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कहानियाँ

समकालीन हिंदी कहानियों के स्तंभ में इस सप्ताह प्रस्तुत है
जापान से हरजेन्द्र चौधरी की कहानी- मायालोक


मैं अपने वर्क-रूम में जाने के लिए प्रोटीन रिसर्च इंस्टीट्यूट की लिफ़्ट में ही था कि मोबाइल टनटना उठा। जब से जापान आया हूँ, मन में अंदेशा रहता है या शायद नहीं रहता कि भारत से बुरी ख़बर कभी भी आ सकती है। स्क्रीन देखकर तसल्ली हुई कि कॊल प्रोफ़ेसर कियोशिमा की है। आदतन बोले गए शुरुआती 'मुशि-मुशि' के बाद उन्हें 'हैलो-हैलो' बोलने का ध्यान आया।

“आइ हैव फ़िक्स्द द वीक-एँद प्रोग्राम। कीप योरसेल्फ फ़्री ओन फ़्राइदे इवनिंग।" वह शायद जल्दी में थे, इसलिए उन्होंने मेरी अधसीखी-अधभूली जापानी को देखते हुए सीधे अंग्रेज़ी में बोलने से परहेज़ नहीं किया।
मेरे 'ओके सेंसेई। आरिगातो गोज़ाइमसु!' कहते ही फ़ोन कट गया।

मेरे भीतर कई दिनों से आशा और आशंका परस्पर लट्ठम-लट्ठा हो रही हैं। दिन भर तो जापानी वर्क-कल्चर के अनुसार, कभी लैब में तो कभी अपने कमरे में कंप्यूटर पर, काम में जुटा रहता हूँ। शाम तक थक जाता हूँ। और ऊपर से यहाँ का यह निचाट अकेलापन! नियंत्रित तापमान वाला मेरा छोटा-सा आरामदायक अपार्टमेंट या नरम बिस्तर भी मेरी बहुत ज़्यादा मदद नहीं कर पाता। थकावट के बावजूद नींद गहरी नहीं होती, उखड़ी-उखड़ी रहती है। अब तो थकान भी निद्रा की गारंटी नहीं रही। काम के दबाव और कैंसर-ग्रस्त माँ की चिंता के कारण नींद में काफ़ी ख़लल पड़ने लगा है। कभी-कभी अचानक मन होता है कि पंख लगाकर भारत की ओर उड़ जाऊँ ताकि माँ की सेवा-शुश्रूषा करके कुछ हद तक उऋण होने का प्रयास कर सकूँ। पिता जी की मृत्यु के बाद उन्हें अकेले हम तीन भाई-बहनों को पालने-पोसने में दशकों तक कितना संघर्ष करना पड़ा! और अब कैंसर के विरुद्ध युद्ध कर रही हैं।

मैं कैंसर और प्रोटीन की संबद्धता पर शोध कर रहा हूँ। विश्व भर के वैज्ञानिक मानते हैं कि बढ़ते बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास के लिए तो यह ज़रूरी है ही, सभी उम्र के लोगों के लिए भी प्रोटीन लेना अनिवार्य है। मांसपेशियों की मजबूती और प्रसार के लिए हमारे भोजन में इसकी उचित मात्रा होनी ही चाहिए। हार्मोन के निर्माण और संतुलन, कोशिकाओं की मरम्मत और नव-निर्माण तथा तंत्रिका-संचरण जैसी शारीरिक प्रक्रियाओं में भी प्रोटीन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। परंतु इस पर विवाद है कि रेडिएशन और कीमोथेरेपी करा रहे कैंसर-रोगियों को प्रोटीन-सप्लीमेंट अधिक मात्रा में दिया जाए या नियंत्रित मात्रा में। उन्हें दुर्बलता से बचाने के लिए दिया जाने वाला प्रोटीन उनके लिए दुधारी तलवार बन जाता है। स्वस्थ कोशिकाओं के साथ-साथ उससे कैंसर-कोशिकाएँ भी प्रसार पाने लगती हैं। देह की प्रतिरक्षा-प्रणाली संक्रमण पर हमला करने की बजाय आत्मघात करने लगती है। शरीर अपना ही शत्रु हो जाता है। कैंसर-रोगियों को इस स्थिति से बचाने के कारगर उपाय करने के लिए लंबे समय से रिसर्च चल रही है।

मुझे माँ की बहुत चिंता रहती है। भाई साहब और भाभी जी उधर माँ की देखभाल कर रहे हैं। ज़रूरत के वक़्त मेरी बहन और बहनोई का आना-जाना भी लगा रहता है। मैं अपनी शोधवृत्ति में से पैसे बचा-बचाकर भारत भेजता रहता हूँ। पर इतने भर से मुझे संतोष नहीं होता। मन करता है कि माँ के पास चला जाऊँ, दिन-रात उनकी परिचर्या करूँ। पर जापान छोड़कर जाने का मतलब है अपना करियर चौपट कर लेना। और फिर कौन कह सकता है कि भारत लौटते ही मुझे यूनिवर्सिटी की पक्की नौकरी मिल ही जाएगी? मैं बहुत अकेला और फंसा हुआ महसूस करता हूँ। प्रवास में बीत रहे जीवन का मानों एक ही आधार बचा है -- निरंतर काम में व्यस्त रहना। डेटा संग्रहित और विश्लेषित करते तथा लैब में प्रोफ़ेसर कियोशिमा के निर्देशन में तरह-तरह के 'एक्सपेरिमेंट' करते मैं कुछ समय के लिए अपनी निजी परेशानियाँ भूल जाता हूँ। बस यही लगता है कि कैंसर का पक्का उपचार निकल आए। प्रोफ़ेसर कियोशिमा का शिष्य होने के नाते मुझे भी ऐसा कुछ करना है कि भविष्य में माँ जैसे सब रोगियों की ज़िंदगी बच सके। कैंसर-रोग के कारगर उपचार में मेरी भी छोटी सी भूमिका ज़रूर होनी चाहिए।

मैं ईश्वर से प्रार्थना करता रहता हूँ कि माँ जल्दी स्वस्थ हो जाएँ। उनकी रिकवरी तथा मेरी नौकरी पक्की होने के बाद ही मैं उनकी इच्छा पूरी कर सकता हूँ। वह चाहती हैं कि जल्दी से जल्दी मेरी शादी हो जाए। पर अभी तो मुझे हर हाल में यहाँ की अपनी रिसर्च असाइनमेंट पूरी करनी है।

प्रोफ़ेसर कियोशिमा कैंसर-वैक्सीन बनाने के अपने प्रोजेक्ट में बहुत ही व्यस्त रहने के बावजूद मेरे निचाट अकेलेपन में प्रायः मेरे सहायक बनते हैं। वह आम जापानियों की तरह बहुत अलग-अलग और औपचारिक रहने वाले शख्स नहीं हैं। मेरी कोई निजी समस्या हो तो उसे भी हल करने में मेरा साथ देते हैं। कभी-कभी लंच के समय मुझे अपने कमरे में बुला लेते हैं और तरह-तरह के विषयों पर बातें करते हैं। मुझे जापान के बारे में बताते हैं और भारत के संबंध में अनेक सवाल पूछते हैं। वह इन दो एशियाई देशों के समाज और संस्कृति की तुलना करते हैं तो मेरी जानकारी बढ़ती है और समझ स्पष्ट होती है।

जब से मैंने कियोशिमा सेंसेई को अपनी माँ के कैंसर-ग्रस्त होने के बारे में बताया है, तब से वह मेरा अतिरिक्त ध्यान रखने लगे हैं। उनकी यह बात मेरे भीतर घर कर गई है कि जीवन में मानवीय संबंधों की वैसी ही भूमिका है, जैसी स्वास्थ्य के मामले में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्त्वों की है। भोजन की विविधता की तरह रिश्तों में भी विविधता बनाकर रखी जाए तो जीवन बेहतर और ऊर्जावान बनता है। यहाँ के स्थानीय भोजन की आदत डालना आपके स्वास्थ्य के लिए बेहतर ही नहीं, ज़रूरी भी है। शाकाहारी लोगों के लिए आपके यहाँ दालों और फलियों की वेरायटी प्रोटीन का स्रोत है। पर जापान में ले-देकर सोयाबीन से ही शाकाहार-प्रोटीन मिल सकता है। इसे सोया-मिल्क, तोहू, सोया-सॊस और मिठाइयों आदि के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हमारे लिए प्रोटीन का प्रमुख स्रोत समुद्री भोजन और माँस-मुर्गा-मछली आदि हैं। आप भी ये चीज़ें खाना शुरू कर दें तो आपकी सेहत के लिए बेहतर होगा। अस्थायी प्रवासियों को अपने ऊपर यहाँ की संस्कृति को अपनाने का दबाव नहीं रखना चाहिए, पर सुविधा और व्यवहार के स्तर पर उसके मुताबिक ढलना फ़ायदेमंद रहता है। अपने से अलग तरह के समाज के संपर्क में आने से व्यक्ति अधिक उदार और अनुभव-संपन्न बनता है। अपने जपानी गुरू की सलाह पर मैंने सब-कुछ खाना शुरू कर दिया है।

कई दिन पहले उन्होंने गीशा और 'ममा-सां' की परंपरा के बारे में बताया था। 'ममा-सां' का शाब्दिक अर्थ तो 'माता जी' है, पर असल में वे ऐसे रेस्त्रां की मालकिन होती हैं, जहाँ ग्राहक उनसे खुलकर अपने मन की बात करते हैं, अपनी कुंठा और भड़ास निकालते हैं। 'ममा-सां' के यहाँ शराब व भोजन परोसने वाली लड़कियाँ भी ग्राहकों से इस अंदाज़ में बातें करती हैं कि जैसे वे उनके बहुत ही क़रीबी हों। वे विभिन्न मुख-मुद्राएँ बनाने में माहिर होती हैं। वे अच्छे से जानती हैं कि कब चिंतित दिखना है, कब मुस्कराना है, कब संवेदना प्रकट करनी है। इससे थके हुए लोगों को भावानात्मक सहारा मिलता है। अकेलेपन से अस्थायी मुक्ति मिल जाती है। तोक्यो के 'गिंज़ा' क्षेत्र में बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, लेखक, व्यापारी, उद्योगपति और राजनेता भी आते-जाते पाए जा सकते हैं। ममा-सां मानव-मन को समझती हैं तथा वार्ता-पटु होने के साथ-साथ बौद्धिक-शैक्षिक रूप से बहुत संपन्न होती हैं। बहुत सारी तो कई-कई भाषाएँ जानती हैं। कुछों ने अपने अनुभवों के आधार पर 'वाक-पटुता' और 'पुरुष-मनोविज्ञान' संबंधी पुस्तकें भी लिखी हैं। वे देह का व्यापार नहीं करती, केवल भावना-स्पर्शी बातें कर-करके ही बहुत पैसा कमा लेती हैं। एक 'ममा-सां' की बनाई यह कहावत मशहूर है कि कुत्ते और पैसे इंसान को कभी धोखा नहीं देते।

एक दिन कियोशिमा सेंसेई ने मुझसे अब तक शादी न करने का कारण पूछा था, या शायद खुद मैंने ही बेहतर करियर के चक्कर में शादी न करने और अपनी उम्र बढ़ते जाने की बात की थी। तब उन्होंने कहा था कि जापान की नई पीढ़ी में अपनी मर्ज़ी से अविवाहित रहने वाले लोगों की संख्या काफ़ी है। अकेलेपन से बचने के लिए अनेक युवा और अधेड़ 'ममा-सां' की शरण में जाते हैं। कोई दंपती समय की कमी या अन्य कारणों से अपनी भावनाओं को दबाकर रखने को विवश है, या जहाँ परस्पर तनाव या तलाक़ जैसी स्थिति होती है, वहाँ पति ऐसे किसी 'मुक्ति-स्थल' की शरण में जाते हैं।

मेरे भारतीय मन को यह बात अजीब लगती है कि अच्छी नौकरी मिलने के बाद भी बहुत से जापानी युवा शादी नहीं करते और जो शादी कर लेते हैं, उनमें से अनेक लोग बच्चे पैदा करके अपनी जिम्मेदारियों में इज़ाफ़ा करने के पक्ष में नहीं हैं। मनुष्य होकर भी ऐसे युवा शुद्ध वर्तमान-जीवी बनते जा रहे हैं। पर अपनी स्मृतियों और सपनों के संग जीने वाला इंसान किसी पशु या कीट-कृमि की तरह केवल वर्तमान में जीने वाला प्राणी नहीं है। वह भूख और अन्य सहजात वृत्तियों की संतुष्टि मात्र तक सीमित नहीं रह सकता। अतीत और भविष्य आजीवन उसके अस्तित्व के साथ चिपके रहते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर जुलाई-अगस्त में जापान की हर पीढ़ी 'ओदोन’ पर्व के अवसर पर अपने पितरों के स्वागत और श्राद्ध के लिए अपने जन्म-स्थानों का रुख क्यों करती है? लोग अपने पैतृक घरों के बाहर लालटेन क्यों जलाकर रखते हैं? इसीलिए न कि स्वर्ग से उतरकर आने वाले पितरों को अपने घर पहुँचने में कोई परेशानी न हो तथा उन्हें अंधेरे में ठोकर न लग जाए? पितरों का मार्ग प्रशस्त करने की यह बौद्ध-परंपरा हर पीढ़ी के लोगों को अपनी वंशावली और कई जन्म पीछे छूट चुके सुदूर अतीत से जोड़ती है। पर इनका भावी क्या है? भविष्य की किसी परिकल्पना के बिना जीवन सुखद और आशावान कैसे हो सकता है?

भारत में तो हम मानते हैं कि पितरों के ऋण से मुक्त होने के लिए संतानोत्पत्ति अनिवार्य है। तो भी मल्टीनेशनल में काम करने वाले सुशिक्षित, महत्त्वाकांक्षी युवक व युवतियाँ बहुत विलंब से शादी करती हैं और अब तो भारत में ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जो विवाह-बंधन में बंधना ही नहीं चाहते। परिवार-हीन जीवन बिताने की यह मानसिकता शायद आर्थिक प्रगति का बाइ-प्रोडक्ट है इसलिए भारत को भी एक दिन जापान जैसी बदतर हालत का सामना करना पड़ सकता है। जनसंख्या को 'एस्सेट' मानने वालों के लिए यह बहुत बड़ा झटका होगा।

'ममा-सां' के प्रसंग में प्रोफ़ेसर कियोशिमा का निष्कर्ष था कि जापान की वर्क-कल्चर को सस्टेन करने में इनकी विशेष भूमिका है। हो सकता है कि उनके कारण जापान में आत्महत्याओं की दर भी कम या स्थिर हुई हो। जापान की जनसंख्या घटने के पीछे संभवतः 'ममा-सां' जैसी व्यवस्था का भी हाथ है, क्योंकि बहुत सारे युवा शादी नहीं करते। उनमें से काम से थके अनेक लोग 'ममा-सां' से भावनात्मक संबल और मानसिक संतोष पाकर खोई हुई ऊर्जा पुनः जुटा लेते हैं। बहुत-सी जापानी कंपनियाँ तो अपने खर्चे पर कर्मचारियों को अवकाश देकर थाइलैंड जैसे देशों में भेजती हैं।

उनकी इन बातों ने मेरी जिज्ञासा को भड़का दिया था। मैंने उनसे निवेदन किया था कि यदि संभव हो तो अंग्रेज़ी जानने वाली किसी 'ममा-सां' से बातें करना चाहूँगा। फिर व्यस्तता और चिंताओं के दबाव के कारण यह बात मेरे दिमाग से उतर गई। पर कियोशिमा सेंसेई को एक महीना बीतने के बाद भी सब याद रहा। उन्होंने कहा कि संभवतः आने वाले शुक्रवार की शाम को 'ममा-सां' के ठिकाने पर चल सकेंगे। और अंततः उन्होंने कार्यक्रम तय करके मुझे सूचना दे दी।

(२)

किसी भी शहर की 'नाइट लाइफ़' से रूबरू होने का यह पहला अवसर था। मैंने कभी कल्पना तक नहीं की थी कि चुप-चुप रहने वाले जापानी लोग इस तरह भीड़ भरी गलियों में घूमते हुए या रेस्त्रांओं में खाते-पीते हुए इतना शोर-शराबा कर सकते हैं। अनेक तरह की शक्ल-सूरत और रंग देखकर लगा कि मैं ओसाका में नहीं, बल्कि किसी और ही जगह आ गया हूँ। प्रोफ़ेसर कियोशिमा फ़ोन पर बात करने के लिए सड़क पर ठिठक गए थे। हम रंगीन रोशनियों से जगमग एक जीने की सीध में खड़े थे कि अफ़्रीकी मूल के एक व्यक्ति ने हमें ऊपर चलकर 'शो' देखने का आग्रह किया। उसकी अंग्रेज़ी ज़रा हल्की और आवाज़ बहुत भारी थी। उसके आग्रह में बहुत कशिश थी। कह रहा था कि पहले ऊपर चलकर देख लो, डांस और नर्तकी पसंद न आए तो पैसे दिए बिना वापस आ जाना।

हम चार मिनट के लिए ऊपर गए। उसके पीछे-पीछे जगमग सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद सामने का एक दरवाज़ा खुला तो अकस्मात दृश्य धुंधला गया। मंद रोशनी और शोर के बीच शराब और परफ़्यूम आदि की गंध से पूरा परिवेश गंधा रहा था। कुछ पल तक तो मैं समझ ही नहीं पाया कि यह क्या है। उसके बाद उस हाल-नुमा कमरे के बीच रंग बदलती रोशनियाँ झप-झप, झप-झप करने लगीं। बीचों-बीच बने एक मंच की झलक उभरी, जिसके मध्य खड़े एक खंभे के चारों ओर किसी पश्चिमी देश की एक अर्धनग्न बाला या महिला मटकती हुई चक्कर लगा रही थी। हमारे देखते-देखते उसने अपनी ब्रा उतारकर मंच पर फेंक दी। शोर मचाते नौजवान और कुंठाग्रस्त अधेड़ मंच की ओर येन फेंक रहे थे। अफ़्रीकी मूल के उस व्यक्ति की निगाह हम पर थी। तीन-चार मिनट से अधिक वहाँ रुकने पर हमें 'शो' की टिकट के पैसे अदा करने थे, पर हम 'थैंक्यू' बोलकर जल्दी नीचे उतर आए।

मैंने प्रोफ़ेसर कियोशिमा से पूछा कि क्या यह सब जापानी संस्कृति का हिस्सा है? नकारात्मक उत्तर देकर उन्होंने कहा कि दुनिया भर के 'नाइट लाइफ़ उद्योग' के केंद्र में औरत को दर्शन-प्रदर्शन या मनोरंजन और भोग की वस्तु मानने की मानसिकता सक्रिय है। स्थानीय लोगों को भिन्न रूप-रंग वाली विदेशी औरतें ज़्यादा लुभावनी लगती हैं। यहाँ नाचने वाली जापानी लड़कियाँ भी यूरोपीय और अमेरिकनों जैसी दिखने के हिसाब से अपना मेक-अप करती हैं। आंखों को 'बड़ी' दिखाने के लिए काजल डालती हैं तथा अपने बाल रंग लेती हैं।
"क्या गीशा भी ऐसे ही नाच दिखाती हैं?”

“बिल्कुल नहीं, कभी नहीं। गीशा का इतिहास सदियों पुराना है। उनका बौद्धिक स्तर ऊँचा और उनकी कलात्मकता देखने लायक होती है। किमोनो-धारिणी गीशा की केश-सज्जा और मेक-अप से लेकर उनकी चलने और बोलने की अदा तक बहुत आकर्षक होती है। उनके रंग-रूप और हाव-भाव से रानियों और राजकुमारियों जैसा आभिजात्य टपकता है। जापानी परंपरा में उनकी उपस्थिति सामान्य महिलाओं की ईर्ष्या और पुरुषों के प्रलोभन का विषय होने के साथ-साथ सबकी प्रशंसा का भी विषय है।"
“और 'ममा-सां' की परंपरा?” मैंने पूछा।

“असल में 'ममा-सां' तो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों द्वारा प्रयुक्त शब्द-युग्म है, जो पूर्वी एशिया के अन्य देशों में भी इस्तेमाल होने लगा। जापान में इसे अपमानजनक माना जाता है। आपसी बातचीत में हम बोल लेते हैं, पर आप ध्यान रखें, सार्वजनिक रूप से इसका इस्तेमाल करना ठीक नहीं है। थाइलैंड और फिलीपीन जैसे देशों में कोठे की मालकिन और मयखाने व 'मालिश-घर' की मैनेजर को भी 'ममा-सां' कह दिया जाता है। क्या एशिया और क्या यूरोप-अमेरिका, आज भी हर जगह औरत का स्थान निम्नतर और कमतर ही है। हर लडाई का क़हर औरतों पर ही टूटता है। इस मामले में द्वितीय विश्वयुद्ध कोई अपवाद नहीं है। पुराने समय में तो हर देश के राजे-महाराजे जब युद्ध-भूमि में जाते थे तो बहुत बार उनके हरम का एक हिस्सा भी उनके साथ जाता था। किसी राजा की सेना विजयी हो या पराजित, औरतों का तो हर हाल में शोषण होता था। युद्ध में किसी स्त्री की मौत होना इतना बुरा नहीं है, जितना उसका दुश्मन के हत्थे चढ़ जाना। मित्र-सैनिकों का नज़ला भी औरतों पर ही गिरता है। अब वर्तमान में भी दुनिया में जहाँ-जहाँ लड़ाई चल रही है, वहाँ फंसी हुई और विस्थापित औरतें और बच्चे मौत से भी बदतर हालात के शिकार हो रहे हैं।"

हमने एक टैक्सी ली। सात-आठ मिनट बाद 'अपनी ममा-सां' के ठिकाने के लगभग सामने पहुँच गए। प्रोफ़ेसर कियोशिमा ने इमारत के द्वार के पास से फ़ोन किया तो द्वार खुल गया। हम लिफ़्ट में सवार हुए। पांचवें माले पर जैसे ही बाहर निकले, हमारे स्वागत के लिए 'मम्मा-सां' एकदम सामने खड़ी थी। जापानी लहजे में 'आपका स्वागत है' कहते हुए दो-तीन बार अभिवादन में झुकी और फिर अचानक मुझसे लिपट गई। मैं बुरी तरह हड़बड़ा गया क्योंकि मैंने ऐसे 'स्वागत' की कल्पना नहीं की थी। उसकी बाहें कुछ पल तक कसी रही तो मेरी दोनों हथेलिया ढीले-ढाले ढंग से उसकी कमर और कंधों के बीच जाकर लौट आईं। उसके बाद वह 'इराशाइमस' बोलते हुए प्रोफ़ेसर कियोशिमा के गले मिली। उन्होंने झुककर जापानी ढंग से आभार व्यक्त किया।

उसने मुड़कर शीशे का दरवाज़ा खोलकर फिर से ‘आपका स्वागत है‘ और 'इराशाइमस' बोलते हुए झुककर, दाएँ हाथ से भीतरी द्वार की ओर संकेत करके हमसे भीतर प्रवेश करने का आग्रह किया। वहाँ शोर-शराबा बिल्कुल नहीं था। लंबी-चौड़ी गोलमेज़ के चारों ओर कुर्सियाँ लगी हुई थीं, जिनमें से कुछ कुर्सियाँ खाली थीं। बाकियों पर मेहमान विराजमान थे। सब के सामने भरे-अधभरे गिलास थे। मेज़ की चौड़ाई काफ़ी थी। उसके भीतरी घुमाव पर लगी खुले डिब्बे जैसी लंबी पट्टी पर बोतलें सजी हुई थीं। अधभरी छूटी हुई बोतलों पर उनके ग्राहकों के नाम लिखे हुए थे कि अगली बार आएँ तब अपनी बोतल और अपनी पसंद को यथावत पा सकें। पसंदीदा शराब परोसने और भावपूर्ण बातचीत के लिए अनेक युवतियाँ तत्पर और व्यस्त थीं। सबकी आवाज़ें बहुत धीमी थीं। निजता बनाए रखने के लिए कुर्सियों के आगे मेज़ पर जगह-जगह दो-दो फुट ऊँचे अर्ध-पारदर्शी पार्टीशन लगे हुए थे। एक युगल की निर्बाध बातचीत दूसरे युगल के लिए बाधा नहीं बन रही थी।

मेरे बैठने के लिए मालकिन ने कुर्सी गोलमेज़ से थोड़ी-सी पीछे सरकाईं। फिर वह मेज़ के भीतरी हिस्से में जाकर मेरे सामने बैठ गई। उसके 'स्वागत' के तौर-तरीक़े से मैं अब तक अभिभूत था। संकोच त्यागकर मैंने पूछा, “आप हिंदी अच्छी तरह बोल लेती है?" अंग्रेज़ी में 'नो' बोलकर वह जापानी में शुरू हो गई' “हिंदीगो गा वाकारिमासेन। एइगो ओके।" यानी हिंदी भाषा नहीं जानती, पर अंग्रेज़ी भाषा ठीक है।

मैंने उसे बता दिया कि जापानी में हाथ तंग होने के कारण मेरे लिए अंग्रेज़ी में बातचीत करना अधिक सुविधाजनक है। उसने मेरी उम्र पूछी तो मैंने अपनी बताकर उसकी उम्र पूछ ली। 'फ़िफ़्ती तू' (बावन साल) सुनकर मैं सकते में आ गया। अब तक वह मुझे अपनी हमउम्र लग रही थी। उसने मेरा मैरिटल स्टेटस पूछा। मैंने उसका पूछा। उसका उत्तर मेरे लिए फिर से एक झटका था। पीछे की ओर कम्प्यूटर पर हिसाब-किताब करने में व्यस्त नौजवान लड़के की ओर संकेत करते हुए उसने बताया कि वह उसका बेटा है। उसकी उम्र छब्बीस साल है। "क्योतो विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने के बाद से वह मेरे यहाँ 'जॊब' कर रहा है। पति बहुत साल पहले अलग हो गए थे।" मैं तो यही सोचता था कि उम्र छिपाना संभव नहीं है, पर प्रमाण-रूप में यह मेरे सामने मौजूद है। इसे मेक-अप का कमाल कहें या अच्छी खुराक, बेहतर पर्यावरण और जीवन-शैली की निशानी? कहीं ऐसा तो नहीं कि इसने हाल ही में प्लास्टिक सर्जरी कराई हो?

‘मेरे यहाँ जौब कर रहा है' पर मेरा विशेष ध्यान गया। मैंने खुलकर सवाल किया तो उसने बताया कि बेटा अलग रहता है। स्वतंत्र है। आत्म-निर्भर है। उसकी अपनी ज़िंदगी है, मेरी अपनी। उसकी बात सुनकर मुझे अपने और अपनी माँ के बीच की भाव-पूर्ण आत्मीयता याद आने लगी। हम तो ऐसी उदासीनता और अलगाव की कल्पना भी नहीं कर सकते। पल-पल एक-दूसरे की कुशल-क्षेम जानना चाहते हैं। आजकल मैं अपने परिवार और माँ से दूर होने के कारण परेशान रहता हूँ। नींद भी ठीक से नहीं आती। मैं अपने में खोया था और वह बोले जा रही थी, "मेरी एक बेटी भी है जो तोक्यो में रहती है। उसने पिछले या उससे पिछले महीने शादी कर ली है, पर मेरा बेटा अभी कुंआरा है।

पीने की आदत न होने के कारण शराब के एक पैग के बाद मैंने केवल जूस पीना बेहतर समझा। मुझे अपनी माँ की याद आने लगी। मेरी माँ तो बावन साल की उम्र में कुछ-कुछ बूढ़ी दिखने लगी थी और यह 'ममा-सां'? यह तो प्रेमिका-भाव से मुझसे बातें और सवाल कर रही है -- अब तक शादी क्यों नहीं की? करने का इरादा है या नहीं? करनी है तो कब तक करोगे? किसी जापानी लड़की से करोगे या भारतीय से? कोई गर्लफ़्रैंड है या नहीं? जीवन में क्या-क्या करना चाहते हो? भविष्य को लेकर क्या सोचते हो? फिर मेरी रिसर्च के विषय में सवाल किए। कहने लगी कि यह आप यह बहुत महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं। मे गॊद ब्लैस यू। भोजन के समय वह मेरी पसंद-नपसंद पूछकर जापानी व्यंजनों पर बात करती रही, फिर उल्लसित-चकित होती भारतीय भोजन के बारे में बताने और पूछने लगी। उसे 'समोसा' और 'इंदोकरी' पसंद है।

उसका पति कई साल पहले उससे अलग हो गया था और बेटा उसके रेस्त्रां में एक कर्मचारी के रूप में काम कर रहा है। माँ-बेटे का संबंध और जीवन कैसा है? ऊपर से तो बहुत सुखी-संपन्न दिखाई देते हैं। इस महिला के चेहरे पर किसी तरह का तनाव नहीं है। दूसरी युवतियाँ भी खिली-खिली दिखाई दे रही हैं। ये भीतर से भी इतनी ही प्रसन्न और उल्लसित हैं या यह सब चेहरे और मन के बीच बहुत चौड़ी खाई बनाए रखने की इनकी प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग का चमत्कार है? मानवीय संबंध कैसे-कैसे होते जा रहे हैं! यह धुर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव है या आर्थिक और तकनीकी विकास के कारण इन्हें ये दिन देखने पड़ रहे हैं?

हमारे लिए नियत दो घंटे की अवधि जल्दी ही बीत गई। उसका बेटा बिल लेकर प्रोफ़ेसर कियोशिमा के सामने पहुँचा और वह खुद पीछे की ओर जाकर वहाँ की व्यवस्था का जायजा लेने लगी। मैंने अपनी जेब से दस-दस हज़ार येन के दो नोट निकाले, और प्रोफ़ेसर कियोशिमा की कुर्सी के पास पहुँचा। उन्होंने मुझे बिल अदा करने से रोक दिया और अपने कार्ड से पेमेंट कर दी। बिल मेरे अनुमान से लगभग लगभग दो गुना ज़्यादा था। दिनचर्या का तनाव दूर करने और बतियाने के नाम पर काफ़ी पैसे ऐंठे गए। हम चले तो वह लिफ़्ट के दरवाज़े तक आई। ज़रा-ज़रा-सी हमारे गले मिली और फिर से आने का निवेदन करके उसने हाथ में पकड़े रिमोट का बटन दबाकर लिफ़्ट का दरवाज़ा खोल दिया।

(३)
घर पहुँचते-पहुँचते देर हो गई थी। अकेलेपन का एहसास तो ठिठक गया था, पर फिर भी मैं भीतर से व्याकुल था। अपनी बेचैनी का कारण समझ नहीं आ रहा था। माँ और भाई साहब से फ़ोन पर बात करने के बाद भी चैन नहीं पड़ा। 'ममा-सां' के ठिकाने पर हुए अनुभवों से मैं हतप्रभ था। यदि उनके निजी व रक्त-संबंध इतने लचर और दुर्बल हैं तो फिर उल्लास और खुशी का स्रोत कहाँ से फूटता है? व्यवहार की यह चहक-महक यदि नक़ली है तो निरंतर इस नक़लीपन को असली जैसा बनाए रखना कैसे मुमकिन हो पाता है? चेहरे और मन के बीच इतनी चौड़ी खाई कैसे बन सकती है? कोई 'ममा-सां' लगातार दो-दो घंटे अपने अनजाने-अधजाने ग्राहकों की जीवनचर्या और खुशियों-परेशानियों के बारे में भावपूर्ण बातचीत कैसे कर लेती है? क्या 'ममा-सां' की दुनिया केवल माया है, जिसमें फंसकर ग्राहक भ्रमवश प्रसन्न हो जाते हैं? एक छायालोक-मात्र है?

भारत के समाचार देखने के लिए मैंने टी. वी. ऒन किया तो पाया कि हिंदी के सब समाचार-चैनल बहुत गदगद थे कि जापान को पछाड़कर भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। यह सुनकर तो अच्छा लगा, पर आगे अपराध के समाचारों का सड़ांधता ज़खीरा था। मेरे शांत होते दिमाग के घोड़े फिर से दौड़ने लगे। भारत में भी तो संबंधों पर बर्फ़ गिर रही है। पारस्परिक ऊष्मा गायब हो रही है। तमाम नजदीकी और भावनात्मक रिश्ते उथले हो रहे हैं। बचे हुए संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। लिव-इन मे रहती प्रेमिकाओं की हत्याएँ हो रही हैं। वैवाहिक जीवन में दुतरफ़ा हिंसा और तलाक़ के मामलों की घुसपैठ बढ़ती जा रही है। सांप्रदायिक-जातिगत वैमनस्य तथा आर्थिक विषमता का बोलबाला है। दफ़्तरों में कामचोरी, लापरवाही और घूसखोरी पर लगाम नहीं लग पा रही।

भारत के मुकाबले जापान में अपराध-दर न के बराबर है। लोग कामचोर नहीं हैं। बल्कि उनके लिए तो ‘अल्कोहोलिक’ की तर्ज़ पर 'वर्कहोलिक' शब्द का इस्तेमाल होता रहा है। इन बातों को देखते हुए 'ममा-सां' का प्रतिष्ठान एक छायालोक मात्र होने के बावजूद इतना भी बुरा, बाँझ और बेकार नहीं है। जिस तरह डिब्बाबंद प्रोटीन किसी सीमा तक लाभदायक ज़रूर होता है, उसी तरह छायालोक भी व्यथित और हताश लोगों में ऊर्जा का संचार करता होगा।

टी. वी. बंद करके मैंने अपने-आपको बिस्तर के हवाले कर दिया। उम्मीद थी कि खूब गहरी नींद आएगी। पर उस रात भी नींद उखड़ी-उखड़ी ही रही।

   
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