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फागुन
की मयारू बयार बह रही थी। गाँव की गलियों में टेसू के
फूलों की भीनी महक रची-बसी थी। बूढ़े बरगद के नीचे बैठे
काका रामपुकार अपनी धुंधली आँखों से टोले के लड़कों को
हुड़दंग मचाते देख रहे थे। पर उनके चेहरे पर उल्लास की कोई
लकीर न थी।
तभी माधव उनके पास आकर ठिठक गया। माधव गाँव का वह
संवेदनशील युवा था जिसके शब्दों में लोक-संस्कृति की सोंधी
गंध और विचारों में आधुनिकता का संबल था। उसने देखा कि चचा
की कोटर जैसी आँखों में कोई पुराना घाव फिर से हरा हो आया
है।
"काका कल तो फाग है, रंगों का मेला। फिर यह उदासी कैसी?"
माधव ने बड़ी कोमलता से उनके कंधे पर हाथ रखा। काका ने एक
लंबी आह भरी और थरथराती आवाज़ में बोले, "बेटा, ई देह के
रंग तो पानी की एक धार से छूट जाते हैं। पर जो मन पर द्वेष
और ईर्ष्या के गहरे दाग लग गए हैं, उन्हें कौन सी गुलाल धो
पाएगी? याद है वह बरस? जब ज़रा सी बात पर इस टोले ने उस
टोले से किनारा कर लिया था? तब से आज तक इस गाँव की होली
अधूरी है।"
माधव को अहसास हुआ कि गाँव के दो मोहल्लों के बीच बरसों
पुराना वह वैमनस्य आज भी त्यौहार की रौनक को निगल रहा है।
उसने संकल्प लिया कि इस बार होली केवल पर्व नहीं, परिवर्तन
होगी। अगले दिन जब सूरज की पहली किरण ने गाँव के मस्तक को
चूमा, माधव ने ढोलक की थाप छेड़ी। वह अकेला नहीं था, उसके
साथ गाँव के बच्चे और कुछ समझदार बुजुर्ग भी थे। वे
गाते-बजाते सीधा दूसरे टोले की उस चौपाल पर पहुँचे जहाँ
लोग अब भी मुँह फुलाए बैठे थे।
माधव ने आगे बढ़कर उस टोले के मुखिया के चरणों में अबीर
रखा और बड़े विनीत स्वर में कहा, "काका, फागुन को सुभाय तो
सबको समेट लेने का होता है। यदि धरती अपने रंग छाँटने लगे,
तो क्या यह हरियाली बचेगी? हमारे पुरखों ने प्यार बाँटना
सिखाया था, हम दीवारें चुनना सीख गए। आज यह रंग गवाह है कि
हम सब एक ही मिट्टी के पुतले हैं।"
मुखिया की आँखें भीग गईं। उन्होंने माधव को गले लगा लिया।
कुछ ही देर में सारा गाँव एक रंग में रंग गया। स्थानीय
बोली के गीत फिजाओं में गूँजने लगे "होली आई रे सखी, मन के
भेद मिटावन को।"
काका रामपुकार यह दृश्य देख रहे थे। उनकी आँखों के आँसू
अब मुस्कुराहट में बदल चुके थे। उन्हें लगा जैसे बरसों बाद
आज सचमुच उनके अंतर्मन की होली सार्थक हुई है। ईर्ष्या की
राख पर प्रेम के अबीर ने विजय पा ली थी।
१ मार्च २०२५ |