हास्य व्यंग्य

यह चोरी नहीं प्रेम है भाई
शशिकांत गीते


पिछले दिनों फेसबुक पर बडा़ बवाल हुआ। फेसबुक की एक सदस्य ने कुछ चर्चित रचनाकारों की कविताएँ कही नेट से हांसिल कर रचनाकारों के नाम दिये बिना अपनी वाल पर प्रकाशित कर दीं। रचनाकार-पाठक बहुत नाराज हुए। मैं भी बहुत दुखी और नाराज हुआ। मेरी रचनाएँ भी नेट पर उपलब्ध हैं। मेरी एक भी रचना उन्होंने अपनी वाल पर प्रकाशित नहीं की। मेरी एक भी रचना उन्हें पसंद नहीं आई? जबकि मैं कभी भी अपनी रचनाओं के अंत में सर्वाधिकार सुरक्षित नहीं लिखता हूँ। मैं बहुत अपमानित महसूस कर रहा हूँ। इतनी शर्मींदगी मैने कभी नहीं झेली। रचनाकारों को तो खुश होना चाहिए कि कोई उनकी रचनाओं को इतना प्यार करता है कि अपनी बना लेता है।

फेसबुकिया सदस्या इस मामले में नौसिखिया हैं। पकडी़ गईं। मुझे उन पर बहुत दया आई। अनुभवी होने के नाते मैं उनका और उनके मार्ग के लोगों का मार्गदर्शन करना चाहता हूँ ताकि ऐसे आक्रमणों से बचा जा सके। पेश्तर तो चर्चित रचनाकारों की रचनाओं से इतना प्यार नहीं ही करना चाहिये। अगर हो ही जाये तो कुछ शब्दों को बदल देना चाहिये। यह भी संभव न हो तो कम से कम शब्दों की जगह बदल दें। ताकि वक्त आने पर इसे प्रेरणा कह कर पल्ला तो झाड़ा जा सके। चर्चित रचनाकार की चर्चित रचना से ऐसा और इतना ही प्यार करने का अनुभव मुझे है। एक बार मुझे निराला जी की एक बहुचर्चित कविता से प्यार हो गया। मैने तुरंत प्रेरणा ली-

वह तोड़ता पत्थर/
देखा उसे मैने ग्राम जूनापानी के रस्ते पर-
वह तोड़ता पत्थर।
गैरह- वगैरह

यहाँ यह बता दूँ कि एक-दो सम्पादकों को भी साधना बहुत जरूरी है। मैंने एक सम्पादक महोदय को साध रखा है। उनकी हर सम्पादकीय को, चाहे कितनी भी घटिया हो, कालजयी कहता और लिखता हूँ। कुछ दिनों के अंतराल में स्व. राजेन्द्र अवस्थी के काल चिंतन की तरह पुस्तकाकार करवा लेने का आग्रह भी करता रहता हूँ ताकि हम पाठक उसका लाभ लेकर वैचारिक रूप से समृद्ध हो सकें। कभी-कभी उनके सम्मान की रिपोर्टिंग भी कर देता हूँ। पिछले दिनों उन्हें ग्राम बड़खालिया खुर्द के गणेश मण्डल द्वारा दिये गए सम्मान की रिपोर्ट मैंने बढ़ा-चढ़ा कर लिखी, जो उन्हे बहुत भायी। मैने भाँति- भाँति प्र
शंसा करते हुए लिखा कि भारतीय लोक मानस में उनकी गहरी पैठ है।

एक बार वे बाल-कथा विशेषांक निकाल रहे थे। मैने इंटरनेट से सामग्री जुटा कर बाल कथा भेज दी। उनका पत्र आया कि भाई बाल-कथा मतलब बच्चों की कहानियाँ और आपने तो “बालों की कथा” अर्थात् केशकथा भेज दी है। आपने अभी तक बोरगाँव बुजुर्ग के गरबा मण्डल द्वारा मुझे सम्मानित करने वाली रपट भी नहीं भेजी है। मैने लिखा- सर आप क्या नहीं
कर सकते? और साथ में रपट भी भेज दी। इसका अच्छा असर हुआ दोनों छप गयीं।

हाँ, तो मैने ”वह तोड़ता पत्थर” भेजी, जो छपना थी, छपी। खास पत्रिकाओं का खास पाठक वर्ग होता है जो सम्पादक और रचनाकारों का बडा़ प्रशंसक होता है। अच्छी प्रतिक्रियाएँ मिलीं। एक भले पाठक ने तो मुझे निराला से आगे का कवि कहा। मगर एक महिला रचनाकार को यह प्रशंसा पची नहीं। उनका पत्र आया कि आपने निराला जी की कविता भी अपने नाम से छपवा ली। उनको तो छोड़ देते। मैने प्रतिकार किया तो उन्होंने प्रमाण सहित कविता भेज दी। अब मैने उन्हें फेसबुक पर खोज निकाला। प्रोफाइल और वाल देखी। वे साधारण सी दीखने वाली औसत दर्जे की रचनाकार थीं। उन्हें पत्र लिखा आप इतनी सुंदर, सुंदर रचनाकार हैं। मैं तो आपका फैन हूँ। आपकी सभी रचनाएँ मुझे कंठस्थ हैं। मित्रों के बीच आपकी प्रशंसा करते नहीं अघाता हूँ और आप इतना संगीन इल्जाम लगा रही हैं? निराला जी की कविता में स्त्री पत्थर तो़ड़ती है, मेरी कविता में पुरुष। निराला जी ने यह सब इलाहाबाद के पथ पर देखा और मैने जूनापानी के रस्ते पर। वे मान गईं। मगर मैने कान पकडे़। किसी बहु-चर्चित या चर्चित रचनाकार से कभी प्यार न करना। न ही प्रेरणा लेना। फिर इन झंझटों में समय भी बर्बाद होता है। इतने समय में तो मैं तीन-चार कविताएँ रच डालता। इससे अच्छा है किसी नये रचनाकार की रचना से प्यार करो। उस बेचारे की प्रेरणा क्या पूरी रचना ही ले लो तो भी वह कुछ नहीं कर सकता। चीखे-चिल्लाये तो
कौन सुनता है।

एक बार एक समानधर्मा का पत्र आया। क्या यह कविता आपकी है? मैंने उन्हे उत्तर दिया- नहीं आपकी है। हम में प्रगाढ़ मित्रता हो गई। अब हम एक दूसरे से पूछ लेते हैं कि आजकल आप क्या पढ़ रहे हैं? फिर हम एक दूसरे की पढ़ी किताबों से ज्यादा प्यार नहीं करते। समानधर्माओं से सामंजस्य बनाएँ रखना भी जरूरी है। मेरी राय में तो एक मजबूत संगठन
होना चाहिये।

अपने हित में दूरगामी परिणामों के मद्देनजर साहित्यकार वर्ग को जानना और साधना भी बेहद जरूरी है। वैसे तो अलिखित वांग्मय में कई वर्ग वर्णित हैं परन्तु हमारे लिये पाँच वर्गों की जानकारी ही पर्याप्त और उपयोगी है।

पहला वर्ग सागर में कछुए की तरह होता है। जो कभी-कभी साँस लेने ऊपर आता है। बाकी समय अपने लेखन में ही डूबा रहता है। यह बनाता नहीं तो बिगाड़ता भी नहीं।

दूसरा वर्ग मछली की तरह होता है जो जल्दी- जल्दी सतह पर आता है। यह जुगाड़ू होता है। जितनी देर साँस लेने बाहर आता है, उतने में अपनी गोटी फिट कर लेता है। इसे साध लिया जाये तो बहुत काम का होता है।

तीसरे वर्ग में कई वर्ग होते हैं। हर वर्ग किसी बड़े बरगद की छाया में रहता है और एक दूसरे पर कीचड़ उछालता रहता है। अपने बरगद और छाया- मित्रों के लिये जान भी दे सकता। यहाँ सुरक्षा की पूरी गारंटी है।

चौथा वर्ग कुछ ज्यादा ही शौकिया लिखता है। नोट गिनकर हिसाब मिला लेने के बाद लिखता है। यह एक साथ मांसल भी लिखता है और आध्यात्मिक भी। य़ह मनुष्य के आत्मिक विकास का पक्षधर होता है। दुनिया के लिये मैं कह नहीं सकता, मगर हमारे लिये कोई खतरा नहीं। अपवाद हर वर्ग में हो सकते हैं।

पाँचवा और अंतिम वर्ग अलग-अलग विचारधारा या समन्वित विचारधारा का होता है। यह मूलतः सकारात्मकता और नैतिकता की बात करता है। हो भी सकता है। यह चिल्ला तो सकता है मगर इसमें से कोई पाण्डुलिपी उड़ा ली जाए तो न्यायालय भी नहीं जा सकता। पहले तो होता ही नही, हुआ भी तो यह अपना बजट बिगाड़ना नहीं चाहेगा। यहाँ हमें सहयोग की कोई उम्मीद नहीं। मगर इसके हमारी साहित्य की चोरी-चकारी पर, माफ करें हमारे साहित्य से अटूट प्रेम पर, चिल्लाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। ये बडा नासमझ होता है। कहता हैं यह सब करते हुए हमें शर्म आनी चाहिए।

अरे भाई! जब पहलवान अखाड़े में उतरते हैं तो क्या कपड़े पहन कर उतरते हैं? है कि नहीं?

१६ जुलाई २०१२