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ग्रीष्म का आतप
बहकती तितलियों के दल
दोपहर की गुनगुनाहट
रहट की आहट
पी रहे एकांत में ये ग्राम्य कोलाहल
बहकती तितलियों के दल

एक टुकड़ा धूप पर
निखरा तुम्हारा नाम
एक पंखुरी फूल पर
बिखरा हुआ अनुमान
प्रेम का पैगाम

जिंदगी के मीत का कोई गीत निश्छल
गा रहे हैं फिर —
बहकती तितलियों के दल

प्यार के सुनसान खेतों में
बिखरते छंद
शहर के तूफ़ान में फिर
ढूँढते मकरंद
पल कोई स्वच्छंद

खुल सकें जिसमें हृदय के बोल कुछ बेकल
कह रहे हैं फिर—
बहकती तितलियों के दल

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