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सांप को पहचाना जा सकता है पर मनुष्य को पहचानना दुष्कर है। बूढ़े लोगों द्वारा पहले इस तरह की बात अक्सर कहते सुनता था। इसका हाथों हाथ प्रमाण मिला युवा गौतम भट्टाचार्य में।
उस दिन रविवार था। मैं सारे दिन घर पर नहीं था। पलाशबाड़ी की ओर गया था। शाम को जब घर लौटा तो पाया रविवार होने पर भी हमारा युवा लड़का घर में ही है। आँगन में घास काट रहा है। मैंने उसे देख कर पूछा तुम्हें आज कहीं जाना है तो जा सकते हो। मेरे लिए भात नहीं बनाना पड़ेगा।
वह कुछ नहीं बोला। मैं समझ गया वह घर पर ही रहेगा। मैं जब निकल कर जा रहा था तब उससे कहा मेरे आने में देर हो सकती है। एक दरवाज़ा खोल इस दरवाज़े में ताला लगा तुम सो जाना। मेरे पास चाबी है।
सिर्फ़ रात के नौ बज कर पचीस मिनट हुए हैं। मैं दोस्त के घर भात खा कर जायेरिगोग से नयनपुर से होते हुए गणेशगुड़ी चरिआली की ओर आ रहा हूँ। सड़क पर लोग बाग न के बराबर हैं। कुछ घरों से दूर दर्शन की आवाज़ आ रही है। ऐसी आवाज़ स्तब्धता को और अधिक बढ़ाती है।
मैं अकस्मात चौंक उठा। एक साथ तीन गोलियों की आवाज़। कितनी विपदा है। मैं जब एक घर में अतिथि बनकर बैठा था उसी दौरान क्या कहीं संघर्ष होने के कारण शहर में कर्फ्यू लगाया गया है? मुझे भी क्या कानून तोड़ने वाला समझ गोली मारेंगे? मैंने सड़क के किनारे बल्ब की कम रोशनी से देखा कि एक व्यक्ति मेरी तरफ़ दौड़ कर आ रहा है। उसके पीछे पीछे बंदूकधारी पुलिस है। वह मेरे सामने आकर उल्टे गिर गया। उसका शरीर खून से लथपथ है। वह दर्द से कराह रहा है। मैं दौडूँगा या पहले की तरह चलूँगा सोचने का वक्त भी नहीं मिला। मैं पसीने से तरबतर हो खून से सने शरीर की ओर देख रहा हूँ उसकी मौत की यातना देखने के लिए कितनी देर रुका रहूँगा। मैं असमंजस में पड़ गया। मेरी चेतना काम नहीं कर रही थी।
इस बीच एक पिस्तौल धारी पुलिस अधिकारी ने पड़े शरीर पर टार्च मारी। क्या वीभत्स दृश्य था। पूरा शरीर खून से लथपथ। उसके मुँह से खून निकल रहा है। कोमल चेहरा- एक युवक लड़के का।
पुलिस अधिकारी ने मेरी ओर टेढ़ी नज़र से देखते हुए कहा, "इसमें रुचि मत लीजिए। समझे? खुद को असुविधा होगी। यह कह उसने लड़के के हाथ की नाड़ी देख कहा, "साला शेष।"
युवा लड़का अभी मेरे सामने मरा। मैं पूछने को विवश हुआ असली बात क्या है? उन्होंने वितृष्णा से कहा यह ही देश है समझे? इनकी उद्दंडता के चलते मनुष्य रह नहीं सकते। डकैत थे। कई अन्य भाग गए।
मैं और वहाँ नहीं ठहरा, घर पहुँचा। गौतम सो चुका था। उसको उठाने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। मैं सो गया। परंतु नींद नहीं आई। मध्य रात्रि तक भी। बार-बार मुझे गोली से आहत उस युवक का चेहरा याद आने लगा।
मेरे जीवन की भयावह अनुभूति थी वह घटना, जो देखी। यातना से कराहती गोलियों से छलनी एक देह, उसकी मौत के असहनीय दर्द की पुकार, यह दृष्य देखने के पहले ही मेरी मौत का आजाना अच्छा था।
अब मैं क्या करूँ? रात मेरे लिए लंबी हो रही है। कहीं मन को लगाना ही अच्छा होगा।
तभी मुझे मेघनाद साहा की अंग्रेज़ी जीवनी की याद आई। अब भी इकसठ पेज का अनुवाद बाकी है। उधर नेशनल बुक ट्रस्ट से लगातार तकाज़ा आ रहा है इसलिए मैंने मध्य रात्रि को किताब के कुछ पेजों का अनुवाद करने की सोची। लेकिन आश्चर्य की बात है कि मैं किताब खोजकर न निकाल सका। दो कमरे देख डाले। किताब नहीं थी। अच्छा किताब को कौन ले सकता है। सुबह किताब टेबल पर ही थी।
मैंने लाइट बुझा दी बिछौने में ही इधर-उधर करवट लेता रहा। मैं पुलिस अधिकारी की तरह निर्दयी नहीं हो सकता। मेरी आँखों में अभी भी था- वह दर्दनाक मौत का दृष्य।

आकाश का अंधेरा छँटने लगा, परंतु चिड़ियाँ अभी भी जगी नहीं हैं। मैंने सोचा एक कप चाय ही पी ली जाय। रसोई घर में कहाँ चाय चीनी है मैं नहीं जानता। इसलिए गौतम को जगाने मैं उसके कमरे में गया। लाइट जला दी। आँखे मच्छरदानी के पास ले जाकर देखा। वह पूरी नींद में था। उसे जगाना बुरा लगा। लेकिन एक चीज़ को देख मेरी आँखें भी सहसा विश्वास न कर सकीं। टेढ़े होकर सो रहे गौतम के नज़दीक किताब अधखुली पड़ी थी। परंतु स्थिति को समझने में मुझे कठिनाई हुई।
मैं चाय पीने की बात भूल गया। अब गौतम के बारे में मेरा कौतूहल अधिक हो गया। मैंने धीरज धर प्रतीक्षा की। निर्धारित समय पर गौतम उठा। वह हाथ मुँह धो गैस जला कर चाय बनाने में लग गया। उसने मेरे सामने एक कप चाय रख दी।
मैंने पूछा, "वह किताब तुम्हारे बिछौने में है। गौतम, तुम अंग्रेज़ी पढ़ सकते हो?"
वह कुछ न कह मेरे सामने से हट कर जाना चाहने लगा। मैंने फिर कहा, "कहा है न, मत जाओ, मेरी बात का जवाब दो।"

मैंने उसकी ओर देखा। वह पूरी तरह तैयार न था। काफी समय बीता। वह निश्चल खड़ा रहा। अखिरकार उसने कहा, "मुझे मारिये सर, मुझे नौकरी से निकाल दीजिये सर। मैंने आप जैसे पिता समान व्यक्ति से झूठ बोला सर।''
"तुम क्या कह रहे हो मैं कुछ नहीं समझा। मुझे संदेह हो रहा है तुम काफी पढ़े लिखे लड़के हो। तुमने तस्वीर देखने के लिए यह किताब मच्छरदानी के अंदर नहीं ली थी। इसमें न तस्वीर है और न यह सहज है। बताओ तुम कितने तक पढ़े हो।"
"सर, थोड़ी-सी पढ़ाई की है। हमारे जैसे गरीब को शिक्षा अर्जित कर क्या फायदा है?"
एक एक लम्बे शब्द। भाषा पर गौतम का इतना अधिकार है मैं सोच भी नहीं सका था।
मैंने देखा उसकी आँखें गीली हो गई हैं। उसने टूट चुकी आवाज़ में कहा- मुझे क्षमा कीजिये सर नौकरी पाने के लिए मैंने आपसे छिपाया। चुपचाप रह मैंने अपनी शिक्षा को छिपाने का प्रयास किया। कुछ फायदा नहीं हुआ सर पकड़ा गया। अब से मैं गौतम को अलग नज़रों से देखने लगा। मुझे फिर सवाल नहीं करना पड़ा। वह मन में दुख के चलते अपने आप कहता गया, " मैं जानता हूँ सर पदार्थ विज्ञान में प्रथम श्रेणी से बी एस सी पास का कहता तो आप निश्चय ही मुझे नौकरी पर नहीं रखते। परंतु इस बार की सौ रुपए की नौकरी ही कुछ महीनों से मेरा घर चला रही है।" मैं गौतम के चेहरे की ओर और देख न सका। मैं व्यथा में डूब गया। मैंने आँखें मूँद लीं। गौतम द्वारा नाक सुड़कने की आवाज़ सुनी।
मैंने धीरे से कहा, "मुझे तुम्हें क्षमा करने का कोई अधिकार नहीं है गौतम। हमारे समाज का भी कोई अधिकार नहीं है।"

अचानक मेरे मुँह से तुम्हारा शब्द निकल आया। गौतम ने पूछा, "सर, आपने उत्तम महाचार्य का नाम सुना है न? अखबार में निश्चय ही उसके बारे में पढ़ा होगा। वह मेरा बड़ा भाई था। सर, काफी महनत के बाद इंजीनियर हुआ था। उसके लिए हमारी ज़मीन बिक गई थी लेकिन सर पाँच साल तक नौकरी न मिलने पर उसने फांसी लगा ली।

मैं उसे और कुछ न कह सका। उसके पास खड़े रहना ही असहनीय हो गया, मैं रास्ते पर निकल आया।

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१५ फरवरी २००१

 
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