
लगभग साढे आठ बजे हम घर से निकल
पड़े। इस समय तक टर्न पाइक पर रोज़ के आने जाने वालों की भीड़
कम हो जाती है, इसलिए हम लगभग ३ घंटों में बिना रुके जॉन
हापकिन्स के कैंपस पहुँच गए। रेजीडेंसी में होने के कारण अब
तरुण ने एक फ्लैट किराये पर ले लिया था और अपने एक और साथी के
साथ रहता था।
दरवाज़े की घंटी कई बार बजाने
पर ही दरवाज़ा खुला और हम अपने सामने खड़े व्यक्ति को देखकर
भौंचक्के रह गये। तरुण के बाल और ढाढ़ी तो बढ़े ही थे, उसका
चेहरा भी उतरा हुआ था। तरुण भी मुझे देखकर आश्चर्य चकित था,
उसने नहीं सोचा था कि, मैं भी वहाँ पहुँच जाऊँगा। उसने मेरे
पैर छुए और बोला,
"आप बेकार परेशान हुए, मैंने तो माँ से ही केवल कहा था..."।
मैं बोला,
"तुमने बात ही ऐसी की थी कि मेरा चौंकना स्वाभाविक था। तुम तो
हमेशा से ही बुकनू से दूर भागते थे, अगर तुम बुकनू को
स्वास्थ्य सुधारने के लिए प्रयोग करना चाहते हो तो बात निश्चित
रूप से साधारण नहीं है।" हम तीनों ही जानते थे कि खाने पीने की
चीज़ों में उसकी रुचियाँ बड़ी बेढब थीं और जो चीजें उसे पसंद
नहीं थी, उन्हें हम उसे बचपन से आज तक कभी भी खिला नहीं पाए।
तरुण स्वयं ही बोला, "पता
नहीं क्या हो रहा है, मैंने कितने ही टेस्ट करवाए, पर हर शाम
को अजीब-सा सर दर्द शुरू हो जाता है। कैट स्केन, ई.एम.जी., एम.
आर. आई. सब कर चुके हैं, पर कुछ भी पता नहीं चला। जैकब से कह
कर उसके न्यूरो के प्रोफेसर साहब से भी बात की। उन्हें भी कुछ
समझ नहीं आ रहा है। इधर मेरा काम सब बिगड़ता जा रहा है। पिछले
हफ्ते तक मैं शाम को तो किसी काम के लायक नहीं रहता था, पर कम
से कम सुबह के समय तो अस्पताल जा पा रहा था, पर अब तो रात में
ठीक से सो न पाने के कारण सुबह भी ठीक से ध्यान नहीं दे पा रहा
हूँ। लगातार टायलोनॉल लेकर काम चला रहा हूँ। इससे अधिक
शक्तिशाली ड्रग्स लेने में दूसरे खतरे हैं। आप तो जानते ही हैं
कि मैं इन चीज़ों से दूर ही रहता हूँ।"
मैंने कहा, "जल्दी से कुछ साफ
कपड़े पहन लो, फिर देखते हैं... सत्य प्रकाश शायद अभी लंच में
घर पर आया हो तो उससे घर पर ही मिल लेते हैं। वहीं और विस्तार
से बात करेंगे। तुम तो जानते ही हो कि मुझे उस पर बहुत भरोसा
है। वैसे तो तुम खुद ही डॉक्टर हो, पर वो कहते हैं ना कि अपना
इलाज खुद नहीं होता। और अब तक अपनी सीमा में जो कुछ हो सकता है
वह तो तुम कर ही चुके होगे।" मैं उससे कह नहीं रहा था, पर असली
बात यह थी कि मुझे न तो स्वास्थ्य संबंधी ज़्यादा जानकारी है
और न ही अपने पर इस मामले में कोई भरोसा।
सत्य प्रकाश के घर जाते हुए
रास्ते में मैंने उसके सेल फोन पर बता दिया कि हम क्यों आ रहे
हैं। हमारे पहुँचने तक वह अपना लंच कर चुका था। तरुण को देखते
ही बोला, "मैंने तुमसे ये उम्मीद नहीं की थी तरुण, कम से कम
मुझे तो बताना चाहिए था।" तरुण झेंपता-सा बोला, "सॉरी अंकल,
मैंने खुद ही नहीं सोचा था कि बात इतनी बढ़ेगी। वैसे जितने हो
सकते थे, सारे टेस्ट मैं करवा चुका हूँ, और डॉ. सिल्विया
कालिन्स से भी मिल चुका हूँ। अब तो मेरी अक्ल ने काम करना बंद
कर दिया है, क्योंकि कोई भी टेस्ट अभी पॉजिटिव नहीं आया है।
सभी की सलाह है कि अत्याधिक काम करने से हुई थकान ही मेरी
मुख्य समस्या है। मुझे आराम करना चाहिए और धीरे-धीरे सभी ठीक
हो जाएगा।"
सत्य प्रकाश ने पूछा, "वैसे
तो तुम और तुम्हारे साथी इस पर पहले ही विचार कर चुके होगे,
लेकिन फिर भी तुम्हें ऐसी कोई भी बात याद आती है, जिससे
अंदाज़ा लगाया जा सके कि समस्या का मूल क्या है?''
तरुण बोला, "मैंने सोचा तो बहुत कुछ, पर ऐसा कुछ भी याद नहीं
आता जिससे पता लगे कि इसका कारण क्या हो सकता है। मैंने पिछले
२-३ महीनों से ज़्यादा समय से बाहर किसी रेस्तरां में खाना तक
नहीं खाया जो कोई अनजाना वायरस या बैक्टीरिया अपना असर दिखा
रहा हो। अपनी आँखो की जाँच करवा चुका हूँ, और वे तो बिलकुल
ठीक-ठाक हैं। मैंने अपने अपार्टमेंट में प्रकाश की भी ठीक-ठाक
व्यवस्था कर ली है। सर दर्द के अन्य कारण जैसे तेज इत्र,
कैफीन, मौसम, भूख आदि मेरे ध्यान में अब तक जो कुछ भी आया है,
मैंने सभी को परखा है, परंतु अभी तक कोई कारण नहीं समझ में आया
है। इसीलिए तो मैंने माँ से बुकनू माँगा था।"
सत्य प्रकाश ने भौंहें चढ़ाईं, बुकनू? उसका इससे क्या मतलब है?
तरुण बोला, "ओह, वो तो मैं टायलोनॉल खाते-खाते उकता गया था, तो
मुझे याद आया कि सर दर्द के लिए माँ बुकनू लेती थी, तो मैंने
सोचा कि मैं भी लेकर देखूँ।"
सत्य प्रकाश ने प्रश्नात्मक दृष्टि से तरुण की ओर देखा और कहा,
''और..?''
तरुण बोला, "उसका असर अभी तक नहीं देखा क्योंकि अभी तक उसे
आज़माने का मौका ही नहीं मिला है।"
सत्य प्रकाश ने तरुण से उसकी
स्वास्थ्य संबंधी सभी रिपोर्ट सुरक्षित ईमेल से भेजने के लिए
कहा तो उसके उत्तर में तरुण ने एक यू.एस.बी. ड्राइव उसे दी
जिसको लगाकर सत्यप्रकाश और तरुण दोनों ही तरुण की जाँचों को
फिर से देखने लगे। सत्यप्रकाश ने कुछ देर बाद सिर हिलाया और
कहा, ''कारण तो कोई समझ में नहीं आता।''
पर कुछ और दूर की संभावनाओं को परखने के लिए टेस्ट लिखकर दिए
और उनको तुरंत करवाने के लिए कहा। हम उसका पर्चा लेकर तुरंत
क्वेस्ट की लैब में गए। लैब पैथालाजिस्ट को तरुण ने अपना पहचान
पत्र दिखाकर कहा कि हमें जल्दी है, हो सके तो फोन पर डॉ सत्य
प्रकाश या फिर डॉ तरुण को विश्लेषण दे दें।
लैब से निकलने के बाद हम सभी
जान हापकिन्स के कैंपस वापस गए। हमें वहाँ देखकर तरुण भी
उत्साहित हो गया था और कॉलेज की लाइब्रेरी में कुछ पुराने
केसों के बारे में माइक्रोफिल्म पर देखना चाहता था। मैं और
पत्नी भी वहीं लाइब्रेरी में कुछ और पुस्तकें देखने लगे। लगभग
दो घंटे बाद तरुण हतोत्साहित वापस आया। उसका चेहरा पुनः थका
दिख रहा था। मैंने उसे उत्साहित करने के लिए कहा, चिंता मत करो
हम इस समस्या का हल कुछ न कुछ ढूँढ़ ही निकालेंगे।
घर वापस पहुँचने से पहले ही
तरुण को सेल पर लैब का टेक्सट मेसेज आया। तरुण उसे देखकर बोला,
"कुछ फायदा नहीं हुआ। सारे रिजल्ट फिर से नेगेटिव आए हैं।"
रास्ते में मेरी नज़र दायीं और बैठे तरुण के चेहरे पर पड़ी, वह
हारा हुआ लग रहा था, बोला, "पापा, सर फिर से दर्द करने लगा
है।"
मैंने पूछा, "क्या तुम्हारे पास टायलोनॉल है अभी?"
उसने इन्कार में सिर हिलाया। मैंने कहा, "पंद्रह मिनट तो कम से
कम लगेंगे ही अभी घर तक पहुँचने में, तब तक काम चल पाएगा कि
नहीं? नहीं तो हम लोग रास्ते में किसी सीवीएस फार्मेसी या
वालमार्ट से दवा ले लें।"
तरुण ने कहा, "रहने दीजिए, जितनी देर ढूँढ़ने में लगेगी, उतनी
देर में तो घर ही पहुँच जाएँगे।"
अगले तीन-चार मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला। हम सभी चुपचाप
अपने-अपने ख़यालों में खोये हुए बैठे थे।
अचानक तरुण बोला, "माँ, क्या
आपके पास वो येलो साल्ट है, या आप अपार्टमेंट पर ही छोड़ आईं?"
उसकी माँ ने कहा, नहीं वो तो डिक्की के सामान में ही है। मैंने
तरुण के चेहरे के भाव देखे तो चुपचाप गाड़ी हाई वे के किनारे
सोल्डर पर रोक ली। उतर कर पीछे से बैग निकाल लाया और उसमें से
निकाल कर बुकनू की शीशी तरुण को पकड़ा दी। उसने हथेली पर रखकर
कुछ बुकनू पानी के साथ फाँक लिया। बाकी का सारा रास्ता चुपचाप
गुज़रा। हम घर पहुँचे और तरुण की हालत देखते हुए उसे टायलोनॉल
लेने की सलाह दी। उसने भी बिना कुछ कहे ५०० मिग्रा की एक गोली
ले ली। उसे एक्सट्रा स्ट्रेंग्थ टायलोनॉल लेते देख मैं फिर से
चिंतित हो गया। सत्य प्रकाश को फिर से फोन मिलाया तो वाइस मेल
में उसकी आवाज़ सुनकर फोन काट दिया। उस रात हमने कुछ अनमने मन
से ही खाना खाया। समस्या विचित्र थी, हम तरुण को आकस्मिक इलाज
के लिए एमरजेन्सी में भी नहीं ले जा सकते थे। उससे तो वेबजह
बात और फैलती, और फिर इमरजेंसी में वो लोग आखिर क्या करते। उसे
सिडेटिव देकर सुला देते। तरुण वही तो नहीं चाहता था, नहीं तो
डॉक्टर होने के नाते कब का वैसा कर चुका होता। साथ ही रोज़
कैसे सिडेटिव लिया जाता।
अगली सुबह चाय के समय तरुण
अपने कमरे से बाहर आया तो हम दोनों ने तरुण की तरफ़ सवालिया
निगाहों से देखा। वह थका हुआ था, और चेहरे पर उलझन साफ दिख रही
थी।
बैठते ही बोला, "समझ में नहीं आ रहा है कि क्या कहूँ? कल रात
उतनी परेशानी नहीं हुई। इसका कारण आप लोगों का यहाँ पर मेरे
साथ होना है या बुकनू...?"
हम दोनो पति-पत्नी भी असमंजस में पड़ गए। मैंने अपना
वापस लौटना स्थगित कर दिया और सोचा, एक दिन और तरुण के साथ
रहना ठीक रहेगा।
अगला दिन ठीक-ठाक गुज़रा पर
शाम होते ही मुसीबत आ खड़ी हुई-- फिर वही सिरदर्द। हमने सोचा,
परेशान होने से तो अच्छा है कि तरुण टायलोनॉल और बुकनू दोनों
ही ले ले। मैं उस रात ही वापस लौट आया, पर सविता वहीं रुक गई।
आफिस से लौटते समय रास्ते में मैंने धड़कते दिल से तरुण का हाल
पूछा तो पता लगा कि कल की तरह आज भी उसने दर्द को सहने के लिए
दोनों तरीके अपनाये थे।
मैंने सत्य प्रकाश को फोन
करके पूछा कि कोई प्रगति हुई। झिझक के कारण बुकनू वाली बात उसे
नहीं बता सका। मुझे भी कुछ निश्चित नहीं था कि पाचन चूर्ण से
कोई फायदा हो सकता था या नहीं। सत्य प्रकाश ने बताया कि उसने
आज कई और विशेषज्ञों को फोन किया था पर अभी तक कोई समुचित
समाधान नहीं मिला था। सभी विशेषज्ञों की धारणा बन रही थी, कि
यह कोई नया वायरस या बैक्टीरिया है जो अभी तक चिकित्सा क्षेत्र
में पहचाना नहीं गया है। मैंने उसे बताया कि दो दिन जब हम लोग
वहाँ थे तो तरुण को कम परेशानी हुई।
सत्य प्रकाश बोला, "हो सकता है कि कोई मनोवैज्ञानिक समस्या हो
जिसके बारे में तरुण हमें बता नहीं पा रहा हो। मैं कल उसके
साथियों आदि से इधर-उधर की बातें करके पता करता हूँ कि कोई और
बात तो नहीं है।" मुझे भी उसकी बात जँची। ऐसा हो सकने की
संभावना तो थी ही।
अगले दो हफ्तों में तरुण की
हालत काफी सुधर गई। यहाँ तक कि सविता भी वापस आ गई। हम अपने
रोज़मर्रा के कामों में उलझ गए। हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं
रहा जब तरुण ने बताया कि उसने टायलोनॉल लेना बंद कर दिया है और
केवल एक बार एक चम्मच बुकनू लेता है, और इतने से ही उसका काम
चल रहा है। हम खुद समझ नहीं पा रहे थे कि इन हालातों में क्या
करें। इसी तरह लगभग एक महीना गुज़र गया।
रात के लगभग एक बज रहे थे।
मैं एक सपने के बीच में था... ऊपर की ओर चढ़ते हुए किसी हवाई
जहाज़ में, अचानक सुनाई दिया... "काल फ्राम वेरिजान
वायरलेस...'' नींद तुरंत उड़ गई और फोन उठाते हुए मेरा दिल
अचानक आशंका से काँप उठा, क्या फिर वही! कनेक्शन मिलते ही फोन
पर तरुण की घबराई हुई आवाज सुनाई दी,
"पापा मेरे पास बुकनू खत्म हो गया है। क्या आप माँ से कहेंगे
कि वो और बुकनू मुझे भेज देंगी?"
"हाँ ज़रूर। पर क्या तुम्हारा ध्यान पहले नहीं गया था?"
"मैंने सोचा था कि आपसे कहूँगा, पर आजकल ठीक ही चल रहा हूँ,
इसलिए ढीला पड़ गया था।"
"क्या दर्द फिर से हो रहा है?"
"नहीं अभी तो नहीं, पर आजकल जो काम पीछे रह गया था उसकी भरपाई
कर रहा हूँ, यदि ऐसे में गड़बड़ हुआ तो फिर मेरे प्रोफेसर
अच्छा नहीं समझेंगे।"
"सुबह होते ही भेजते हैं।" मैंने उसे आश्वस्त करते हुए फोन बंद
किया।
अबतक सविता भी जाग गई थी, बोली, "मैंने तो सोचा ही नहीं था कि
ऐसी ज़रूरत पडे़गी, अब तो बुकनू खत्म हो गया है। ऐसा करते हैं
कि भारत में मुकेश से कहो कि वे भेज दें।" मैं अपने चचेरे भाई
मुकेश को फोन करने ही वाला था कि याद आया, एफ.डी.ए. वाले
कूरियर से खाने की साम्रगी के नाम पर कोई भी मसाले आदि लाने से
रोक देंगे। इसका मतलब ये हुआ कि भारत से आने वाले किसी व्यक्ति
के व्यक्तिगत सामान के साथ ही मँगाना पड़ेगा। यदि कोई नहीं
मिला तो स्वयं जाना पड़ जाएगा।
कितनी विडम्बना होगी कि
विकासशील देशों, यहाँ तक कि अमेरिका के कई अन्य शहरों से लोग
अपना इलाज करवाने यहाँ हमारे शहर न्यू यार्क आते हैं और हमें
अपने पुत्र के स्वास्थ्य के लिए बुकनू लाने भारत जाना पड़ जाए।
अगले दो दिन बड़े ही असमंजस में बीते। सप्ताहांत आते-आते तरुण
ने बताया कि अब उसके पास बिलकुल भी बुकनू नहीं बचा था। हम उसकी
बेबसी समझ रहे थे। न्यू जर्सी में लगभग सभी दुकानों पर ढूँढ़ने
के बाद हम कुछ सामग्री जुटा पाए जिससे यहीं पर वह मिश्रण बनाया
जा सके। उसे लेकर जब हम तरुण के पास पहुँचे तो उसने एक चम्मच
चूर्ण खाया और खाते ही बोला, "यह तो कुछ अजीब-सा स्वाद वाला
है।" हमने उसे सारी बात बताई तो उसने कुछ कहा तो नहीं पर वह
आश्वस्त नहीं लग रहा था। मैंने अपने सभी परिचितों में कह रखा
था कि यदि कोई भारत गया हो तो बता दें, क्योंकि हमें एक छोटा
मसाले का पैकेट मँगाना है जिसे मसाला होने के कारण सीधे कूरियर
से नहीं मँगाया जा सकता। |