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"होली
आई रे..." की गूँज के बीच मोहल्ले की गलियाँ रंगों से
सराबोर थीं। लेकिन, शहर के उस पॉश इलाके के एक घर में
सन्नाटा था। मिस्टर खन्ना और उनकी पत्नी ने तय किया था कि
वे इस बार होली नहीं खेलेंगे। बरसों बाद वे विदेश से लौटे
हैं। जब वे भारत में थे, सामुदायिक होली का उनका अनुभव
अच्छा नहीं रहा था। वे अपनी माँ के साथ गुलाल और गुझियों
वाली शांतिपूर्ण होली मनाना चाहते थे।
तभी बाहर से शोर सुनाई दिया। उनकी ७० साल की माँ, जो पिछले
कई दिनों से बीमार थीं, अचानक उठकर खिड़की के पास जा खड़ी
हुईं। बाहर मोहल्ले के बच्चे एक-दूसरे को रंग लगा रहे थे।
माँ की आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
मिस्टर खन्ना ने कहा, "माँ, आप अंदर चलिए, बाहर बहुत शोर
है।"
माँ मुस्कुराईं और बोलीं, "बेटा, यह शोर नहीं है, यह तो
खुशियों की खनक है। हमारे ज़माने में तो फाग का रंग तब तक
चोखा नहीं माना जाता था, जब तक पूरा गाँव एक रंग में न रँग
जाए। रंग केवल चेहरे पर नहीं, रूह पर चढ़ना चाहिए।"
इतने में पड़ोस के 'शरारती' बच्चों की टोली दरवाज़े पर आ
धमकी। खन्ना जी डाँटने ही वाले थे कि माँ ने स्वयं दरवाज़ा
खोल दिया। एक छोटे बच्चे ने झिझकते हुए माँ के पैरों पर
गुलाल रखा। माँ ने उसी गुलाल को उठाकर बच्चे के गालों पर
मल दिया और खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
उस एक पल में मिस्टर खन्ना को समझ आ गया कि सावधानी के
चक्कर में वे ज़िंदगी जीना भूल रहे थे। उन्होंने भी गुलाल
उठाया और अपनी पत्नी के चेहरे पर मलते हुए कहा, "सच है
माँ, फाग का रंग तभी चोखा होता है जब दिल के दरवाज़े खुले
हों।"
गलियों का शोर अब घर के अंदर संगीत बन चुका था। सादगी और
शरारत के इस मिलन ने साबित कर दिया कि त्योहार कैलेंडर की
तारीख नहीं, बल्कि रिश्तों का उत्सव है।
१ मार्च
२०२६ |