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अगली दूकान रेशम सान्याल की है। नकली गहने, मेकअप और दूसरे बहुत-सी तरह के प्रसाधानों की दूकान। रेशमा भी आज तीन बजे दूकान बंद कर के जा रही है। काली मंडप में जाने से पहले उसे ब्यूटी पार्लर जो जाना है। पर नंदिता का काम वैसा नहीं है। जबतक सारे ग्राहक कपड़े नहीं ले जाते उसको यहीं रुकना है। इसके बाद घर जाना, थकान उतारना और दिवाली पर ख़ास क्या कार्यक्रम है वह कुछ तय नहीं है अभी तक।
लंच टाइम ख़त्म हो चुका है, कारीगर काम पर लग गए हैं। पीको वाली सारी साड़ियाँ और चुन्नियाँ बन गई हैं। सालिहा ने पीको मशीन को ढँक दिया है। दो बजे वाली चेकिंग शुरू हो गई है। नंदिता पैकेटों का रसीद से मिलानकर नंबर वाली गुलाबी चिट के साथ स्टैपल कर रही है। सुधा खुले हुए थानों को तहा रही है। अभी तक राजीव को आ जाना चाहिए था। अगर कारीगरों को पगार बाँटनी है और उनकी छुट्टी पाँच बजे करनी है तो तीन बजे तक काम शुरू हो जाना चाहिए। कल परसों दो दिन छुट्टी रहेगी इसलिए जिस दिन शोरूम खुलेगा उस दिन के कपड़े भी आज ही पूरे कर के रख देने होंगे।

"आज का काम पूरा हो गया है दीदी," सुधा ने बताया, फिर पूछा, "भैया आए?"
"अभी तो नहीं, आते होंगे," नंदिता ने कहा, "अगले दिन जिस दिन काम खुलेगा उस दिन का सब काम पैक हो गया?"
"वो कुछ बाकी है अभी, जारी है। गणेशलक्ष्मी सजा दें? भैया तीन बजे पूजा कर के प्रसाद बाँट देंगे हम सबको?"
"हाँ, तीन बजे तक सब तैयार तो कर ही देना चाहिए। और हाँ दूसरे दिन वाले पैकेट अंदर ही रखना, यहाँ मत लाना।"
"रज़िया और सुधा पूजा की तैयारी कर रही हैं। मास्टर जी का काम ख़त्म हो गया है, वो बाहर बीड़ी पीने गए हैं।"
नंदिता ग्राहकों को निबटा रही है पर उसकी निगाहें बेसमेंट की सीढ़ियों पर लगी हैं और कान फ़ोन पर। चैन नहीं पड़ा तो घर फ़ोन मिलाया, कोई फ़ोन नहीं उठा रहा। माँ को फ़ोन कर के पूछा,"राजीव आए माँ?"
"नहीं, अभी तो नहीं पर सुबह फ़ोन कर के बताया था कि जैसा कार्यक्रम था उसी समय से पहुँच रहा है। ट्रेन लेट होगी पहुँचता होगा।"
"ठीक है, बिट्टू क्या कर रही है?"
"नाना जी के साथ बाज़ार गई है फुलझड़ियाँ लेने।"
"ठीक है माँ, राजीव वहाँ पहुँचे तो तुरंत फ़ोन करने को कहना।" नंदिता ने फ़ोन रख कर देखा कि सिर्फ़ सात पैकेट बचे हैं, बाकी सब जा चुके हैं।
सुधा आकर बोली, "दीदी, अंदर जा कर देखिए, पूजा का सब ठीक हो गया या नहीं। मैं काउंटर सँभालती हूँ।"
नंदिता ने अंदर जा कर देखा- पूजा सजी हुई है। बस दीपक जलाने भर की कसर है।
"रंगोली किसने बनाई है?" नंदिता ने पूछा।
"आबिदा ने," किसी ने जवाब दिया। आबिदा इस साल नई आई है।
"बड़ी सुंदर रंगोली बनाई है आबिदा, कहाँ से सीखी?"
"बचपन से ही शौक ही दीदी, मैं ड्राइंग में अच्छी थी स्कूल में। जिस बुटीक में पहले काम करती थी उसमें भी मैं ही बनाती थी। आपके घर में डाल कर आऊँ?"
"हाँ, पर शायद बाहर की सफ़ाई नहीं हुई है, सुबह काफ़ी धूल थी।"
"अंदर पूजा में डालूँ?"
"नहीं, अंदर कोई पूजा नहीं है। बाहर के बरामदे को साफ़ कर के डाल दो। कैसे जाओगी?"
"सालिहा की साइकिल पर, उसे घर भी मालूम है।"
"ठीक है, पूजा जल्दी कर लेते हैं फिर जाना।"
"दीदी, मेरा हिसाब पहले कर देंगी?" रज़िया ने पूछा।
"अब तुम्हें क्या हो गया?"
"मैं जल्दी निकल गई तो पहली बस मिल जाएगी। पैसे अपनी बहन के घर रख कर फिर अपने घर जाऊँगी वर्ना मेरा भाई आज सब पैसों का जुआ खेल डालेगा। उसको पता नहीं चलना चाहिए कि मुझे आज पगार मिली है। वर्ना मेरा आदमी भी मुझ पर चिल्लाएगा।"
"दिवाली के दिन तो हिंदू जुआ खेलते हैं रज़िया।"
"लो अब जुआ खेलने में क्या हिंदू क्या मुसलमान, पिछली बार भी दिवाली पर पकड़ा गया था जुआ खेलते। पर मुझसे पैसे माँगता है और मेरे पास पैसे हुए तो मुझसे ना नहीं कहते बनता।"
"ठीक है, पहले तुम ही ले लेना।" नंदिता ने कहा।
"सुधा, जाली वाला शटर बंद कर दो और बाहर नोटिस लगा दो कि दुकान आधे घंटे को पूजा के लिए बंद है। आओ हम पूजा कर लें।"

पूजा छोटी-सी थी। धूप, दीप, मिठाई, रोली-अक्षत और फूल नंदिता ने चढ़ाए। सबने एक मिनट के लिए आँखें बंद कीं। काम बढ़ता रहे और अच्छा चले मन ही मन प्रार्थना की। अरुणा ने आरती की और सबको दी। थाली में सबने पैसे डाले। और फिर सुधा ने शोरूम की सारी बत्तियाँ जला दीं। सामने वाली झालर भी टिमटिमाने लगी।
नंदिता ने दराज में से सबके लिफ़ाफ़े निकाले और कहा, "सब लोग ठीक से देख लो जितने पैसे लिफ़ाफ़े पर लिखे हैं उतने हैं या नहीं। अंदर की पर्ची सँभाल कर रखना, अगर कुछ ठीक न लगे तो दो दिन बाद आकर भैया जी से बात कर लेना।" सबको मिठाई और बर्तन दिए गए। शुभकामनाओं का एक और दौर हो गया। कारीगर अपने-अपने घर चल दिए।
"मैं आपके घर पर रंगोली डालती हुई घर जाऊँगी," आबिदा ने कहा।
"देखना अगर गेट बंद हो तो फलाँग कर जाना होगा।"
सुधा ने वर्कशॉप में ताला लगा कर चाभी उसे पकड़ाई और वह भी चल दी।
नंदिता ने फिर घर फ़ोन किया।
दो घंटियाँ बजते ही उधर से आवाज़ आई, "हम आ गए भई आ गए. . ."
"कमाल है, आ कर फ़ोन तो करना था, मैं यहाँ परेशान हो रही हूँ।"
"बिलकुल अभी आया हूँ, एकदम गंदा हूँ अपने आँगन और बरामदे की तरह। सोचा कि पहले यह धोकर साफ़ कर दूँ फिर अपनी सफ़ाई करूँ, फिर सीधा शोरूम पर। देख कर दंग रह जाओगी क्या सफ़ाई की है, ऐसा चमचमा रहा है प्रवेशद्वार कि लक्ष्मी जी अंदर आए बिना नहीं जा सकेंगी।"
"अच्छा? शुरू हो गए मिठ्ठू मियाँ, शुक्रिया इतना ख़याल करने का," चैन की एक लंबी चादर नंदिता के चारों ओर तन गई।
"सालिहा और आबिदा पहुँचेंगी रंगोली डालने, उनको देख लेना ज़रा।"
"ठीक है, चाय बनाने ही जा रहा था उनके लिए भी बना लूँगा। आता हूँ फिर बिट्टू को लेकर, ठीक?"
"हाँ, ठीक।" नंदिता ने कहा और उसको लगा कि उसकी दिवाली अब शुरू हुई है।
राजीव बिट्टू के साथ जब शोरूम पर पहुँचा तब तक अँधेरा घिर आया था। बिट्टू अपनी फुलझड़ियाँ सीने से लगाए थी जो उसे अपने घर में छुटानी थीं। सात बज चुके थे। पर एक पैकेट अभी तक बचा हुआ था। उसका लेने वाला अभी तक आया नहीं था।
"अब, चलें?" राजीव ने पूछा।
"एक पैकेट बाकी है अभी, ज़रा फ़ोन कर के देखती हूँ कि कितनी देर में आ रहे हैं।" नंदिता ने गुलाबी चिट पर नाम पढ़ा रीना मैथ्यूज़, फ़ोन मिलाया। रीना उसकी पुरानी ग्राहक हैं। यहीं सरकारी अस्पताल में नर्स हैं। रीना मैथ्यूज़ ने बताया कि उसे स्पेशल ड्यूटी पर रुकना पड़ा है। वह आज कपड़े नहीं ले सकेगी बाद में लेगी।
नंदिता ने निश्चिंत होकर अपने और बिट्टू के कपड़ों के पैकेट उठाए, प्रसाद वाली मिठाई का डब्बा बाहर निकाल कर रखा। शटर बंद किया, सड़क पर आकर झालर से सजे अपने शोरूम को टिमटिमाते हुए एक नज़र देखा और वे सब निकल पड़े शहर की सैर को।
"माँ के यहाँ पूजा हो गई?"
"करने जा रहे थे वो लोग। और हाँ उन्होंने रात के खाने पर बुलाया है हमको। कुछ और लोगों को भी बुलाया है।"
"अच्छा।" नंदिता बिट्टू को शहर की दिवाली दिखाने में लगी थी।

सड़क के दोनों ओर मकानों में हलचल थी। अलग-अलग आकारों में सजी रोशनी की कतारों में शहर जीवंत हो उठा था। पटाखों, फुलझड़ियों और चकरियों से रास्ते रौशन हो रहे थे। हर तरफ़ बिखरते शोरगुल से मौसम में उत्सव छा गया था। लोग आ रहे थे, लोग जा रहे थे, बरामदों में कहकहे थे, मिठाइयों की खुशबू थी, नए कपड़ों की सरसराहट थी, कंदीले थीं। मुँडेरों पर दिये थे, मोमबत्तियाँ थीं, छोटे बल्बों की लड़ियाँ थीं और हर कहीं खुशी थी।
यह खुशी धीरे-धीरे नंदिता के दिल में समाने लगी। अपनी गली में स्कूटर मुड़ते ही उसे ध्यान आया,
"हमारा घर अँधेरा पड़ा होगा राजीव?"
नंदिता ने दूर से अपनी चार दीवारी को देखा, उसे विश्वास नहीं हुआ तो फिर से एक बार गर्दन ऊँची कर के देखा-
पूरी दीवार पर मोमबत्तियाँ टिमटिमा रहीं थीं। उसकी नज़र ऊपर गई-छत की मुंडेर भी सजी हुई थी। तब तक वे लोग घर पहुँच चुके थे। उसने नीचे देखा फ़र्श सचमुच चमक रहा था, आबिदा के बनाए गए आँगन के चौक पर एक बड़ा दिया रखा था। नंदिता ने दरवाज़ा खोला, अंदर बरामदे में भी दीयों की क़तार सजी थी। हर कमरे में एक दिया रखा हुआ था।
"भटनागर आँटी ने लगाए होंगे ये दिये।" राजीव ने कहा।
"हाँ, ऐसा ही लगता है। सुबह चाभी माँग रही थीं।"
"हमारे घर में दिवाली हो गई माँ," बिट्टू ताली बजाने लगी थी। "अब हम फुलझड़ी छुटाएँ?"
"नहीं पहले तैयार होकर नाना-नानी के घर चलना है।" राजीव ने कहा।
सबने नए कपड़े पहने और तैयार होकर नाना-नानी के घर पहुँचे, जहाँ त्योहार पहले से ही जगमगा रहा था। अभिवादन खुशी श़ुभकामनाओं का एक और दौर, लॉन में पड़ी कुर्सियाँ और अंदर सजी खाने की मेज़, खूब व्यस्त भाभी, अतिशबाज़ी में लगा भैया, हँसती खिलखिलाती महिलाएँ, ठहाके लगाते पुरुष, ज़ोर-ज़ोर से आदेश देते पापा और मिठाई का डिब्बा लिए सबका मुँह मीठा करवाती माँ।

नंदिता बाहर ही पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गई। दिन भर की सारी थकान आतिशबाज़ी के धुएँ की तरह अचानक घनी हुई और धीर-धीरे गायब होने लगी। आसमान में सितारे टिमटिमा रहे थे और ज़मीन पर दीये। नंदिता के चेहरे पर भी संतोष की आभा फैलने लगी। वह देर तक बूंदी के लड्डुओं की मिठास, दीयों के प्रकाश और रंगोली के रंगों में डूब कर दीपावली के साथ एकसार होती रही तब तक, जब तक माँ की पुकार ने उसे रात के खाने की याद नहीं दिला दी।

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१ नवंबर २००५

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