|

होलिका दहन के साथ ही अग्नि के
समक्ष चहुँ ओर चक्कर लगाते हुए मिनी ने एक कागज आग की लपटों के
हवाले कर दिया था। इसके साथ ही मानो उसके दिमाग से एक भारी बोझ
उतर गया था। दूसरे दिन होली खेलने के लिए रंग बिरंगी गुलाल की
थालियाँ सजाती मिनी के समक्ष अतीत के चलचित्र उभरने लगे थे।
बेहद जिन्दादिल हँसमुख सुधीर भैया... सभी की आँखों का तारा थे।
बचपन से ही हर त्योहार पर उनका उत्साह देखते ही बनता था। होली,
दीवाली, दशहरा, ईद, क्रिसमस, राखी, बैसाखी सभी को खास बनाती
उनकी मित्रमंडली मौहल्ले में भैया एवं उनके दोस्त बलजिन्दर
इरफान और मैसी की चौकड़ी सबकी मनभावन थी।
उसे भी अच्छा लगता था जब राखी पर भैया के सभी दोस्त उससे राखी
बँधाते ईद पर घर में लज्जतदार सेवियाँ आती, क्रिसमस पर मैसी
भैया के घर से आये चॉकलेट व केक खाने को मिलते दीवाली पर सभी
के साथ मिलकर पटाखे चलाते। जीवन को एक खूबसूरत उत्सव के रूप
में जीने का जज्बा बचपन से ही देखने को मिला। हालाँकि वह बचपन
से ही बेहद तुनक मिजाज और स्वार्थी किस्म की थी लेकिन भैया के
पावन सानिध्य ने उसे बदलने पर मजबूर कर दिया था।
होली के त्योहार पर भैया और उनकी मित्र मण्डली सभी घरों में
जाकर चंदा इकट्ठा करती। कहीं से लकड़ियाँ एवं कंडों का इंतजाम
किया जाता फिर होलिका दहन और दूसरे दिन जम कर रंगों का खेल,
बड़ा मजा आता था। माँ के हाथ से बने गूँजे, बेसन की चक्की,
मठरियों पर हाथ साफ किया जाता। माँ काफी मेहनत से अकेली ही
तरह-तरह के पकवान बनाती।
बीती बातों का पिटारा खुला जा रहा था। एक रात माँ खाना बना
रहीं थी, दाल सब्जी बन चुकी थी माँ आटा गूँथ रही थी। तभी
दरवाजे की घंटी बजी माँ ने सोचा कि मिनी दरवाजा खोल देगी।
लेकिन वह हमेशा की तरह ढीठ बनी अपने कमरे में आँखों के सामने
किताब खोले बैठी रही। आखिर माँ ने आटा सने हाथों से ही दरवाजा
खोला। दरवाजे पर भैया व पिताजी खड़े थे। माँ का लाल पड़ा चेहरा
देखते ही पिता जी हड़बड़ा गये थे।
‘‘क्या हुआ रमा तुम्हारी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है।’’
माँ ने धीरे से कहा ‘‘ नही मैं ठीक हूँ।’’
भैया ने माँ का हाथ छुआ, बेहद गर्म था। चिंतित से बोले, ‘‘माँ
आपको तो तेज बुखार है मिनी कहाँ है?’’
वह अपने कमरे में पढ़ रही है।’’
पिताजी चिल्लाए ‘‘ मिनी तुमने देखा नहीं तुम्हारी माँ की हालत
खराब है?’’
वह रूआसी हो उठी थी ‘‘माँ ने मुझसे तो कुछ नहीं कहा’’
माँ का बुखार नापा सौ डिग्री से कुछ ऊपर ही था। भैया ने डॉक्टर
अंकल से बात कर उन्हें दवाई दी पिताजी ने जबरन उन्हें पलंग पर
आराम करने को कहा। माँ नानुकर करती रहीं लेकिन पिताजी वहीं
कुर्सी लगा कर बैठ गये। उसे पिताजी का गंभीर स्वर सुनायी दिया,
‘‘मिनी माँ के लिए खिचड़ी बना दो और आज रोटी भी तुम्हीं
बनाना।’’
वह सदा ही रसोई के काम से दूर भागती रही थी। पिताजी अक्सर माँ
से कहा करते थे अब मिनी कॉलेज में आ गई है। कुछ वर्षो में इसका
विवाह होगा। इसे खाना बनाना सिखाया करो। माँ जब भी कुछ सिखाने
का प्रयास करती वह अपनी पढाई का बहाना बना कर काम सीखने बचती
रहती। थकहार कर माँ कहती- ‘‘इसे पढ़ाई करने दो जब सिर पर
पड़ेगी अपने आप सीख लेगी।’’
उस दिन जब रोटियाँ बनानी पड़ी तो उसे नानी याद आ गई, वह
बड़बड़ा रही थी, माँ आटे में कुछ ज्यादा ही पानी डाल कर उसे
पतला कर देती है, ढेर सारा सूखा आटा मिला कर उसने आटे को एकदम
कड़ा कर लिया। फि र जैसे तैसे रोटियाँ बनाई आड़ी, तिरछी
कच्ची-पक्की रोटियाँ बनाती मिनी पसीने से भीग गई थी। पूरी
स्लैब पर सूखा आटा बिखर गया था। न जाने इतनी गरमी में माँ खाना
कैसे बना लेती है।
माँ के लिए खिचड़ी भी उसने उसने अंदाज से ही बनाई थी जिसमें
हरी दाल ज्यादा और चावल का मिश्रण कम था। माँ ने तो चुपचाप
खिचड़ी खा ली थी लेकिन पिताजी ने मुँह बनाते हुए उसकी बनायी
रोटी खाई थी। जाने अगले घर जाकर क्या करोगी। केवल भैया ही थे
जो मंद-मंद मुस्कुराते हुए खाना खा रहे थे। भैया को मुस्कुराते
देख पिताजी चिढ़ गये थे।
‘‘सुधीर मिनी को बिगाड़ने में तुम्हारा बहुत बड़ा हाथ है। जब
भी उसे कुछ कहने लगता हूँ तुम उसका बचाव करने लगते हो’’
पिताजी की बात सुन वह मन ही मन भुनभुनाते हुए अपने कमरे में
जाकर पलंग पर पड़ गई थी। उस दिन हमेशा की तरह भैया उसे मनाने
नहीं आये थे। भूख जब जोर मारने लगी तो वह यह सोचती हुई रसोई की
ओर चल दी थी कि पहले बिखरी हुई रसोई साफ करेगी फिर ही खाना
खाएगी, खाना खाने के बाद काम करना उस के बस का नहीं है।
अचानक उसके मन से आवाज उठी वैसे कौन-सा काम करती है तू और उसके
चेहरे पर मुस्कान उभर आयी थी रसोई देख कर वह दंग रह गई थी,
रसोई बिलकुल साफ थी। ओह माँ ने बुखार में भी रसोई साफ कर दी
उसे अपने ऊपर ग्लानि होने लगी थी। माँ के कमरे की ओर कदम बढाये
तो देखा कमरे की बत्ती बंद थी, पिताजी के खर्राटे की आवाज
सुनायी दे रही थी। वह सोच में पड़ गई तभी पीछे से भैया की आवाज
सुनाई दी ‘‘मिनी परेशान मत हो माँ तो कब से सो गई है। रसोई
मैने साफ करी है, माँ ने नहीं, बहुत देर हो गई है तू खाना खा
ले।’’
मिनी हैरान थी। भैया हमेशा उसके मन की बात कैसे जान लेते है।
वे अपने कमने में चले गए थे मिनी भी खाने की थाली लेकर अपने
कमरे में चली आयी। अपनी बनायी रोटियाँ उसके गले से नीचे नहीं
उतर रही थी। वह सोच रही थी जब माँ रोटी बनाती हैं तब वह कितने
नखरे करती है। माँ रोटी फूली हुई दो, गर्म-गर्म दो और भी ना
जाने क्या-क्या बोलती है और आज खुद की बनाई रोटी उसे मुँह
चिढाती हुई सी लगी।
तभी उसे लगा रसोई में कुछ बन रहा है रसोई से आती महक उसकी भूख
को तीव्र कर गई भला रसोई में इस समय कौन उसके लिए पकवान बना
रहा होगा। अपने मन के इस वहम पर वह झल्ला उठी ख्याली पुलाव
बनाने से अच्छा है कि वह फ्रिज से डबलरोटी निकालकर नमकीन के
साथ खा ले। कम से कम पेट तो भरेगा। यही सोचकर वह रसोई में आ गई
वहां का दृश्य देखकर कर हैरान रह गई। भैया पैटीमेकर से पैटी
निकाल रहे थे देखते ही मुस्कुरा उठे।
‘‘मुझे पता था तुझसे ये रोटियाँ नही खायी जायेगी। मैं तो बस
तुझे आइना दिखाना चाहता था, सूखी आलू मटर की सब्जी में चीज
मिलाकर तेरे लिए गर्मागर्म पैटी बनाई है। यह सॉस की बोतल पकड़
और तुरंत खा ले। ठण्डी होने पर तो इनका भगवान ही मालिक है।’’
उसकी आँखों में आँसू आ गये।’’ भैया आप कितने अच्छे हो’’ भैया
मुस्कुराये चल अब मस्का मत लगा, खा ले’’।
उस रात मिनी ने पक्का इरादा कर लिया था कि वह माँ से खाना
बनाना सीखेगी और रसोई के कार्यो में उसकी मदद किया करेगी। कुछ
दिनों तक तो वह अपने निर्णय पर अमल करती माँ के साथ रसोई में
उनकी मदद कराती रही किन्तु जल्दी ही उब कर बहाने बनाती ढाक के
तीन पात की तरह किताबों की आई में अपने कमरे में बंद रहने लगी।
सुधीर अपनी छोटी बहन का स्वभाव अच्छी तरह से जानता था। बेहद
भावुक छोटी-छोटी बातें को दिल से लगाने वाली मिनी को वह बड़े
प्यार से समझाता था। माँ पिताजी भी जानते थे कि मिनी से प्यार
से बोल कर कुछ भी करवाया जा सकता है लेकिन गुस्सा करने पर वह
विद्रोही हो जाती थी।
मिनी को याद आ रहा था। एक बार दादी कुछ दिनों के लिए उनके यहाँ
रहने आयी थी। माँ और दादी खरीदारी के लिए बाजार गई हुई थी।
मिनी ने उन्हें सरप्राईज देने के लिए सारा खाना बना कर रखा था।
माँ खुश थी खाने की मेज पर बैठी दादी ने जैसे पहला निवाला मुँह
में डाला उन्हें खाँसी का दौरा पड़ गया। बड़ी मुश्किल से पानी
पीकर उस पर काबू पाया था। बाजार से थकी भूखी प्यासी आई दादी के
मुँह से निकल गया था।
इस लड़की ने इतना नमक-मिर्च झोंक रखा है सब्जी में बहू। तुम
इसके लिए लड़का ढूँढने के लिए कह रही थी। लड़का बाद में
ढूँढूगी। पहले इसे खाना बनाना तो सिखाओ।
दादी की बात सुनते ही मिनी का पारा चढ गया था।।
‘‘एक तो अकेले ही इतना सारा खाना बनाया उस पर दादी आप कैसी बात
कर रही है।? और माँ आपने दादी से मेरे लिए रिश्ता ढूँढने को
क्यों कहा। मुझे पहले अपने पैरों पर खड़ा होना है दादी प्लीज
आप मेंरे लिए रिश्ता ढूँढने का कष्ट मत करना।
पैर पटकती मिनी अपने कमरे में जा घुसी।
उस दिन उसके व्यवहार से व्यथित दादी माँ को कह रही थी। बहू आज
तक तूने मेरे सामने कभी इस तरह व्यवहार नहीं किया। लड़की चाहे
कितना ही अपने पैरों पर खड़ी हो जाये घर के कामकाज और बोलने की
तमीज तो उसे सीखनी ही पड़ती है ना। उस समय पिता और दादी के बीच
हुए वाक युद्ध में माँ सैंडविच बन गई थी तब भैया ने बात
संभालते हुए कहा था- मिनी पर पढाई का दबाव बहुत ज्यादा है।
हमें उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। पर तब मेरी वजह से माँ की
स्थिति कितनी दयनीय हो गई थी अब सोचती हूँ तो बेहद ग्लानि होती
है लेकिन उस रात मैने भैया से कहा था- ‘‘भैया दादी की बातों से
भगवान बचाये पता नहीं चाची उनके साथ कैसे रहती होगी। मैं तो
इनके साथ बिलकुल नहीं रह सकती। तब भी भैया ने बड़े धैर्य से
उसे
समझाया था- ‘‘ऐसा नहीं कहते दादी दिल से बहुत अच्छी है। बड़े
लोग अपने अनुभव के आधार पर ही हमें सीख देते हैं। ठण्डे दिमाग
से सोचेगी तो उनकी बातों में तेरे भविष्य की चिन्ता ही दिखाई
देगी।‘‘
भैया के समझाने ही मिनी को कई बातें समझ आने लगी थी।
मिनी को बुत पहले की बात याद आ रही थी एक बार स्कूल में उसकी
सहेली और पढाई में प्रतिस्पर्धी शिप्रा को किसी विषय में उससे
एक अंक ज्यादा मिल गया था गुस्से से लाल पिली कह रही थी।
‘‘भैया हम दोनों ने उस विषय के एक जैसे नोट्स बनाये थे फिर भी
टीचर ने उसे एक नम्बर ज्यादा कैसे
दे दिया।’’
सुधीर ने मुस्कुराते हुए समझाया था ‘‘नोट्स एक जैसे बनाये थे
लकिन प्रश्नों के उत्तर देने में तुमसे कहीं कोई छोटी सी चूक
हो गई होगी। एक अंक कम आने से क्या फर्क पड़ता है मिनी। लेकिन
मिनी कई दिन तक इस छोटी सी बात का बोझ लिए अपना दिमाग बोझिल
करती रही।
मिनी को याद आ रहा था कॉलेज की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में
हमेशा प्रथम पुरस्कार मिलना उसका सपना रहता था और उसे सच करने
के लिए वह कड़ी मेहनत करती थी। हर बार प्रथम आती थी लेकिन एक
बार वाद-विवाद प्रतियोगिता से घर लौटी मिनी अपने कमरे का
दरवाजा बंद करके बेठ गई थी। माँ के लाख कहने पर भी उसने ना
कमरे का दरवाजा खोला और ना ही उनसे कोई बात ही करी। सुधीर भैया
जब घर आये तब उनके कहने से ही मिनी ने दरवाजा खोला और उन्हें
देखकर फफक-फफक कर रोने लगी ‘‘क्या हुआ मिनी जरूरी नहीं कि हमें
हर बार अपनी आशानुसार फल मिले। तूने पूरी मेहनत की किन्तु
विजेता नहीं रही। हो सकता है कॉलेज वाले नई प्रतिभाओं को आगे
लाना चाहते हो।
मिनी ने जब बताया कि वह प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर आयी है
प्रथम स्थान पर शिप्रा आयी है तब सुधीर ने उसे समझाया था मिनी
तुम्हें दिल बड़ा रखना चाहिए। पहला नम्बर तुम्हारी प्रिय सहेली
का ही आया है मिनी ने बहस करते हुए कहा ‘‘भैया शिप्रा ने तो
खुद मुझसे कहा था कि मिनी तुमने विपक्ष में ज्यादा अच्छे तर्क
दिये थे। तुम्हें ही प्रथम पुरस्कार मिलना चाहिए था।
मिनी ये उसकी उदारता है। उससे हमें सीखना चाहिए कि जीवन में हर
इंसान को हमेशा पहले आपसी रिश्तों को महत्व देना चाहिए सम्मान
पुरस्कार आपसी रिश्तों के बेहद गौण हो जाते हैं।
मिनी को अक्सर भैया की बातें उपदेशात्मक लगती थी। भैया कह रहे
थे, ‘‘मिनी अब जरा शिप्रा की जगह अपने को रखकर देखो? तब तुम
प्रथम आती रही थी और शिप्रा द्वितीय कभी तुमने शिप्रा से ऐसी
बात कही थी? नहीं ना तुम तो गर्व से गर्दन अकड़ाये अपनी ही
प्रशंसा के पुल बाँधती रही थी। एक बार शिप्रा प्रथम आ गई तो
तुम्हे अच्छा नहीं लगा फिर भी शिप्रा ने तुम्हारी भावनाओं का
ध्यान रखते हुए केवल तुम्हारा स्वाभिमान बरकारार रखने के लिये
तुम्हें यह बात कही है। क्योंकि वह तम्हें अपनी प्रिय सखी
मानती है चाहती तो वह भी तुम्हे नीचा दिखाने के लिए कुछ और भी
कह सकती थी। मैं ठीक कह रहा हूँ ना?
तब भैया की खरी-खरी बातों ने मिनी को आत्ममंथन करने को मजबूर
कर दिया था। सुधीर अपनी छोटी बहन से बहुत प्यार करता था।
समय-समय पर उसके अंदर की नकारात्मकता को मनोवैज्ञानिक तरीके से
दूर करने की कोशिश करता रहता था वह चाहता था कि उसकी बहन जीवन
के सकारात्मक पक्ष को भरपूर जिए।
होली का त्यौहार करीब आ रहा था, सुधीर ने मिनी से कहा ‘‘ मिनी
होली खोलने से एक दिन पहले आग जला कर उसकी पूजा परिक्रमा करने
की परम्परा यू तो हमारे यहाँ प्राचीन काल से चली आ रही है
लेकिन तुझे पता है इसके पीछे मान्यता क्या है?
मिनी हँसते हुए बोली ‘‘हाँ भैया मैंने पढा है कि हिरण्यकश्यप
का बेटा प्रहलाद अपने पिता की इच्छानुसार उनको भगवान न मान कर
श्री राम की पूजा अर्चना करता था इस पर उन्होंने अपनी बहन
होलिका जिसे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था उसे आदेश
दिया कि वह प्रहलाद को गोदी में लेकर जलती आग में बैठ जाए।
उसने अपनी भाई की बात मान भी ली और वह अपने भतीजे प्रहलाद को
लेकर जलती आग में बैठ गई लेकिन परिणाम विपरीत निकला। होलिका
स्वयं जलकर राख हो गई और प्रहलाद सुरक्षित बच निकला।
हाँ मिनी इस सारी बात को मैं इस रूप में मानता हूँ कि
हिरण्यकश्यप का घमंड चूर-चूर हो गया था और अच्छाई की जीत हुई
इसी घटना की याद में लोग होली के रंग खेलते हैं। तरह-तरह के
रंगों से खेलना प्रसन्नता का प्रतीक ही है। मैं तो कहता हूँ कि
प्रत्येक घर से होली जलाने के लिए लकड़ी लेना या चंदा लेकर
लकड़ियाँ कंडे आदि एक स्थान पर इकट्ठे करके जलाये जाते हैं। ये
सब की बुराईयाँ दोषों को एक स्थान पर इकट्ठा करके जलाने का
उत्सव ही है। फाल्गुन मास में मनाया जानेवाला रंगों का ये
रंगीला त्यौहार हमारे जीवन को खुशियों के रंग में एक उत्सव में
बदल देता है।
अब मेरी बात ध्यान से सुन। पिछली होली से इस होली तक तेरे जीवन
में जो भी समस्याएँ आई है या जिन बातों से तेरे दिल को ठेस लगी
हैं। तू कागज पर उन सबकी एक लिस्ट बना ले।
‘‘मिनी हँसते हुए बोली थी ‘‘ क्या भैया.... मुझे इतना सब याद
थोड़ी रहेगा’’
भैया हँस दिये थे। अच्छा ऐसी जितनी बातें तुझे अब भी याद है
जिनसे तू अभी तक दुखी रहती है। उन सबको एक कागज पर क्रमवार लिख
ले। उसके बाद क्या करना है मैं तुझे बताऊँगा। उस समय तो मिनी
ने कुछ नहीं कहा लेकिन रात को कमरे में बैठी मिनी भैया के कहे
अनुसार अपने मन को विचलित करने वाले दुखों को क्रमवार कागज पर
उतारने में मशगुल हो गई।
वाद-विवाद प्रतियोगिता में शिप्रा के प्रथम आने के दुखः से वो
आज तक नहीं उबर सकी थी ताऊजी की बेटी अनु के प्री मेडिकल टेस्ट
में सलैक्शन पर दादी ने उसकी तारीफों के पुल बांधते हुए कहा था
कि सारे घर के काम कुशलतापूर्वक संभालने के बाद भी मेडिकल
कॉलेज में प्रवेश मिलना हर एक के बस की बात नहीं है। अनु ने
खानदान का नाम रोशन कर दिया। मिनी ने दादी की बात को अपने
परिप्रेक्ष्य में लिया। दादी के तंज की टीस आज भी उसके मन में
कायम है। बुआ की बेटी के विवाह में आयी बारात में पतली दुबली
लड़कियों ने जब उसके मोटापे पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि-
आपकी पर्सनलिटी के सामने हम कहाँ टिक सकते हैं। आप तो
खाते-पीते घर की लड़की लगती है। तब वहाँ उपस्थित लोगों के
ठहाके पिघले सीसे की तरह उसके कानों मे उतरते चले गये। इस बात
को वह कभी भूल नहीं पायी।
ऐसी कई बातें उसने लिखी जो तब भी दिन रात उसकी उद्वेलित किये
रहती थी। थक कर वह सो गई थी। दूसरे दिन भैया ने उससे पूछा था।
मिनी पर्चे में कुछ लिखा तूने। वह अचकचा गई थी, भैया को सच-सच
कैसे बता सकती थी ध्यान से पढने पर उसने महसूस किया था कि जिन
बातों के लिए वह दूसरों को दोषी मान रही थी कहीं न कहीं वह
स्वयं भी उनके लिए दोषी थी।
भैया जैसे उसके चेहरे की उलझन से सब कुछ समझ गये थे।
देख मिनी मैंने तुझे वो सारी बात केवल तेरे लिए ही लिखने को
कही थी मुझे वह कागज नहीं देखना है तुझे स्वयं उन सारी बातों
पर मंथन कर अपना जवाब लिखना होगा। उस फालतू के बोझ को अपने दिल
दिमाग से झटकना होगा। अपनी कमियाँ को इंसान स्वयं ही दूर कर
सकता है शुभचिंतक तो केवल सही रास्ता ही दिखा सकते है जैसे ही
कहते हुए भैया होले से मुस्कुरा दिए थे।
जिस कागज पर तूने अपने सारे दुख-नकारात्मक बातें लिखी हैं उसे
आज शाम को होलिका दहन के उत्सव में अग्नि को समर्पित कर देना।
उसके बाद तेरा मन हल्का हो जायेगा और कल होली के खुशनुमा रंगों
से अपने जीवन का नया अध्याय शुरू करना। मिनी जीवन का यही फलसफा
है हमारा होली का त्यौहार यही कहता है कि होलिका दहन में अपनी
सभी बुराईयाँ कमियाँ गलतियाँ का दहन करके धुलंडी पर सबको माफ
करते हुए रंग-बिरंगे गुलाल रूपी खुशहाल रंगों से सराबोर होकर
नई ऊर्जा के साथ अपनी जीवन आरम्भ करें।
भैया की बातें मिनी पर गहरा प्रभाव छोड़ती रही थी। सचमुच मिनी
ने अपनी कमियाँ को खंगाला था खाना बनाने के लिए कुंकिंग कोर्स
की कलासेज ज्वाईन की। रेगुलर जिम जाना शुरू किया था पढाई में
भी खूब मन लगाया और अपने आपको काबिल बनाने के लिय युद्ध स्तर
पर जुट गई थी किन्तु ना जाने क्यों अपने अहम् से पूरी तरह
छुटकारा नहीं पा सकी थी।
समय के साथ-साथ भैया का विवाह हुआ प्यारी सी भाभी आयी भैया देश
के सीमा पर तैनात थे। भाभी और जुड़वाँ भतीजे माँ पिताजी का मन
बहला रहे थे। मिनी भी संयुक्त परिवर की छोटी बहू बन गई थी।
हालाँकि मिनी की माँ उसका रिश्ता इतने बड़े परिवार में नहीं
करना चाहती थी, वे जानती थी कि मिनी इतने बड़े परिवार मिल जुल
कर रह सकेगी लेकिन मिनी को तो इसी परिवार का सबसे छोटा बेटा
सुशील ही पसंद आया था वह अपनी जिद पर अड़ गई थी और उसे पूरा
करके ही मानी।
विवाह के बाद कुछ समय तो ठीक रहा लेकिन अपने घर में स्वतंत्र
बिंदास रही मिनी को संयुक्त परिवार के सदस्य पहरेदार से लगने
लगे थे। उनकी साधारण सी कही बात भी चुभने लगी थी। अब मिनी
सुशील पर घर से अलग रहने का दबाव बनाने लगी थी सुशील ने बड़े
प्यार से उसे स्पष्ट समझा दिया था कि हमारा परिवारिक संयुक्त
व्यवसाय है। घर में सभी सदस्य आपस में इतना प्यार एवं स्नेह
रखते हैं कि इनसे अलग रहने की बात मैं सपने भी नहीं सोच सकता।
थोड़े दिन साथ रहोगी तब तुम्हें भी इन सबसे अलग रहना अच्छा
नहीं लगेगा। सुशील के समझाने का मिनी पर विपरीत असर हुआ था।
क्रोधावेश में वह मायके चली आयी थी।
लेकिन तभी एक तूफान भी घर में प्रवेश कर गया था। सरहद से सुधीर
भैया के शहीद होने की खबर आयी थी तिरंगे में लिपटे भाई को देख
मिनी गश खाकर गिर गई थी, घर में हाहाकार मच गया था। खबर मिलते
ही उसके ससुराल के सभी सदस्य वहाँ पहुँच गये थे। बेहाल माँ
पिताजी, भाभी, व दोनों बच्चों को उसके सास-ससुर सुशील व उसके
भाई-भाभियों ने संभाल लिया था। बारहवें तक सभी वहाँ रूके थे,
उनके स्नेह अपनेपन ने मिनी को बिल्कुल बदल दिया था। इन सब का
साथ ना होता तो उसकी और उसके परिवार वालों की क्या हालत होती।
बारहवें के बाद सभी चले गये थे। केवल सुशील ही रूके हुए थे। एक
रस्म के अनुसार भाभी को अपने बच्चों के साथ पीहर जाना जरूरी
था। जाने से पहले वे माँ से लिपट कर बोली थी।
माँ जी आप अपने दिल में यह बात कभी मत लाना कि मैं आपको या इस
घर को कभी छोड़ कर कहीं चली जाऊँगी। केवल रस्म निभाने की खातिर
मैं एक दिन के लिए पीहर जा रही हूँ। मैंने सुधीर को वचन दिया
है कि मैं किसी भी परिस्थिति में आपको छोड़ कर कहीं नहीं
जाऊँगी। मेरे जीवन के सभी रंग आपसे ही है। सुधीर की बाते मैं
कभी नहीं भूल सकती।
माँ ने कस कर भाभी को गले से लगा लिया था। उनकी आर्द्र आँखों
में बहू के कथन ने एक अनोखी रोशनी के दीये टिमटिमा दिये थे। तब
एक मजबूत बंधन उन दोनों के बीच नजर आ रहा था।
भाभी के जाने बाद एक ही कमरे मे अलग-अलग बिस्तर वह और सुशील
लेटे हुए थे। अपने ही अहम् से आहत कमरे की छत को घुरती निढाल
मिनी ना जाने कब नींद के आगोश में चली गई थी। तभी ना जाने कहां
से भैया का मुस्कुराता चेहरा सामने आ गया था। सुन मिनी होली कब
आ रही है हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी तू अपने झुठे अहम् का दहन
कर देनी और आने वाली खुशियों के रंग समेट लेना।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे थे। हाँ भैया कहती वह उठ बैठी थी
और आँखें खोलकर चारों और भैया को ढूँढ रही थी। अचानक अपने सिर
पर किसी का स्नेहिल स्पर्श पाकर चौंक गई थी। क्या भैया अब कहाँ
चैतन्य होकर उसने देखा सुशील द्रवित निगाहों से उसे निहार रहे
थे निरीह स्वर में बोली। मिनी तुम कहोगी तो मैं अपना घर छोड़
कर अलग हो जाऊँगा। मेरे परिवार वालों का कहना है कि मुझे
तुम्हारी खुशी का ध्यान रखना चाहिए। वे मुझे अलग व्यवसाय खोल
कर देने के लिए भी तैयार हैं।
मिनी पर मानों घड़ों पानी पड़ गया था। वह तड़प कर सुशील से
लिपट गई थी। बस सुशील अब और कुछ मत कहना अपने परिवार में ही
हमारी खुशियों के रंग बिखरे हैं।
इसके बाद से ही मानो मिनी का जीवन बदल गया था। वर्षो गुजर गये
लेकिन हर वर्ष अपने दोनों बच्चों व परिवार के साथ मिनी होलिका
दहन में वर्ष भर की अपनी कमियों गलतियाँ को कागज पर लिखकर उनका
दहन करती है और अपने सिर का सारा बोझ मानो इसी तरह झटक देती है
और दूसरे दिन दुगने जोश के साथ अपने परिजनों के साथ होली खेलती
है उसका ये क्रम कभी नहीं टूटा। सुधीर भैया ने होली के त्यौहार
के साथ जो आस्था जोड़ी थी उसने मिनी की जिंदगी में खुशियों के
रंग भर दिये थे। |