भाईयों, आज का टॉपिक है-
देसी हाथ बनाम विदेशी हाथ।
आज हम इसी टॉपिक पर चर्चा करेंगे और अपना सिर खपायेंगे। अब
आप यह मत कह बैठना कि हाथ तो हाथ ही होता है, देसी हो या
विदेशी, गोरा हो या काला, भ्रष्टाचार से सना हो या दूध
धुला, छोटा हो या बड़ा, पाँच उँगलियों वाला हो या छह-सात
उँगलियों से सज्जित, इससे क्या फ़र्क पड़ता है और इस पर
क्या फिजूल की बहस करनी। लेकिन अपुन को यह साबित करना है
कि देसी हाथ और विदेशी हाथ में उसी तरह ज़मीन-आसमान का
फ़र्क होता है जैसे देसी दुल्हन और विदेशी मेम, देसी गाड़ी
और विदेशी गाड़ी, देसी शराब और विदेशी शराब, देसी लॉकर और
विदेशी लॉकर में फ़र्क होता है इत्यादि-इत्यादि। वैसे तो
देने के लिए अपुन के पास और भी उदाहरण हैं लेकिन अपुन पहले
ही स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अपुन का मकसद मुल्क का
टाइम पास करना है न कि टाइम बरबाद करना, इसलिए हम बहस को
देसी हाथ बनाम विदेशी हाथ तक सीमित रखेंगे, राजनीतिक दलों
के अंदरूनी झगड़ों की तरह ज़्यादा पचड़े में नहीं पड़ेंगे। पचड़ेबाजी में पड़ने से बंदा विवाद ग्रस्त हो जाता है और
प्रजातंत्र में विवाद ग्रस्त होना कई बार बहुत महँगा पड़
जाता है, इसलिए महँगाई और विवाद से किनारा करते हुए अपुन
यह साबित करेंगे कि कौन-कौन से लफड़ों में विदेशी हाथ होता
है और कौन से लफड़े देसी यानी स्वदेशी हाथ द्वारा किए जाते
हैं। पहले हम देसी हाथ की चर्चा करेंगे और कुछ एक उदाहरणों
द्वारा यह बताएँगे कि देसी हाथ भी किसी से कम नहीं है, इसे
यों ही सस्ते में लेने की भूल न की जाए।
अगर किसी पार्टी में
नेतृत्व की लड़ाई छिड़ती है और मामला मीडिया के मार्फत
पब्लिक तक पहुँचता है तो इसका मतलब एकदम साफ़ है कि इस
पचड़े में शुद्ध रूप से देसी हाथ ही है। हो सकता है पार्टी
के भीतर कोई महत्वाकांक्षी व्यक्ति जलजला पैदा करके आसन
हथियाना चाहता हो। अगर समय पर उस व्यक्ति की महत्वाकांक्षा
पर नकेल कस दी जाए तो मीडिया के मार्फत पब्लिक को यह बात
भी पता चल सकती है कि सिंहासन पलट की नाकाम कोशिश के पीछे
खुदा का नहीं बल्कि देसी हाथ ही था। देसी हाथ के और भी
बहुत से जलवे हैं। मान लीजिए कि किसी विभाग में कोई घोटाला
होता है ओर घोटाले का पर्दाफाश हो जाता है तो यही कहा
जाएगा कि घोटाला करने के पीछे भी देसी हाथ था और घोटाले की
ख़बर लीक करवाने में भी देसी हाथ का ही कमाल था।
इश्कबाज़ी में भी कई बार देसी हाथ रंग दिखाता है। प्रेमी
महोदय अपनी प्रेमिका तक खत पहुँचाने के लिए जिस दोस्त की
मदद ले रहे होते हैं, एक दिन वहीं दोस्त प्रेमिका उड़ाकर
ले जाता है और प्रेमी महोदय अपनी डायरी में उदास नग़मे
लिखने को मजबूर हो जाते हैं। देसी जेल से अगर देसी कैदी
भाग जाएँ तो इसमें भी देसी हाथ ही होता है और देश में कहीं
परीक्षा के पेपर लीक हो जाएँ तो इस करिश्मे के पीछे भी
देसी हाथ का चमत्कार होता है।
देसी हाथ कई बार फ़र्श से
अर्श तक पहुँचा देता है और कई बार अर्श से फ़र्श पर लाकर
पटक देता है। ऐसा चमत्कार अमूमन राजनीति में होता है। हाई
कमान में बैठे किसी देसी हाथ का वरद-हस्त मिलते ही बंदा
राजनीति की सीढ़ियाँ-दर-सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाता है और अगर
हाई कमान में बैठा कोई पावरफुल देसी हाथ सीढ़ियों के नीचे
धकेल दे तो बेचारा बंदा लुढ़कते हुए पाताल तक पहुँच जाता
है। फिर उसका कोई नामलेवा भी नहीं होता। भारत के
गली-मुहल्लों और परिवारों में होने वाले झगड़ों में भी
देसी हाथ ही पाया जाता है। यह बात दीगर है कि यह हाथ कई
बार दस्ताने में छिपा होता है तो कई बार खुले में चमक
बिखेर रहा होता है।
अब बात करते हैं विदेशी
हाथ की। सत्ता में बैठे राजनीतिज्ञों और पुलिस अधिकारियों
के श्रीमुख से अकसर यह शब्द सुनने को मिलता है और वह भी उस
वक्त, जब कोई तगड़ा लफड़ा हो जाता है या फिर अपनी नाकामी
छुपाने के लिए किसी बहाने की ज़रूरत होती है। यह हाथ आम
पब्लिक के लिए अदृश्य होता है और इसे सिर्फ़ राजनीतिज्ञ या
पुलिस अधिकारी ही देख पाते हैं। उन्हीं की बदौलत मुल्क की
जनता को पता चलता है कि अभी-अभी जो वारदात हुई है, उसमें
विदेशी हाथ था। मसलन कहीं बम विस्फोट हो जाए, लोग मर-मरा
जाएँ, विमान अपहरण हो जाए, कोई अज्ञात महामारी फैल जाए और
सरकार बेबस हो जाए तो इसमें विदेशी हाथ होता है। कई बार
कुछ लीडर अति उत्साह में महँगाई बढ़ने, भ्रष्टाचार बेलगाम
होने, आँधी-तूफ़ान आने के पीछे भी विदेशी हाथ करार दे देते
हैं और बेचारी पब्लिक हर बार की तरह यह मान लेती है कि अगर
स्थितियाँ मुल्क के रहनुमाओं के बस से बाहर हैं, तो यकीनन
इसमें विदेशी हाथ ही होगा। एक सज्जन इस बात पर चिंतित थे
कि विदेशी हाथ के प्रकोप पर अगर लगाम न लगाई गई तो हो सकता
है कि एक दिन यह सुनने को मिले कि अगर सड़कें गड्ढों में
तबदील हो रहीं हैं तो इसमें विदेशी हाथ है, रोज़गार के
अवसर कम हो रहे हैं तो इसमें विदेशी हाथ है, जंगलों से
पेड़ और वन्य जीव गायब हो रहे हैं तो इसमें विदेशी हाथ है,
नैतिकता दुम दबा कर भाग गई है तो इसमें विदेशी हाथ है,
कन्या भ्रूण हत्याएँ बढ़ रही हैं तो इसमें विदेशी हाथ है,
सांसद रिश्वत लेते पकड़े जा रहे हैं तो इसमें विदेशी हाथ
है। अगर ऐसे ही होता रहा तो मुल्क का क्या होगा? देसी हाथ
का क्या होगा? दोस्तों, आप भी इस विषय पर चिंतन कीजिए कि
देसी हाथ ज़्यादा ख़तरनाक है या विदेशी हाथ? यह भी चिंतन
कीजिए कि विदेशी हाथ में अगर देसी हाथ खेल जाए तो स्थिति
कितनी गंभीर हो सकती है?
२८ जनवरी २००८ |