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समकालीन कहानियों में
इस माह
प्रस्तुत है-
भारत से
निर्देश निधि की
कहानी
इस नये बरस

इस बार नया साल मनाने के लिए बड़े
पापा, यानी मेरे ताऊ जी ने हम सबको गाँव बुलाया है। जाने वाले
वर्ष के अंतिम दिन शाम से पहले ही हम गाँव पहुँच गए हैं। पापा
और चाचा दोनो ही पढ़-लिख कर शहर चले आए थे। वे दोनो तो बड़े
पापा और दादा-दादी के पीछे भी पड़े थे शहर आकर बस जाने के लिए,
पर कितना अच्छा हुआ कि बड़े पापा और दादी-दादा ने अपना गाँव,
‘गिलाड़ी’ छोड़ना स्वीकार नहीं किया था। वरना आज इस धरती से
इतनी आत्मीयता से जुड़ने का सुयोग कैसे बनता भला।
वसुधैव कुटुम्बकम का राग कितना
भी क्यों ना अलाप लिया जाए परंतु अपनी स्थानीयता या अपनी
व्यक्तिगत चीजों से जो भावनात्मक जुड़ाव होता है वह पराई चीजों
से हो ही नहीं सकता। यही कारण है कि
...आगे-
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