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रामकथा का एक अत्यंत
मार्मिक, किंतु अपेक्षाकृत कम चर्चित प्रसंग है—राम और काल
का संवाद। यह कथा मुख्यतः भागवत पुराण तथा आनंद रामायण में
वर्णित मिलती है और उत्तरकांड की परंपराओं में भी इसका
संकेत आता है।
लंका-विजय, राज्याभिषेक और दीर्घकालीन धर्म-राज्य की
स्थापना के पश्चात अयोध्या में सब कुछ संतुलित और शांत था।
श्रीराम का राज्य आदर्श बन चुका था—न रोग, न शोक, न
अन्याय। परंतु अवतार का उद्देश्य केवल रावण-वध या
राज्य-स्थापना तक सीमित नहीं था; वह समयबद्ध था। जब पृथ्वी
पर उनका कार्य पूर्ण हुआ, तब काल—स्वयं समय—एक तपस्वी के
रूप में अयोध्या पहुँचे।
उन्होंने राजसभा में प्रवेश कर श्रीराम से एकांत वार्ता की
इच्छा प्रकट की। श्रीराम ने संकेत समझ लिया। उन्होंने
लक्ष्मण को द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया और स्पष्ट
कहा—“जब तक यह वार्ता पूर्ण न हो, कोई भी भीतर न आए। यदि
कोई आए, तो उसे दंड मिलेगा।”
काल और राम का संवाद लौकिक नहीं, दार्शनिक था। काल ने
स्मरण कराया कि अवतार की अवधि पूर्ण हो चुकी है; अब
वैकुण्ठ-प्रयाण का समय समीप है। श्रीराम, जो स्वयं विष्णु
के अवतार थे, सब जानते हुए भी मानव-धर्म निभा रहे थे।
उन्होंने शांत मन से समय की आज्ञा स्वीकार की।
इसी बीच एक अनपेक्षित घटना घटी। द्वार पर महर्षि दुर्वासा
आ पहुँचे। उनका स्वभाव उग्र माना जाता है। उन्होंने तुरंत
श्रीराम से भेंट की इच्छा व्यक्त की। लक्ष्मण ने
विनम्रतापूर्वक प्रतीक्षा का निवेदन किया, परंतु दुर्वासा
ने क्रोध में आकर समस्त अयोध्या को शाप देने की चेतावनी दे
दी। यह धर्म-संकट की घड़ी थी—एक ओर श्रीराम की आज्ञा,
दूसरी ओर अयोध्या की रक्षा।
लक्ष्मण ने क्षणभर में निर्णय लिया। उन्होंने सोचा—“यदि
मेरे कारण अयोध्या नष्ट हो जाए, तो यह अनुचित होगा।” अतः
उन्होंने भीतर प्रवेश कर श्रीराम को दुर्वासा के आगमन की
सूचना दी। वार्ता पूर्ण हुई, ऋषि का सम्मान हुआ, और संकट
टल गया।
परंतु अब श्रीराम के सामने एक और धर्म-संकट था। उन्होंने
वचन दिया था कि वार्ता में व्यवधान डालने वाले को दंड
मिलेगा। मर्यादा पुरुषोत्तम के लिए वचन ही जीवन था।
राजधर्म और व्यक्तिगत स्नेह के बीच संतुलन कठिन था।
मंत्रियों और गुरुजनों से परामर्श हुआ। निष्कर्ष यह निकला
कि त्याग ही दंड है—और त्याग, प्राण-दंड के समान है।
लक्ष्मण ने परिस्थिति को समझ लिया। वे बिना किसी शिकायत के
सरयू तट पर गए। ध्यानस्थ होकर उन्होंने जल-समाधि ले ली।
कहते हैं कि वे अपने दिव्य स्वरूप—शेषनाग—में विलीन हो गए।
लक्ष्मण-वियोग के पश्चात श्रीराम ने भी राज्यभार
उत्तराधिकारी को सौंप दिया और सरयू तट की ओर प्रस्थान
किया। अयोध्या की प्रजा उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। अंततः
श्रीराम ने भी सरयू में प्रवेश कर अपने दिव्य स्वरूप में
विलीन होकर वैकुण्ठ गमन किया।
यह कथा केवल अवसान की कथा नहीं, बल्कि धर्म, वचनपालन और
समय की अनिवार्यता की गाथा है। यहाँ राम देवत्व से अधिक
मानव मर्यादा के प्रतीक बनकर उभरते हैं। वे जानते हैं कि
समय सर्वशक्तिमान है; स्वयं ईश्वरावतार भी उसकी मर्यादा का
अतिक्रमण नहीं करते।
और इस प्रकार, राम और काल का यह संवाद हमें स्मरण कराता
है—धर्म का पथ सरल नहीं होता, परंतु जो उसे निभा ले, वही
युगों-युगों तक आदर्श बन जाता है।
१ अप्रैल
२०२५ |