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रत्ना मेज़ पर पड़ी हर तस्वीर को ऐसे देख रही थी जैसे किसी से चोरी कर रही हो- जबकि उसकी अपनी बेटी ने ही उसे सलाह दी थी कि, "ममी आपको बुढ़ापे में अपना कोई साथी ढूँढ़ लेना चाहिए। यहाँ सब ऐसे ही करते हैं। मेरी सहेली की माँ तो अस्सी की होने वाली हैं और वे छयासी साल के अपने एक पड़ोसी के साथ जुड़ गई हैं। दोनों मज़े से रहते हैं, एक दूसरे का साथ भी रहता है एक दूसरे की देखभाल भी करते हैं। वर्ना ममी पोते-पोतियों के पास कहाँ वक्त है।"
बहन ने अपना सुझाव दिया था, "बहनजी आपको अपनी ज़िंदगी अपने ढंग से, अपने बूते पर जीनी चाहिए। आपको भी कोई बॉयफ्रेंड बना लेना चाहिए। यहाँ तो बूढ़े-बूढ़े लोग शादी करते हैं। यहाँ इसमें कोई बुराई नहीं मानी जाती। उल्टे लोग खुश ही होते हैं कि आपने बुढ़ापे में भी ज़िंदगी को रसमय बना लिया। वर्ना भाई-बहनों के आसरे कहीं बुढ़ापा कटता हैं? किसी के खाविंद को उज्र होगा तो किसी की बीवी को। भाईबहन शादी के बाद कहाँ अपने रहते हैं? पहले अपने बीवी-बच्चों को ही सँवारेंगे आखिर।"

रत्ना के चेहरे पर विद्रूप की लहर-सी फैल गई। पागल हे गई है बहन भी, मज़ाक सूझता है इसे।
फिर गुस्से में जैसे सारी दुनिया से बदला लेती हुई आवाज़ में कहा, "ठीक है तू ढूँढ़ दे मुझे आदमी, कर लूँगी मैं दूसरी शादी, बुढ़ापे की शादी।"
जीजा पूरे ज़ोर से बोला, "ठीक है मैं अखबार में इश्तहार दे दूँगा। फिर जवाब आएँगे तो मिल लेना। मिलना आपको ही पड़ेगा। मुझे मत घसीटना इस झंझट में।"
"ठीक है तुम इश्तहार दे दो।"
रत्ना उत्साहित थी- एक खेल का सा मज़ा भी था और कुछ पा लेने की उम्मीद भी।
साथ ही भीतर कहीं रत्ना इतना उजड़ा इतना अकेला महसूस करती रही थी कि कहीं लगा कि यह इलाज भी करके देख लिया जाए, शायद मन को कुछ सुकून मिल जाए!
सच यह था कि रत्ना के भीतर कहीं कोई दबी हुई ललक भी थी। ज़रा देखें तो क्या होता है! कैसा पुरुष होगा? किस तरह का व्यक्ति रत्ना को पसंद करेगा? उम्र के इस पहलू पर आकर किस तरह का मज़ा होता है?
और सबसे बड़ी बात तो यह कि यह अकेला बुढ़ापा काटना बड़ा दूभर है। बीमार हो जाओ तो कोई पूछनेवाला नहीं!
पोते-पोतियों से रत्ना कुछ उम्मीद कर नहीं रही थी। यों भी अभी वे बहुत छोटे थे।
पर हैरानी तो अपने बेटे पर ही थी जिसका सारा धरम-करम अब उसकी औरत ही थी।
बेटी को भी अपने पति के मारे मुँह मोड़ लेना पड़ा।

और अगर वह सचमुच किसी दूसरे पुरुष के साथ रहने लगे तो सब क्या इसे स्वीकार पाएँगे? ओह कितनी शर्म आएगी उन्हें। चाचे-ताए के आगे सबकी नाक कट जाएगी। वे कहेंगे, "देखा दूसरा आदमी कर लिया है रत्ना ने।"
ओह कैसे सुनेगी लोगों की ऐसी बातें,
कैसे चोट पहुँचा सकती है अपनों को?
लेकिन रत्ना भी करे तो क्या? कैसे उठाए इस कभी न खत्म होने वाली ज़िंदगी का बोझ। जब तक जीना है, जीना तो है ही। तब कैसे जीना है?
क्या यही एक सुविधाजनक रास्ता नही है? बच्चों-रिश्तेदारें की भी ज़िम्मेदारी खत्म हो!
वह मेज़ पर सभी तस्वीरें फैलाने लगी- ज़्यादा नहीं- चार ही लोगों ने जवाब दिया था। एक तलाकशुदा था बाकी दोनों की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। एक उम्मीदवार तो अपने बेटे के साथ रह रहा था और उम्मीद कर रहा था कि अगर रिश्ता बन जाए तो वह रत्ना के घर में रहने चला आएगा। एक अमरीकी का खत भी था। वह भारत और पाकिस्तान रह चुका था और उसे किसी हिंदुस्तानी औरत के मिलने और उसके साथ जीवन गुज़ारने में दिलचस्पी होगी। उसकी यों तीन शादियाँ और तीन ही तलाक हो चुके थे। उसने यह भी लिखा था कि वह मानता है कि पत्नी के रूप में एशियाई औरतें ज़्यादा कोमल, भावनामयी और सेवापरक होती हैं-
रत्ना ने मुँह बिचकाया, "साला सेवा करवाना चाहता है। अब मेरी सेवा करने वाली उम्र नहीं। मैं तो अपनी सेवा करवाना चाहती हूँ- मुझे क्या पड़ी है कि साठ साल की उम्र में यह दूसरी बीमारी पाल लूँ। इनके लिए खाना बनाओ, सफाइयाँ करो, आगे कम काम किया है ज़िंदगी में जो एक और मुसीबत पालूँ?"
उसे दूसरे पुरुष के विचार मात्र से ही घबराहट उठने लगी,
"कैसा ज़माना आ गया है? रत्ना की माँ आज ज़िंदा होतीं तो क्या कहतीं- विधवा बेटी दूसरी शादी कर रही है और वह भी साठ साल की उम्र में?

वह सचमुच अगर इन निवेदकों से मिली तो क्या सोचेगे वे अपने मन में? कैसी औरत है जो इस उम्र में इश्तहार दे रही है- उसकी हेठी तो नहीं होगी? उसको कमज़ोर चरित्र वाली तो नहीं समझा जाएगा? उसे याद है कि जब पंजाब में कालेज में थी तो उसकी जो कोई सहेली भी मरदों में दिलचस्पी लेती थी उसे "लूज़ कैरेक्टर" कह दिया जाता था।
रत्ना को सोच के शर्म आने लगी- शायद उसे भी कोई "लूज कैरेक्टर" समझेगा- सेक्स की भूखी समझेगा- जबकि ऐसी बात कतई नहीं- सारी उम्र तो प्रताप कुमार के नाम बिना शारीरिक भोग के निकाल दी। अब भला क्योंकर ऐसा करेगी?
पर अकेलापन, यह निपट अकेलापन?
इसका क्या इलाज करे?
और मन फिर उड़ने लगा- "मुझे तो कोई घुमानेवाला पति चाहिए, जिसे देस घूमने का शौक हो। जिसके पास गाड़ी हो और शौक भी और वे दोनों खूब दूर-दूर घूमने जाएँ, उसके कंधे पर सिर रख रत्ना अपना सारा दुख भूल जाएगी। उसकी बाँहों का घेरा रत्ना को हर आपत्ति से बचा लेगा। उसका मज़बूत हाथ जब रत्ना के हाथ को अपनी गिरफ्त में लेगा तो रत्ना की हर फ़िक्र भाग जाएगी। वह ऐसा महसूस करेगी जैसे अचानक फिर से सारी दुनिया रंगभरी और खुशनुमा हो गई है। बस तब रत्ना की सारी मुरादें पूरी हो जाएँगी और वह तब खुशी-खुशी मर सकती है। वर्ना, वर्ना बहुत कुछ अधूरा अ़तृप्त रह जाएगा!"
पर उसके उस स्वयंवर के रचाव में एक भी वर उसे भला नहीं लगा। आने को अभी और भी जवाब आ सकते थे। इश्तहार दुबारा भी दिया जा सकता था। पर एक वितृष्णा से रत्ना ने तस्वीरों को परे धकेल दिया। "वॉट नानसेंस- ये क्या कर रही हूँ मैं"

उसकी सारी जीवन योजना तो बेटे की ज़िंदगी की योजनाओं के ईद-गिर्द ही बनी थी? बीस में डाक्टर बन जाएगा। फिर दो साल रेज़ीडेंसी के बाद शादी करेगी उसकी। इस बीच वह अपनी बैंक की नौकरी करती रहेगी। जब उसे रेजीडेंसी खत्म करने के बाद ढंग की नौकरी मिल जाएगी तब वह भी बैंक से त्यागपत्र दे देगी। इस बीच पोते-पोती भी आ जाएँगे। तब बेटे के पास रहने चली जाएगी।
ये योजनाएं माँ-बेटे ने साथ-साथ बनाईं थीं और सब कुछ योजना के अनुसार ही होता रहा था। बस एक ही जगह गड़बड़ हुई।
गड़बड़ हुई तो सारी की सारी योजना ही खड्डे में पड़ गई!
जो कुछ भी माँ-बेटा चाहें वह तो ज़रूरी नहीं कि है- क्यों कि शादी वाले पड़ाव के बाद से दो नहीं तीन की राय को म्यान में रखना वे दोनों भूल गए- बहू की भविष्य योजना में रत्ना की शरीकी नहीं थी- सो अब सारा मसला यहीं आकर खटाई में पड़ गया था।
रत्ना पहले पति फिर हमेशा बच्चों के साथ ही रही।
अब क्या करे? किसी के तो साथ रहना है?

बेटियों के साथ रहना माँओं को मंज़ूर हो भी जाय तो जवाइयों को रास नहीं आता। फिर दस्तूर तो यही रहा है कि बेटे के पास रहेगी माँ। कहाँ गलती हो गई रत्ना से?
क्या कमी कर दी उसने, किस तरह बड़ा किया कि आज बेटा इतना पराया हो गया। सास-बहू के रिश्तों के तनाव कोई नयी बात तो नहीं। सभी घरों में ऐसा होता है। पर इससे कोई माँ को घर में नहीं रखता?
दूसरे रिश्तेदारों के यहाँ तो मिट्टी पलीद करवाने वाली ही बात है।
यह तो कोई तरीका न हुआ रहने का?
सारी उम्र तो हारी नहीं थी। लड़ती रही हालात से। अब एकदम पस्त-सी हो रही है। लगता है जिसके लिए ज़िंदगी गुज़ार रही थी। अब उसकी ज़िंदगी का हिस्सा न होने पर सब कुछ नि:सार हो गया है, एकदम निरर्थक!
और उस निरर्थकता में यह सार्थकता खोजी है रत्ना ने- एक दूसरे पुरुष का साथ!
एक विद्रूप, एक भीषण अट्टहास फैल गया था उसके आसपास।
अपने प्रति घृणा वितृष्णा से भरती जा रही थी वह।
यही सूझा था, बस आ गई दूसरों की बातों में। जो व्रत उम्र भर का था उसे यों ही तोड़ने को तैयार हो गई। जब जवान थी तब तो शादी की नहीं। अब चली है अपना व्रत तोड़ने! खिल्ली का सामान बनने। क्या कोई आत्मसम्मान नहीं उसका?
ऐसे लगा जैसे वह अपनी नीलामी कर रही है - एक लावारिस औरत हो गई है क़िसी से कुछ लेना-देना नहीं। किसी से जवाबदेही नहीं।
लावारिस औरत जो लाचारी में आवारापन पर तुल गई है।

क्या बदला लेना चाह रही थी सब से? तुम औरों के हो गए तो मैं भी किसी की हो जाऊँगी। बस यही तरीका रह गया है उसके पास? कोई अपना न रहा तो यह अपनी किस्मत सही, पर यह तो ज़रूरी नहीं कि अपनों की कमी को इस तरह पूरा करे वह।
यह सोच ही परेशान कर रही है रत्ना को कि कैसे कर पायी वह यह?
फिर एक अजीब-सा ख़याल आया था-
क्या यह इश्तहार ही भेज दे सब को? या झूठमूठ का शादी का कार्ड?
फिर जैसे सचेत हुई, नहीं, कितनी नागवार बात होगी?
पता नहीं क्या पागलपन-सा सवार हो रहा था रत्ना पर तू ने ऐसा क्यों, क्यों किया रत्ना- प्रताप कुमार की रूह को भी कितनी तकलीफ़ पहुँच रही होगी! ऐसी अवमानना- ऐसा अपमान!
अपने इकलौते कमरे के अपार्टमेंट में अचानक फफक-फफक कर रो रही थी रत्ना, अखबार की तस्वीरों की चिंदियाँ-चिंदियाँ किए जा रही थी। सिसकियों के बीच बड़बड़ाती जाती,"देखो सब - देखो मेरा हाल- देखते क्यों नहीं? किस्मत ने मुझे इस हद तक ला दिया, क्यों सब मौत की तरह खामोश हो गए है, किसी को मेरी ज़रूरत ही नहीं रही।
"अपने इस हाल के लिए किसको दोष दूँ मैं, बता न? किसको? किस्मत को या खुद को?"
सारे कमरे में अखबार की चिंदियाँ फैली हुई थीं और रत्ना ज़मीन पर उनके बीच घुटने पर सिर टिकाए इस तरह बैठी हुई थी जैसे पहली बार विधवा हुई हो!
पहली बार अपने पति की मौत का मातम मना रही हो!

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१६ जुलाई २००५

 
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