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अभिव्यक्ति
में काका कालेलकर
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ललित निबंध में
मध्याह्न का काव्य
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काका कालेलकर
१ दिसम्बर,
१८८५ ई. को सतारा (महाराष्ट्र) में जन्मे काका कालेलकर का पूरा
नाम 'दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर' था। उन्होंने 'फ़र्ग्यूसन
कॉलेज', पुणे में शिक्षा प्राप्त की और शिक्षक के रूप में अपना
जीवन आरम्भ किया। १९९० में वे बेलगांव के गणेश विद्यालय के
प्रधानाध्यापक के रूप में बड़ौदा चले गए।
कुछ वर्षों बाद वे मोक्ष की खोज में हिमालय की ओर चल पड़े।
लगभग तीन वर्ष तक देश के विभिन्न भागों की २५०० मील की पैदल
यात्रा करते हुए उन्होंने अनुभव किया कि देश की स्वतंत्रता के
लिए प्रयत्न करना ही सबसे उत्तम मार्ग है और इसके लिए नई पीढ़ी
को तैयार करना चाहिए। कुछ दिन हरिद्वार और कुछ दिन हैदराबाद
(सिंध) में अध्यापन करने के बाद वे शिक्षक के रूप में शांति
निकेतन पहुँचे।
मराठी भाषी होने पर भी काकासाहेब ने मराठी से अधिक गुजराती और
राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा की है। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति,
भाषा आदि के क्षेत्रों में उनका योगदान अनुपम है। वे सही मायने
में विश्वकोश थे। राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, इतिहास,
भूगोल, अर्थशास्त्र, अध्यात्म आदि कोई भी ऐसा विषय नहीं है जिस
पर उन्होंने प्रामाणिक लेखन न किया हो।
१९५२ से १९६४ तक वे संसद के सदस्य भी रहे। १९६४ में उन्हें
'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। वे 'पिछड़ा वर्ग आयोग',
'बेसिक एजुकेशन बोर्ड', 'हिन्दुस्तानी प्रचार सभा', 'गांधी
विचार परिषद' के अध्यक्ष तथा 'गांधी स्मारक संग्रहालय' के
निदेशक रहे। काका कालेलकर ने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की
और गांधीवादी विचारों का प्रचार किया। वे ग्रामीण और कुटीर
उद्योगों के समर्थक थे। सामाजिक स्तर पर वे भेदभाव के विरोधी
थे। स्वातंत्र्य के सेनानी, लोकशिक्षक, पंडित, देश के
सांस्कृतिक दूत, साहित्य सेवक आदि सभी दृष्टियों से उनका
व्यक्तित्व महान है। सरदार पटेल विश्वविद्यालय, आणंद, गुजरात
विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ ने उन्हें मानद् डी. लिट्. से
और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने ‘फ़ैलो’ से अलंकृत किया।
आचार्य काकासाहेब कालेलकर का निधन २१ अगस्त, १९८१ को नई दिल्ली
में उनके ‘संनिधि’ आश्रम में हुआ। हिंदी गुजराती और मराठी में
उन्होंने लगभग १०० पुस्तकें लिखीं।
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