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१
भारतीय
गणतंत्र के छह दशक
सफलताएँ -
अपेक्षाएँ - समस्याएँ१
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अपेक्षाएँ-
लाखों
राष्ट्रभक्तों के त्याग और बलिदान के बाद २६
जनवरी १९५० को घोषित हमारा यह गणतंत्र, हमारी
किन आकांक्षाओं पर खरा उतरा और कौन सी
आकांक्षाएँ अधूरी रह गईं यह जानने का समय अब आ
गया है। गणतंत्र का सीधा सा अर्थ है- ‘जनता के
द्वारा, जनता के लिए और जनता का तंत्र।’
गणतंत्र की
घोषणा के समय लगता था कि अब मुगल आक्रांताओं
तथा अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के बाद
भारत में पुन: भारतीय प्रणाली का आदर्श राज्य
विकसित होगा। विदेशी भाषा, विदेशी विचारों व
विदेशी तंत्र से पूर्ण मुक्त स्वदेशी का
बोलबाला होगा। जनता किसी भी तरह के उत्पीड़न,
असमानता, भेदभाव से पूरी तरह मुक्त होकर खुली
साँस लेने का सपना संजोने लगी, किंतु यह सपना
सत्य हुआ नहीं।
न अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन
किया गया न न्याय प्रणाली में। स्वाधीनता
आंदोलन के दौरान आश्वासन दिया गया था कि
विदेशी वस्तुओं का आयात पूरी तरह बंद कर देश
में बनी वस्तुओं के उपयोग का मार्ग प्रशस्त
किया जाएगा। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई जाती
थी। घोषणा की जाती थी कि शराब का उपयोग नहीं
होने दिया जाएगा। अंग्रेजी भाषा की जगह हिंदी
को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाएगा। भारतीय
कृषि की रीढ़ गाय-बैलों की हत्या पर तुरंत
प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।
स्वाधीनता के बाद जवाहर लाल नेहरू
प्रधानमंत्री बनाये गए। नेहरू का सपना था कि
भारत को अमेरिका, ब्रिटेन की तरह आधुनिकतम देश
बनाना है। विदेशी संविधानों को इकट्ठा कर
उन्हीं पर आधारित भारत का संविधान बनाया गया।
विकास व आधुनिकता के लिए अंग्रेजी भाषा को
आवश्यक बताकर हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के
महत्व को नकार दिया गया। शराब को आय का प्रमुख
स्रोत बताकर मद्य-निषेध के आश्वासन को फाइल
में बंद कर दिया गया। अंग्रेजों के शासन काल
की तमाम व्याधियों को लागू देखकर एक बार
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के मुख से निकल
गया- ‘गोरे देश से भले चले गये- काले
अंग्रेजों के हाथों सत्ता आ गई है।’
‘गणतंत्र’ घोषित होने के बाद चुनाव कराए गए।
लोकसभा में सत्तारूढ़ कांग्रेस के विरोध में
सशक्त विपक्षी दल उभरा। कांग्रेस किसी भी तरह
सत्ता पर काबिज रहने के लिए नये-नये ताने-बाने
बुनने में लग गई। जातिवाद की विष-बेल को
पनपाना शुरू किया गया। दूसरी ओर वोटों के लिए
अल्पसंख्यकवाद को प्राश्रय दिया जाने लगा।
विभाजन के बाद कश्मीर में अलगाववादी दनदनाने
लगे। कबाइली हमले को हमारी बहादुर सेना ने
विफल कर श्रीनगर घाटी की रक्षा की गई तो शेख
अब्दुल्ला ने कश्मीर का स्वतंत्र सुलतान बनने
का सपना बुनना शुरू कर दिया। वर्ष १९५३ में
डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान व प्रजा
परिषद के व्यापक आंदोलन के बाद ही शेख का सपना
चकनाचूर हो पाया।
कांग्रेस द्वारा
तेजी से उभरते जनसंघ जैसे विपक्षी दलों को
सांप्रदायिक बताकर विषवमन करना शुरू कर दिया।
जनसंघ व हिंदू महासभा को सांप्रदायिक बताकर
अल्पसंख्यकों का शत्रु बताकर, अल्पसंख्यकों को
लामबंद करने के प्रयास किये। दूसरी ओर
कांग्रेस ने मुस्लिम लीग जसी घोर अराष्ट्रीय
संस्था से चुनाव में सहयोग लेने में हिचकिचाहट
नहीं की। सत्ता की लालसा से देश में सक्रिय
पाकिस्तान प्रशिक्षित घुसपैठियों व
आतंकवादियों की गतिविधियों को किसी न किसी
प्रकार से संरक्षण ही मिलता गया।
कांग्रेस की तरह अन्य दल भी उन तमाम विकृतियों
के शिकार होते गए। प्रत्याशियों द्वारा
चुनावों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये
जाने लगे। इसका परिणाम तरह-तरह के भ्रष्टाचार
के रूप में सामने आने लगा। विदेशी बैंकों में
भी इन भारतीय राजनेताओं के काले धन का अंबार
लगने लगा। हत्यारों, अपहरण कर्ताओं,
बलात्कारियों को जेल भेजने की जगह राजनीति में
स्थान दिया जाने लगा। राजनीति का तेजी से
अपराधीकरण होने लगा। बाहुबलियों, अपराधियों को
प्रत्याशी बनाया जाने लगा। परिणामत: गणतंत्र
की जगह गनतंत्र (बंदूक) तथा धनतंत्र लेते जा
रहे हैं। सभी दलों ने सिद्धांतों का परित्याग
कर किसी भी तरह सत्ता प्राप्ति को अपना
उद्देश्य बना लिया। उन्हें न अपराधियों से कोई
गुरेज है न राष्ट्रद्रोही अलगाववादियों से।
वोटों के खिसकने के भय के कारण ही संसद पर
हमले के दोषी अफजल गुरु को आज तक फाँसी नहीं
दी गई है।
आज देश की अखंडता को खुली चुनौती दी जा रही
है। नेपाल में माओवादी भारत को आंखें दिखा रहे
हैं तो कई राज्यों में नक्सली सुरक्षाबलों पर
हमले कर नृशंस हत्याएं कर रहे हैं। पाकिस्तान
जाली नोटों की खेप भेजकर हमारी अर्थव्यवस्था
चौपट करने में सक्रिय हैं। चीन ने पाकिस्तान
से सांठगांठ करके पुन: भारत की भूमि पर
अतिक्रमण कर अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र
बता हमारी भूमि पर अनाधिकृत कब्जा करके हमें
खुली चुनौती दे रहा है। देश की जनता एक ओर
भीषण महंगाई का शिकार बनकर दाने-दाने को
मोहताज होती दिखाई दे रही है ऐसी विषम स्थिति
में गणतंत्र का सपना साकार करना कोई आसान काम
नहीं।
- शिव कुमार
गोयल
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सफलताएँ-
पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने जब
देश को २०२० में महाशक्ति बन जाने का सपना
दिखाया था, तो वे एक ऐसी हकीकत बयान कर रहे थे,
जो जल्दी ही साकार होने वाली है। आजादी के ६ दशक
पूरे करने के बाद भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे मुकाम
पर है, जहाँ से उसे सिर्फ आगे ही जाना है। अपनी
एकता, अखंडता और सांस्कृतिक व नैतिक मूल्यों के
साथ पूरी हुई इन ६ दशकों की यात्रा ने पूरी
दुनिया के मन में भारत के लिए एक आदर पैदा किया
है। यही कारण है कि हमारे भारतवंशी आज दुनिया के
हर देश में एक नई निगाह से देखे जा रहे हैं।
उनकी प्रतिभा का आदर और मूल्य भी उन्हें मिल रहा
है। अब जबकि हम फिर नए साल-२०१० को अपनी बांहों
में ले चुके हैं तो हमें सोचना होगा कि आखिर हम
उस सपने को कैसा पूरा कर सकते हैं जिसे पूरे
करने के लिए सिर्फ दस साल बचे हैं। यानि २०२०
में भारत को महाशक्ति बनाने का सपना।
एक साल का समय बहुत कम होता है। किंतु वह उन
सपनों की आगे बढ़ने का एक लंबा समय है क्योंकि
३६५ दिनों में आप इतने कदम तो चल ही सकते हैं।
आजादी के लड़ाई के मूल्य आज भले थोड़ा धुंधले
दिखते हों या राष्ट्रीय पर्व औपचारिकताओं में
लिपटे हुए, लेकिन यह सच है कि देश की युवाशक्ति
आज भी अपने राष्ट्र को उसी ज़ज्बे से प्यार करती
है, जो सपना हमारे सेनानियों ने देखा था। हमारे
प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र में भले ही संवेदना
घट चली हो, लेकिन आम आदमी आज भी बेहद ईमानदार और
नैतिक है। वह सीधे रास्ते चलकर प्रगति की
सीढ़ियाँ चढ़ना चाहता है।
यदि ऐसा न होता तो
विदेशों में जाकर भारत के युवा सफलताओं के
इतिहास न लिख रहे होते। जो विदेशों में गए हैं,
उनके सामने यदि अपने देश में ही विकास के समान
अवसर उपलब्ध होते तो वे शायद अपनी मातृभूमि को
छोड़ने के लिए प्रेरित न होते। बावजूद इसके
विदेशों में जाकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभा,
मेहनत और ईमानदारी से भारत के लिए एक ब्रांड
एंबेसेडर का काम किया है। यही कारण है कि साँप,
सपेरों और साधुओं के रूप में पहचाने जाने वाले
भारत की छवि आज एक ऐसे तेजी से प्रगति करते
राष्ट्र के रूप में बनी है, जो तेजी से अपने को
एक महाशक्ति में बदल रहा है।
आर्थिक सुधारों की
तीव्र गति ने भारत को दुनिया के सामने एक ऐसे
चमकीले क्षेत्र के रूप में स्थापित कर दिया है,
जहाँ व्यवसायिक विकास की भारी संभावनाएं देखी जा
रही हैं। यह अकारण नहीं है कि तेजी के साथ भारत
की तरफ विदेशी राष्ट्र आकर्षित हुए हैं।
बाजारवाद के हो-हल्ले के बावजूद आम भारतीय की
शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में
व्यापक परिवर्तन देखे जा रहे हैं। ये परिवर्तन
आज भले ही मध्यवर्ग तक सीमित दिखते हों, इनका
लाभ आने वाले समय में नीचे तक पहुँचेगा।
भारी संख्या में युवा शक्तियों से सुसज्जित देश
अपनी आंकाक्षाओं की पूर्ति के लिए अब किसी भी
सीमा को तोड़ने को आतुर है। वे तेजी के साथ नए-नए
विषयों पर काम कर रही है, जिसने हर क्षेत्र में
एक ऐसी प्रयोगधर्मी और प्रगतिशील पीढ़ी खड़ी की
है, जिस पर दुनिया विस्मित है। सूचना
प्रौद्योगिकी, फिल्में, कृषि और अनुसंधान से
जुड़े क्षेत्रों या विविध प्रदर्शन कलाएँ हर जगह
भारतीय प्रतिभाएँ वैश्विक संदर्भ में अपनी जगह
बना रही हैं। शायद यही कारण है कि भारत की तरफ
देखने का दुनिया का नजरिया पिछले एक दशक में
बहुत बदला है। ये चीजें अनायास और अचानक घट गईं
हैं, ऐसा भी नहीं है। देश के नेतृत्व के साथ-साथ
आम आदमी के अंदर पैदा हुए आत्मविश्वास ने विकास
की गति बहुत बढ़ा दी है। भ्रष्टाचार और
संवेदनहीनता की तमाम कहानियों के बीच भी विश्वास
के बीज धीरे-धीरे एक वृक्ष का रूप ले रहे हैं।

इसका यह अर्थ नहीं कि सब कुछ अच्छा है और करने
को अब कुछ बचा ही नहीं। अपनी स्वभाविक प्रतिभा
से नैसर्गिक विकास कर रहा यह देश आज भी एक भगीरथ
की प्रतीक्षा में है, जो उसके सपनों में रंग भर
सके। उन शिकायतों को हल कर सके, जो आम आदमी को
परेशान और हलाकान करती रहती हैं। इसके लिए हमें
साधन संपन्नों और हाशिये पर खड़े लोगों को एक तल
पर देखना होगा। क्योंकि आजादी तभी सार्थक है, जब
वह हिंदुस्तान के हर आदमी को समान विकास के अवसर
उपलब्ध कराए। -संजय द्विवेदी |
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समस्याएँ-
प्रत्येक भारतीय की इच्छा होती है कि हमारा गणतंत्र अमर
रहे। गणतंत्र का आकलन सदैव होते रहना चाहिए। हम कहाँ
खड़े हैं, कहाँ तक जाना है और जाने के लिए कहाँ और कैसे
प्रयास करने हैं, इसकी जानकारी भी होनी चाहिए। हम
अधिकारों की बात तो करते हैं पर कर्तव्यों के प्रति
उदासीन रहते हैं। स्थितियाँ बदलनी है तो हमें वर्तमान
हालात पर नजर दौड़ानी होगी। सच से कब तक भागेंगे?
कृषि क्षेत्र में हम पिछड़
रहे हैं। वर्ष १९५१ में प्रति व्यक्ति कृषि जोत उपलब्धता
०.४६ हेक्टेयर थी, जो १९९२-९३ में घटकर ०.१९ रह गई।
वर्तमान में यह ०.१६ है। जून २००९ में संसद में
राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा
अधिनियम लाएगी लेकिन अभी तक इसकी अधिसूचना जारी नहीं हुई
है। हमारे देश में ५३ प्रतिशत आबादी भुखमरी और कुपोषण की
शिकार है। भारत के डेढ़ करोड़ बच्चे कुपोषित होने के
कगार पर हैं। विश्व की २७ प्रतिशत कुपोषित आबादी भारत
में है। देश में ५८ हजार करोड़ का खाद्यान भण्डारण और
आधुनिक तकनीक के अभाव में नष्ट हो जाता है। यह कैसी
विडम्बना है कि कृषि आधारित व्यवस्था वाले देश की भुखमरी
और कुपोषण में विश्व में ११९ देशों में ९४वाँ स्थान है।
गरीबी और विषमता घटने के बजाय बढ़ गई है। सुरेश तेंदुलकर
समिति ने एक रिपोर्ट तैयार की है। इसके अनुसार भारत में
३७.२ प्रतिशत लोग बहुत गरीब हैं। पिछले ११ वर्षों में ११
करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए हैं। ४५ करोड़ लोग
प्रति माह प्रति व्यक्ति ४४७ रुपये पर गुजारा कर रहे
हैं।
गाँवों का विकास नहीं हो रहा। शहरों में ७७.७० फीसदी
लोग पक्के मकान में रहते हैं, वहीं ग्रामीण भारत के
केवल २९.२० फीसदी लोगों के पास यह सुविधा उपलब्ध है।
शहरों के ८१.३८ फीसदी लोगों को पीने का पानी उपलब्ध
है। वहीं गाँवों के ५५.३४ फीसदी लोगों को ही पीने का
पानी नसीब हो रहा है। शहरों के ७५ फीसदी लोगों तक ही
बिजली पहुँच पा रही है। वहीं गावों के सिर्फ ३०
फीसदी लोग ही बिजली का लाभ उठा पा रहे हैं। आज भी
देश की ७२.२२ फीसदी आबादी गावों में रहती है। अत:
गाँव के समग्र विकास के बिना हम दुनिया की दौड़ में
भारत को आर्थिक रूप से मजबूत भी नहीं बना सकते।
भारत पर विदेशी कर्ज का बोझ ३१ दिसम्बर २००८ तक
बढ़कर २३०८० अरब डॉलर पर पहुँच गया जो समीक्षाधीन
अवधि में २५४६ अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भण्डार के
मुकाबले मामूली रूप से कम है। संयुक्त राष्ट्र
आर्थिक एवं सामाजिक आयोग ने अनुमान व्यक्ति किया है
कि वर्ष २०२५ तक भारत की जनसंख्या बढ़कर १५ अरब हो
जाएगी। वर्ष २०२५ तक आधी आबादी शहरों में रहने
लगेगी। भारतीय शहरों में अगर कोई आपदा आए तो उसका
नागरिकों पर गहरा असर पड़ेगा।
विश्व के भ्रष्ट देशों में हमारा ८५वाँ और एशिया में
चौथा स्थान है। साल की शुरुआत से पहले ही देश में
सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की सबसे बड़ी कम्पनी
सत्यम् में सात हजार करोड़ रुपये का घोटाला सामने
आया। इस दौरान संचार मंत्रालय का स्पेक्ट्रम, झारखंड
के पूर्व राज्यपाल श्री सिब्ते रजी तथा पूर्व
मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री के
बेटे स्वीटी तथा हाल के दिनों में संसद में गूँजी
जस्टिस दिनाकरण एवं सैन्य अधिकारियों के भूमि
घोटालों ने भी भारत की साख को गहरा धक्का पहुँचाया
है।
सरकार
दावा करती है कि प्राथमिक कक्षाओं में ९०.९५ फीसदी
दाखिले हो रहे हैं लेकिन उसके उलट युवाओं का एक
तिहाई हिस्सा निरक्षर है और प्राथमिक स्तर की पढ़ाई
भी पूरी नहीं कर पा रहा है। जिस युवा भारत की तस्वीर
पेश की जा रही है वह सूचना तकनीक कंप्यूटर,
सॉफ्टवेयर, मैनेजमेंट आदि की शहरी दुनिया में जीने
वाले युवाओं की तस्वीर है। भारत के गाँवों तथा शहरों
की झोंपडपट्टियों में रहने वाले ७०-८० फीसदी बच्चों,
किशोरों और युवाओं से इसका कोई वास्ता नहीं है। इस
असली युवा भारत के निर्माण के बगैर भारत का निर्माण
संभव नहीं। स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो
जनसंख्या मानदंडों के अनुसार २०,८५५ उपकेंद्रों ४८३३
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और २५२५ समुदाय
स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। डॉक्टरों एवं नर्सों
की भारी कमी है। जिस देश में प्रतिदिन एक हज़ार लोग
रोग से मरते हों, वहाँ सरकार जीडीपी का लगभग एक
प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती है। अपार
संभावनाओं से भरा भारत किन कारणों से अभावग्रस्त
जीवन जीने को मजबूर है, जैसे विषयों पर प्रत्येक
भारतीय को विचार करना होगा। अगर हम ऐसा कर पाए तो वह
सपना पूरा होने में कोई संदेह नहीं जब हम सभी एक
स्वर से कहें, ''मेरा भारत महान।''
-प्रकाश झा
२५
जनवरी २०१० |
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