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मैंने
कहा, “राम-राम अम्मा!”, “राम-राम बहिनी!” उन्होंने जवाब दिया।
ग्राहक आते रहते—कोई ‘राम-राम अम्मा’, तो कोई ‘नमस्ते अम्मा’,
तो कोई ‘कैसे हो अम्मा’ पूछता और वह अपने हिसाब से सबके
अभिवादन का जवाब देती।
रामचरण और उसकी अम्मा दोनों पार्क के बगल में सब्ज़ी का ठेला
लगाते और सब्ज़ियाँ बेचते। वहाँ लाइन से कई सब्ज़ीवाले
अपनी-अपनी ठेली लिए खड़े रहते, लेकिन रामचरण और उसकी अम्मा के
सौम्य एवं मर्यादित व्यवहार के कारण उनके ठेले पर ही सारी भीड़
उमड़ती।
लोग पार्क से भ्रमण, योग, व्यायाम करके निकलते तो ताज़ी
सब्ज़ियों पर नज़र पड़ ही जाती। दूसरी तरफ़ एक गाड़ीवाला अपनी
गाड़ी में रस निकालने की मशीन रखकर रस निकालता। किसी को लौकी
का रस पीना है, तो किसी को करेले का, तो किसी को गिलोय का। एक
तरफ़ नारियलवाला खड़ा रहता। कुछ लोग सुबह-सुबह नारियल पानी भी
पीते। उसके बगल में एक फलवाला अपनी ठेली लगाए रहता। अर्थात्
सारी चीज़ें वहीं पार्क के पास ही मिल जाती थीं।
मोटी, साँवली-सी अम्मा लाल-पीली, खूब सेंटदार साड़ी पहनती। भरी
माँग में सिंदूर और माथे पर बड़ी-सी लाल बिंदी। भरे-भरे हाथों
में काँच की हरी-पीली चूड़ियाँ। फटे, खुरदरे पैरों में महावर
लगाए रहती। अम्मा बहुत मेहनत करती। सुना था, दो बजे रात को
उठकर खाना पका लेती। फिर तीन बजे रात को ही बेटे के साथ सब्ज़ी
मंडी पहुँच जाती। वहाँ से ताज़ी सब्ज़ियाँ लदवाकर यहाँ पार्क
के पास लाकर बेचती।
सर्दी, गरमी, बरसात—हर मौसम में
अम्मा का काम अनवरत चलता रहा। मौसम का उन पर कोई असर नहीं
होता। पता नहीं क्यों, मुझे अम्मा पर बहुत प्यार उमड़ता। उनके
मोटे, फूले हुए, फटे हुए पैर देखकर हमेशा ख़याल आता—काश,
इन्हें गरम पानी से धोकर ढेर सारा क्रीम लगा पाती।
ठेले पर कितनी ही भीड़ हो, रामचरण फटाफट सब्ज़ियाँ तौलता रहता।
छुट्टे पैसे देने का काम अम्मा का रहता। पीले कपड़े के थैले
में अम्मा ढेर सारा छुट्टा रखती। रामचरण कहता रहता, “अम्मा,
इन्हें सौ रुपये लौटा, इन्हें पचास रुपये लौटा।” अम्मा लोगों
को पैसे के साथ-साथ हरी मिर्च और धनिया पत्ती भी उनके थैले में
डालती रहती। दोनों माँ-बेटे का मोहक व्यक्तित्व ही ग्राहक को
खींच लाता।
बुज़ुर्गों पर विशेष स्नेह रखने के कारण अम्मा का भी हमारे ऊपर
विशेष स्नेह रहता। कभी अकेले सब्ज़ी ख़रीदने जाती तो पूछ
बैठती, “आज भइया नहीं आए, बहिनी? ऑफ़िस चले गए क्या?” या फिर
कभी टहलते हुए जाती तो, “आज गाड़ी नहीं लाए? फिर दो-दो झोला
उठाकर पैदल जाओगी, बहिनी?” कुशल-क्षेम पूछने के साथ-साथ इसी
तरह की बातें होतीं। कोरोना काल शुरू होने के कारण मेरा कई
महीनों तक उधर जाना नहीं हुआ। रामचरण फ़ोन भी नहीं रखता था,
इसलिए उससे सब्ज़ी मँगवाना संभव नहीं था। अतः हम लोग कहीं और
से सब्ज़ी मँगवाने लगे, लेकिन अम्मा का ख़याल हमेशा मन के भीतर
छाया रहता।
इधर क़रीब दस महीने बाद मेरा उधर जाना हुआ। अम्मा पर नज़र
पड़ते ही जी धक से रह गया। अम्मा की सूनी माँग, बिंदीविहीन
चेहरा एवं सूनी कलाइयाँ देखकर आँखों में आँसू आ गए। रामचरण से
पता चला—बाबूजी क़रीब सोलह साल से लकवाग्रस्त थे। बिस्तर पर ही
रहते थे। अम्मा घर के काम-काज के साथ उनकी सेवा-टहल भी करती
थीं। कोरोना काल में चल बसे।
अब अम्मा न हँसती थीं, न मुसकराती थीं। किसी के अभिवादन का भी
जवाब नहीं देती थीं। छुट्टा माँगने पर गालियों की बौछार कर
देतीं—“चल हट, नहीं है छुट्टा।” कोई ग्राहक हरी मिर्च, धनिया
पत्ती माँगता तो कहतीं, “बाप का माल समझ रखा है क्या, फ़ोकट
में नहीं मिलेगा।” पैसे देकर माँगने पर भी उनका बड़बड़ाना चालू
रहता।
रामचरण बेचारा शर्म से पानी-पानी हो जाता। डपटता रहता, “अम्मा,
मैडमजी लोगों से ऐसे बात करते हैं क्या?” लेकिन अम्मा कहाँ
सुनने वाली थीं! उनका गाली देना अनवरत चलता।
दबी ज़ुबान से सब बुदबुदाते—“यह तो बिल्कुल पागल हो गई है।
रामचरण, इन्हें किसी डॉक्टर को दिखाओ।” जितने लोग, उतनी
सलाहें।
एक दिन हम देर से गए। ठेले पर भीड़ नहीं थी। मैंने रामचरण से
पूछा, “बाबूजी की मौत का सदमा लग गया इन्हें?” रामचरण ने उदास
भाव से जवाब दिया, “बाबूजी की मौत से ज़्यादा सास-बहू के कलह
से अम्मा टूट गई हैं, मैडमजी। जब तक अम्मा का शरीर चला, बाबूजी
की देखभाल के साथ-साथ घर के सारे काम-काज, मेरे बच्चों को
पालना, मेरे साथ सब्ज़ी बेचना—अम्मा ने सब निबटाया। लेकिन अब
इनका शरीर नहीं चलता। घर के काम-काज नहीं कर पातीं तो मेरी
घरवाली बहुत लड़ाई करती है। बिना काम किए एक रोटी भी इन्हें
देने को तैयार नहीं होती। अभी तो दो महीने से, मैडमजी, मैं नमक
डालकर एक मोटी-सी रोटी बना देता हूँ। अम्मा वही खाकर पानी पी
लेती हैं।”
रामचरण के मुँह से यह सब सुनकर मेरी आँखें भर आईं। सब्ज़ी का
व्यापार करने वाली अम्मा, दुनिया भर के ग्राहकों को ताज़ी
सब्ज़ी खिलाने वाली अम्मा के हिस्से में सब्ज़ी का एक कतरा भी
नहीं। मन बेहद ख़राब हो गया। उस एक पल के लिए मन में अम्मा के
लिए ढेर सारी संवेदनाएँ उपजीं। पूछ बैठी, “अम्मा, आपको खाने
में क्या पसंद है?” अम्मा टुकुर-टुकुर मेरा मुँह देखने लगीं।
राम से पूछा तो कहने लगा, “ये तो सब कुछ खाती हैं, मैडमजी।
पसंद का तो मुझे भी आज तक पता नहीं चला।”
दूसरे दिन मैंने रोटी-सब्ज़ी बनाई और एक डिब्बे में रखकर अम्मा
के पास पहुँच गई।
“लो
अम्मा, आपका कलेवा लाई हूँ, खा लो।” खाना देखकर अम्मा की आँखों
में जो चमक आई, उसे मैं आज तक नहीं भूल पाई। मैंने फिर कहा,
“गरम-गरम खा लो, अम्मा।”
एक कौर खाते ही अम्मा की आँखों से धारा-प्रवाह आँसू बहने लगे।
रुँधे गले से बोलीं, “बहुत स्वाद बना है, बहिनी। जब से होश
सँभाला है, गाली के साथ ही खाना मिला है। पहले माँ गालियाँ
देती थी, फिर सास। अब पोतोह देती है। जुग-जुग जिओ, बहिनी।”
मैं हतप्रभ, अवाक्—गाली देने वाली ज़ुबान से मेरे लिए आशीर्वाद
निकल रहे थे। मुझे लगा, प्यार की भाषा हर कोई समझता है—पगली
अम्मा भी। |