सामयिकी भारत से

हिंदी की लिपि बदलने की मंशा के पीछे छुपे रहस्य को खोलते प्रभु जोशी के विचार-


षडयंत्र को 'ज़रूरत' बताने की मासूमियत का मर्म


हिन्दी कथा-संसार के एक गंभीर नागरिक के 'जनसत्ता' में क्रमश: दो क़िस्तों में प्रकाशित आलेख को आद्योपान्त पढ़ने के पश्चात, यह तथ्य हाथ लगा कि दिन-प्रतिदिन 'हिन्दी के विघटन की बढ़ती दर; और 'दुरावस्था' ने उन्हें काफी गहरे तक उद्वेलित कर रखा है- और, इसके परिणामस्वरूप वे अपने गहन चिन्तन मनन के उपरान्त, समस्या समाधान के रूप में अंतत: सिर्फ एक ही कारगर युक्ति के पास पहुँचते दिखायी देते हैं कि यदि 'दम तोड़ती हिन्दी के प्राण बचाना है तो, उसकी लिपि को 'देवनागरी' से बदल कर 'रोमन' कर दी जाये।

लेखक ने अपने विचारपूर्ण लेख में, कठिन और कष्टदायक देवनागरी की वजह से परेशान आबादी की फेहरिस्त में, सबसे पहले मुम्बइया फिल्म-उद्योग से जुड़े एक निर्देशक की लाचारी का सहानुभूतिपूर्वक उल्लेख किया है और बताया कि 'क्योंकि, अभिनेताओं में से कुछ हिन्दी बोलते-समझते तो हैं, लेकिन नागरी लिपि नहीं पढ़ सकते।'

वस्तुत: उनका कष्ट साफ-साफ समझ में आता है, क्योंकि पिछले दिनों मीडिया में ख़बर थी कि कैटरीना कैफ फिल्म के सेट पर बेहोश हो गयीं। सुनते हैं, कैटरीना को हिन्दी में सम्वाद बोलने से बहुत तनाव हो जाता हैं।

देवनागरी जैसी लिखने-पढ़ने में दुरूह लिपि के कारण कष्ट भोगने वालों की पड़ताल करते हुए वे बताते हैं कि जो दूसरे क्रम पर आते हैं, वे, वे लोग हैं, जो विज्ञापन जगत में हैं। अर्थात् वे उन कारिन्दों के कष्ट को बड़ी शिद्दत से समझ रहे हैं, जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का माल बेचने के लिए अपनी भाषा से जनता में लालच गढ़ने का काम करते हैं। या कहें कि भारत की 'अल्प-उपभोगवादी' जनता को 'पूर्णत: उपभोक्तावादी' बनाने के पुण्य-कर्म में हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं। सहानुभूति हमें भी है कि आखिर अपने कारोबार से करोड़ों में कमाई करने वाले लोग ऐसे असहनीय कष्ट भी भोगने को क्यों बाध्य हों?
लेख में, इनके अतिरिक्त आहतों की कोई अन्य आबादी नहीं गिनाई गयी है। हाँ अंग्रेजी भाषा की भूख के मारों का मार्मिक और सम्मानजनक उल्लेख जरूर है, जो 'मांगे मोर' की आवाज बुलंद किये जा रहे हैं और निश्चय ही एक अरसे से लगातार उनकी पुकार की एक निर्लज्ज अनसुनी की जा रही है। क्योंकि वे चाहते हैं कि न केवल बोलचाल, बल्कि लिखी जाने वाली भाषा में भी अंग्रेजी के शब्द 60 प्रतिशत हो जायें और हिन्दी के केवल 40 प्रतिशत रह जायें। क्योंकि, भाषिक-उपनिवेश बनाने के लिए यह प्रतिशत निर्धारित किया गया है। भाषा में मिश्रण की इस अवस्था तक पहुँच जाने पर कहा जाता है कि 'लैंग्विज इज रेडी फॉर स्मूथ ट्रांजिशन फ्रॉम हिन्दी टू इंग्लिश।'

बहरहाल, वे ही वे तमाम लोग हैं, जिनके लिए हिन्दी की नागरी लिपि दु:खदायी बनी हुई है। और इनकी ही जरूरत है कि हिन्दी की लिपि नागरी से रोमन कर दी जाये। इनके लिए हिन्दी के अधिकांश शब्द 'टंग-टि्वस्टर' ही हैं। इसीलिए, तरह-तरह से ये लोग, हिन्दी के शब्दों को लगातार बेदखल करते हुए, उन्हें अपनी ही नहीं, बल्कि समूची हिन्दी भाषा-भाषी जनता की जबान से हटाने में जी जान से जुटे हुए हैं। इनके पास अपनी ही बनायी हुई एक छलनी है, जिससे वे पूरी भाषा को छानने में लगे हैं।

इसके अलावा, जो हिन्दी के समकालीन स्वरूप से, सबसे ज्यादा परेशान हैं और उनके पास भी अपनी एक छलनी है, वे लोग हैं हिन्दी के अखबारों के युवा 'मालिक-सम्पादक'। चूंकि, वे भी शब्दों को छान-छान कर अखबार की भाषा से बाहर फेंक रहे हैं। उन्हें 'छात्र-छात्रा', 'माता-पिता', 'विश्वविद्यालय', 'न्यायालय', 'यातायात', 'संसद', 'राज्य-सभा', 'विधान-सभा', 'नगर पालिका', 'अध्यापक', 'वकील', 'बाजार', 'रविवार', 'सोमवार', 'मंगलवार' - यहां तक कि नहाते-धोते, खाते-पीते और कार्यालयों में काम करते हुए, जो शब्द बोले जाते हैं, वे कठिन लगते हैं। इनको अखबार के छापेखाने से खदेड़ कर बाहर करते हुए, वे इनके स्थान पर अंग्रेजी के शब्द ला रहे हैं। उनकी दृष्टि में ये तमाम शब्द 'बासी' हो चुके हैं। वे भाषा को 'फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ' देना चाहते हैं। उन्होंने अपने अखबारी कर्मचारियों को सख्त हिदायत दे रखी है कि वे अखबार के तमाम रंगीन परिशिष्टों में हिन्दी-अंग्रेजी का वही चालीस तथा साठ का प्रतिशत बना कर रखें। इसके साथ-ही साथ वे एकाध पृष्ठ अंग्रेजी का भी छापते हैं, ताकि हिन्दी उसके पड़ोस में बनी रहने से आगे-पीछे अपना लध्दड़पन छोड़ कर थोड़ी बहुत सुधरने लगेगी। आखिर किसी भद्र-साहचर्य से ही तो गंवारों का परिष्कार होता आया है। यह भाषा के 'उत्थान' का आवश्यक उपक्रम है।
ब्रिटिश कौंसिल के एक चिंतक बर्नार्ड लॉट के शब्द की इमदाद ले कर कहें कि यह तो हिन्दी का 'रि-लिंग्विफिकेशन' है, जो 'सिन्थेसिस ऑफ वक्युब्लरि' के जरिए ही तो संभव हो सकेगा। यह विचार ब्रिटेन के केबिनेट पेपर में था और जिसे तीस वर्षों तक गुप्त दस्तावेज की तरह रखा गया था।

खैर, अब तो ब्रिटेन और अमेरिका भारतीय भाषाओं के ध्वंस के समवेत-श्रम में जुट चुके हैं, जिसे भाषा के 'क्रियोलाइजेशन' कहा जाता है इस काम को 'मेन-टास्क' जैसा विशेषण दिया गया है। जिसके अन्तर्गत स्थानीय भाषा के व्याकरण को नष्ट करके उसमें वर्चस्वी-भाषा की शब्दावलि का मिश्रण किया जाता है। इस शब्दावलि को 'शेयर्ड-वक्युब्लरि' के सम्मानजनक विशेषण से नाथा जाता है। ताकि बदनीयत को छुपाया जा सके। यह हिन्दी-चीनी भाई-भाई की तरह की छद्म युति है।

भाषिक-उपनिवेश के एक और शिल्पकार जोशुआ फिशमैन बड़ी उपयुक्त रणनीतिक बुध्दि रखते हैं। वे कहते हैं कि 'भाषा को भाषा के हित में बढ़ाने के बजाय उसे वर्ग-हित में बदल कर बढ़ायी जाये, ताकि वह वर्ग ही भाषिक उपनिवेश के निर्माण के काम में स्वनियुक्त सहयोगी की भूमिका में आ जाये।' आज के भारत का मेट्रोपॉलिटिन कल्चरल एलिट (महानगरीय सांस्कृतिक अभिजन) इसी कूटनीति के तैयार की गयी सैन्यशक्ति का प्रतिरूप है, जो देशज भाषाओं के विध्वंस के लिए स्वयं को तैयार कर चुका है। वह स्वीकार कर चुका है कि अब अंग्रेजी ही इस महादेश की अपराजेय भाषा बन कर रहेगी। और वे इस ऐतिहासिक काम में अपना पूर्ण समर्थन और सहयोग देंगे। भारत का सारा इलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट मीडिया, इसीलिए अब इस वर्ग की 'जीवन शैली' का 'शेष-भारत' को उनकी जीवन शैली में ढालने के लिए पूरी शक्ति से, 'भाषा, भूषा, भोजन' सभी को सर्वग्राही बनाने का काम कर रहा है। यहां यह याद दिलाना उचित ही होगा कि शीतयुध्द के दौरान 'समतावादी-विचार' के विरूध्द 'लाइफ-स्टाइल' शब्द को लगभग विस्फोटक की तरह इस्तेमाल किया गया था। वह 'समानता' को ढहा कर 'विशिष्टता' को प्रतिष्ठित करता था। दुर्भाग्यवश, अब वह शब्द हिन्दी के अखबारों के चमकीले और चिकने पन्नों पर छप रहे 'परिशिष्टों' का 'मास्ट हेड' है। इन्हीं परिशिष्टों पर पश्चिम के उस संस्कृति-उद्योग' की 'समरगाथा' चल रही है, जो अंग्रेजी भाषा से नालबध्द है। इसलिए तीसरी दुनिया के देशों में अंग्रेजी भाषा की एक विराट् मार्केटिंग चल रही है, जिसका बजट रक्षा बजटों से ऊपर है और वे 'कल्चरल-इकोनामी' की तरह जाना जाता है। उनका स्पष्ट कथन है कि 'नाऊ वी डोण्ट इण्टर अ कण्ट्री विथ गनबोट्स, रादर विथ लैंग्विज एण्ड कल्चर।' बाद इसके तो वे पाते हैं कि लोगों ने हंस-हंस कर उनकी गुलामी का वरण कर लिया है।

उनकी रणनीति है कि वर्ग-निर्माण के समानान्तर हाइब्रिड-आर्गेनाइजेशन पैदा किये जायें, जो 'अनालोच्य' रह कर अंग्रेजी के साम्राज्य के निर्माण में अपनी अचूक और असंदिग्ध भूमिका अदा करेंगे।

भूमण्डलीकरण की हवा के बाद से तो यह बार-बार प्रचारित किया जा रहा है कि अब हिन्दी पढ़ कर तो कोई आगे बढ़ ही नहीं सकता। इसलिए प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में विदेशी धन से जो 'एज्युकेशन फॉर आल' की मुहिम चलायी गयी है, उस धन की अघोषित शर्त ही 'इंग्लिश फॉर आल' की है। इसीलिए, हमारे देशभक्त सैम पित्रौदा लगातार कहते आ रहे हैं कि पहली कक्षा से ही 'अंग्रेजी की पढ़ाई' शुरू की जाये - क्योंकि, यह मुहिम पहली कक्षा से 'अंग्रेजी की पढ़ाई' के बजाय पहली कक्षा से अंग्रेजी में पढ़ाई में बदल जायेगी। यह देवनागिरि लिपि को रोमन में निर्विघ्न ढंग से बदलने की सबसे सुरक्षित युक्ति है। क्योंकि जब बच्चा पहली कक्षा से ही यह जान लेगा कि उसके लिए रोमन लिपि सरल और देवरागरी लिपि कठिन है, तो वह पीढ़ी रोमन को श्रेष्ठ और उसे ही हमेशा के लिए अपनाने वाली पीढ़ी के रूप में तैयार हो जायेगी।

जोशुआ फिशमैन की विचार सारिणी बताती है कि 'भाषा' को भाषा समस्या नहीं, बल्कि 'शिक्षा-समस्या' बनाकर रखो तथा अंग्रेजी बनाम यूथ-कल्चर की प्रतीति होनी चाहिए। इसी फण्डे के तहत प्रायवेट एफ.एम. तथा टेलिविजन चैनलों पर हिन्दी की भर्त्सना करते हुए अंग्रेजी की श्रेष्ठता का बखान करने वाले इंग्लिश गुरूओं के प्रायोजित कार्यक्रम छाये हुए हैं। ये सभी मुक्त भारत के शिल्पी है, जो अपनी प्रायोजित हथौड़ियों से एक विराट संघर्ष के बाद आजाद हुए मुल्क में नये भाषा-उपनिवेश का प्रारूप उकेर रहे हैं। ये सब युवा वर्ग को ही संबोधित है, जिसके भीतर स्थानीय भाषा के प्रति हेय दृष्टि पैदा की जा रही है। अर्थात् अपनी ही भाषा तथा अपनी परम्परागत जीवन-शैली के प्रति नफरत, यूथ-कल्चर का नाम है।
कुल मिलाकर, हिन्दी की मौज़ूदा स्थिति को देख कर उसकी लिपि को बदल कर, उसे 'फ्रेशलिंग्विस्टिक' लाइफ देने वाला चमत्कारिक 'आइडिया' लेखक के भीतर कौंधा और उसी कौंध में उन्होंने यह लेख भी लिख डाला- यह सब एक ऐसी मासूमियत है, जिसका मर्म उसी महानगरीय अभिजन के हित में ही स्वाहा हो जाता है। हालांकि, उन्होंने, जिन्हें ऐतिहासिक शक्तियां कहा है, दरअस्ल वे अपनी अथाह पूंजी से तीसरी दुनिया के मुल्कों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को निर्दयता से नष्ट करने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ही हैं। अब उन्हें सिर्फ एक ही भाषा और एक ही लिपि चाहिए।

बीसवीं शताब्दी में उन्होंने एफ.एम. रेडियो टेलिविजन या कहें कि अपने विकराल सूचना और संचार तंत्र के जरिये जिस तरह अफ्रीकी भाषाओं को नष्ट किया, उसी आजमायी हुई युक्ति से वे यहां की भाषाओं का क्रियोलीकरण्ा करते हुए, उनका संहार करने की तैयारी में है। पहले स्थानीय भाषाओं के भीतर अपनी साम्राज्यवादी भाषा की शब्दावली को बढ़ाना और अंत में उस बास्टर्ड-लैंग्विज को रोमन में लिखने की शुरूआत करना उनका अंतिम अभीष्ट होता है, जिसे वे 'फाइनल असाल्ट ऑन नेटिव लैंग्विज' कहते हैं। और निश्चय ही, जब हम यह भाषा लिखेंगे कि 'यूनिवर्सिटी द्वारा अभी तक स्टूडेण्ट्स को मार्कशीट इश्यू न किये जाने को लेकर कैम्पस में वी.सी. के अगेंस्ट, जो प्रोटेस्ट हुआ, उससे ला एण्ड आर्डर की क्रिटिकल सिचएशन बन गई', तो इसे रोमन के बजाय पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ने वाला अंग्रेजी में ही लिखेगा-हिंग्लिश या क्रियोल हो चुकी हिन्दी में नहीं लिखेगा।

दरअस्ल, भाषा के लिए संघर्ष अपने समूचे अर्थ में स्मृति के विनाश के विरूध्द संघर्ष होता है। रोमन में हिन्दी की शुरूआत के थोड़े से ही वर्षों में नई पीढ़ी के लिए करोड़ों पुस्तकें किसी जादुई लिपि में लिखी हुई लगने लगेगी। उन्हें लाल कपड़े में लिपटी पवित्र पुस्तकों की तरह संग्रहालय में रख देना होगा। यह निहायत ही विडम्बनापूर्ण है, कि हम अपने अन्तर्विरोधों से सिर उठा कर जब भी ऊपर देखते हैं, तो हमें अपना मोक्षदाता सिर्फ अंग्रेजी और पश्चिम में ही दिखाई देता है।

यह चिन्तन की दरिद्रता है कि भारत के वैचारिक भूगोल में तमाम लड़ाईयां इतिहास के संदर्भ में इतिहास को दुरूस्त करने की सौगंध के साथ शुरू की जाती है। लिपि के निर्धारण में आजादी के बाद लिये गये निर्णय को भूल बता कर उसे सुधारने का आह्वान, एक किस्म की विदूषकीय बुध्दि ही लगती है। हमारी नियति यहीं है कि हम एक अंधेरे से निकल कर, अपने द्वारा गढ़े जाने वाले नये अंधेरे में खुद को हांकने लगते हैं। जब चित्राात्मक लिपि वाली जापानी और चीनी भाषाओं में बीसवीं शताब्दी का सारा, न केवल ज्ञान-विज्ञान आ सकता है, बल्कि वे स्वयं को विश्व के श्रेष्ठतम और सफल राष्ट्र की तरह दुनिया के सामने गर्व से खड़ा कर सकते हों, तब नागरी लिपि जैसी दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक और समर्थ लिपि को हमेशा-हमेशा के लिए विदा करना कौन-से विवेक का प्रमाणीकरण होगा। यह भारत लगता है वस्तुत: महाभारत ही है, जिसमें धृतराष्ट्र का अंधापन भी है और संजय की दिव्यदृष्टि भी है। लेकिन, संजय तो बहुराष्ट्रीय कम्पनी के चलाये जा रहे मुजरे के 'आँखों देखा हाल' के बखान के लिए तैयारी में जुटे हैं।

१९ अप्रैल २०१०