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कौल साहब की बातें सुनकर विघ्नराज ने अमरेश की ओर देखा। अमरेश ने विघ्नराज को आँखें मारी। दूसरे दिन दोनों भाई-बहन को डिनर के लिए होटल में आमंत्रित किया गया। बातचीत के दौरान अमरेश ने विघ्नराज की सम्पत्ति के बारे में बताते हुए कहा, ''जानते हैं कौल साहब, हमारा कारोबार वैसे कोई बड़ा नहीं है। पाराद्वीप में पंद्रह ट्रालर, भुवनेश्वर में तीस ट्रक और चिंगुड़ी मछली पालन के लिए चिलिका में मात्र दो सौ एकड़ जमीन है। दो छोटी-छोटी इण्डस्ट्री थी। देखभाल करने का समय नहीं मिलता था इसलिए पिछले वर्ष बेच दी। सोचते हैं दिल्ली अथवा कलकत्ते में कोई नई इण्डस्ट्री बैठाएँगे। हम लोग आपके समान उतने बड़े बिजनेस मैन तो नहीं हैं किन्तु हमें अपने परिश्रम पर विश्वास है और जो मेहनत करता है उसे ईश्वर भी कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने देते।

''वाह, आपका विचार कितना अच्छा है। इतना बड़ा कारोबार होने पर भी आपके मन में थोड़ा-सा भी अहंकार नहीं है। आप तो जानते हैं कि हम लोग पाकिस्तानी आक्रमण के कारण कश्मीर से भाग कर आए। हम लोग अर्थात हमारे पिता जी सिर्फ़ ग्यारह रुपए लेकर दिल्ली आए थे। शुरू-शुरू में वे पुराना डिब्बा खरीदते और बेचते थे और उसी से अपना गुज़ारा करते थे। इसी तरह धीरे-धीरे बिजनस करते हुए हम यहाँ तक पहुँचे हैं। पहले माँ और उसके बाद पिता जी हमें छोड़कर परलोक सिधार गए। हमलोग बिलकुल अनाथ हो गए। सब कुछ रहकर भी अगर सिर पर माँ-बाप का हाथ न रहे तो बड़ा अकेलापन महसूस होता है।'' इतना कहते-कहते कौल साहब का गला रूँध गया। उन्होंने रूमाल से आँसू पोंछते हुए पुन: कहना शुरू किया, ''इतने बड़े कारोबार का भार अचानक मेरे कंधे पर आ पड़ेगा, मैं नहीं जानता था। मैं अकेला आदमी, कहाँ-कहाँ मारा फिरूँ, किस-किस को सँभालूँ? इसीलिए इस तलाश में हूँ कि सुनीता के लिए कोई योग्य लड़का मिल जाए तो शादी करके आधा कारोबार उसको सौंप दूँ। लेकिन आजकल अच्छे आदमी कहाँ मिलते हैं। सबकी निगाह दहेज के रूप में मिलने वाली नकदी पर लगी रहती है। बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि आज का आदमी अपनी मेहनत पर विश्वास न करके दूसरे की धन-सम्पत्ति को फोकट में हड़प लेने की ताक में रहता हैं। अच्छा, आप ही बताएँ यदि ऐसी मनोवृत्ति लेकर हम चलेंगे तो देश का क्या होगा? क्या कभी हमारा राष्ट्र जापान और अमेरिका की तरह विकास कर पाएगा?''

''आप बिलकुल ठीक कहते हैं। अपने देश को उन्नति के शिखर पर ले जाने के लिए पहले हमें अपने आपको सुधारना होगा।'' विघ्नराज एवं अमरेश दोनों ने कौल साहब के कथन के प्रति अपनी सहमति जताई। जब उन लोगों की बातें हो रही थीं सुनीता चुपचाप मुँह झुकाए बैठी थी। शायद बड़ों के बीच में बोलना उसे पसंद नहीं था। वह बड़ी शर्मीली लड़की थी सुनीता।
होटल से लौटने के बाद विघ्नराज ने अमरेश से पूछा, ''क्या अमरू, यहाँ दाँव मारने से कैसा रहेगा?''

''अरे पूछता क्या है? यही एक हाथ मारने पर तो हम मालामाल हो जाएँगे। देखते ही देखते करोड़ों के मालिक बन जाएँगे। सुनीता से शादी कर तू उसका कारोबार सँभाल लेना और मुझे अपना बिजनस पार्टनर बना देना।''
''शादी के बाद हम अपनी सम्पत्ति के बारे में सुनीता को क्या कहेंगे?'' विघ्नराज ने प्रश्न किया।

''अरे विवाह होने के बाद यदि उन्हें मालूम भी हो गया कि हम लोग फोकट में राम गिरधारी हैं तो क्या फ़र्क पड़ेगा? क्या कर लेंगे वे लोग?'' अमरेश ने ठहाका लगाते हुए कहा।
''तब ठीक है। तू जाकर विवाह प्रस्ताव दे आ।'' विघ्नराज ने कहा।

दूसरे दिन विघ्नराज के विवाह का प्रस्ताव लेकर अमरेश कौल साहब के पास पहुँचा। कौल साहब पहले तो हिचकिचाए फिर बोले, ''देखिए, हम लोग रूढ़िवादी परिवार के हैं। यद्यपि विघ्नराज अच्छा लड़का है फिर भी हमें उसके माँ-बाप से बातचीत करनी होगी। इसके अलावा सुनीता से भी इस विषय में पूछना होगा। इसलिए अभी से मैं कुछ नहीं कह सकता।''
'ज़रूर-ज़रूर, मैं विघ्नराज के पिता जी को बुला लाऊँगा। आपकी ओर से कौन बातचीत करेंगे?' अमरेश ने पूछा।
''हमारे मामा। मैं उन्हें खबर कर दूँगा।'' कौल साहब ने भी अपनी सहमति दी।

बातचीत के अनुसार तिथि निश्चित की गई। विघ्नराज की ओर से उसका भाड़े का बाप आया। कौल साहब के मामू भी समय पर पहुँच गए। कुछ देर बातचीत चलने के बाद विवाह की तारीख तय हुई। उससे पहले निबन्ध करने की तिथि निश्चित की गई।
सप्ताह भर बाद अमरेश को बुलाकर कौल साहब ने कहा, ''आप तो जानते हैं, व्यापारी समुदाय का मनोभाव कैसा होता है। इसलिए निर्बन्ध के समय अगर आपकी ओर से यथेष्ट गहने नहीं दिए गए तो समाज में चर्चा शुरू हो जाएगी। अब तो सिर्फ़ दो दिन रह गए हैं। मुझे मालूम हैं कि आप इतना जल्द इतने सारे रुपए जोगाड़ नहीं कर पाएँगे। मैं तीन लाख रुपए का चैक काट देता हूँ। आप उसी रुपए से सुनीता को हीरे का एक बढ़िया सेट देंगे। ताकि हमारे कुटुम्बजनों को बोलने का मौका न मिले।''

''वाह कौल साहब वाह, आप भी अच्छी बात करते हैं। यह सच है कि हम आपकी तरह बड़े व्यापारी नहीं हैं किन्तु क्या तीन लाख रुपया भी जोगाड़ नहीं कर सकते?'' इतना कहते हुए अमरेश ने कौल साहब का हाथ थाम लिया।
अमरेश से सारी बातें सुनकर विघ्नराज ने कहा, ''क्यों नहीं ले आया तीन लाख का चैक? बेकार में शेखी बघार आए।''
'तेरी मुर्खामी कब जाएगी, पता नहीं। यदि मैं चैक ले लेता तो कौल साहब को हमारे ऊपर शक नहीं होता?' अमरेश ने विघ्नराज को समझाया।
''तो फिर इतने रुपए कहाँ से आएँगे?''
''बैंक में ढ़ाई लाख रुपए हैं। बाकी पैसे तेरे भाडे के बाप से सैकड़े पचास रुपए की दर से सूद पर ले आएँगे।'

निर्बन्ध के दिन बहू को हीरे का एक बेशकीमती सेट दिया गया। तय किया गया कि विवाह दिल्ली में सम्पन्न होगा। कौल साहब ने जिद्द  की बारात प्लेन से ही जाएगी। जितने लोग जाएँगे लिस्ट दे दें। तीन-चार दिन में प्लेन टिकट होटल में आकर ही दे जाएंगे।
तीन-चार दिन बीत गए। कोई ख़बर नहीं आई। कौल साहब कहाँ गए क्या पता?

'हो सकता है दोनों भाई-बहन दार्जिलिंग घूमने चले गए हों।' विघ्नराज ने कहा।
'हाँ, हो सकता है। किन्तु ख़बर तो देनी चाहिए।' अमरेश बोला।

कई दिन बीत गए, किन्तु कोई-खबर नहीं मिली। दार्जिलिंग जाकर भी कुछ पता नहीं चला। उन लोगों ने दिल्ली का जो पता दिया था, उस जगह पहुँचने पर मालूम हुआ कि ऐसा कोई आदमी वहाँ कभी नहीं रहता था।
''हम लोगों ने कहीं गलत पता तो नहीं लिख लिया है?'' अमरेश ने अपनी शंका व्यक्त की।
''हो सकता है। चलो कलकत्ता चलकर देखते हैं। वहीं दोनों का पता लगेगा।' विघ्नराज ने सुझाव दिया।

कलकत्ता लौट कर उन्होंने देखा कि डेरे पर एक लिफाफा आया हुआ था। कौल साहब और सुनीता ने दोनों के नाम से चिठ्ठी लिखी थी।
''लाओ लाओ मुझे देखने दो।'' इतना कहते हुए अमरेश ने विघ्नराज के हाथ से चिठ्ठी छीनकर कहा, ''देखें, क्या लिखा है।''
विघ्नराज का चेहरा उतर गया। वह एकटक अमरेश की ओर देखता रहा। चिठ्ठी में केवल एक पंक्ति टाइप की गई थी, ''बंधुगण, इस व्यवसाय में हमलोग तुम लोगों से सीनियर हैं।''

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१५ मई २००१

 
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