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वह
फुलका बेलती जा रही थीं और टेबल पर सबकी थालियों में
परोसती जा रही थी। पसीना बह रहा था, जिसे वह लगातार पल्लू
से पोंछती जा रही थी।
फिर तवे पर रोटी पलटती और नयी रोटी बेलती, तीसरे पर घी
चुपड़ती और परसती जातीं। कुछ आवाज़ें लगातार उसका पीछा कर
रही थीं- घी कम है... थोड़ा और सेंको... मुझे मोटी रोटी
दो...।
अपनी सुध ही नहीं थी विभा को। सब सलटा कर बैठीं खाने, ठंडा
फुलका सब्जी लेकर, कि बिजली गुल। दो घंटे तक ग़ायब। तबतक
कपड़े मशीन से निकाल कर सुखाए और झाड़ू पोछा करने लगीं।
फ़ोन आया रात का खाना चार जन का बनेगा। बंबई से लोग आऐगे।
ढँग की सब्जियाँ बनाना। पराठे लच्छेदार।
वे फिर रसोई में लग गयीं। टेबल सज गई। पसीने से तर बतर
विभा।
किसी से कुछ नहीं कहतीं। कोई सुनने वाला भी तो नहीं था।
स्कूल से बच्चे आ गए। नाश्ता और जूस। दिया। वे खेलने चले
गऐ।
बिजली आ गई। विभा ने खुद को तरतीब दी। अतिथियों को जूस
दिया गर्म पकौड़े के साथ। सलाद दिया। जितना हो सका बच्चे
मदद करते रहे।
खाने पर चर्चा रही व्यवसाय की। मेहमानों ने कहा बड़ा
लज़ीज़ खाना बनता है आपके यहाँ। कौन बनाता है?
जवाब था मेरी पत्नी।
वाह। क्या बात है? पराठे इतने लच्छेदार। सब्जियाँ कितनी
स्वादिष्ट है। ये मिठाई? ये तो बाज़ार की होगी।
नहीं घर की ही है।
मुस्कुरा कर सब खाने में व्यस्त हो गए। आवाज़ लगाई भाभीजी
आप तो कमाल करती है। अतिथियों का आग्रह हमसे मिलिये तो।
विभा आई। नमस्कार किया। इंग्लिश मे बातचीत हुई। वो
इकोनॉमिक्स मे एम ए थी। व्यापार की बहुत जानकारी थी उसे।
मेहमान प्रभावित हुए। लेकिन जो हरदम साथ रहता है उसको क़दर
ही नहीं। बच्चे पढ़ने में अच्छे खेलने में अच्छे। बहुत ही
संस्कारी भी। पर बात बात पर हीनभावना से ग्रसित पति की
अवहेलना सहन करती अब खुद को संयमित कर चुकी थी विभा।
घर को सँभालती। अपना वर्क फ्रौम होम करती। अपना बैंक
बैलेन्स था। पर कोई नहीं जानता था उस हुनरदार औरत को।
सबकुछ समय पर होता था। लेकिन गर्मी ने इस बार विधा को रुला
दिया। तीन बार नहाती। पर पसीना पोंछती थक जाती। एक दिन
चक्कर खा कर गिर पड़ी। बच्चों ने एम्बुलेंस बुलाई पापा को
खबर करी। पसीने से भरा साड़ी का आँचल कह रहा था गर्मी बहुत
है। और विभा ने चुपचाप संसार से विदा ले ली।
अब आप उस घर की दिशा और दशा का अंदाज भर लगाएँ कि जहाँ एक
गृहणी ने मौसम को कर्मठता ने झेल लिया पर उफ़ तक नहीं की।
विभा कह ही नहीं पाई कि गर्मी बहुत है।
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