|
3 |
|
बरामदे
में आते ही मेरी पत्नी ने शिकायती स्वर में कहा - "बेचारी। जब
भी दरवाज़े पर आहट होती थी, बाहर आकर आप के लिए देखती थी। शाम
से कुछ नहीं खाया उसने। कहती रही, "पापा आएँगे, टेडी बियर
लाएँगे। तब मैं, पापा और टेडी बियर मिलकर एक साथ खाएँगे'। अभी
अभी सोई है''।मैं हतोत्साहित हो गया। खाने की इच्छा भी लुप्त हो गयी। उदास मन से, सम्मानार्थ भेजी गई एक पत्रिका के पृष्ठ उलटने लगा। उसमें किसी प्रतियोगिता के नतीजे छपे थे। इस प्रतियोगिता में विजेताओं को इनाम के रूप में गिफ़्ट कूपन दे रहे थे। इन गिफ़्ट कूपनों को चुनी हुई दूकानों में देकर मनपसंद सामान ख़रीदा जा सकता था। झट से मुझे एक उपाय सूझा। एक चार्ट-पेपर लेकर, उस पर गुलाबवाले टेडी बियर का चित्र बनाया। आकार और रंग में वह बिलकुल असली टेडी बियर लगता था। उस चित्र पर आदत के अनुसार मैंने हस्ताक्षर भी कर दिए। एक चॉकलेट का बाक्स, जिसे मेरी पत्नी ने ख़रीदा था, और इस चित्र को साथ लेकर हमने सिंधु को जगाया। "सिंधु बेटी, और एक बार जनम दिन के मुबारक। लो ये चॉकलेट बाक्स और ये टेडी बियर का चित्र तुम्हारा गिफ़्ट कूपन। कल सुबह यह गिफ़्ट कूपन दुकान पर दोगी तो, वहाँ के अंकल तुम्हें असली टेडी बियर देंगे।'' "पापा, ये टेडी बियर का चित्र आपने बनाया क्या?'' "हाँ बेटी'' मैं पहले से ही अपनी योजना पत्नी को बता चुका। कल किसी समय सिंधु को दुकान जाकर असली टेडी बियर दिलवा देना और दुकानदार के पास पहले ही पैसे जमा कर देना ताकि सिंधु को लगे कि उसे टेडी बियर इस टेडी बियर के चित्र यानी गिफ़्ट कूपन के बदले में ही मिल रहा है। सिंधु मेरे बनाए गए उस चित्र को देर तक देखती रही, फिर बोली, "पापा, ये तो बिलकुल वह दुकानवाला असली टेडी बियर लगता है। थैंक्स पापा, अपना वादा निभाने के लिये।'' अगले दिन दफ़तर से आने के बाद मैंने टेडी बियर के बारे में पत्नी से पूछा। "सिंधु ने उस का नाम तक नहीं लिया। पता नहीं क्यों''। पत्नी ने उत्तर दिया। मैं हैरान हो गया। सोचा कि मुझे खुद सिंधु को दुकान ले जाकर टेडी बियर दिलवा देना बेहतर रहेगा। मैंने
सिंधु से पूछा, |
|