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''लेकिन भाई अमरू, पॉलिटिक्स करना क्या इतना आसान है। आज जो लोग चारों खुर छूकर जुहार करेंगे वे ही लोग पान से चूना खिसकते मात्र जूते की माला पहनाने पर उतारू हो जाएँगे। लोगों ने उन्हें जूता का हार पहनाकर पूरा गाँव घुमाया था। मैंने अपनी आँखों से देखा था कि किस तरह सरपंच की बोलती बंद हो गई थी। उसी दिन मैंने मन ही मन कसम खा ली कि कुछ भी करूँगा किन्तु पॉलिटिक्स नहीं करूँगा''

''नहीं रे भाई नहीं, अगर ठीक से राजनीति करने का हुनर सीख लिया तो जूते का हार क्यों पहनेगा? लोग फूलों की माला लिए बाट जोहेंगे। बस चार-पाँच वर्ष पावर में रह जाने पर सिनेमा हॉल से लेकर पेट्रोल पम्प तक बनवा लेगा। उसके बाद सात पुस्त तक आराम से खीर-पूड़ी उड़ाता रहेगा। तू तैयार हो जा, बाकी इंतजाम मैं करूँगा। मेरी भाभी के मामू के लड़के के छोटे भाई के मौसिया ससुर का लड़का अरुण भाई पक्का पॉलिटीशियन है।

उससे एकाध साल की ट्रेनिंग लेने पर मंत्री, एम.एल.ए. खुद हमारे पास दौड़े आएँगे। हमारे हाथ में वोट है और जब हम लोग वोट जोगाड़ करेंगे तभी तो वे लोग एम.एल.ए. - मंत्री होंगे''
''नहीं अमरू, मंत्री की बात मत कर। एक बार गया था मंत्री से भेंट करने। दो घंटा इंतज़ार करना पड़ा और उसके बाद संतरी ने आकर गाय-गोरू की तरह खदेड़ दिया''
''ओह, तू तो हर जगह गोबर ही माखता है। यदि किसी सही आदमी को लेकर जाता तो वही संतरी तुझे सलाम बजाता। अरे भाई, मंत्री तो गुलाब के गाछ हैं। तू अगर फूल तोड़ने के बजाय काँटों में हाथ लगाएगा तो इसमें गुलाब गाँछ का क्या दोष है?''

अमरेश के तर्क के आगे विघ्नराज का कुछ नहीं चला। वह राजी हो गया। दोनों अरुण भाई के दरबार में पहुँचे। पैकेट से थोड़ा-सा पान पराग निकाल कर मुँह में डालते हुए अरुण भाई ने कहा,''वह सामने बिजली का खम्भा दिखलाई पड़ रहा है? जानते हो एक चींटी को उस पर चढ़ने में कितना समय लगेगा? वह सीधे तो ऊपर नहीं पहुँच सकती। कई बार गिरेगी, फिर उठेगी तब कहीं ऊपर पहुँच पाएगी। पॉलिटिक्स में भी उसी तरह उठोगे, गिरोगे और फिर चढ़ने की कोशिश करोगे, तब कहीं जाकर ऊपर पहुँच पाओगे। इसमें काफी वक्त लगता है। यहा एक रात में दाढ़ी लम्बी नहीं हो जाती। समय लगता है। राजनीति के सभी दाँव-पेंच सीखने पड़ते हैं। दक्षता प्राप्त करने के पहले हज़ार बार धरना, स्ट्राइक, घेराव, लाठी चार्ज के दौर से गुज़रना पड़ता है। जेल जाना पड़ता है क्या तुम लोग इसके लिए तैयार हो?''

विघ्नराज सोच में पड़ गया। सब तो बर्दाश्त कर लेंगे, किन्तु पुलिस के लम्बे डंडे का ज़बर्दस्त प्रहार ना रे बाबा ना, मुझे नहीं करनी है राजनीति। अमरेश ने विघ्नराज के चेहरे पर उभरती हुई झिझक की रेखाओं को परखा। झट से उसका हाथ पकड़कर पीछे की ओर खींच लिया और आगे बढ़कर बोला,''भाई, आप आग में कूदने के लिए कहेंगे तो हम कूद जाएँगे। बस, हमें आपका आशीर्वाद चाहिए।''

अरुण बाबू के दल में शामिल होते ही दोनों को रास्ता रोकने का काम मिल गया। सामन्त टोला कॉलेज को मिलनेवाला सरकारी अनुदान, बिजली की अबाध आपूर्ति आदि मामलों को लेकर कॉलेज के लड़कों ने 'रास्ता रोको अभियान ' की योजना बनाई। अरुण बाबू ने तीन सौ रूपये पकड़ाते हुए उनसे कहा, ''देखो, रास्ता रोको अभियान शुरू करने पर पुलिस, मजिस्ट्रेट आदि आकर बहुत कुछ कहेंगे, बहुत तरह से समझाएँगे, धमकाएँगे किन्तु कुछ नहीं सुनना। जब तक मैं न कहूँ रास्ता रोके रखना। सुबह छह बजे से संध्या छह बजे तक बिल्कुल चक्का जाम। एक भी गाड़ी आगे नहीं जानी चाहिए। गाड़ी बंद होने पर ही सरकार की नींद टूटेगी। एक डेगची में चूड़ा और गुड़ रेडी रखना। भूख लगने पर पहले खुद खाना और माँगने पर दूसरे लड़कों को भी खिलाना किन्तु एक पल के लिए रास्ता भी छोड़कर कहीं मत जाना।''

योजना के अनुसार लगभग पचास लड़के नेशनल हाईवे को रोककर बैठ गए। सबसे सामने विघ्नराज और अमरेश थे। उन लोगों ने मन ही मन कसम खाई थी कि सिर भले ही उतर जाए किन्तु पीछे नहीं हटेंगे। देखते ही देखते सैंकड़ो गाड़ियाँ एक के बाद एक आकर खड़ी हो गई। पुलिस आई। मजिस्ट्रेट आए। उन लोगों ने बहुत समझाया किन्तु लड़कों के कानों पर जूँ नहीं रेंगी। सब उसी तरह डँटे रहे।

ड्राइव्हरों के नेता आगे आकर बोले,''सर आप हम लोगों पर छोड़ दीजिए, हम लोग इन्हें समझ लेंगे। ताज़िन्दगी याद रखेंगे इस रास्ता रोको अभियान को।''
''लेकिन कुछ ऐसा-वैसा नहीं होना चाहिए, धीरज से काम लेना।'' मजिस्ट्रेट साहब ने समझाया।

तीन-चार घंटे बाद अरुण बाबू आए। उन्होंने लड़कों को बताया कि सरकार ने हमारी सारी माँगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का वचन दिया है। लड़कों ने अरुण बाबू का इशारा पाते ही रास्ता रोको अभियान समाप्त कर दिया। बाँध के टूटते ही जैसे पानी का रेला हरहरा कर आगे की ओर भागता है उसी तरह उस राजपथ पर गाड़ियों की लम्बी कतार आगे बढ़ गई।

''अरे वाह, तुम लोग दिन भर यहाँ धूप-बतास में कूद-फाँद करते रहे और तुम्हारे अरुण भाई पार्टी वाले से पाँच हज़ार रुपए ऐंठ गए।''  विरोधी पार्टी के एक छोट भैया ने आकर जब उन लोगों से कहा तो उन लोगों ने अपना माथा पीट लिया।

विरोधी नेता की बातें सुनकर विघ्नराज ने अमरेश से कहा,''बात सच लगती है। यदि ऐसा नहीं होता तो हमें छह बजे सुबह से शाम छह बजे तक रास्ता रोकने के लिए कहा गया था और खुद तुम्हारे अरुण भाई ने दस बजे दिन में ही आंदोलन क्यों तोड़ दिया? '
जब दोनों न जाकर अरुण बाबू से इसके बारे में पूछा तो उनके आदमी ने उन्हें वहाँ से धक्का मार कर बाहर कर दिया।
'रास्ता रोको अभियान की खबर गाँव तक पहुँच गई और जब विघ्नराज अपने गाँव पहुँचा तो बाप ने खूब पिटाई की। विघ्नराज रात को ही गाँव छोड़कर अमरेश के पास शहर लौट गया।
विघ्नराज ने अमरेश से कहा,''भाई, कोई और रास्ता निकालो। यह पॉलिटिक्स-वॉलिटिक्स मुझसे नहीं होगी। ऐसा कोई धन्धा बताओ जिसमें हर्रे लगे न फिटकरी और रंग चोखा आए। बस साल-दो-साल में किसी तरह हम लोग लखपति बन जाएँ।''

अमरेश कुछ देर तक सोचता रहा। हठात उसके दिमाग में कुछ कौंध गया। वह मुस्कुराता हुआ बोला, ''अरे विघ्न, तू ने कभी आइने में अपना चेहरा देखा है? तुझ जैसा सुन्दर चेहरे वाले कितने लोग हैं? ख़बर मिलते ही लड़की वाले प्रस्ताव लेकर दौड़ेंगे तेरे पास।''
''मुझे अभी शादी नहीं करनी है।'' विघ्नराज ने कहा।
''शादी करने के लिए तुझे कौन कहता है?''
''तो?''
''हम लोग विवाह करने का व्यवसाय करेंगे। विवाह होते ही उड़न छू। फिर कौन खोज पाएगा।''
''अगर पकड़े गए?''
''कलकत्ता, बम्बई जैसे बड़े महानगरों में कौन किसे पहचानता है? हम लोग अपना-अपना नाम बदल लेंगे।''

दोनों इस नए धंधे के लिए एकमत हो गए। बाहर जाने के लिए खर्च का जोगाड़ अमरेश ने किया। अपने बाप को ने जाने उसने क्या पाठ पढ़ाया कि उन्होंने ज़मीन का एक टुकड़ा बेचकर पाँच हज़ार रुपए का जुगाड़ कर दिया।

दोनों मित्र कलकत्ता जा पहुँचे। वहाँ श्याम बाज़ार में एक किराये का मकान लिया। छह महीने का एडवांस दे दिया। नाम बदलकर रमेश और महेश रख लिया। महेश ने रमेश के ब्याह के लिए एक व्यापारी की बेटी से बातचीत चलाई। व्यापारी अपनी बेटी के विवाह के लिए बहुत चिन्तित था क्योंकि उसकी लाड़ली बेटी दो बार अलग-अलग लड़कों के साथ घर से भागकर बदनामी के बाजार में खूब नाम कमा चुकी थी। रमेश के लिए विवाह प्रस्ताव तो दे दिया गया किन्तु पहला सवाल उठा कि लड़का का बाप कौन बनेगा और बाराती कहाँ से आएँगे?

''अरे भाई, सब भाड़े पर मिल जाते हैं। दैनिक बीस रुपए और पेटभर भोजन पर ढेर सारे लोग मिल जाएँगे। उनमें से किसी एक को बाप और बाकी लोगों को बाराती बना देंगे।'
भाड़े के बाप और बारात को लेकर विवाह कार्य सम्पन्न हुआ। दहेज में बहुत से सामानों के साथ दस हज़ार रूपये नकद मिले। उसी दिन रात को घड़ी, अंगूठी, हार और दस हज़ार नकद लेकर दोनों मित्र चंपत हो गए। कलकत्ता से बनारस, बनारस से इलाहाबाद, दिल्ली, बड़ौदा, बम्बई होते हुए जब दो बर्ष बाद वे लोग पुन: कलकत्ता वापस आए तो उनकी वेशभूषा और चेहरे-मोहरे में काफी बदलाव आ गया था। दोनों लखपति हो गए थे। बिलकुल साहबी ठाठ-बाट हो गया था। दोनों सूट-बूट-टाई पहन कर क्लब, होटल, स्वीमिंगपुल का चक्कर लगाते और कोई नया शिकार तलाशते रहते।

हठात एक दिन होटल में उनकी मुलाकात एक अनिंद्य सुन्दरी से हो गई। उसके बड़े भाई कौल साहब ने अपनी बहन से उन लोगों का परिचय कराया। दोनों भाई-बहन कलकत्ता, दार्जिलिंग, सिक्किम आदि घूमने के लिए आए थे। माँ-बाप नहीं थे। करोड़ों के व्यवसाय के मालिक थे कौल साहब। अभी तक कौल साहब का विवाह नहीं हुआ था। उम्र अधिक नहीं थी। देखने में काफी सौम्य-सुन्दर। आकर्षक व्यक्तित्व। शादी के लिए ढेर सारे प्रस्ताव आ रहे थे किन्तु उन्होंने निश्चय कर लिया था कि जब तक उनकी बहन सुनीता की शादी नहीं होगी वह ब्याह नहीं करेंगे। कौल साहब चाहते थे कि कोई सुन्दर और सच्चा लड़का मिल जाए तो सुनीता की शादी कर दें। सुनीता के नाम से जितनी सम्पत्ति है, वही उनके भावी जीवन को सुखमय बनाने के लिए काफी होगी।

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