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दस ही दिन के बाद मेरे जिस्म के अंदर की सिर से पाँव तक लटकी
हड्डियों की जंजीर कहीं बीच से तिरखी हुई महसूस होने लगी और
मुझे लगा कि काम, काम नहीं होता। छोटा या बड़ा होता है और हर
काम हर किसी के बस का नहीं होता। ग्यारहवें दिन जब टहलसिंह ने
सुबह चार बजे मुझे आवाज़ दी तो मैं सुनी अनसुनी करता बिस्तर
में मस्त पड़ा रहा। काम सुबह पाँच से नौ बजे तक होता था। उस
रोज़ जब वह वापस आया तो बोला, "नंदा साहब!
यू ओ़ के?" शायद वह मुझे बीमार समझ कर चला गया था। फ्री एंट्री होने की वजह से दर असल जर्मनी उन दिनों अर्ध महाद्वीप पाक व हिन्दी से आने वाले सब पढ़े और अनपढ़े हिन्दुस्तानियों और पाकिस्तानियों का ट्रांजिट स्टेशन था। आए टक आराम किया। कमा कर चार मार्क जेब में डाले और आगे किसी अंगरेजी बोलने वाले मुल्क को सिधारे। इसलिये कि हर हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी जो खुद अँग्रेज़ी जानता था और समझता था, सोचता था कि अमेरिका, कनाडा या इंग्लैंड के बादशाह या मंत्री हाथों में हार लिये उनकी प्रतीक्षा में खड़े हैं। यह अलग बात है कि इन देशों के कठोर क़ानूनों और तेज़ नज़र रखने वाले अफ़सरों से बच बचाकर कुछ ही लोग पार उतर पाते थे। हर कोई बिना किसी साथी को बताए अंदर ही अंदर और बाहर ही बाहर प्रयत्नशील रहता और जब एक दिन वह बिस्तर बाँधता या शाम को उसका बेड खाली मिलता तो साथियों को पता चलता कि एक पंछी और उड़ गया मगर टहलसिंह को अपने ऊपर पूरा विश्वास था कि वह इंग्लैंड बड़ी आसानी से सेट हो जाएगा। इसलिये वह इस बात को छुपाता नहीं था। एक दिन शाम के समय वह गड़ोंगी के स्टाल पर खड़ा बियर पीता कुछ दोस्तों से गप्पें हाँक रहा था। मैं वहाँ से निकला तो उसके 'सत श्री अकाल' का जवाब देने को पल भर के लिये रुक गया। वह उनसे कह रहा था, "मैं जब पैदा हुआ तो मेरे बाप ने दादा को बताया मुंडा हुआ है। टहलने के शौकीन दादा घर के बगीचे में टहल रहे थे। बोले, "धन्य धन्य वाहे गुरू। तो अपना टहलसिंह आ गया। बस तब से मेरा नाम टहलसिंह पड़ गया। तुम देखना मैं टहलते टहलते एक दिन लंदन जा बिराजूँगा।"
तीन लड़के तो किसी न किसी तरह कनाडा और अमेरिका की तरफ निकल गये।
मैंने भी इंग्लैंड की तरफ एक ट्राइ मारी मगर पहले ही हल्ले में
अपने भारी भारी अँग्रेज़ी शब्दों के भंडार के बावजूद कस्टम पर ही
मार खा गया और वापस जर्मनी लौट आया। फिर न जाने क्या हुआ और
कैसे हुआ कि टहलसिंह अपने ढाई अक्खरों के सहारे इंग्लैंड पहुँच
गया। |
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१५ अगस्त २००० |