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कला और कलाकार

रसिक रावल

रसिक दुर्गाशंकर रावल का जन्म १९२८ में सौराष्ट्र में हुआ था। साबरकाँठा में बचपन बीता और कला की शिक्षा सर जे जे स्कूल आफ आर्टस में। मयूरल कलाकृतियों के लिये उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली।

लोक संस्कृति के बीच में पलने और बढ़ने के कारण सौराष्ट्र की लोक अलंकरण शैली का प्रभाव उनके चित्रों में साफ दिखता है। लेकिन रसिक रावल के चित्रों में इसके अलावा भी कुछ है जो भीड़ में से उनके चित्रों को अलग कर देता है। ऐसी आधुनिकता है जो पेरिस की फैशनपरस्त आधुनिकता नहीं और अपनी भारतीयता है लेकिन पारंपरिक रूढ़िवादिता नहीं।

उनकी रेखाएँ आकर्षक हैं, उनकी आकृतियाँ लंबी और नाजुक। उनकी कलाकृतियों की चटक पृष्ठभूमि में अनोखी नाटकीयता है जिसमें उनकी कूची के प्रवाह सहज ही आकार लेते चले जाते हैं। उनके पात्र दैनिक जीवन के सामान्य लोग हैं लेकिन उनकी कूची के आकार और उनकी रेखाओं के विस्तार उन्हें अलौकिक बना देते हैं। उनकी मछुआरिनें, लोक नर्तक, फल वाले, पशु और पक्षी, वर्ली और भीमबेटका के उन कलाकारों की याद दिला देते हैं जो अपनी सामान्य दृष्टि को दीवानगी की सीमा तक कलात्मक बना देते हैं।

आधुनिक चित्रकला को लेकर अक्सर मज़ाक में कहा जाता है कि चीजें असल में इतनी खराब नहीं होतीं जितनी कि उनके चित्र बनाए जाते हैं लेकिन अगर यह बात रसिक रावल के चित्रों के लिये कहनी पड़े तो इसमें सुधार करना पड़ेगा कि चीज़े शायद उतनी अच्छी नहीं थीं, जितने सुंदर उनके चित्र रसिक रावल ने बनाए हैं।
बात के प्रमाण के लिये यहाँ दिया चित्र ही देखिये, आप तो क्या, अगर ये चिड़ियाँ भी यह चित्र देखें तो सोचेंगी कि काश, हम इतनी सुंदर होतीं!

आपकी पहली एकल प्रदर्शनी १९५४ में हुई। इसके बाद उन्हें अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त हुए। बम्बई आर्ट सोसायटी का पुरस्कार १९५२, १९५५ में ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार, फाइन आर्ट अकादमी, कलकत्ता का पुरस्कार भी मिले। १९६७ में उनकी एक प्रदर्शनी कनेक्टीकट में भी हुई। वे एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय मुंबई की सीनेट के सदस्य भी थे।

१९८० में आपका देहांत हुआ।

 
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© सर्वाधिका सुरक्षित
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