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अपने १५ साल के अंतरिक्ष प्रवास
में मीर अंतरिक्ष स्टेशन ने मानव कल्याण की दृष्टि से अंतरिक्ष
अन्वेषण के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए और शायद
इसने 'यथा नामो तथा गुणो' लोकोक्ति को भी चरितार्थ कर दिया।
मीर शब्द रूसी भाषा का शब्द है
जिसका अर्थ होता है शांति। पिछले कुछ वर्षों से मीर अंतरिक्ष
स्टेशन में कई समस्याएँ चल रही थीं तथा इसका प्रचालन मुश्किल
पड़ रहा था। मीर अंतरिक्ष स्टेशन में छोटी-मोटी कई दुर्घटनाएँ
हुईं, लेकिन जून १९९७ में मीर अंतरिक्ष स्टेशन और मालवाहक
प्रोग्रेस यान के बीच अंतरिक्ष में हुए टकराव से मीर स्टेशन के
ढांचे को काफी क्षति हुई और इसमें कुछ दरारें पड़ जाने से एक
मोड्यूल की ऑक्सीजन अंतरिक्ष में रिस गई। बाद में इसकी मरम्मत
भी की गई। रेकॉर्डों के अनुसार, अंतरिक्ष में दो मानव निर्मित
पिंडों के बीच घटित होनेवाला यह पहला टकराव था। जुलाई २००० में
मीर अंतरिक्ष स्टेशन को नीदरलैंड की एक कंपनी मीर कार्प्स ने
लीज पर लिया तथा इसको प्रचलित करने का बीड़ा उठाया। मीर
कार्प्स कंपनी में ६० प्रतिशत शेयर आरकेके इनर्जिया कंपनी के
थे जिसने मीर अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण किया था तथा जो अब तक
इस स्टेशन का प्रचालन कर रही थी। सारे प्रयासों के बावजूद जब
रूस ने यह महसूस किया कि अंतरिक्ष स्टेशन मीर काफी बूढ़ा हो
गया है तथा उसके तमाम तंत्र काम नहीं करत रहे हैं और उसका
प्रचालन काफी महँगा पड़ रहा है, तब रूसी अंतरिक्ष अधिकारियों
एवं सरकार ने उसे कक्षा से हटाकर (डी ऑरबिट) पृथ्वी में समुद्र
में गिरा देने का निर्णय लिया।
मीर अंतरिक्ष स्टेशन को
पृथ्वी पर गिराने की प्रक्रिया
मीर अंतरिक्ष स्टेशन को
अंतरिक्ष से हटाकर पृथ्वी पर गिराने की तैयारी काफी दिनों से
की जा रही थी। इसके लिए जनवरी २००१ के महीने में एक प्रोग्रेस
अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष स्टेशन मीर के लिए छो़ड़ा गया जो
अंतरिक्ष में जाकर मीर अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़ गया। इसमें कई
इंजन लगे हुए थे। यहाँ पर प्रोग्रेस अंतरिक्ष यान के विषय में
जानना आवश्यक है। प्रोग्रेस अंतरिक्ष यान एक प्रकार का
मानवरहित अंतरिक्ष यान होता है जिसके द्वारा अंतरिक्ष स्टेशनों
को विभिन्न प्रकार की सामग्री, उपकरण, खाद्य सामग्री, डाक
इत्यादि भेजी जाती है। योजना के अनुसार अंतरिक्ष स्टेशन के
कंप्यूटर और इंजनों को अंतरिक्ष केंद्र (मास्को के समीप) के
साकरे कमांडों का अनुसरण करते हुए मीर स्टेशन को पृथ्वी पर
गिराया जाना था।
मीर अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़े
आठ इंजनों की पहली फायरिंग भारतीय समय के अनुसार सुबह ६.०१ बजे
(००.३१ ग्रीनविच समय) पर २८ मिनट के लिए की गई और यह तिथि थी
२३ मार्च, २००१ की। उस समय मीर अंतरिक्ष स्टेशन हिंद महासागर
के ऊपर भूमध्य रेखा से ठीक नीचे था। मीर के प्रोग्रेस यान के
इंजनों की दूसरी बार फायरिंग भारतीय समय के अनुसार सुबह ७ बजकर
३० मिनट (०२.०० ग्रीनविच समय) पर २४ मिनट के लिए की गई। उस समय
मीर अंतरिक्ष स्टेशन पूर्वी अफरीका के ऊपर था। इंजनों की आखिरी
फायरिंग तब की गई जब वह टोंगा के ऊपर था। यह फायरिंग २२ मिनट
तक चला तथा मीर स्टेशन अब तक ईरान के ऊपर पहुँच चुका था। इन
तीनों फायरिंगों में मीर अंतरिक्ष स्टेशन की पृथ्वी से दूरी कम
होती गई। जब अंतरिक्ष स्टेशन इंडोनेशिया के ऊपर से गुज़रा तो
यह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर गया तथा १५०० छोटे-छोटे
टुकड़ों में बँट गया। फिजी के ऊपर आते-आते इन टुकड़ों से
हरे-नीले रंग की चमक आने लगी। वायुमंडल के प्रवेश करने के बाद
तथा छोटे-छोटे १५०० टुकड़ों में बटने के बाद १३० टन के मीर
अंतरिक्ष स्टेशन का १०० टन भार वायुमंडल में ही जल गया तथा
टुकड़ों के रूप में ३० टन का भार जलती हुई अवस्था में
न्यूजीलैंड में वेलिंग्टन स्थान से १८०० मील की दूरी पर पूर्व
में समुद्र में गिरा। मीर के जलते हुए टुकड़े आकाश में फायर
बॉल की भाँति २०० मीटर प्रति सेकंड की गति से तैरते हुए देखे
गए। यद्यपि योजना और गणना के अनुसार मीर अंतरिक्ष स्टेशन का
कोई भी टुकड़ा आवासीय क्षेत्रों में नहीं गिरना था तथा हुआ भी
ऐसा, फिर भी सुरक्षा की दृष्टि से ऐसी स्थिति के लिए रूस ने
भावी नुकसान से बचने के लिए २० करोड़ डॉलर का बीमा करवाया था।
मीर अंतरिक्ष की पृथ्वी पर
वापसी का सजीव दृश्य देखने के लिए विशेषज्ञों, पत्रकारों और
मेहमानों का विशाल समुदाय बृहस्पतिवार की रात और शुक्रवार की
सुबह को मास्को के मिशन नियंत्रण केंद्र में एकत्र हुआ था।
विभिन्न देशों के राजदूत, वैज्ञानिक विभूतियों (विश्व के ६३
देशों के) न इस दृश्य को देखने के लिए मिशन नियंत्रण कक्ष में
स्थान ग्रहण किया। इन व्यक्तियों में अधिकांश प्रतिनिधि उन
देशों के थे जो अंतरिक्ष स्टेशन मीर की आखिरी कक्षा में पड़ते
थे। ये प्रेक्षक थे- ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चिली, चीन,
मंगोलिया, कजाकिस्तान, इटली और मैकेडोनिया। वैसे तो मीर
अंतरिक्ष स्टेशन को नष्ट करने का माह फरवरी, २००१ के लिए
सुनिश्चित किया गया था, लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से इसे रोकना
पड़ा था। जिस मानवरहित प्रोग्रेस अंतरिक्ष यान को अंतरिक्ष
स्टेशन मीर से जोड़ा गया उसमें २.७ टन का ईंधन केवल मीर को
पृथ्वी पर लाने के लिए था। उसमें १५०० पौंड का अतिरिक्त ईंधन
भी था जिसमें ७०० पौंड ईंधन प्रोग्रेस यान द्वारा प्रयोग किया
जाना था।
मीर को पृथ्वी पर गिराने की
भाँति कुछ अन्य विश्व घटनाएँ
जिस तरह मीर को पृथ्वी पर
लाया गया वह कोई नई बात नहीं थी। इसके पहले भी इस तरह के मानव
निर्मित पिंडों को पृथ्वी पर लाना आम बात रही है, लेकिन मीर के
मामले में एक अति विशिष्ट अंतर है और वह यह है कि मीर अंतरिक्ष
स्टेशन का भार १३० टन था जो कि अब तक लाए गए मानव निर्मित
पिंडों में सबसे बड़ा था। सन १९७८ से अब तक मास्को के मिशन
नियंत्रण केंद्र ने ८० प्रोग्रेस मानवरहित अंतरिक्ष यानों को
तथा अनेक रूसी अंतरिक्ष स्टेशनों को पृथ्वी पर लाने के लिए इस
तकनीक का प्रयोग किया। इनमें सबसे बड़ा सैल्यूट-७ था जिसका भार
४० टन था तथा जो १९९१ में पृथ्वी पर लाया गया। सैल्यूट-७ की
वापसी (पृथ्वी पर) योजनाबद्ध तरीके से संभव नहीं हो पाई थी।
नियंत्रण कक्ष इसे भी उसी स्थान पर जल प्रवाहित करना चाहता था,
जहाँ पर मीर अंतरिक्ष स्टेशन ने जल समाधि ली थी, लेकिन वापसी
प्रक्रिया में सोवियत नियंत्रण केंद्र का संपर्क सैल्यूट-७ से
टूट गया था तथा वे यह नहीं सुनिश्चित कर पाए कि सैल्यूट-७ अपनी
कक्षा में नीचे आ गया या नहीं। उन्होंने यह विश्वास किया कि
सैल्यूट-७ अब भी कक्षा में था। उतरते समय यह निर्धारित स्थान
से दूर गिरा। मीर के मामले में यद्यपि यह एक अलग बात है,
क्योंकि यह आकार तथा भार में अन्य प्रकार के उदाहरणों से भिन्न
है। मीर को पृथ्वी पर लाने की घटना को १९७९ में अमेरिकी
अंतरिक्ष यान स्काईलैब को पृथ्वी पर लाने से की जा सकती है
जिसका भार ७० टन था। स्काईलैब ऑस्ट्रेलिया के बाहर समुद्र में
गिरा। राडार प्रेक्षणों के अनुसार, स्काईलैब समूचा (बिना
टुकड़ों में टूटे हुए) समुद्र में गिरा। ऐसा मीर अंतरिक्ष
स्टेशन के साथ शायद इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि मीर अंतरिक्ष
स्टेशन माड्यूलों को जोड़कर बनाया गया था। इसी प्रकार सन २०००
में १४ टन की काम्पटन गामा किरण प्रेक्षणशाला अमेरिका के
द्वारा पृथ्वी पर वापस लाई गई। अमेरिकी नियंत्रण केंद्र के
अनुसार, यह प्रेक्षणशाला ८० कि.मी. की ऊँचाई पर जलने लगी
(वायुमंडल के घर्षण के कारण) तथा ७० कि.मी. की ऊँचाई पर यह कई
टुकड़ों में टूट गई।
रूस ने राहत की साँस ली
मीर अंतरिक्ष स्टेशन की
पृथ्वी पर सुरक्षित वापसी पर रूसी अंतरिक्ष यात्रियों ने
अत्यधिक राहत की साँस ली। मीर अंतरिक्ष स्टेशन को बनानेवाली और
प्रचालित रखनेवाली कंपनी एनर्जिया के अध्यक्ष यूरी सेमयोनोव के
अनुसार, ''मीर को अंतरिक्ष की कक्षा से वापस लाने में कोई
परेशानी नहीं हुई तथा सारा घटनाक्रम आशा के अनुरूप घटित हुआ।''
रूसी अंतरिक्ष संस्था के प्रधान यूरी कोप्टेव के अनुसार,
''सारा प्रचालन बहुत अच्छे तरीके से संपन्न हुआ'' और उन्होंने
नियंत्रण कक्ष के सभी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं को धन्यवाद
दिया। कोप्टेव के अनुसार, ''विशेषज्ञों ने किसी भाँति की भी
ग़लती नहीं की तथा उनकी गणनाएँ और प्रचालन शुद्धता एक मिलीमीट
तक की थी।''
एनर्जिया कंपनी के अनुसार,
अंतरिक्ष स्टेशन मीर जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश के समय
टुकड़ों में टूटना शुरू हुआ तो इसकी गति उस समय १७८९५ मील
प्रति घंटे यानी आठ कि.मी. प्रति सेकंड थी। मीर स्टेशन के
पृथ्वी पर गिरने के समय किसी आपातकालीन परिस्थिति के पैदा हो
जाने की अवस्था से निपटने के लिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और
जापान के देशों ने सुरक्षा के समुचित प्रबंध कर लिए थे।
मीर अंतरिक्ष स्टेशन के कुछ
विचित्र आँकड़े
अंतरिक्ष स्टेशन मीर २० फरवरी
१९८६ को अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। प्रारंभ में इसमें
केवल कोर माड्यूल ही लगाया गया था तथा बाद में इसमें अनेक
माड्यूल जोड़े गए। यह पृथ्वी से २२५ मील की दूरी पर पृथ्वी का
चक्कर लगाता था तथा पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने की इसकी
गति थी १७५०० मील प्रति घंटा। एक दिन में यह पृथ्वी के १६
चक्कर लगाता था तथा पृथ्वी से इसका संपर्क मास्को स्थित
नियंत्रण कक्ष के द्वारा किया जाता था। पृथ्वी की भूमध्य रेखा
पर मीर अंतरिक्ष स्टेशन के अंतरिक्ष पक्ष का झुकाव ५१.६ डिग्री
होता था। २३ मार्च सन २००१ तक मीर अंतरिक्ष स्टेशन ने पृथ्वी
की ८८००० परिक्रमाएँ कर ली थीं। इसमें सामान्यतया एक बार में
दो से तीन अंतरि७ यात्री रहते थे, लेकिन एक-आध सप्ताह की अल्प
अवधि के मिशनों में छह अंतरिक्ष स्टेशन का निर्धारित जीवनकाल
सात साल का रखा गया था, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्टेशन की
जीवनकाल बढ़ा दी गई। इसका भार १३० टन था जिसमें टी-आकार में
व्यवस्थित इसके छह माड्यूल शामिल थे तथा इसकी लंबाई ८५ फुट और
चौड़ाई ९८ फुट थी। इस अंतरिक्ष स्टेशन का आकार एक रेलकार की
भाँति अंतरिक्ष में था। २३ मार्च, २००१ को जब यह पृथ्वी पर
वापस लाया गया तो रेकॉर्ड की बात यह थी कि अंतरिक्ष से पृथ्वी
पर गिरनेवाला यह सबसे विशाल मानव निर्मित पिंड था। अमेरिकी
स्पेस शटल और अंतरिक्ष स्टेशन मीर पहली बार फरवरी १९९५ में
सबसे अधिक समीप आए। जून १९९५ में पहली बार अमेरिकी स्पेस शटल
मीर अंतरिक्ष स्टेशन से अंतरिक्ष में जुड़ी। अपने पूरे जीवनकाल
में मीर अंतरिक्ष स्टेशन ने पृथ्वी का चक्कर लगाने में ३.६
बिलियन किलोमीटर की यात्रा की। कई मामलों में इसने मानव जाति
के लिए अपने को अंतरिक्ष में वास्तविक आवास के रूप में सिद्ध
करके दिखाया।
अंतरिक्ष में मीर स्टेशन कैसे
बनाया गया?
१३० टन के मीर अंतरिक्ष
स्टेशन का निर्माण अंतरिक्ष में एक बार में पूरा नहीं हुआ,
बल्कि कई माड्यूल जोड़कर पूरा किया गया। मीर अंतरिक्ष स्टेशन
का पहला अवयव २० टन का कोर माड्यूल था जिसे फरवरी, १९८६ में
अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। जिस समय इसे अंतरिक्ष में
प्रक्षेपित किया गया, उस समय इसे अंतरिक्ष शहर के एक भाग की
संज्ञा दी गई थी। मीर स्टेशन का कोर माड्यूल इसके पहले के रूसी
अंतरिक्ष स्टेशन सैल्यूट-७ से मिलता-जुलता था, अंतर केवल यह था
कि कोर माड्यूल में भविष्य में जोड़े जानेवाले माड्यूलों के
लिए डाकिंग पोर्ट थे।
३१ मार्च १९८७ को क्वांट-१
माड्यूल अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया तथा ९ अप्रैल, १९८७
को यह मीर अंतरिक्ष स्टेशन के कोर माड्यूल से अंतरिक्ष में
जाकर जुड़ गया। इसमें ऑस्ट्रोफिजिक्स और अन्य वैज्ञानिक प्रयोग
किए गए थे। इसमें एक प्रयोगशाला, ट्रांसफर चैंबर और दाबरहित
कंपार्टमेंट थे। २६ नवंबर, १९८९ को क्वांट-२ माड्यूल
प्रक्षेपित हुआ और छह दिसंबर १९८९ को मीर स्टेशन से जुड़ा। इस
मोड्यूल में तीन दाबयुक्त कंपार्टमेंट थे। इस माड्यूल ने मीर
स्टेशन के लिए वैज्ञानिक हार्डवेयर और उपकरण प्रदान किए। ३१ मई
१९९० को एक अन्य माड्यूल-क्रिस्टल माड्यूल भेजा गया जो १० जून
१९९० को अंतरिक्ष में मीर से जाकर जुड़ा। इसमें अन्य प्रकार के
वैज्ञानिक और तकनीकी परीक्षण किए गए। २० मई १९९५ को प्रक्षेपित
और १ जून १९९५ को मीर स्टेशन से जुड़े स्पेक्टर माड्यूल का
प्रयोग पृथ्वी के संपदा स्रोतों का पता लगाने के लिए किया गया।
१२ नवंबर १९९५ को डाकिंग माड्यूल प्रक्षेपित किया गया जो मीर
स्टेशन से १५ नवंबर १९९५ को जुड़ा। इसी डाकिंग माड्यूल से ९
बार अमेरिकी स्पेस शटल मीर से आकर जुड़ी थी। २३ अप्रैल १९९६ को
मीर स्टेशन का आखिरी माड्यूल-प्रिरोदा माड्यूल छोड़ा गया जो २६
अप्रैल १९९६ को मीर अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़ा। इस माड्यूल के
द्वारा पृथ्वी संपदा स्रोतों, अंतरिक्ष विकिरण, भू-भौतिक
प्रक्रियाएँ और पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन किया गया।
मीर अंतरिक्ष स्टेशन में
किन-किन क्षेत्रों में काम किया गया?
मीर अंतरिक्ष स्टेशन में लगभग
३० हज़ार प्रकार के वैज्ञानिक परीक्षण और अनुसंधान किए गए।
मानवयुक्त अंतरिक्ष अन्वेषण की दृष्टि से ६४०० से भी ज़्यादा
परीक्षण तकनीकी संभावनाओं की जाँच के लिए किए गए। सुदूर संवेदन
तकनीकी से संबंधित सुविधाओं और तरीकों के परीक्षण के लिए लगभग
२४०० परीक्षण हुए। अंतरिक्ष जीव विज्ञान से संबंधित कुल
परीक्षणों की अवधि थी लगभग डेढ़ वर्ष। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के
क्षेत्र में मीर अंतरिक्ष स्टेशन की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका
थी। १२ देशों के सहयोग से लगभग २७ अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष
मिशन संपादित किए गए। इसके साथ-साथ विभिन्न देशों के उपकरणों
का प्रयोग करते हुए लगभग ७००० चिकित्सीय, तकनीकी और अन्य
प्रयोग संपन्न किए गए। अंतरिक्ष में कुछ पदार्थों का निर्माण
गुणवत्ता की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस बात को
ध्यान में रखते हुए लगभग २३०० परीक्षण किए गए तथा इसके लिए मीर
अंतरिक्ष स्टेशन में अनेक उपकरण लगाए गए थे। उदाहरणार्थ-
अंतरिक्ष में बनाई गई मिश्र धातु पृथ्वी में बनाई गई मिश्र
धातु से बहुत अच्छी होती है। इसके साथ साथ ऑस्ट्रोफिजिक्स के
क्षेत्र में ५९०० और बायो-तकनीकी के क्षेत्र में १२५ प्रयोग
संपन्न किए गए।
मीर अंतरिक्ष स्टेशन में
पहुँचे अंतरिक्ष यात्री
मीर अंतरिक्ष स्टेशन में अनेक
अंतरिक्ष यात्रियों ने लंबे अरसे के अंतरिक्ष प्रवास गुज़ारे
हैं। १९८७ में यूरी रोमैन्को ने मीर स्टेशन में ३२६ दिन
गुज़ारे, १९८८ में ब्लैडिमिर टिटोव और मूसा मनारोव ने ३६५ दिन
मीर अंतरिक्ष स्टेशन में गुज़ारे। १९९५ में वैलेरी पालिकोव ने
मीर अंतरिक्ष स्टेशन में एक समय में ४३८ दिन बिताकर एक विश्व
रिकार्ड स्थापित किया। वैलेरी पालिकोव ने दो उड़ानों के द्वारा
अंतरिक्ष स्टेशन मीर में कुल ६७८ दिन गुज़ारे तथा सरगेई अवडेव
ने अपनी ३ उड़ानों के द्वारा अंतरिक्ष में (मीर स्टेशन में)
७४८ दिन गुज़ारे। सरगेई अवडेव का भी रिकार्ड बना हुआ है।
महिला अंतरिक्ष यात्रियों ने
भी मीर अंतरिक्ष स्टेशन में लंबे समय प्रवास गुज़ारे हैं। १९९५
में एलेना कोंडाकोवा ने मीर स्टेशन में १६९ दिन गुज़ारे तथा
अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री शैनन ल्युसिड ने मीर स्टेशन में १८८
दिन गुज़ारे। महिलाओं में डॉ. शैनन ल्युसिड का सबसे लंबे
अंतरिक्ष प्रवास का रिकार्ड बना हुआ है। विदेशी अंतरिक्ष
यात्रियों में शैनन ल्युसिड के अलावा फ्रांस के जीन-पियरे और
जर्मनी के थामस रीटर ने मीर अंतरिक्ष स्टेशन में क्रमशः १८८
दिन और १७९ दिन गुज़ारे।
मीर अंतरिक्ष स्टेशन के प्रथम
यात्री ल्योनिड किजिम और ब्लैडिमिर सोलोविए थे तथा इन अंतरिक्ष
यात्रियों की ख़ास बात यह थी कि ये पहले मीर अंतरिक्ष स्टेशन
में पृथ्वी से आए तथा अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए इसे प्रचालित
किया, तत्पश्चात मीर के पहले के स्टेशन (जो अंतरिक्ष में उस
समय मौजूद था) सैल्युट ७ पर एक सोयुज अंतरिक्ष यान के द्वारा
चले गए। ये अंतरिक्ष यात्री सैल्युट ७ पर दो महीने रहने के बाद
पुनः मीर अंतरिक्ष स्टेशन पर वापस आ गए। १९८८ में फ्रांस के
अंतरिक्ष यात्री जीन लूप चेर्टियन पहले व्यक्ति थे, (गैर रूसी
और गैर अमेरिकी) जिन्होंने पहली स्पेस वॉक की। जापान के
पत्रकार थे जो मीर अंतरिक्ष स्टेशन में गए। पत्रकार होने के
नाते आकीयामा ने अंतरिक्ष से टोकियो आधारित टेलीविजन चैनेल के
लिए सजीव टेलीविजन का प्रसारण किया।
अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष
स्टेशन अल्फा से संबंधित समुचित अनुभव पाने के लिए अमेरिकी
स्पेस शटल ८ बार मीर अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़ी। जुड़ने की यह
पहली प्रक्रिया २७ जून १९९५ से ७ जुलाई १९९५ के बीच हुई तथा
नौर्वी डाकिंग प्रक्रिया २ जून १९९८ से १२ जून १९९८ के बीच
संपन्न हुई। अंतरिक्ष स्टेशन मीर में जाने वाले पहले अमेरिकी
अंतरिक्ष यात्री थे, डॉ. नार्मन थैगर्ड। वे सोयुज टी एम-२१
अंतरिक्ष यान के द्वारा मीर अंतरिक्ष स्टेशन में गए तथा स्पेस
शटल की उड़ान एस टी एस-७१ के द्वारा पृथ्वी पर वापस आए। सात
अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों नार्मन थैगर्ड, शैनन ल्युसिड, जान
ब्लाहा, जेरी लिनेंज़र, माइकल फोले, डेविड ओल्फ और ऐंडी थामस
ने अंतरिक्ष यात्री मीर अंतरिक्ष स्टेशन जा चुके थे। ब्रिटेन
की एकमात्र महिला हेलेन शर्मन भी मीर अंतरिक्ष स्टेशन में गई।
मीरकार्प्स संस्था ने मीर
अंतरिक्ष स्टेशन को लीज पर लेने के बाद एक अमेरिकी राकेट
वैज्ञानिक डेनिस टिटो को अंतरिक्ष पर्यटक के रूप में मीर
स्टेशन पर भेजने की योजना बनाई थी तथा टिटोका इसके लिए बाकायदा
प्रशिक्षण भी प्रारंभ हो गया था, लेकिन मीर अंतरिक्ष स्टेशन
में बढ़ती हुई प्रचालन समस्याओं के कारण इस कार्यक्रम को
स्थगित किया गया। अब ऐसा सुना जाता है कि डेनिस टिटो अब शायद
पर्यटक के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन अल्फा में
जाएँ।
२३ मार्च २००९ |