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पर्व परिचय


आदिवासियों का शिकार पर्व
फागुन में सेंदरा
- वाणी हेम्ब्रम


फागुन (फरवरी-मार्च) महीने में, विशेषकर झारखंड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में, सेंदरा (पारंपरिक शिकार पर्व) होली के आस-पास या फाल्गुन पूर्णिमा के समय मनाया जाता है। यह एक सामूहिक शिकार यात्रा है जो कुछ दिनों से लेकर हफ़्तों तक चल सकती है, जिसमें पुरुष जंगलों में जाकर पारंपरिक हथियारों से शिकार करते हैं।

'सेंदरा' का अर्थ शिकार है। इस कार्य में प्रकृति और मानव के बीच तालमेल विशिष्ट है, जो समुदाय की एकजुटता, शारीरिक क्षमता और प्रकृति के साथ संबंध को दर्शाता है। सेंदरा तीन प्रकार के होते हैं। १२ वर्षो में एक बार मनाए जाने वाली मुक्का सेंदरा, फागुन माह में होने वाली फागु सेंदरा और चैत-वैशाख माह में मनाया जाने वाला बाहा सेंदरा या विशु सेंदरा। बाहा सेंदरा के दौरान बड़े इलाके में शिकार करना होता है। जिसमें गाँव के पुरुष १५ दिनों तक जंगल में रहकर शिकार करते हैं।

अस्त्र-शस्त्र का पूजन और 'शगुन सुपड़ी' और उत्सव की तैयारी
माझी परगना के दशमत हांसदा इस प्राचीन संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि 'बाहा' के दिन गाँव के 'नायके' (पुजारी) के घर ग्रामीण अपने तीर-धनुष और अन्य पारंपरिक अस्त्र पूजा के लिए रखते हैं। साथ ही 'शगुन सुपड़ी' (मिट्टी का कलश) में जल भरकर रखा जाता है। अगले दिन शुभ मुहूर्त देखकर ग्रामीण इन्हीं अस्त्रों के साथ निकटवर्ती जंगलों में सेंदरा के लिए प्रस्थान करते हैं। जंगल से केवल शिकार ही नहीं, बल्कि विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियाँ भी लाई जाती हैं, जिन्हें बाद में पूरे गाँव में वितरित किया जाता है।

बाहा पर्व से पूर्व पूरे गाँव में उत्साह का वातावरण होता है। ग्रामीण अपने घरों का रंग-रोगन कर उन्हें सजाते हैं। उत्सव के दौरान युवा, बुजुर्ग और महिलाएँ अपनी पारंपरिक भाषा के गीतों पर थिरकते हैं। गाँव की महिलाएँ लोटे में जल लेकर अपने द्वारों पर 'सेंदरा बीर' के लौटने की प्रतीक्षा करती हैं, जो उनकी अटूट आस्था और स्नेह को दर्शाता है।

जंगल का रोमांच और प्रकृति से सहवास
जंगल प्रस्थान से पूर्व शिकारी पुरुष अपने गुरुओं के साथ कई दौर की बैठकें करते हैं। इन बैठकों में उन्हें विभिन्न पौधों के फल, फूल, जड़ और पत्तियों के औषधीय गुणों की जानकारी दी जाती है। गुरु जंगल की जड़ी बूटियों से पहचान के दौरान सेंदरा वीर को जानकारी देते हैं कि किस पौधे का फल-फूल, जड़ या पत्ते का उपयोग किस बीमारी की रोकथाम में कारगर होता है। यह पारंपरिक ज्ञान आदिवासी समाज के लिए अत्यंत उपयोगी होता है, जिसका लाभ वे जीवनभर उठाते हैं। जब 'सेंदरा बीर' (शिकारी) पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर लोकगीत गाते हुए जंगल में प्रवेश करते हैं, तब वे प्रकृति के साथ एकाकार होते हैं। यदि इस दौरान कोई जानवर उनके मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है, तभी वे उसका शिकार करते हैं।

एक सेंदरा शिकारी ने बताया यह परंपरा बेहद ही खूबसूरत तरीके से निभाई जाती है। बचपन में मुझे याद है जब सेंदरा जाने का समय होता था, सुबह जल्दी उठकर नहा-धोकर, नाश्ता- पानी करने के बाद दिन के भोजन को टिफिन में बाँधकर सुबह ९-९:३० बजे हम लोग जंगल के लिए निकल जाते थे। बीहड़ घनघोर जंगल, ऊँचे- नीचे पहाड़, टिलों को पार करते हुए जंगलों में जो भी जंगली जानवर जैसे खरगोश, सियार, गिलहरी, जंगली सुअर और विभिन्न प्रकार के पक्षी मिलते थे, उनका शिकार किया जाता था। विशेष रूप से इस सेंदरा में खरगोश को मारना शुभ माना जाता है, लेकिन इस दरमियान अगर जंगल में और भी अन्य जंगली जानवर मिले तो उनका भी शिकार किया जाता है। जंगलों में पंक्तिबद्ध तरीके से शिकार को ढूँढा जाता है, यह बेहद अनुशासित तरीके से होता है। दिन भर जंगलों में शिकार ढूँढते ढूँढते जब दोपहर हो जाती तब कहीं जंगल के बीच में जहाँ पर पानी की स्रोत पाया जाती है वहाँ पर दिन का भोजन करने के लिए रुका जाता है। भोजन पानी होने के बाद पुनः शिकार की खोज में फिर आगे बढ़ा जाता है। इस प्रकार शाम होते-होते वापस गाँव लौट आते हैं। ये प्रक्रिया पूरे सेंदरा के कार्यक्रम में लगातार चलती है।

परंपरागत स्वागत और जल की होली
सेंदरा से लौटते समय ग्रामीण ढोल, नगाड़ा और मांदर की थाप पर झूमते-गाते गाँव पहुँचते हैं। शिकार लेकर गाँव लौटने पर पुरुषों का भव्य स्वागत किया जाता है। महिलाएँ उनके पैर धोती हैं और उनके साथ पारंपरिक 'पानी वाली होली' खेलती हैं। आदिवासी समाज में इस जल-होली को अत्यंत पवित्र माना जाता है। उनके आगमन पर महिलाएँ तेल और जल से उनके पैर धोकर स्वागत करती हैं, उनका आशीर्वाद लेती हैं और घर में बने विभिन्न पकवान खिलाती है। पैर धोने की रस्म के पश्चात, रिश्ते में बड़े पुरुष महिलाओं पर जल की बूंदें छिड़ककर उन्हें शुभाशीष देते हैं। इस दरमियान गांव के बड़े बुजुर्ग द्वारा मंदार, ढोलक को बजाकर पूरे गाँव में शिकार किए गए जानवरों को इकट्ठा करके घुमाया जाता है और प्रत्येक घर से चंदा के रूप में कुछ ना कुछ दिया जाता है। यह परंपरा बहुत ही विलक्षण और गाँव की सामूहिकता को प्रदर्शित करती है। इस प्रकार दो दिन तक शिकार करने के बाद तीसरे दिन सभी मारे गए जानवरों, पक्षियों को एक जगह पर ले जाकर उनको पकाने हेतु तैयार किया जाता है और उन्हें प्रत्येक परिवार के हिस्से बराबर बराबर बाँटा जाता है, यह बेहद अनुशासित रूप से किया जाता है। इस अवसर पर महिलाएँ लौटते हुए पुरुषों पर जल की बौछार करती हैं, जिसे आदिवासी समाज में 'पानी की होली' कहा जाता है। इस दौरान ग्रामीणों को पारंपरिक रूप से चना और हड़िया (पेय) भी परोसा जाता है।

भविष्य का संकेत देता कलश
गाँव की महिलाएँ उत्सुकता से सेंदरा वीरों की प्रतीक्षा करती हैं। दशमत हांसदा के अनुसार, 'शगुन सुपड़ी' का जल पूरे वर्ष के भविष्य का संकेत देता है। यदि कलश में पानी लबालब भरा हो, तो मान्यता है कि उस वर्ष फसल अच्छी होगी और गाँव में सुख-समृद्धि आएगी। इसके विपरीत, जल कम होने पर आने वाले संकट की आशंका जताई जाती है, जिसके लिए समाज पूर्व में ही मानसिक रूप से तैयार हो जाता है। संतोष की बात यह है कि आज की युवा पीढ़ी भी इस परंपरा से गहरे से जुड़ी हुई है।

रंगों का वर्जना और प्रकृति का प्रेम
बाहा सेंदरा के दौरान गाँव का दृश्य अद्भुत और तनावमुक्त होता है। गाँव के 'छोटे प्रधान' चंपई मुर्मू को अपनी इस विरासत पर गर्व है। वे बताते हैं कि आदिवासी समाज में रंगों वाली होली नहीं खेली जाती। जल भी केवल उन्हीं पर डाला जाता है, जिनसे पारिवारिक या मर्यादापूर्ण रिश्ता हो। यहाँ रंग का प्रयोग केवल विवाह के समय ही होता है। सामाजिक मान्यता है कि यदि किसी अविवाहित युवती पर रंग लग जाए, तो उसे 'छड़वी' (परित्यक्ता या सामाजिक रूप से भिन्न) माना जाने लगता है, इसलिए प्रकृति प्रदत्त शुद्ध जल से ही होली खेलने का विधान है।

परंपराओं की निरंतरता और कल्याण की भावना
जाहेर स्थान कमेटी के अध्यक्ष भोक्ता हांसदा बताते हैं कि वर्तमान में कई स्थानों पर प्रतीकात्मक रूप से मुर्गी का शिकार कर सेंदरा की रस्म पूरी की जाती है। इसके साथ ही अगले वर्ष के सेंदरा की तैयारियाँ भी आरंभ हो जाती हैं। 'जाहेर स्थान' (पूजा स्थल) पर सामूहिक प्रार्थनाएँ की जाती हैं, जिनमें केवल निजी स्वार्थ नहीं बल्कि पूरे देश और मानवता के कल्याण की भावना निहित होती है। इन्हीं लोक-कल्याणकारी प्रार्थनाओं के साथ सेंदरा पर्व संपन्न होता है।

१ मार्च २०२५

 
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