनकी सज्जनता उनकी गरिमा तो आज भी वैसी ही होती। ठीक है, चेहरे पर उम्र आ भी जाए पर व्यक्ति का व्यक्तित्व तो बदलता नहीं। यों उनका बूढ़ापन वह नहीं देख पाती। अपने हर बिंब में वे युवा ही होते। उसी उम्र में छप गया था चेहरा जिस में गए थे। उसके छत्तीस वर्ष के युवा प्रताप कुमार, बल्कि जो तस्वीर घर में लगी थी, वह साल भर पहले की थी। वही चेहरा था अब रत्ना की आँखों में, तस्वीर वाला चेहरा, असल चेहरा तो जाने कब का धुँधला-सा गया था।
बेटा भी तो लगभग उसी उम्र में था- कितना मिलता-जुलता है पापा से-
पर उससे क्या? वह भी कहाँ है अब रत्ना की दुनिया में? सब अपने-अपने दड़बे में घुसे हैं, अपनी-अपनी परवाह, किसी दूसरे की खोज ख़बर नहीं, चिंता नहीं, जैसे कि दुनिया सिर्फ़ उनके अपने गिर्द ही घूमती है, उसके बाहर कुछ नहीं।
अपने भाई अपनी बहनें, अपने बेटे, अपनी बेटियाँ- फिर भी इस बड़े से संसार में कोई अपना नहीं- सबको लगता है कि कहीं रत्ना उनके साथ न रहने लग जाए! पता नहीं कितना बड़ा मसला खड़ा हो जाएगा उनकी ज़िंदगियों में! रत्ना अब एक बहन या माँ नहीं एक मसला थी- एक मुसीबत- एक समस्या- जिसका कोई हल नहीं था।

यह भी कोई शाप था क्या? इतनी उम्र में पति चल बसे थे। अब बेटा दुनिया में होकर भी उससे दूर हो गया है! एक-एक करके सब का साथ छूटता गया। बस यहीं तक साथ होना था! अब बस अपना अकेलापन, अपने आप का बोझ, कितनों के बोझ ढोए? अब अपना बोझ ढोने के भी काबिल नहीं।
कोई साथ चाहिए- बोझ ढोने में मदद करनेवाला! क्या ऐसा भी कभी होता है?

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© सर्वाधिका सुरक्षित
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