| ललित निबंध | |
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दीया दिवाली
का |
| उर्दू साहित्य में सांप्रदायिक एकता, सद्भावना, सभी धर्मों का सम्मान, मेल-जोल और मानव प्रेम की भावनाएँ उसी तरह रची-बची हैं, जैसे सूर्य में प्रकाश और गुलाब में खुशबू। उर्दू भाषा एवं साहित्य का स्वरूप इन्हीं तत्वों से मिलकर बना है और आज भी इसकी यही विशिष्टता है। इस भाषा के हिंदू शायरों ने अगर एक ओर मुसलमानों के त्योहारों पर नज़्में लिखी हैं, तो दूसरी और उर्दू के मुसलमान शायरों ने भी अपने हृदय की गहराइयों से अपने हिंदू भाइयों के त्योहारों के रंग और आहंग की झलकियाँ अपनी रचनाओं में प्रस्तुत की हैं। | |
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यह सिलसिला उर्दू काव्य के
आरंभ से अब तक चला आ रहा है। इसके सबूत में बहुत पहले के
शायरों, जैसे मनसवी 'कदम राव पदम राव' के शायर 'निजामी',
हिंदुस्तान के आशिक अमीर खुसरो, दक्षिण भारत के राजा कवि
मुहम्मद अली कुतुब, 'इंद्रसभा' के कवि 'अमानत', उत्तर भारत
के फाईज देहलवी, 'विकट कहानी' के शायर अफ़जल, गज़लों के इमाम
मीर तकी मीर और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक 'नज़ीर
अकबराबादी' के नाम आसानी से गिनाए जा सकते हैं। इस परंपरा को
आगे बढ़ाने में आज के उर्दू शायर पूरा सहयोग दे रहे हैं। मैं
संक्षेप में इसकी कुछ झलकियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। शुरुआत
नजीर अकबराबादी की नज़्म के दो छंद से कर रहा हूँ।
हर एक मकां में जला फिर दीया
दिवाली का आधुनिक युग में उर्दू के सुप्रसिद्ध आलोचक एवं शायर आल अहमद सुरूर ने दिवाली पर एक नज़्म में कहा है कि इंसान दुख-दर्द की लपेट में होते हुए भी रोशनी के इस त्योहार में बुराइयों का अँधेरा मिटाने और अच्छाइयों का प्रकाश फैलाने के पवित्र कार्य में लगा हुआ है। यह बामोदर', यह चिरागां ग़ज़ल का रंग-ओ-ढंग लिए हुए उमर अंसारी ने दिवाली पर एक लंबी नज़्म लिखी है, जिसके एक अंश का लुत्फ़ उठाइए - रात आई है यों दिवाली की उर्दू के एक विख्यात शायर नाजिश प्रतापगढ़ी अपनी नज़्म 'दीपावली' में कहते हैं कि प्रकाश के इस त्योहार के अवसर पर हम अँधेरे से निकलने के लिए ईश्वर से विनती करते हैं, परंतु दिवाली की रात के बाद हम अपनी इस विनती को भूल जाते हैं। नाजिश का अंदाज़ देखिए - बरस-बरस पे जो दीपावली
मनाते हैं एक जश्न के अवसर पर एक नया उर्दू शायर महबूब राही इन शब्दों में अपनी प्रसन्नता का इज़हार कर रहा है - दिवाली लिए आई उजालों की
बहारें अंत में इस हसीन और रोशनी से जगमगाते त्योहार पर मैं अपनी एक नज़्म के कुछ शेर प्रस्तुत करते हुए यह लेख समाप्त करता हूँ - फिर आ गई दिवाली की हँसती
हुई यह शाम |
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(आजकल से साभार) |